विपदाओं पर राजनीतिक रोटियां
राजस्थान में आई बाढ़ ने उस राजनीति की याद फिर ताजा कर दी, जो एनडीए सरकार के समय देखने को मिली थी। सोनिया गांधी उस समय विपक्ष की नेता थी और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार थी। सोनिया गांधी बार-बार राजस्थान में जाकर केंद्र पर सूखा राहत में भेदभाव का आरोप लगा रही थी। यह आरोप मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मौजूदगी में लगाए जाते थे, इसलिए जनता का एक बड़ा तबका इन आरोपों को सही मानता था। लेकिन दिल्ली में बैठे एनडीए सरकार के कर्ताधर्ताओं ने सोनिया गांधी के आरोपों की आंकड़ों के साथ धाियां उड़ाना शुरू किया, तो खुद गहलोत सरकार कटघरे में खड़ी हो गई थी। आखिर चुनाव में जनता ने सोनिया गांधी के आरोपों को सही नहीं माना और उनके धुंआधार दौरों के बावजूद कांग्रेस न सिर्फ हार गई, बल्कि राजस्थान के इतिहास में इतनी बुरी हार का सामना कभी नहीं करना पड़ा था। राजग सरकार जनता में यह छाप छोड़ने में कामयाब रही कि केंद्र की ओर से तो भरपूर सहायता दी गई, लेकिन राज्य की सरकार ने उसका ठीक से इस्तेमाल नहीं किया। अब जब राजस्थान में बाढ़ आई है, तो वही बातें फिर दोहराई जा रही हैं। पिछले ढाई सालों में फर्क सिर्फ यह आया है कि सोनिया गांधी तब विशेष विमान पर राजस्थान का दौरा करती थी, जिसका किराया कांग्रेस पार्टी को अदा करना पड़ता था। भले ही राज्य में सोनिया गांधी के दौरे राज्य सरकार के छोटे विमान पर हो जाते थे, जिससे कांग्रेस पार्टी का कुछ पैसा बच जाता था। अब सोनिया गांधी के देश भर में हो रहे दौरों में कांग्रेस को कौड़ी भी खर्च नहीं करनी पड़ती। अलबता गृहमंत्री शिवराज पाटिल या रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी को सोनिया गांधी के साथ संतरी की तरह जाना पड़ता है। क्योंकि सरकारी विमान यही दोनों केंद्रीय मंत्री इस्तेमाल कर सकते हैं, इसलिए सोनिया गांधी के दौरों के लिए इन दोनों मंत्रियों को अपने दौरे कई बार रद्द करने पड़ते हैं। अब सोनिया गांधी के राजस्थान दौरे को ही लें, तो रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी का वहां रक्षा मंत्रालय से जुड़ा कोई काम नहीं था। लेकिन उन्हें सोनिया गांधी के साथ जाना पड़ा और रक्षा मंत्रालय के विमान के इस्तेमाल के बावजूद वह दौरा रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी का न होकर सोनिया गांधी का दौरा कहलाया। इसी तरह सरकारी विमानों के निजी दौरों के लिए इस्तेमाल का एक मामला कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट में गया था। जिसमें दो केंद्रीय मंत्रियों को सुप्रीम कोर्ट में फटकार भी पड़ी थी। मुलायम सिंह जब हरदन हल्ली डोडेगौड़ा देवगौड़ा सरकार में रक्षा मंत्री थे, तो उन्होंने उतर प्रदेश के बहुत दौरे किए थे। वह अक्सर सुबह लखनऊ चले जाते थे और शाम को लौट आते थे, इस दौरान उनका रक्षा मंत्री के नाते कोई कार्यक्रम भी नहीं होता था। हू-ब-हू वही नरसिंह राव के शासनकाल के समय भी हुआ था, जब शरद पवार रक्षा मंत्री थे। उस समय रक्षा मंत्री महाराष्ट्र के बहुत दौरे करते थे, जबकि रक्षा मंत्री का वहां कोई काम नहीं होता था। सरकारी विमान असल में सरकारी कामकाज को जल्दी निपटाने के लिए मुहैया करवाए जाते हैं। अभी सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका यह भी लंबित पड़ी है कि यूपीए सरकार आने के बाद कई नेताओं के जन्मदिन पर लाखों रुपए के इश्तिहार जारी किए गए, जबकि आम जनता के टेक्स से उगाही गई इस राशि का विकास और जनकल्याण के कामों पर इस्तेमाल होना चाहिए। विभिन्न राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के इश्तिहारों में सोनिया गांधी के फोटो को लेकर भी मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है। हालांकि मामला अदालत में जाने के बाद केंद्र और राज्य सरकारें इस मामले में एहतियात बरतने लगी हैं, लेकिन कम से कम इन दो मामलों में कोई कानून-कायदा स्पष्ट तौर पर बनाया जाना चाहिए। सरकारी विमानों को दुरुपयोग नहीं होना चाहिए और आम जनता की ओर से उगाहे गए टेक्सों का भी अपने राजनीतिक प्रचार के लिए दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। सरकारी फंड के अपने राजनीतिक प्रचार के लिए इस्तेमाल का एक तीसरा उदाहरण सांसदों को मिल रही सांसद निधि का है। सांसद निधि 1993 में नरसिंह राव के शासनकाल में सांसदों को खुश करने के लिए शुरू की गई थी, जो संवैधानिक प्रावधानों का खुला उल्लंघन है। अब यह सांसद निधि सांसदों के व्यक्तिगत और चुनावी लाभ का हथियार बन चुकी है। चुनावों के समय सांसद अपनी सांसद निधि से करवाए कामों के आधार पर वोट मांगता है, जबकि उसके प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार के पास ऐसे उदाहरण नहीं हैं। इस तरह सरकारी फंड राजनीतिक इस्तेमाल का जरिया बन गया है। यही पैसा इस तरह की प्राकृतिक विपदाओं के समय इस्तेमाल किया जा सकता है। लोकसभा और राज्यसभा के कुल मिलाकर 800 सांसद हैं और हर सांसद को दो करोड़ रुपया प्रति वर्ष सांसद निधि मिलती है। इस तरह हर साल 1600 करोड़ रुपया प्राकृतिक विपदाओं के लिए रखा जा सकता है। प्राकृतिक विपदा पर राज्य सरकार को केंद्र सरकार की ओर से समय पर राहत राशि न पहुंचाया जाना राजनीतिक विवाद का कारण अब भी बन गया है, जैसा कि राज्य में कांग्रेस और केंद्र में राजग सरकार के समय बना था। लेकिन इस बार सोनिया गांधी ने अपने राजस्थान दौरे के समय वसुंधरा सरकार पर उस तरह के आरोप लगाने से परहेज किया। शायद इसकी वजह भाजपाई विधायकों की तरफ से पूरी तैयारी कर लेना था। बाढ़ग्रस्त क्षेत्र के विधायक जालम सिंह रावलोत ने उस प्रायोजित कार्यक्रम का मौके पर कड़ा विरोध किया, जिसमें सोनिया गांधी को यह बताया जाना था कि राज्य सरकार ने कोई राहत नहीं पहुंचाई। हम सब जानते हैं कि इस तरह की विपदाओं के समय राजनीतिक नेताओं के सामने इस तरह की भीड़ जुटाई जाती है जो विरोधी दल की आलोचना करे। सोनिया गांधी जब गहलोत सरकार के समय राजस्थान के दौरे करती थीं, तो राज्य सरकार की तारीफ और केंद्र सरकार की आलोचना करने वाली भीड़ जुटाई जाती थी, और अब ठीक इसके उलटा हो रहा है। आम तौर पर इस तरह के राजनीतिक शोशेबाजी वाले कार्यक्रमों में दूसरे दलों के नेता दूर ही रहते हैं। लेकिन भाजपा के विधायक ने अपने साथ भीड़ ले जाकर जिस तरह सोनिया गांधी का मौके पर विरोध किया है, वह अपने आप में उन नेताओं के लिए सीख है जो ऐसी विपदाओं के मौके पर राजनीतिक रोटियां सेकने की कोशिश करते हैं।
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