मुख्यमंत्री पद की दौड़ से स्तब्ध हुई सोनिया

लालकृष्ण आडवाणी भी श्रध्दांजलि देकर लौटे। तो जन सैलाब से अभिभूत थे। आखिर राजशेखर रेड्डी ने आंध्र में करिश्मा न किया होता। तो 2004 में एनडीए सरकार जाती ही नहीं। देर-सबेर आडवाणी पीएम हो जाते। सोनिया गांधी के बहुत करीब थे राजशेखर रेड्डी। पर अपन ने सालों पहले कहीं पढ़ा था- 'मरने वालों के साथ कोई मर नहीं जाता।' जीवन की यह सच्चाई सब जगह लागू नहीं होती। एमजीआर की मौत हुई। तो तमिलनाडु में दर्जनों ने आत्महत्या की। कन्नड़ हीरो राजकुमार का अपहरण हुआ। तो कर्नाटक में कई दीवाने जल मरे। अब ऐसी ही खबरें राजशेखर रेड्डी के दीवानों की। अपन राजशेखर रेड्डी के पुराने इतिहास पर नहीं जाते। इतिहास में सफेद हो तो काला भी होगा। पर आज बात सिर्फ सफेद की। राजशेखर के पास पहुंचकर कोई कभी खाली हाथ नहीं लौटा। अगर कोई कालेज में एडमिशन के लिए भी गया। तो सिर्फ सिफारिश हल नहीं होता था। सिफारिश से एडमिशन न हो। तो वह पूछते थे- 'कितनी डोनेशन मांग रहे हैं?' अपनी जेब से पैसे दे दिया करते थे। यह दानवीर कंगाली की हालत में पहुंच गया था। बैंक पर कर्जो का भार था। पर जब इस दुनिया से उठा। तो हजारों करोड़ का मालिक था। बेराइट की खदानों के खूनी संघर्ष के किस्से याद कराने का दिन नहीं। आज बात राजशेखर रेड्डी की राजनीतिक विरासत की। तो कौन होगा राजशेखर की कुर्सी का वारिस। क्या छत्तीस साल का बेटा जगन्न मोहन रेड्डी? सोनिया शुक्रवार को श्रध्दांजलि देने गई। तो राजशेखर के समर्थकों ने मेमोरेंडम दे दिया। मेमोरेंडम पर 120 विधायकों के दस्तखत। इनमें मौजूदा सभी मंत्री भी शामिल। अपन दावे से तो नहीं कह सकते। पर खबर है- दस्तखत के रोसैया के भी। रोसैया सीएम की शपथ ले चुके। अपन बता दें- संविधान में एक्टिंग सीएम का कहीं जिक्र नहीं। ना ही रोसैया ने एक्टिंग सीएम की शपथ ली। पर लाख टके का सवाल। क्या सोनिया पर मेमोरेंडम का असर होगा? वैसे तो सोनिया का झुकाव जगन्न रेड्डी की तरफ ही होगा। पर बॉडी लेंग्वेज राजनीतिक कदम का इशारा हो। तो जगन्न के फौरी सीएम बनने के आसार नहीं। सोनिया को हैदराबाद से पुलीवेंदुला भी जाना था। पुलीवेंदुला में हुआ राजशेखर का क्रिश्चियन रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार। आठ जुलाई 1949 को वहीं पर पैदा हुए थे राजशेखर। पर सोनिया लौट आई हैदराबाद से ही। राहुल गांधी भी वहीं से लौट आए। मनमोहन सिंह भी। क्या सोनिया मुख्यमंत्री पद की दौड़ से निराश होकर लौटी? तो क्या हाईकमान को दस्तखत मुहिम पर ऐतराज? मुहिम समर्थकों की होती। तो कोई बात नहीं थी। शवयात्रा में जगन्न के व्यवहार से भी राजनीतिक दावेदारी की झलक दिखी। यों वीरप्पा मोइली ने कहा है- 'हाईकमान विधायकों की राय से ही फैसला करेगा।' पर क्या मौजूदा राय अगले पंद्रह-बीस दिनों में भी बरकरार रहेगी। चेन्ना रेड्डी के बेटे शशिधर रेड्डी का दावा भी होगा। दावेदार तो दीवाकर, श्रीनिवास, हनुमंत राव, जयपाल रेड्डी भी होंगे। यों बताते जाएं- आंध्र की आर्थिक हालत बेहद खस्ता। यह मौजूदा सीएम रोसैया से ज्यादा कोई नहीं जानता। वह राजशेखर के वित्त मंत्री थे। जनकल्याण की योजनाएं चलाना अलग बात। बजट के मुताबिक योजनाएं चलाना अलग बात। तो क्या सोनिया अनाड़ी वारिस बिठाकर जुआ खेलेंगी? दिल्ली के राजनीतिक गलियारों से कोई साफ संकेत नहीं। फूंक-फूंककर कदम रखने के संकेत जरूर। ऐसा ही हुआ, तो जल्द फैसला हो। यह जरूरी भी नहीं। क्यों नहीं बने रह सकते रोसैया। रोसैया ने तो कह दिया- 'मेरी कोई ख्वाहिश नहीं। हाईकमान जो तय करे, वह मंजूर।' अपन बताते जाएं- रोसैया ही सबसे नजदीक थे राजशेखर रेड्डी के। यों राजशेखर से सोलह साल बड़े। राजनीतिक अनुभव भी बहुत ज्यादा। एक बार एमपी भी रहे। पंद्रह साल तक वित्त मंत्री रहने का रिकार्ड। सो जरूरी नहीं, जगन्न रेड्डी सीएम बन पाएं। पर जगन्न रेड्डी के समर्थकों की दलील का क्या करेंगी सोनिया। दलील है- 'राजीव चालीस साल की उम्र में पीएम बन सकते हैं। तो छत्तीस साल की उम्र में जगन्न रेड्डी सीएम क्यों नहीं?'

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