वोल्कर रपट और मित्रोखिन दस्तावेज

देश में बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के किस्से सामने आए, लेकिन राजनीतिज्ञों को सजा नहीं मिली। अगर सजा मिली तो सिर्फ इतनी कि जब बवाल खड़ा हुआ तो कुर्सी खिसक गई, इसके अलावा कुछ नहीं हुआ। मेरा मानना है कि वोल्कर तेल घोटाले के मामले में भी ऐसा ही होगा। वोल्कर तेल घोटाला कुछ-कुछ मित्रोखिन दस्तावेजों जैसा ही है। इतिहास बताता है कि सोवियत संघ किस तरह दुनिया भर में अपने राजनीतिक समर्थकों को घूस दिया करता था। मित्रोखिन दस्तावेजों में इन्हीं बातों का खुलासा किया गया था। मित्रोखिन दस्तावेजों के मुताबिक भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां और कांग्रेस पार्टी के अलावा कुछ ऐसे बड़े नेता भी शामिल थे, जिन्हें सोवियत संघ से पैसा आता था। अगर हम वोल्कर कमेटी के दस्तावेजों को देखें तो सद्दाम हुसैन के शासन में सोवियत संघ की परछाईं दिखाई देगी। सद्दाम हुसैन भी दुनिया भर के उन राजनीतिज्ञों को घूस दे रहे थे, जो संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के बावजूद इराक के मददगार थे। संयुक्त राष्ट्र में यह मामला उठा था कि उसके प्रतिबंधों के चलते इराक की जनता बेहद मुश्किल में है, इसलिए कोई ऐसा रास्ता निकाला जाना चाहिए जिससे इराक के मौजूदा शासन की वजह से वहां की जनता को कष्ट न झेलना पड़े। नतीजतन संयुक्त राष्ट्र ने दिसंबर 1996 में एक प्रस्ताव पास करके इराक के लिए तेल के बदले अनाज की योजना शुरू की। इस योजना के तहत इराक को मार्केट की कीमत के आधार पर तेल बेचने की इजाजत थी और उससे आया पैसा संयुक्त राष्ट्र के नियंत्रण वाले एस्क्रू अकाउंट में जमा होना था। इस पैसे का इस्तेमाल इराक में मानवीय आधार पर खाद्यान्न के लिए किया जाना था, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद यह तय कर सकती थी कि इस खाते में से पैसा किन और मदों पर भी खर्च किया जा सकता है। इराक को यह छूट दी गई कि वह तेल के खरीददार खुद ढूंढ ले और उससे मिले पैसे का खाद्यान्न आयात करने के लिए कंपनियों का चयन भी खुद ही कर ले। लेकिन सद्दाम हुसैन ने इस छूट का फायदा उठाते हुए दुनिया भर में अपने समर्थक राजनीतिज्ञों और राजनीतिक दलों को तेल के कूपन जारी करने के लिए चुना। सद्दाम हुसैन के प्रशासन ने उन लोगों को तेल के घोटाले के लिए प्रेरित किया और रास्ता यह निकाला गया कि वे तेल के कूपनों के बदले कुछ पैसा सद्दाम प्रशासन को देंगे, जिसे उन्होंने सरचार्ज का नाम दिया। संयुक्त राष्ट्र ने सरचार्ज का कोई प्रावधान नहीं किया था और यह एक तरह से चोर दरवाजे से हासिल की जाने वाली घूस थी। संयुक्त राष्ट्र के फैसले को दरकिनार कर सद्दाम हुसैन को घूस देने और खुद भी फायदा उठाने में करीब-करीब वही राजनीतिज्ञ और राजनीतिक दल शामिल हैं, जो मित्रोखिन दस्तावेजों में भी शामिल थे। वोल्कर कमेटी की रिपोर्ट में और मित्रोखिन दस्तावेजों में एक बहुत छोटा सा अंतर दिखाई देता है और वह है भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों का वोल्कर कमेटी की रपट में नाम न आना। संभवत: पहले कम्युनिस्ट पार्टियां इराक और सद्दाम हुसैन की उतनी समर्थक नहीं थी, इसलिए सद्दाम हुसैन ने उन्हें फायदा नहीं पहुंचाया, वरना वोल्कर कमेटी की रपट को ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि सद्दाम हुसैन ने संयुक्त राष्ट्र की इस योजना के तहत जितना तेल बेचा, उसमें से 30 फीसदी रूसी कंपनियों को अलाट किया गया था। तेल के इस काले धंधे में रूस की सरकार खुद शामिल थी। इसलिए रूस ने वोल्कर कमेटी की