पाक नहीं बदला, फिर भी मनमोहन बात को राजी

अपने यहां फैमिली प्लानिंग की आवाज उठाना गुनाह। जब-जब कानून की बात उठी। खुदा की नियामत बताकर मुखालफत हुई। बंदे मातरम् पर भी बंट जाती है अपनी संसद। फैमिली प्लानिग तो दूर की बात। अपन आज यह सवाल न उठाते। अगर मुस्लिम देश में कानून की बात न उठती। पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली में उठा है सवाल। पीएमएल-क्यू के मेंबर रियाज फालियाना ने एसेंबली में कहा- 'दो से ज्यादा बच्चों पर टैक्स लगाया जाए। तभी आबादी पर कंट्रोल होगा।' यों दकियानुसियों ने मुखालफत की। पर बहुतेरे मेंबर समर्थन में भी उठे। बाकायदा बहस हो गई। अपने यहां तो संसद में बहस भी नहीं होती। पाक में तो कानून बनाने की बहस भी चल निकली। अपन नहीं जानते- कानून बना पाएंगे या नहीं। पर बहस में एक सुझाव आया- 'कानून बनने के दस महीने बाद लागू हो।' यों पाक की नेशनल एसेंबली मे महिला आरक्षण भी लागू। सो क्या आबादी पर भी अपन पाक के पिछलग्गू बनेंगे। बात पाक की शुरू हो गई। तो पाक का आतंकवाद पर बदलता रुख भी बता दें। अपन पाक की अंदरुनी राजनीति से वाकिफ। कई बार तो समझ नहीं आता- पाक में शासन किसका? सेना का, राजनीतिज्ञों का, या आंतकियों का। अब आतंकवादी हाफिज मुहम्मद सईद को ही लो। अपन मुंबई हमले में सईद के हाथ का सबूत दे चुके। वह पढ़कर नहीं देख रही पाक सरकार। सुरक्षा परिषद ने जमात-उद-दावा पर रोक लगाई। तो पाक सरकार ने सईद को नजर बंद किया। पर हाईकोर्ट में सबूत नहीं दिए। तो छूटना ही था। सो दो जून को छूट गए। तो बवाल हुआ। अपन ने भी पाक को कटघरे में खड़ा किया। अमेरिका ने भी ऐतराज किया। आखिर यह सुरक्षा परिषद के खिलाफ फैसला था। तो पाक सरकार अदालती आजादी की दुहाई देने लगी। पर जरदारी ने रूस में मनमोहन से वादा किया- 'सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।' जरदारी ने वादा निभाया। एक नहीं, दो चुनौतियां दी गई। पंजाब सरकार ने भी चुनौती दी। अपन बताते जाएं- पंजाब में नवाज शरीफ के भाई शाबाज की हुकूमत। जरदारी-नवाज में चूहे-बिल्ली का खेल तो आप जानते ही होंगे। दोनों में आठ नवंबर से बात नहीं हुई। पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। तो शाम को जरदारी ने नवाज को फोन लगाया। इस फोन का असर मंगलवार को दिख गया। जब पंजाब के एटार्नी जनरल मोहम्मद रजा फारूख ने कोर्ट में कहा- 'सईद के खिलाफ कोई सबूत नहीं। फेडरल हुकूमत के कहने पर अपील दायर की थी। फेडरल हुकूमत ने कोई सबूत नहीं दिए। सो सूबे की हुकूमत अपील वापस लेती है।' सुप्रीम कोर्ट ने फेडरल हुकूमत के वकील शाह खांवर से पूछा। तो उसने आपसी सलाह-मशविरे के लिए वक्त मांगा। अदालत ने कुछ वक्त दिया। तो दोनों ने सलाह-मशविरा कर अदालत से दो दिन की मोहलत मांग ली। अदालत अब सोलह जुलाई को सुनवाई करेगी। पर यह दो दिन की मोहलत क्यों? यह नौटंकी ठीक उस समय हुई। जब मंगलवार की रात ही शिवशंकर मैनन की सलमान बशीर से मुलाकात तय थी। यह मुलाकात होनी थी मिस्र के शहर शारम-अज-शेख में। जहां अपने पीएम दल-बल के साथ फ्रांस से पहुंच चुके। पाक के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी भी पहुंच चुके। यों नौटंकी में पाक का जवाब नहीं। मिस्र में सेक्रेटरी-पीएम लेवल की बात हो। उससे पहले शनिवार को इस्लामाबाद में मुंबई हमले की जांच रपट सौंप दी। अपने हाई कमिश्नर को मिली रिपोर्ट दिल्ली पहुंची। तो उसमें लीपापोती के अलावा कुछ खास नहीं। आप खुद सोचिए। एक तरफ हाफिज सईद को बचाने की कोशिश। दूसरी तरफ आतंकवाद के खिलाफ सहयोग का नाटक। अपन को तो मनमोहन सरकार की बात समझ नहीं आई। कहने को कहा- 'जब तक मुंबई के हमलावरों पर कार्रवाई के ठोस सबूत नहीं। तब तक बातचीत नहीं होगी।' पर बातचीत का एक दौर रूस में हो चुका। दूसरा मिस्र में  शुरू हो चुका।

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