निकले, तो बड़े बेआबरू होकर बीजेपी से निकले

शिमला में रिज के पीछे से सड़क जाती है जाखू। जाखू हनुमान का प्राचीन मंदिर। कहावत है- लक्ष्मण मूर्छित हुए। लंका के वैद्य सुशैन ने हिमालय से बूटी लाने को कहा। तो पवनपुत्र समुद्र किनारे से चलकर यहीं आकर रुके थे। बुधवार को जसवंत सिंह बीजेपी से निकाले गए। तो उनने खुद को हनुमान कहा। बोले- 'मुझे पार्टी के हनुमान से रावण बना दिया गया।' जाखू मंदिर के कारण ही खुद को हनुमान समझ बैठे होंगे जसवंत। बुधवार को बीजेपी की चिंतन बैठक शुरू होनी थी। यों हार के तीन महीने बाद चिंतन का क्या मतलब। चिंतन पहले मुंबई में होना था। फिर शिमला तय हुआ। पर चिंतन से पहले नई चिंताओं ने घेर लिया बीजेपी को। पहले वसुंधरा ने आंख दिखाई। फिर जसवंत सिंह की किताब। किताब 'जिन्ना-इंडिया, पार्टीशन, इंडीपेंडेंस' सोमवार को रिलीज हुई। छह सौ पेज की किताब चौबीस घंटे में किसी ने पढ़ी भी होगी। तो सिर्फ लालकृष्ण आडवाणी ने। बीजेपी में वही सबसे बड़े पढाकू। यों भी किताब बीजेपी से निकालने की वजह बनेगी। यह सोचा न होगा। सोचा होता, तो जसवंत सिंह शिमला जाते ही क्यों। यह अलग बात। जो पिटर हाफ की बजाए होटल सिसिल में रुके। कोई ज्यादा दूर नहीं पिटर हाफ से। चार साल पहले 31 दिसंबर को अपन पिटर हाफ में रुके। तो अरुण जेटली तब सिसिल में थे। अब जब हिमाचल में बीजेपी सरकार। तो सरकारी पिटर हाफ में शुरू हुआ बीजेपी का चिंतन-मंथन। आडवाणी-जेटली समेत सभी रुके भी वहीं। अपन को छह साल पहले की बात भी याद। जब अक्टूबर 2003 में कांग्रेस की चिंतन बैठक हुई। तब भी यही पिटर हाफ था। तब वहां कांग्रेस की सरकार थी। पर अपन बात कर रहे थे जसवंत सिंह की। स्वप्न दासगुप्त ने किताब पढ़ ली। बीजेपी की इलेक्शन मैनेजमेंट कमेटी के मेंबर थे स्वप्न। वह एक चैनल पर बता रहे थे- 'किताब में ऐसा कुछ नहीं। जैसा उनने करण थापर को दिए इंटरव्यू में कहा।' अपन को याद आया। आडवाणी की 'माई कंट्री, माई लाइफ' रिलीज हुई। तो किताब से ज्यादा विवाद में फंसा था इंटरव्यू। किताब में उनने कहीं नहीं लिखा- 'कंधार के विमान अपहर्ताओं को छोड़ने की जानकारी नहीं थी।' उनने शेखर गुप्ता के 'वाक दि टाक' इंटरव्यू में कहा था- 'जसवंत सिंह के उसी विमान में जाने की मुझे कोई जानकारी नहीं थी।' तो अब जसवंत सिंह ने करण थापर के 'डेविल्स एडवोकेट' इंटरव्यू में कहा- 'जिन्ना हिंदू विरोधी नहीं थे। उनके मतभेद कांग्रेस से थे। बंटवारे पर हामी नेहरू और पटेल ने भरी।' पर संघ परिवार 62 साल से जिन्ना को बंटवारे का जिम्मेवार ही नहीं। हिंदू विरोधी भी ठहराता आया।  जिस जिन्ना को खलनायक बताता रहा। उसे नायक कैसे मान ले संघ परिवार। इसीलिए जब आडवाणी ने कहा- 'जिन्ना सेक्युलर पाकिस्तान बनाना चाहते थे।' तो अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा। आडवाणी ने गलत नहीं कहा था। जिन्ना ने संविधान सभा में ऐसे ही पाक की कल्पना की थी। जो हो तो मुस्लिम देश। पर हिंदुओं, ईसाईयों, सिखों को बराबर हक हो। कहा जसवंत सिंह ने भी गलत नहीं। जिन्ना ने ही मुसलमानों के लिए अलग देश मांगा। पर वह आखिर में भारत के अंदर मुस्लिम स्टेट के लिए राजी थे। नेहरू ने ही अंग्रेजों की बंटवारे की ख्वाहिश पर मुहर लगाई। नेहरू के साथ पटेल थे। यही बात संघ परिवार के हलक नहीं उतर रही। पटेल कांग्रेस के उतने शिखर पुरुष नहीं। जितने संघ परिवार के। कांग्रेस के शिखर पुरुष तो होंगे भी कैसे। कांग्रेस पर तो नेहरू परिवार का कब्जा। पर बात जिन्ना के मुद्दे पर जसवंत को निकालने की। किताब रिसर्च पर आधारित। किताब बुध्दि से जुड़ा काम। भावनाओं और विचारधारा पर आधारित नहीं। सो जसवंत सिंह को इस मुद्दे पर निकालना शायद ही किसी को जंचे। निकालने को तो तब भी काफी था। जब उनने हार के बाद बयानबाजी की। जब उनने पार्लियामेंट्री बोर्ड में सर्कुलर बांटा। उससे पहले तो प्रेस को लीक कर दिया था। तब ही अनुशासनहीनता में निकाल देते। तो बेहतर होता। यों सभी ने यह मौका देखा होगा। वरना जसवंत सिंह से पार्टी परेशान तो एक अर्से से थी। अब आंख दिखाने वाली वसुंधरा भी सावधान हो जाएं। नाक-भौं सिकोड़ने वाले शौरी और सिन्हा भी।

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