राजनाथ-आडवाणी-अरुण की तिकड़ी छह महीने ही

ज्योति बाबू-अटल बिहारी की रिटायरमेंट के बाद करुणानिधि ही सबसे बुजुर्ग नेता। अपन यह कहें- करुणानिधि सबसे बुजुर्ग एक्टिव नेता। तो गलत नहीं होगा। वाजपेयी-ज्योति बाबू के बाद अब रिटायरमेंट की बारी करुणानिधि की। करुणानिधि बुधवार को 86 साल के हो गए। तो बधाईयों का तांता लगा। करुणानिधि संन्यास का ऐलान कर ही देते। तो अच्छा रहता। जैसे वाजपेयी ने बीजेपी के मुंबई अधिवेशन में किया था। जैसे ज्योति बाबू ने सीएम पद की कुर्सी छोड़कर किया था। करुणानिधि बुधवार को ज्योतिबाबू का अनुसरण करते। तो हिस्ट्री में ज्योतिबाबू के बाद नाम लिखा लेते। यों करुणानिधि अपना राजनैतिक वारिस अपने बेटे स्टालिन को बना चुके। पिछले हफ्ते की ही तो बात। अब एसेंबली इलेक्शन में स्टालिन सीएम प्रोजेक्ट होंगे। मनमोहन-सोनिया की बधाई तो बनती थी। सो उनने दी। बधाई आडवाणी और डी राजा ने भी भेजी। पर बात जब राजनैतिक बुजुर्गों की चले। तो युवाओं की बात तो होगी ही। कांग्रेस ने तो राहुल को अपना भावी नेता बना लिया। मनमोहन सिंह गैर गांधी परिवार के आखिरी कांग्रेसी पीएम। अगले पीएम राहुल होंगे। अपन को इसमें कोई संदेह नहीं। अलबत्ता इन्हीं पांच सालों में हो जाएंगे। पर युवा नेतृत्व को लेकर दुविधा में बीजेपी। बुधवार को अपन को एक खबर तो अच्छी लगी। बीजेपी के दूसरी पीढ़ी का खाका बनने लगा। लोकसभा में सुषमा स्वराज डिप्टी लीडर हो गई। राज्यसभा में अरुण जेटली लीडर। एसएस आहलूवालिया राज्यसभा के डिप्टी लीडर। सुषमा-आहलूवालिया की जोड़ी तो पहले से जम रही। आडवाणी-अरुण की जोड़ी तो जमेगी ही। पर यह तो छह-आठ महीने की बात। बात तो तब होगी। जब अरुण-सुषमा का तालमेल बैठ जाए। तो पार्लियामेंट में बीजेपी होश के साथ जोश में होगी। अपन को इन दोनों ही नियुक्तियों की उम्मीद थी। ऐसा न होता, तो बीजेपी का ही नुकसान होता। यों बीजेपी अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारने में माहिर। मुरली मनोहर जोशी की छटपटाहट ने फिर सुर्खियां बटोरी। प्यारेलाल खंडेलवाल-जोशी की मुलाकात क्या हुई। अफवाहों को पंख लग गए। यों खंडेलवाल का आडवाणी से छत्तीस का आंकड़ा पुराना। बात कोई 1993-94 की होगी। मध्यप्रदेश में कुशाभाऊ ठाकरे की तूती बोलती थी। तभी खंडेलवाल का भी मध्यप्रदेश में जलवा था। खंडेलवाल के बारे में बता दें- वह दिग्विजय सिंह को चुनाव में हरा चुका। इस बार दिग्विजय सिंह ने अपने भाई को हरवाया। यह अलग बात। पर बात ठाकरे-खंडेलवाल टकराव की। मध्यप्रदेश में दोनों का टकराव शुरू हुआ। तो खंडेलवाल डर-बडर कर दिए गए। हरियाणा में संगठन मंत्री बनाकर भेज दिए गए। पर खंडेलवाल का हरियाणा में मन नहीं लगा। संघ तो बदलाव को सहमत था। पर बीजेपी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी नहीं। खंडेलवाल ने भी कुछ जल्दबाजी कर दी। उनने लिखकर दे दिया- 'मैं हरियाणा में काम नहीं कर सकता। कोई और जिम्मेदारी दी जाए।' वह दिल्ली आकर बैठ गए। पर आडवाणी ने कई महीने नई जिम्मेदारी नहीं दी। खंडेलवाल बिना काम के बैठे रहे। तब से कुशाभाऊ ठाकरे से टकराव आडवाणी के साथ तब्दील। पर बात हो रही थी बीजेपी की नई लीडरशिप पर। छह-आठ महीने बाद आडवाणी का संन्यास होगा। लगभग उसी समय- जब करुणानिधि का संन्यास होगा। राजनाथ के बीजेपी अध्यक्ष पद की अवधि भी तब खत्म। बात राजनाथ की चली। तो बताते जाएं- बीजेपी की पार्लियामेंट्री बोर्ड मीटिंग में थावर चंद गहलोत ने प्रस्ताव रखा- 'पार्टी अध्यक्ष पद की अवधि तीन से बढ़ाकर पांच साल की जाए।' यह सुन सब हक्के-बक्के रह गए। मीटिंग में मरघट सी शांति छा गई। शांति को खुद राजनाथ सिंह ने तोड़ा। उनने कहा- 'नहीं, नहीं, यह बहुत ज्यादा होगा। इसकी जरूरत नहीं। तीन साल ही काफी।' कोई छह महीने पहले की बात। अपन राजनाथ सिंह से बतिया रहे थे। तब उनने कहा था- 'तीन साल का कार्यकाल काफी बड़ा।' सो अपन को नहीं लगता- बीजेपी का संविधान फिर बदलेगा। इसका मतलब हुआ- छह महीने बाद सुषमा लोकसभा में नेता होगी। तो बीजेपी को दूसरी पीढ़ी का नया अध्यक्ष भी मिलेगा।

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