स्पीकर के साथ टकराव की यह तो शुरूआत भर
फूंक-फूंककर कदम रखें। हर किसी पर शक करें। अपने नए सांसदों को यह संदेश है लालकृष्ण आडवाणी का। कहते हैं ना दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक पीता है। सो आडवाणी को डर- कहीं नए सांसद फजीहत न करा दें। जैसे चौदहवीं लोकसभा में आठ सांसदों ने कराई थी। सदन में सवाल पूछने के बदले पैसा लेने का मामला। याद आया आपको। ग्यारह सांसदों की मेंबरी गई थी। सो उनने अपने सांसदों को चेताया- 'किसी के झांसे में न आएं। कारपोरेट घरानों की जंग में न कूदें। एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए आपको इस्तेमाल करेंगे। सवालों के झोले लिए घूम रहे हैं। बिना सोचे-समझे किसी कागज पर दस्तखत न करें। प्राईवेट सेक्रेट्री भी सोच-समझ कर रखें।' आडवाणी की बात से अपन को याद आया। उनने वोटिंग मशीनों पर सवाल उठा दिया। कईयों की दुखती रग पर हाथ रख दिया। असलम शेर खान इस बार सागर से हारे। उनने कहा- 'जब तक वोटिंग मशीनें रहेंगी। मेरे जैसों का जीतना मुश्किल।' बात उनके हारने-जीतने की नहीं। बात वोटिंग मशीन पर शक की। नवीन चावला के सीईसी बनते ही सवाल उठा। अब इस सवाल को समर्थन मिलने लगा। आखिर आडवाणी का कांग्रेसी उम्मीदवार ने समर्थन किया। बात बर्खास्त सांसदों की चली। तो बताते जाएं। बीजेपी ने इस बार किसी बर्खास्त को टिकट नहीं दिया। पर कांग्रेस ने दिया राजा राम पाल को। वह जीतकर भी आए अकबरपुर से। बर्खास्त हुए तो मायावती के थे। बर्खास्तगी के बाद कांग्रेसी होने में मुश्किल नहीं आई। अपन दूध के धुलों का हिसाब नहीं बता रहे। पर हिसाब-किताब तो अपन को मंगलवार को लोकसभा में दिखा। जब पहले लालू यादव बिहारी स्पीकर मीरा कुमार से भिड़े। तो बाद में जद यू के बिहारी सांसद मीरा कुमार से भिड़ लिए। लालू बोले- 'हम जानते हैं, आप हमें बोलने नहीं देंगी। पर आप हमारी बोलती बंद नहीं कर सकती।' अपन को सोमनाथ चटर्जी की याद आ गई। पांचों साल ममता से नोंक-झोंक चलती रही। एक बार तो ममता ने ताव में इस्तीफा भी दे मारा। लोकसभा के सेक्रेट्री हुआ करते थे- सुभाष कश्यप। उनने एक इंटरव्यू में कह दिया- 'स्पीकर की ममता से बंगाल की पुरानी खुन्नस।' दादा ने कश्यप की खाट खड़ी कर दी। विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिलाया। प्रताड़ना देकर जान छोड़ी। अब अपन को वैसा ही मीरा कुमार से होता दिखा। बात हो रही थी बाढ़ राहत की। सुषमा स्वराज ने चिदंबरम पर चुटकी लेते कहा- 'राहत दीजिए। पर वैसा मत करिए। जैसा बिहार और उड़ीसा के साथ किया। राहत देकर वापस मांग ली थी।' चिदंबरम तो शायद भूल गए थे। उनने कहा- 'हमने ऐसा कभी नहीं किया।' बस फिर क्या था। हंगामा शुरू हो गया। शरद यादव ने खड़े होकर कहा- 'राज्य सरकार को चिट्ठी लिखी गई थी।' पर वह चिदंबरम ही क्या, जो सच को झूठ न बता दें। अपन याद करा दें। इसी बात पर चुनावों में नीतिश-मनमोहन भिड़े थे। तब मनमोहन ने नीतिश को फोन कर कहा था- 'कोई गलतफहमी हुई होगी। तो दूर कर लेंगे।' बात चिदंबरम की चली। तो उनके रुखेपन से कौन नहीं वाकिफ। वरुण गांधी अपनी सुरक्षा के लिए मिले। तो रुखेपन से बोले- 'मैं हर किसी की सुरक्षा नहीं देख सकता।' सुषमा ने यह मामला भी लोकसभा में उठाया। ताकि कुछ ऊंच-नीच हो जाए। तो सनद रहे। पर बात बाढ़ राहत की। बात चिदंबरम-शरद में से किसी एक के झूठ बोलने की नहीं। बात मीरा कुमार के शरद के कहे को रिकार्ड से निकालने की। इसी पर बवाल हो गया। चिदंबरम तो धरे रह गए। बिहार के सांसदों ने मीरा कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल लिया। सदन नहीं चला। स्पीकर के चैंबर में मामला सुलट गया। पर इसे आप अंत न समझिए। यह अगली जंग की शुरूआत समझिए। निशाने पर मीरा ही नहीं लालू भी होंगे। लालू तो दोनों ओर से घिरेंगे। कांग्रेस भी पीछा छुड़ाने के मूड में।
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