विकास के लिए जरुरी राजनीतिक स्थिरता

झारखंड में सता परिवर्तन के बाद मौजूदा संविधान पर एक बार फिर गौर करने का वक्त आ गया है। कई बार लगता है कि अमेरिका का संविधान भारत के संविधान से कहीं बेहतर है। शायद इसी वजह से अमेरिका में राजनीतिक स्थिरता कायम रहती है और विकास की गति मंद होने के सवाल ही पैदा नहीं होता। भारत के बारे में कहा जाता है कि या तो चुनाव हो रहे होते हैं, या चुनावों की तैयारी हो रही होती है। मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था ने सरकारों को इतना कमजोर और अस्थिर बना दिया है कि कोई भी निर्दलीय विधायक सरकार को गिराने की स्थिति में होता है। बड़े राजनीतिक दलों का जमीनी आधार खिसकने के बाद इस स्थिति ने विकराल रुप धारण कर लिया है। तीन दशक तक सिर्फ कांग्रेस ही बड़ा राजनीतिक दल रहा और आजादी के बाद देश में दलीय राजनीति को खड़ा करने की जो जिम्मेदारी कांग्रेस पर आई थी, कांग्रेस ने उसे निभाने के बजाए दूसरे दलों को उभरने हीं नहीं दिया। आज इस बात की समीक्षा करने का वक्त आ गया है कि क्या कांग्रेस की इस मनोवृति ने देश की लोकतांत्रिक जड़ों को कमजोर किया या मजबूत किया। कांग्रेस से जब जनता का मोहभंग हुआ तो उसके सामने कोई एक बडा विकल्प मौजूद नहीं था। नतीजा यह निकला कि जगह-जगह पर स्थानीय नेतृत्व उभरकर सामने आया। कई जगह पर जरुर प्रमुख विपक्षी दल के रुप में भाजपा ने कांग्रेस की जगह ली, लेकिन मोटे तौर पर भाजपा उस कांग्रेस का विकल्प नहीं बन पाई जो जमीनी आधार खो चुकी थी। इसका नुकसान पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को झेलना पड़ रहा है। लालकृष्ण आडवाणी की मौजूदा समय में एक राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर यह टिप्पणी काफी हद तक सही है कि जिस तीव्र गति से जनता का कांग्रेस से मोहभंग हुआ, उस तीव्र गति से भाजपा का विकास नहीं हुआ। अगर यह विकास स्वाभाविक होता और भाजपा जनता में अपनी जड़े जमाने की कोशिशों में जुटती तो कांग्रेस का विकल्प तैयार हो सकता था। आडवाणी की यह बात बिलकुल सही है कि कांग्रेस जनता की निगाह से उतर गई लेकिन भाजपा जनता की निगाह में चढ़ नहीं पाई। जिसका नतीजा 1991 से 1998 तक के तीन चुनावों में तो लगातार दिखा ही, उसके बाद के 1999 और 2004 के चुनावों में भी दिखा। लगातार पांच लोकसभाओं में किसी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। पिछले सोलह सालों से देश में जुगाड़ से बनी मिली जुली सरकारों का दौर चल रहा है। जिस कारण राजनीतिक अस्थिरता तो है ही, विकास और आर्थिक स्थिरता पर भी गहरा असर पड़ा है। यह संयोग ही है कि 1991 में जब अस्थिर सरकारों का दौर शुरु हुआ तभी भारत को नरसिंह राव के रुप में एक ऐसा विद्वान प्रधानमंत्री मिला, जिसके राजनीतिक कौशल्य को तो याद किया ही जाएगा, देश के विकास के लिए अपनाई गई नीतियों को भी हमेशा याद रखा जाएगा। अगर देश में स्थिर राजनीतिक माहौल होता तो पिछले सोलह सालों में विकास की गति कई गुना ज्यादा हो सकती थी। लेकिन हुआ इसके उलट है, सिर्फ केंद्रीय स्तर पर ही नहीं, राज्यों में भी अस्थिर सरकारों का दौर