सरकार कूटनीति में पैदल राहुल राजनीति में मस्त

राजनीति अपनी जगह। कूटनीति अपनी जगह। राजनीति में होगा कांग्रेस का सितारा बुलंद। पर कूटनीति में कांग्रेस की चूल्हें हिल गई। नटवर सिंह के बिना तो कांग्रेस कूटनीति में लाचार। प्रणव दा भी काम चला ले गए थे। पर प्रणव दा कूटनीति करते। तो कांग्रेस घरेलू राजनीति में चप्पे-चप्पे पर फंसती। सो पहले बात राजनीति की। लालू-मुलायम अपनी सुरक्षा के लिए पहले चिदम्बरम से मिले। फिर मायावती से भिड़ंत शुरू हो गई। यूपी-बिहार वालों का गुरुवार का सारा दिन बॉडीगार्डों की राजनीति में बीता। संसद के दोनों सदन अखाड़ा बन गए। पृथ्वीराज चव्हाण ने राज्यसभा में सुरक्षा बरकरार रखने का वादा किया। तो वही वादा लोकसभा में ही दोहराने पर अड़ गए। अपने पवन बंसल भी क्या करते। चव्हाण का बयान दोहरा दिया। प्रणव दा को भी सफाई देनी पड़ी। पर ऐसा नहीं, जो कुछ हुआ ही न हो। बुधवार को लालू-मुलायम धममियां दे रहे थे। तो सामने बैठे चिदम्बरम ने खंडन नहीं किया। गुरुवार को भी उनने इतना ही कहा- 'समीक्षा होती रहती है। अभी किसी की सुरक्षा घटाने का फैसला नहीं हुआ।' मतलब- फैसला अभी  होगा। सत्रावसान होने दीजिए।  लालू-मुलायम-मायावादी सुरक्षा बंदोबस्त पर भिड़ते रहे। पर राहुल गांधी यूपी-बिहार की रणनीति में व्यस्त-मस्त। उनने बुधवार को यूथ कांग्रेस की क्लास ली। तो गुरुवार को पी चिदम्बरम को मेमोरेंडम दिया। है ना हैरानी की बात। पी चिदम्बरम को संदेशा भेजते। तो वह खुद मेमोरेंडम लेने चले आते। खैर मेमोरेंडम का मजमून था- यूपी का लॉ एंड आर्डर। बात यूपी के लॉ एंड आर्डर की चली। तो याद करा दें- रीता बहुगुणा गिरफ्तार हुई थी। तो बहुतेरों को लगता था- अध्यक्ष पद से हटा दी जाएगी। पर अपन ने तभी लिखा था- 'लोक दिखावे के लिए नोटिस-वोटिस ही होगा।' तो कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह अब पूरी तरह रीता बहुगुणा के साथ। दिग्विजय सिंह ने गुरुवार को सोनिया से मुलाकात की। तो रीता बहुगुणा का बचाव किया। मुद्दा था- यूपी का लॉ एंड आर्डर। तो अब चार अगस्त को को-आर्डिनेशन कमेटी बैठेगी। तय होगा- यूपी में जेल भरो आंदोलन। सोचो, अगर राहुल गांधी ने खुद गिरफ्तारी दी। तो क्या होगा। कांग्रेसी देशभर में सड़कों पर उतर आएंगे। ऐसा ड्रामा अपन पहले भी देख चुके। गांधी परिवार पर कोई आंच आई नहीं। सड़कों पर उतरे नहीं। पर राहुल गांधी यूपी को लेकर बेहद संजीदा। चिदम्बरम के बाद अब मनमोहन सिंह को मेमोरेंडम देंगे। अठाईस नहीं, तो उनतीस को। मुद्दा होगा- बुंदेलखंड के लिए पैकेज। मायावती कितनी बार मांग चुकी। मनमोहन के कान पर जूं नहीं रेंगी। पर अब राहुल के मेमोरेंडम के बाद पैकेज आना तय। पर अब बात मनमोहन सिंह की कूटनीतिक विफलताओं की। गुरुवार को इस्लामाबाद के 'डॉन' ने अपने संपादकीय में लिखा है- 'गिलानी ने मिस्र में मनमोहन को ब्लूचिस्तान का डोजियर सौंपा।' अपन ब्लूचिस्तान का जिक्र यहां कई बार कर चुके। मुशर्रफ आतंकवाद को जंग-ए-आजादी बनाने पर तुले थे। तो वाजपेयी ने आगरा से बैरंग लौटा दिया। पर मनमोहन ब्लूचिस्तान की जंग-ए-आजादी को आतंकवाद बना आए। वह भी भारत को कटघरे में खड़ा कर आए। 'डॉन' लिखता है- 'काबुल के जरिए ब्लूचिस्तान में अलगाववादियों को मदद दे रहा है भारत।' पर बात डोजियर की। कहा जा रहा है- डोजियर में भारत के खिलाफ सबूत। पर पीएमओ की तरफ से कोई सफाई नहीं आई। न ही विदेश मंत्रालय से। अपने विदेश मंत्री एसएम कृष्णा तो फुकेत में शाह महमूद कुरैशी से हाथ मिलाने में मशगूल थे। स्टेट मिनिस्टर शशि थरूर और प्रणीत कौर के बयानों में विरोधाभास देखिए। प्रणीत कौर बोली- 'ऐसा कोई डोजियर नहीं मिला।' पर शशि थरूर बोले- 'मैंने ऐसा कोई डोजियर नहीं देखा। होगा, तो मंत्रालय में देखा जा रहा होगा। पढ़ लेंगे, तो रिएक्शन देंगे। पाकिस्तानी मीडिया की रिपोर्टो पर तो भरोसा नहीं कर सकते।' आपको गफलत में नहीं दिखती सरकार। अपन को तो कूटनीति के मामले में पूरी तरह गफलत में दिखी।

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