सिर मुड़ाने से अब जहर खाने तक की राजनीति

असल में संसद शुक्रवार को शुरू हुई। पहले ही दिन कोई सदन में सो जाए। वह भी चेयरमैन की कुर्सी पर बैठकर सो जाए। तो इसे अपशकुन न समझें। राज्यसभा में पहले ही दिन यह हो गया। जयंती नटराजन आसन पर बैठी-बैठी सोने लगी। तो अरुण जेटली ने जयंती को चिट भिजवाई- 'सदन में बैठकर सोने पर तब तक किसी को एतराज नहीं होगा। जब तक कोई सो कर खर्राटे न लेने लगे।' अर्दली ने चिट देकर चौंकाया। तो जयंती पढ़कर मुस्कुराई। यह फर्क अब राज्यसभा में अक्सर दिखा करेगा। यही फर्क है जसवंत और जेटली में। जेटली की 'सेंस आफ ह्यूमर' का जवाब नहीं। पर जेटली जब हमले करने को आएं। तो सामने वाले की बखियां उधेड़कर रख दें। यों तो जेटली जनता के फैसले पर फूल चढ़ाने की तैयारी से आए थे।  पर राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस की शुरूआत ही बेढंगी हुई। लोकसभा में अपनी गिरिजा व्यास। राज्यसभा में सत्यव्रत चतुर्वेदी। दोनों ने धन्यवाद प्रस्ताव रखते हुए बीजेपी पर जमकर हमले किए। पहले बात लोकसभा की। लोकतंत्र में हार-जीत नई बात नहीं। आडवाणी ने इसे कुछ इस तरह समझाया- '1984 में राजीव 414 सीटें लाए थे। अगले चुनाव में कांग्रेस 197 पर आ गई। हम तब दो सीटें लाए थे। अगले चुनाव में 85 पर चले गए।' सो कांग्रेस के लिए घमंड करने की कोई बात नहीं। पर प्रस्ताव पेश करने वालों की आवाज में घमंड दिखा। सत्यव्रत तो घमंड से लबालब भरे थे। बोले- 'बीजेपी ने जहां-जहां मोदीकरण की कोशिश की। वहां-वहां बुरी तरह हारे।' तो अरुण जेटली बोले- 'लोकतंत्र में जीतने वाले की जिम्मेदारी अचानक बढ़ जाती हैं। उससे परिपक्वता, शिष्टता और विनम्रता की उम्मीद होती है। लेकिन जीतने वाले में घमंड दिखाई दे रहा है।' पर गिरिजा-चतुर्वेदी के मुकाबले मनमोहन पहले से भी ज्यादा शालीन दिखे। कांग्रेस ने इस बार मनमोहन को आगे करके चुनाव लड़ा। अपन ने पिछले पांच साल भी देखे। मनमोहन सेंट्रल हाल से बंदूक की नली से निकली गोली की तरह निकलते थे। पर शुक्रवार को न सिर्फ धीमी रफ्तार से निकले। अलबत्ता अपन लोगों से मिलने को रुके। हाथ मिलाए, बधाई ली। बतियाने भी लगे। पर पहले ही सवाल से उखड़ गए। सवाल था- 'शरद यादव ने कहा है- महिला बिल पास हुआ। तो वह जहर खा लेंगे।' मनमोहन बिना जवाब दिए निकल गए। शरद यादव का यह बयान बाकायदा सदन में हुआ। अपन को सुषमा स्वराज की याद आ गई। उनने 2004 में चुनाव नतीजों के बाद कहा था- 'सोनिया पीएम बनी, तो सिर मुड़वा लूंगी।' तब सोनिया राष्ट्रपति भवन जाकर लौट आई थी। सेंट्रल हाल में हुई कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में उनने मनमोहन का नाम रखा। तो कई कांग्रेसी सांसदों की आंखों में आंसू थे। सुषमा के खिलाफ गुस्सा था। तब मणिशंकर अय्यर ने सोनिया गांधी से कहा था- 'मेडम आप ही पीएम बनें। मैं सुषमा स्वराज को सिरमुंड़ा देखना चाहता हूं।' मणिशंकर की बात में गुस्सा तो था, 'सेंस आफ ह्यूमर' भी था। पर बात विदेशी मूल की। तो इसी मुद्दे पर कांग्रेस छोड़ने वाले पीए संगमा को अब अफसोस। सोनिया ने संगमा की बेटी अगाथा की शपथ पर ताली क्या बजाई। संगमा शर्म से पानी-पानी हो गए। उनने सोनिया से बाकायदा 'सॉरी' कहा। पर अपन बात कर रहे थे जनता के फैसले पर फूल चढ़ाने की। तो आडवाणी ने सोनिया-मनमोहन-प्रणव दा को बधाई दी। बधाई जेटली ने भी मनमोहन को दी। आडवाणी-जेटली दोनों ने इस बात पर खुशी जताई- 'कांग्रेस के रास्ते में अब पिछले पांच सालों जैसे राजनीतिक अवरोधक नहीं होंगे।'  दोनों ने धन्यवाद प्रस्ताव का समर्थन किया। पर बात हो रही थी शरद यादव के जहर खाने की। अपन को लगता है- इस बार महिला आरक्षण बिल पास हो ही जाएगा। सुषमा स्वराज बोली- 'इससे बढ़िया मौका फिर कब मिलेगा।' आडवाणी-जेटली ने समर्थन का ऐलान कर एनडीए की फूट दिखा दी। पर अपन को नहीं लगता- नीतीश कुमार ही शरद यादव से सहमत होंगे।

Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Lines and paragraphs break automatically.

More information about formatting options