रिपोर्ट को यह कहते हुए सिरे से खारिज कर दिया कि यह अमेरिका विरोधी देशों को बदनाम करने के लिए तैयार की गई है। वोल्कर दस्तावेज बताते हैं कि रूस से पांच करोड़ 20 लाख डालर का सरचार्ज मार्च 2001 से दिसंबर 2002 तक के पौने दो सालों में मास्को स्थित इराक के दूतावास के जरिए सद्दाम हुसैन तक पहुंचाया गया। यानी संयुक्त राष्ट्र की आंखों में धूल झोंक कर तेल के इस कम्युनिस्टों और सद्दाम हुसैन के मिलेजुले काले धंधे में रूस और इराक की सरकारें हवाला के जरिए मुद्रा का आदान-प्रदान कर रही थी। इस बात के भी सबूत मिले हैं कि मास्को में हर रोज इराक के दूतावास में घूस का पैसा पहुंचाया जाता था, जिसे हर पखवाड़े कूटनीतिज्ञ बैगों में भरकर मास्को से बगदाद भेजा जाता था, इस बीच घूस की यह राशि मास्को के इराकी दूतावास के आधिकारिक सेफ में सुरक्षित रहती थी। भारत में कांग्रेस पार्टी और उसके विदेश विभाग के प्रभारी नटवर सिंह की तरह फ्रांस की तत्कालीन सरकार भी संयुक्त राष्ट्र की पाबंदियों की अनदेखी कर सद्दाम हुसैन और उसकी सरकार की समर्थक थी। फ्रांस संयुक्त राष्ट्र की बैठकों में और दुनिया के अन्य मंचों पर भारत की कांग्रेस पार्टी की तरह सद्दाम हुसैन की पैरवी कर रहा था। इसलिए रूस सरकार, रूस की कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कांग्रेस पार्टी और उसके नेता नटवर सिंह की तरह फ्रांस को भी इराक में मित्र श्रेणी में रखा जाता था। इसलिए रूस के बाद फ्रांस की कंपनियों को दूसरे नंबर पर तरजीह दी गई। यहां तक कि फ्रांस की तत्कालीन सरकार खुद फ्रांस की कंपनियों और प्रमुख नेताओं को सद्दाम हुसैन के हवाले से तेल आवंटन कर रही थी। इसमें एक उदाहरण उल्लेखनीय है। संयुक्त राष्ट्र में 1991 से 1995 तक फ्रांस के स्थाई प्रतिनिधि रहे बरनार्ड मेरेमी को 60 लाख बैरल तेल अलाट किया गया था, हालांकि वह उसमें से 20 लाख बैरल ही तेल बेच पाया और उसे 1,65,725 डालर की आमदनी हुई। फ्रांस में फायदा हासिल करने वाला दूसरा बड़ा शख्स चार्ल्स पास्कियो था, जो फ्रांस का गृहमंत्री था। उसे एक करोड़ 10 लाख बैरल तेल अलाट किया गया। हालांकि चार्ल्स ने तेल के इस धंधे में शामिल होने से इनकार किया है, लेकिन रिकार्ड बताता है कि उसके कूटनीतिक सलाहकार बरनार्ड गुलेट ने कुछ तेल बेचा था और उसके बदले में 2,34,000 डालर का मुनाफा हुआ था। तेल के इस धंधे में वोल्कर कमेटी की रिपोर्ट किसी भी मायने में मित्रोखिन दस्तावेजों से अलग नहीं है। दुनिया भर में फैले इराक और सद्दाम हुसैन के समर्थकों ने संयुक्त राष्ट्र की इस योजना का खुद भी फायदा उठाया और परदे के पीछे सद्दाम हुसैन को भी मालामाल किया। इसमें रूस, फ्रांस, ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका, भारत, संयुक्त अरब अमीरात, मलेशिया, म्यांमार, चाड, सीरिया, लेबनान, इंडोनेशिया, नाइजीरिया और चीन के बड़े-बड़े नेता और राजनीतिक दल शामिल थे। दुनिया भर की उन कंपनियों को उतना जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जितना संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के प्रति जवाबदेह देशों के राजनीतिक दलों और उसके नेताओं को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। व्यापारियों का काम व्यापार करना होता है और उसमें कमीशनखोरी एक सामान्य बात है, भले ही वह गैर कानूनी हो। इस मामले में दुनिया के अनेक व्यापारियों को यह पता ही नहीं होगा कि इराक सरकार जिसे सरचार्ज कहकर वसूल कर रही है, वह संयुक्त राष्ट्र की नजर में गैर कानूनी है।

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