संस्कृति, सभ्यता, संविधान और हिंदू

हाल ही में अल कायदा ने अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश को सलाह दी कि अगर वह बचना चाहते हैं तो उन्हें इस्लाम कबूल कर लेना चाहिए। इससे भी पहले एक खबर आई कि एक ईसाई महिला पत्रकार का अपहरण किया गया और उसका धर्म परिवर्तन करवा कर मुक्त कर दिया गया। उसे धमकी दी गई कि वह अब मुस्लिम के तौर पर ही रहेगी। ईरान और अफगान से आए मुगलों ने हिंदुस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन करवाने की मुहिम छेड़ी थी, इसी वजह से कश्मीर में ज्यादातर आबादी मुस्लिम हो गई, जबकि वहां सौ फीसदी आबादी ब्राह्मणों की थी। कश्मीरी पंडितों की फरियाद पर ही गुरु तेगबहादुर ने बलिदान दिया और उसके बाद सिख मत का उदय हुआ। मुगलों ने हिंदुस्तान में न सिर्फ तलवार की नोंक पर धर्म परिवर्तन करवाया, अलबता हिंदुओं के हजारों साल पुराने मंदिरों को तोड़ा-फोड़ा और लूटा गया। मुगलों की इसी कारिस्तानी के खिलाफ देश भर में जगह-जगह लड़ाइयां होती रहीं। बंगाल से लेकर पंजाब तक, महाराष्ट्र से लेकर राजस्थान तक मुगलों से लड़ाइयां हुईं। बांग्ला भाषा में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 'आनंद मठ' नाम से जो उपन्यास लिखा उसमें भी मुसलमानों के तलवार की नोंक पर धर्म परिवर्तन करवाने की आलोचना की गई है। वंदे मातरम से मुसलमानों का विरोध सिर्फ इसलिए हैं क्योंकि वह 'आनंद मठ' में लिखा गया था।

धर्म परिवर्तन करवाने के मामले में ईसाइयों का रिकार्ड भी कोई कम नहीं। करीब छह साल पहले दिसंबर 1999 में मैं अंडमान निकोबार के काचाल नामक द्वीप में गया था तो वहां पाया कि ईसाइयों ने इस द्वीप के आदिवासियों का भी लालच देकर धर्म परिवर्तन करवा दिया। भारत में ब्रिटिश शासन खत्म होने के बाद धर्म परिवर्तन करवाने की मुहिम में तेजी आई है। वेटिकन सिटी से भेजे गए पादरियों ने देश भर के आदिवासी क्षेत्रों को धर्म परिवर्तन का क्षेत्र चुना। पूर्वोत्तर के सभी राज्य, उड़ीसा, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में पिछले पचास सालों में बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन की मुहिम चलाई। जगह-जगह पर हिंदुओं ने लालच से धर्म परिवर्तन करवाए जाने की मुखालफत की और तनाव पैदा हुआ। कई जगह पर हिंसक स्थिति भी पैदा हुई, जिससे समाज में वैमनस्य फैला। उड़ीसा में ग्राह्म स्टेंस की हत्या इसी वैमनस्य का नतीजा था, जो कई सालों से समाज सेवा के नाम पर धर्म परिवर्तन करवाने की मुहिम छेड़े हुए थे। हिंदू धर्म की बुराइयां निकाल कर, देवी-देवताओं की खिल्ली उड़ाकर, उनके लिए अपमानजनक और अश्लील टिप्पणियां करके ईसाई स्कूलों में पढ़ रहे अबोध बच्चों के मन पर हिंदू धर्म के खिलाफ नफरत फैलाने का काम आज भी किया जा रहा है।

लेकिन हिंदुओं ने दुनिया भर में कहीं भी, कभी भी धर्म परिवर्तन करवाने की कोई मुहिम नहीं छेड़ी। स्वामी दयानंद ने जरूर मुगलों की ओर से जबर्दस्ती मुसलमान बनाए गए हिंदुओं को वापस हिंदू धर्म में लाने के लिए शुध्दि अभियान चलाया था, जो आगे चलकर कई जगह पर सनातन धर्म ने भी अपनाया। लेकिन यह धर्म परिवर्तन कतई नहीं था, क्योंकि यूरोप से आए ईसाइयों या ईरान या अफगानिस्तान से आए मुसलमानों को हिंदू बनाने की मुहिम नहीं थी, अलबत्ता सिर्फ धर्म परिवर्तन करने वालों के शुध्दिकरण की मुहिम थी। हिंदुस्तान में सदियों-सदियों से हर धर्म को सम्मान दिया गया। हिंदू यहां की जीवन पध्दति है, इसका पूजा-पाठ से कोई ताल्लुक नहीं। इसीलिए जैन, सिख, बौध्द सभी खुद को हिंदू ही कहते रहे, क्योंकि यह सभी मत यहीं पर पनपे और उनका मूल हिंदू ही था। वे हिंदू होते हुए भी जैन, सिख, बौध्द थे। जैसे मूर्ति पूजा करने वाला भी हिंदू है और मूर्ति पूजा न करने वाला भी हिंदू है। आर्यसमाजी भी हिंदू है और सनातन धर्मी भी हिंदू है। हिंदू की यही परिभाषा संविधान में भी दर्ज है और सुप्रीम कोर्ट भी अपने फैसलों में यही परिभाषा दे चुकी है। सिर्फ मुसलमान और ईसाई ही खुद को बाकी धर्मों से ऊपर मानते हैं और पूरी दुनिया को मुसलमान और ईसाई बनाने की कोशिशों में जुटे रहते हैं। ईसाइयों और मुसलमानों की पूरी दुनिया को अपने रंग में रंग लेने की मुहिम शताब्दियों से चल रही है, जिस कारण भारत में हिंदू खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और उनमें असुरक्षा की भावना के कारण समय-समय पर आक्रोश पैदा होता रहा।

हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करवाने की मुहिम आठ सौ साल से चल रही है। पहले मुसलमानों ने ऐसी कोशिश की और अब ईसाई ऐसी कोशिश में जुटे हुए हैं। अगर ईसाइयों और मुसलमानों में हिंदुओं की तरह सब धर्मों को बराबर मानने की धारणा होती, तो धर्म परिवर्तन की जरूरत ही नहीं पड़ती। जब ईश्वर एक है तो कोई किसी भी पध्दति से उसका पूजा-पाठ करे, उससे क्या फर्क पड़ता है, धर्म परिवर्तन करवाने की जरूरत ही क्या है। यह व्यक्ति के विवेक पर छोड़ देना चाहिए कि वह किस रास्ते को अपनाता है। अपने धर्म को ऊंचा बताकर धर्म परिवर्तन की मुहिम मानवाधिकार विरोधी मानी जानी चाहिए। लेकिन इस तरह का कोई विचारणीय फैसला करने की बजाए धर्म परिवर्तन राजनीतिक दलों का वोट हासिल करने का जरिया बनकर रह गया। आजादी से पहले धर्म परिवर्तन हो रहा था और आजादी के बाद भी उस पर रोक नहीं लगी। अब कुछ राज्य सरकारों ने धर्म परिवर्तन के नियमों को कुछ कड़ा करने की कोशिश की है, ताकि डरा-धमका या लालच देकर धर्म परिवर्तन न करवाया जा सके, तो उसकी राजनीतिक तौर पर मुखालफत की जा रही है। जो भी गवर्नर राजनीतिक कारणों से धर्म परिवर्तनों को कानून-कायदे के दायरे में लाने में रुकावट बन रहे हैं, वे निश्चित रूप से धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन कर रहे हैं।

राजस्थान की गवर्नर प्रतिभा पाटिल ने राजस्थान विधानसभा से पारित बिल पर अभी मोहर नहीं लगाई, बावजूद इसके कि उन्होंने जो आपत्तियां उठाई थीं, उनका राज्य मंत्रिमंडल जवाब दे चुका है। इसी तरह का विवाद अब गुजरात विधानसभा की ओर से पारित बिल में भी पैदा करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि गुजरात के राज्यपाल नवल किशोर शर्मा के बारे में यह आम धारणा है कि वह राजनीतिक दबाव में कोई फैसला नहीं करते और माना जा रहा है कि इस बिल में उन्हें कोई संवैधानिक खामी नजर नहीं आई तो वह बिल पर दस्तखत कर देंगे। अब सवाल पैदा होता है कि विवाद किस बात पर खड़ा किया जा रहा है। विवाद इस बात पर खड़ा किया जा रहा है कि हिंदुओं के साथ-साथ बौध्दों और जैनों के धर्म परिवर्तन करके मुसलमान या ईसाई बनने पर जिला कलेक्टर को पहले सूचना देनी होगी। यह प्रावधान इसलिए किया गया है कि अगर धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति खुद जिला मुख्यालय में जाकर समय रहते धर्म परिवर्तन की इजाजत मांगेगा तो ईसाइयों पर जबरन धर्म परिवर्तन करवाने का आरोप नहीं लग सकेगा। यह प्रावधान तो देश भर में धर्म परिवर्तन करवाने वाले ईसाइयों के हित में है, फिर कांग्रेस इसका विरोध क्यों कर रही है? कांग्रेस के नेता इस बात से खफा हैं कि हिंदुओं के साथ-साथ जैनियों और बौध्दों पर भी पूर्व सूचना की बंदिश क्यों लगाई जा रही है। असल में वे हिंदुओं को बहुत छोटा समुदाय बनाने में तुले हुए हैं, इसलिए पिछले पचास सालों से बौध्दों, जैनियों और सिखों को यह कहकर उकसाया जा रहा है कि उनका हिंदुओं से कुछ लेना-देना नहीं। लेकिन जो लोग इस देश का इतिहास और संस्कृति जानते हैं, वे जानते हैं कि ये तीनों समुदाय ही नहीं बल्कि अनेकों अनेक पूजा पध्दतियों को अपनाने वाले हिंदू ही हैं, जिसे न सिर्फ इतिहास बल्कि संविधान ने भी स्पष्ट रूप से माना है।

