राजनैतिक से नैतिकता विहीन राजनीति तक

पहले बात अपनी दो खबरों की। अपन ने 24 जुलाई को लिखा था- 'सरकार कूटनीति में पैदल, राहुल राजनीति में मस्त।' तो अपन ने उसमें लिखा था- 'राहुल ने चिदंबरम को मेमोरेंडम दिया। अब 28 या 29 को मनमोहन सिंह को भी देंगे।' तो 28 जुलाई को राहुल की हो गई मनमोहन से मुलाकात। यूपी के सारे एमपी-एमएलए साथ थे। मायावती की जमकर शिकायतें हुई। अब बात दूसरी खबर की। तो अपन ने 17 जुलाई को लिखा था- 'साझा बयान में हाफिज सईद का जिक्र तक नहीं। अब पाक की सुप्रीम कोर्ट से बरी होंगे। तो पाक बेशर्मी से कहेगा- अदालतें तो सरकार के बस में नहीं।' आखिर वही हुआ। अदालत के सिर ठीकरा फोड़ना तो दूर की बात। पाक सरकार ने साझा बयान के बारहवें दिन ही कह दिया- 'हाफिज सईद के खिलाफ कोई सबूत नहीं। बिना सबूत गिरफ्तार नहीं कर सकते।' यह बयान है पाकिस्तान के होम मिनिस्टर रहमान मलिक का। जो साझा बयान पर संसद में मनमोहन की सफाई से एक दिन पहले आया। आप रहमान मलिक के साथ जनरल कियानी का बयान भी पढ़िए। जनरल कियानी ने कहा है- 'भारत पहले बलूचिस्तान में आतंकवाद रोके। फिर पाक लश्कर-ए-तोएबा पर कार्रवाई करेगा।' इसीलिए तो अपन ने कहा था- 'तो मनमोहन सिंह मिस्र में जीती बाजी हारकर आए।' यह अहसास अब कांग्रेस को भी। सो आज मनमोहन की सफाई का इंतजार। पर इंतजार से पहले मंगलवार को विपक्ष राष्ट्रपति से मिला। विपक्ष के नेता आडवाणी की रहनुमाई में। बाहर निकले तो आडवाण बोले- 'हमने राष्ट्रपति से कहा- वह पीएम को सही सलाह दें। पीएम ने आतंकवाद और बलूचिस्तान पर गलत स्टेंड लिया।' बात राष्ट्रपति की चली। तो बताते चलें- मनमोहन से खफा चल रही कांग्रेस अब राष्ट्रपति से भी खफा। शुक्रवार को राष्ट्रपति के सेक्रेट्री क्रिस्टि फर्नाडीस ने कह दिया- 'किसानों के कर्ज तो राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने माफ कराए थे।' अब कर्जमाफी का सेहरा सोनिया के सिवा कोई अपने सिर बांधे। तो कांग्रेसियों का भेजा खराब होगा ही। सो अभिषेक मनु सिंघवी ने साफ कहा- 'यह आइडिया तो सोनिया गांधी का था। कोई भी इसका श्रेय नहीं ले सकता।' पर बात मंगलवार के राजनीतिक ड्रामे की। जो दिल्ली में नहीं। अलबत्ता जम्मू कश्मीर में हुआ। अपन उस ड्रामे की बात करेंगे। पर पहले बात रंगीन मिजाज फारुख अब्दुल्ला से एक टीवी इंटरव्यू की। फारुख से पूछा गया- 'आपके बेटे में तो आप जैसे गुण नहीं।' फारुख बोले- 'मेरे बेटे को जीवन जीना ही नहीं आता।' उमर अब्दुल्ला पर लगे आरोप भले गलत हों। पर फारुख अब्दुल्ला को खुश होना चाहिए। कोई उनके बेटे को रंगीन मिजाज कहने वाला तो हुआ। तो बात मंगलवार को जम्मू कश्मीर एसेंबली में हुए हंगामे की। पीडीपी के मुजफ्फर बेग ने कहा- '2006 के सेक्स स्केंडल में उमर अब्दुल्ला का नाम 102 नंबर पर। फारुख अब्दुल्ला का 38वें नंबर पर।' उमर अब्दुल्ला को अपन जानते न होते। तो मुजफ्फर बेग के आरोपों पर भरोसा करते। पर अपने बाप से एकदम अलग उमर अब्दुल्ला तैश में आ गए। उनने एसेंबली में इस्तीफे का ऐलान कर दिया। वह एसेंबली से निकल फारुख के साथ राजभवन गए। गवर्नर एनएन वोरा को इस्तीफा दे आए। यह तो शुकर जो वोरा ने इस तरह इस्तीफा मंजूर नहीं किया। पर केंद्र में सरकार अपनी हो। तो सीबीआई के काम का तरीका देखिए। तुरत-फुरत कह दिया- 'उमर अब्दुल्ला का नाम तो कभी आया ही नहीं। लिस्ट तो 37 की थी।' तो बता दें- तब पीडीपी-कांग्रेस सरकार थी। पीडीपी के दो मंत्रियों जीए मीर और रमण मट्टू सेक्स स्केंडल में फंसे। तो इस्तीफा देना पड़ा था। खैर अटकलों का बाजार गर्म। उमर की जगह फारुख अब्दुल्ला लेंगे। वैसे भी फारुख को दिल्ली में मजा नहीं आ रहा। ताकि सनद रहे। सो याद करा दें- 2006 में सामने आया था सेक्स स्केंडल। सबीना नाम की महिला गिरफ्तार हुई। तो उसने खुलासा किया- 'राजनेताओं, अधिकारियों, पुलिस अफसरों को नाबालिक लड़कियां सप्लाई करती थी।' तब कोई ही राजनेता बचा होगा। जिस पर शक की सुई नहीं अटकी। तब एक लंबी-चौड़ी लिस्ट भी बनी। सौ से ज्यादा की लिस्ट। पर सीबीआई ने अब कहा- 'हमारी सूची में सिर्फ 37 नाम।' सो अब जम्मू कश्मीर का नैतिकताविहीन राजनीतिक ड्रामा चलेगा।

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