बीजेपी मीटिंग में जमकर चले जुबान के जूते

हार के बाद अब मंथन की बारी। शनिवार दिल्ली में सीपीएम और बीजेपी बैठे। तो पटना में लालू की टोली। हारने वाली यही तीनों पार्टियां। सीपीएम की मुसीबत सिर्फ हार नहीं। अलबत्ता एसेंबली की संभावित हार का भी डर। पर हार की सबसे ज्यादा छटपटाहट लालू को। सोनिया-मनमोहन ने भी दूध से मक्खी की तरह निकाल दिया। यों शकील अहमद बता रहे थे- 'लालू हमसे मिलकर लड़ते तो न उनका ऐसा हाल होता, न हमारा।' पर आज बात न लालू की, न सीपीएम की। आज बात बीजेपी की। जिसकी दो दिनी वर्किंग कमेटी शनिवार को शुरू हुई। अपन को पहले से अंदेशा था- जमकर चलेंगे जुबान के जूते। इसीलिए अपन ने 19 जून को लिखा था- 'अपन वर्किंग कमेटी की वजह नहीं जानते। हार की पड़ताल इतनी बड़ी वर्किंग कमेटी में कैसे होगी। सब अपना-अपना गुब्बार जरूर निकाल लेंगे।' अपन राजनाथ सिंह के भाषण पर नहीं जाते। हार की ली जिम्मेदारी पर भी नहीं जाते। बात पहले ही दिन उठे बवाल की। यों तो अपन जसवंत सिंह के बवाल पर ज्यादा तवज्जो नहीं देते। जसवंत की भड़ास की अपनी वजहें होंगी। गलियारों में चल रही चर्चाएं बता दें। सोलह मई को आया था चुनाव नतीजा। जसवंत लोकसभा के मेंबर चुने गए। चाहिए तो था- संसद से विपक्ष के नेता का कमरा उसी दिन खाली कर देते। पर उनने न कमरा खाली किया। न विपक्ष के नेता की पट्टी हटाई। वह पट्टी भी आठ जून तक लगी रही। वह कोई सरकारी फ्लैट-कोठी नहीं थी। जो सांसद हार के बाद भी जल्दी से खाली नहीं करते। एक चर्चा और भी। राष्ट्रपति के अभिभाषण में पहली लाइन में नहीं बैठ पाए। बीजेपी पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग में मंच पर नहीं बैठ पाए। शनिवार को वर्किंग कमेटी में भी पीछे जाकर बैठना पड़ा। सो जमकर भड़ास निकाली। यों महीनेभर से भड़ास तो वही निकाल रहे थे। अपनी चिट्ठी हो, चैनलों को दिया इंटरव्यू हो। या अपने खास दोस्त सम्पादक से लिखवाया लेख हो। इतना ही नहीं। शुक्रवार की मीटिंग में अरुण शौरी की चिट्ठी भी जसवंत सिंह लेकर आए। वर्किंग कमेटी में अध्यक्षीय भाषण के बाद राज्यों की रिपोर्टिंग शुरू हुई। तो जसवंत सिंह के सब्र का प्याला भर गया। इजाजत लेकर बोले- 'मेरा 44 साल का कैरियर। मैं कभी कुर्सी और कमरे के लिए नहीं लड़ा। मेरे खिलाफ खबरें प्लांट करवाई गई। मैं इस्तीफा दे दूंगा। अगला चुनाव नहीं लड़ूंगा।' अपन ने जब से बीजेपी कवर करना शुरू किया। जसवंत को मंच पर ही देखा। पहली बार मंच से नीचे देखा। तो यह भड़ास भी देखी। पर जसवंत सिंह से ज्यादा गंभीर अरुण शौरी। वैसे अपन बता दें- चिट्ठी उनने 17 मई को लिखी थी। चुनाव नतीजे के अगले दिन। अपन तो 25-30 साल से शौरी के मुरीद। उनके लिखे की काट नहीं। वह बिना किसी ठोस आधार के नहीं लिखते। उनकी चिट्ठी भी लेख से कम नहीं होगी। उनने चुनाव प्रबंधन को बारीकी से देखा। सो उनकी चिट्ठी से राजनाथ भी भयभीत। इसीलिए तो उनने शुक्रवार को चिट्ठी बंटने नहीं दी। हार की जिन बातों पर अपन भी यहां जिक्र कर चुके। शौरी की चिट्ठी में उन्हीं बातों का खुलासा। जैसे जसवंत सिंह खड़े हुए। वैसे शौरी भी खड़े हुए। उनने कहा- 'राजनाथ जी, आप क्यों लेते हैं हार की जिम्मेदारी। हार की जिम्मेदारी तो उनकी। जो होर्डिंग लगवा रहे थे। होर्डिंग के फोटू, मजमून और जगह तय कर रहे थे। छह पत्रकार मिलकर पार्टी का एजेंडा बना रहे थे।' शौरी का इशारा- सुधींद्र कुलकर्णी, चन्दन मित्रा, बलबीर पुंज, स्वप्न दासगुप्त वगैरा। यों तो शौरी भी मूल रूप से पत्रकार। पर उनका गुस्सा चुनाव की फ्लाप रणनीति बनाने वालों पर। साथ में चिट्ठियां लीक करवाने वालों पर। शौरी चाहते थे- पहले हार पर समीक्षा हो। पर राजनाथ उससे बचते दिखे। दबाव पड़ा, तो उनने कहा- 'इतवार को चर्चा करेंगे।' देखते हैं आज क्या होता है। वैसे राजनाथ की कोशिश बवाल टालने की। पर जेटली की गैरहाजिरी में उन पर हमले खूब हुए। हां, शौरी ने हमला किया। तो सुंदरलाल पटवा ने बचाव भी।

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