संविधान के अनुच्छेद 25 की धारा- दो में लिखा है कि हिंदू में सिख, जैन और बौध्द भी शामिल हैं। तत्कालीन चीफ जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ की रहनुमाई वाली पांच जजों की बैंच ने 1982 में कहा था- 'संविधान निर्माताओं ने यह स्पष्ट कर दिया था कि हिंदुओं में सिख, जैन और बौध्द मतों को मानने वाले भी आते हैं।' जस्टिस जेएस वर्मा ने 1994 के अपने एतिहासिक फैसले में लिखा था कि हिंदू कोई धर्म नहीं बल्कि जीवन पध्दति है। जो कांग्रेस अब गुजरात विधानसभा की ओर से पास किए गए बिल का यह कहकर विरोध कर रही है कि जैनियों, बौध्दों को हिंदुओं में शामिल करना संघ परिवार की साजिश है, उन्हें यह क्यों भूल जाता है कि जवाहरलाल नेहरू के समय में इसी कांग्रेस ने 1955 में जब हिंदू विवाह कानून बनाया और 1956 में जब हिंदू उत्तराधिकार कानून बनाया, उसके बाद जब हिंदू उत्तराधिकारी कानून और हिंदू दत्तक और भत्ता कानून बनाया तो यह कहा गया कि यह सिखों, बौध्दों और जैनों पर भी लागू होगा, लेकिन मुसलमानों, ईसाइयों, पारसियों और यहूदियों पर लागू नहीं होगा। कांग्रेस विदेशी धर्मावलंबियों के मोह में भारतीय संस्कृति और इतिहास को सिर्फ पचास साल के छोटे कार्यकाल में भूल गई है। गुजरात के बिल का विरोध करने वालों को डा. अंबेडकर का संसद में दिया गया जवाब याद करना चाहिए। डा. अंबेडकर जब नवंबर 1947 में संसद में हिंदू कोड बिल पेश कर रहे थे, तो उनसे आदिवासियों की स्थिति के बारे में कई टेढ़े सवाल किए गए। तो उन्होंने जवाब दिया- 'अगर मेरे मित्रों ने हिंदू कोड बिल की परिभाषा पढ़ ली हो, तो यह स्पष्ट है कि कौन हिंदू है और किस पर यह लागू होगा। उन्होंने देख लिया होगा कि हिंदू कोड बिल में यह प्रावधान है कि जो मुसलमान, पारसी या ईसाई नहीं है, उसे हिंदू माना जाएगा।' अब यही बात गुजरात विधानसभा की ओर से पारित बिल में कही गई है। यानी हिंदू, बौध्द और जैन अगर ईसाई, मुसलमान धर्म अपनाते हैं तो उन्हें कलेक्टर को सूचना देनी होगी। यह बात मुसलमानों और ईसाइयों के हिंदू बनने पर भी लागू होगी, लेकिन कोई सुन्नी अगर शिया बने या कोई कैथोलिक अगर प्रोटेस्टेंट बने तो कोई कानूनी बंदिश नहीं। इसी तरह आर्यसमाजी, सनातनी, जैनी, बौध्द हिंदुओं का कोई भी मत अपना लें, कोई कानूनी बंदिश नहीं। इसमें आपत्तिजनक क्या है, यह समझ नहीं आ रहा।

भारतीय सभ्यता, संस्कृति और संविधान के मुताबिक भी देश में पनपे सभी मत हिंदू धर्म में आते हैं। हालांकि आजादी के बाद राजनीतिक कारणों से ही जैनियों, बौध्दों और सिखों को हिंदुओं से अलग-थलग करने की साजिश के तहत उन्हें अल्पसंख्यक ठहराया गया और अल्पसंख्यक आयोग में शामिल किया गया, अदालतों ने भी कुछ इस तरह के फैसले दिए जिनमें कुछ भ्रांतियां पैदा हुई, लेकिन मोटे तौर पर मंदिरों, गुरुद्वारों और जैन स्थानकों में बिना भेदभाव के हिंदू, सिख, जैनी जाते हैं, उन पर कोई रोक-टोक नहीं होती। इसलिए इतिहास के गर्भ में जाकर, प्राचीन संस्कृति और नवीनतम संविधान के प्रावधानों और भावनाओं को समझ कर हिंदुओं के ही विभिन्न मतों को हिंदुओं से लड़ाने की घिनौनी चालें खत्म होनी चाहिए। बांटकर राज करने की अंग्रेजों की प्रवृत्ति खत्म होनी चाहिए।

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