स्पीकर-डिप्टी स्पीकर पर भी जातिवादी तड़का

तो बीजेपी ने अपना मन बदल दिया। सुमित्रा महाजन की बजाए अब करिया मुंडा डिप्टी स्पीकर होंगे। ब्राह्मण की जगह आदिवासी। यों महिला डिप्टी स्पीकर का आइडिया बीजेपी का था। जिसे कांग्रेस ने चुरा लिया। यों कांग्रेस ने पहले आदिवासी केशव देव को स्पीकर बनाना था। बीजेपी का आइडिया देख कांग्रेस ने मोर्चा मारा। केशव देव की बनी बनाई बात बिगड़ गई। कोर कमेटी में सोनिया ने कहा- 'क्यों न महिला स्पीकर बनाई जाए। हमने पहले महिला राष्ट्रपति बनाई।' अब सोनिया कहे, तो टोकने की हिम्मत कौन करे। महिलाओं पर विचार शुरू हुआ। तो टारगेट राहुल पर आकर अटका। तो वहां सिर्फ एक ही महिला तो जीतकर आई। मीरा कुमार, दलित भी। तो कांग्रेस के लिए यह सोने पर सुहागा हो गया। कांग्रेस ने दलित महिला कार्ड खेला। तो बीजेपी को भी टारगेट झारखंड का ख्याल आया। झारखंड के चुनाव बस आए-कि- आए। तो कांग्रेस के दलित कार्ड पर बीजेपी का आदिवासी कार्ड। यानी कांग्रेस ने आदिवासी को स्पीकर नहीं बनाया। तो बीजेपी ने आदिवासी को डिप्टी स्पीकर बनाया। मीरा कुमार का पर्चा दाखिल हो गया। वह न चाहते हुए भी स्पीकर बनने को राजी। सुनते हैं मीरा कुमार ने कहा-   'मेरे लिए सदन संभालना थोड़ा मुश्किल होगा। इस तरह का तुजुर्बा नहीं।' यों तुजुर्बे की जुरूरत नहीं होती। जीएम बालयोगी तो पहली बार सांसद बनकर स्पीकर हुए थे। सोमनाथ चटर्जी का पार्लियामेंट्री तुजुर्बा तो खूब था। पर स्पीकर का तुजुर्बा उन्हें भी कहां था। तो अब सोमनाथ की जगह मीरा कुमार होंगी। लंबे समय बाद डिप्टी स्पीकर बीजेपी का। यों इससे पहले बीजेपी का स्पीकर दलित था। अपन याद दिला दें- 'सूरजभान।' सो दलित -आदिवासी डिप्टी स्पीकर बनाने में बीजेपी भी पीछे नहीं। यों बीजेपी हो या कांग्रेस। पदों की बंदरबांट होती है वोट बैंक देखकर। भले बीजेपी मना करे, भले कांग्रेस मना करे। सच सबके सामने। अरुण जेटली से पूछा- 'आपने आदिवासी वोट बैंक के लिए करिया मुंडा को चुना?' जेटली बोले- 'करिया मुंडा आदिवासी तो हैं। पर संसदीय अनुभव भी कम नहीं।' तो अपन बताते जाएं- करिया मुंडा दो बार केन्द्र में मंत्री रहे। पहले मोरारजी की सरकार में। फिर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में। पर झारखंड बना। तो बीजेपी ने करिया मुंडा को सीएम नहीं बनाया। सीएम बनने की बारी आई, तो दूसरों की। तब बीजेपी का तर्क था- युवा नेतृत्व चाहिए। कभी बाबू लाल मरांडी-अर्जुन मुंडा। पर दोनों आदिवासी नेता झारखंड संभाल नहीं पाए। अब जब देश में युवा नेतृत्व की लहर। तो बीजेपी को 72 वर्षीय करिया मुंडा की याद आई। देर आयद, दुरुस्त आयद। पर बीजेपी सत्तरे-बहत्तरे के फेर से निकलेगी। तभी बीजेपी का बेड़ा पार होगा। लगता है- बीजेपी ने अपनी हार से सबक नहीं सीखा। कांग्रेस के पास क्या बूढ़े अनुभवियों की कमी थी। ऐसा नहीं, जो स्पीकर पद पर ज्यादा अनुभवी ही चाहिए। अपन ने शुरू में लिखा ही- 'बालयोगी पहली बार सांसद बने। पहली बार स्पीकर।' कोई बुरे स्पीकर भी नहीं रहे बालयोगी। पर अपनी निगाह अब बीजेपी के अंदरूनी महाभारत पर। लोकसभा में अब नेता कौन होगा। क्या सुषमा स्वराज ही। या मोहन भागवत की आडवाणी-राजनाथ से मुलाकात का कोई असर होगा। अब जब युवाओं और महिलाओं का जोर। तो बीजेपी के डिप्टी लीडर भी सुषमा स्वराज हो जाए। पर उससे भी ज्यादा अपनी निगाह राज्यसभा पर। देखते हैं किसका नंबर लगेगा। वेंकैया नायडू या अरुण जेटली। यों लोकसभा चुनाव के साथ अरुण जेटली ही थे। पर हार का ठीकरा जेटली के सिर तो नहीं फोड़ सकते। उम्मीदवार उनने तो नहीं चुने थे। अगर यही पैमाना हो। तो वेंकैया के आंध्र प्रदेश में तो लुटिया डूबी। यों अपना अनुमान अरुण जेटली के लीडर बनने का। आडवाणी-जेटली की जोड़ी भी खूब जमेगी। पर बताते जाएं- जेटली, सुषमा दोनों ब्राह्मण। तो क्या मीरा कुमार के स्पीकर बनने से जैसे सुमित्रा महाजन का पत्ता कटा। अरुण जेटली का भी कटेगा। यों अपन को नहीं लगता- अब हर फैसला वोट को देखकर होगा। ब्राह्मण वोट बैंक भी कम नहीं। बीजेपी अटल बिहारी वाजपेयी का चेहरा इस्तेमाल करती। तो नतीजे इतने बुरे न होते। वाजपेयी का चेहरा ही नहीं, लोग काम भी नहीं भूले।

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