चला। अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने शासनकाल में देश में राजनीतिक स्थायित्व के लिए एक बड़ा कदम उठाने की पहल की थी, लेकिन उसका इतना ज्यादा विरोध हुआ कि बात नतीजे तक नहीं पहुंच पाई। वाजपेयी और उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत ने देश में यह बहस शुरु करवाई थी कि लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल पांच साल तय होना चाहिए। राजनीतिक मक्कारी और कुटिलता के कारण मलाईदार ओहदे नहीं मिलने पर सरकारों को गिराने और विधानसभाओं को भंग करवाने के ओछे हथकंडे हमेशा के लिए बंद किए जाने चाहिए। संविधान में संशोधन करके इस तरह का बंदोबस्त करना कोई बड़ी मुश्किल नहीं है, लेकिन अच्छी नीयत से शुरु की गई इस बहस का देश की आजादी में अहम भूमिका निभाने वाली देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ने विरोध किया। हालांकि अगर ऐसा हो जाए तो राजनीति में धन-बल की भूमिका को काफी हद तक कम किया जा सकता है, विकास के कामों की गति में निरंतरता और तेजी लाई जा सकती है। आए दिन चुनावों का सामना करने या चुनावों की तैयारी करने के माहौल से बचा जा सकता है, विधानसभाओं के कार्यकाल पूरा न करने और लोकसभा के मध्यावधि चुनावों ने पिछले तीन दशकों में देश पर अच्छा खासा आर्थिक बोझ डाला है। राज्यों में अस्थिरता पैदा करने में केंद्र सरकारों की भी अहम भूमिका रही है। हालांकि सरकारिया आयोग ने राज्यों में केंद्र सरकार के दखल को रोकने के लिए कई अच्छे सुझाव दिए थे, लेकिन राजनीतिक स्वार्थो के कारण उन सुझावों पर भी अमल नहीं हुआ। केंद्र सरकार की ओर से अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर राज्यों में अस्थिरता पैदा करने का ताजा उदाहरण झारखंड का है। इससे पहले गोवा और अरुणाचल में भी यह हथकंडा अपनाया जा चुका है। ऐसा नहीं है कि ऐसे हथकंडे सिर्फ कांग्रेस ही अपनाती है अलबता राजग सरकार के समय में भी इस तरह के हथकंडे अपनाए गए थे। अरुणाचल की कांग्रेस सरकार अचानक भाजपा की सरकार बन गई थी। अब समय आ गया है कि देश में हर चीज राजनीतिक नजरिए से नहीं, अलबता आर्थिक और सामजिक विकास के नजरिए से देखी जानी चाहिए। सरकारों की स्थिरता के लिए मौजूदा संविधान की खामियों को दूर किया जाना चाहिए। जब लाभ के पदों पर बैठे सांसदों की सदस्यता बचाने के लिए अधकचरा कानून बनाया जा सकता है तो देश की राजनीतिक स्थिरता के लिए कोई बड़ा कदम क्यों नहीं उठाया जा सकता। अटल बिहारी वाजपेयी ने संविधान की समीक्षा के लिए जो आयोग बनाया था, उसने गंभीर मसलों पर गंभीरता से विचार करने के बजाए ज्यादातर जजों की समस्याओं पर ही विचार विमर्श किया। वाजपेयी की गलती यह थी कि उन्होंने संविधान समीक्षा संबंधी आयोग का प्रमुख एक पूर्व चीफ जस्टिस को बना दिया था। जबकि इसके लिए राजनीतिक दिमाग की ज्यादा जरुरत थी। देश के विकास के लिए हर कोशिश करने वाले मनमोहन सिंह को इस बारे में बिना राजनीतिक नफा-नुकसान देखे देश के हित में एक ऐसा कदम उठाना चाहिए जिससे राजनीतिक अस्थिरता और रोज-रोज के चुनावों से देश को निजात मिले।

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