ब्रेकिंग न्यूज

भारत का विजुअल मीडिया बार-बार इमेच्योर साबित होता है। ब्रेकिंग न्यूज की होड़ में सारी मर्यादाएं ताक पर रखी जा रही हैं और ऐसी खबरें प्रसारित की जा रही हैं, जो इतने बड़े पैमाने पर प्रसारित होने लायक ही नहीं होती। विजुअल मीडिया ने हाल ही में क्राइम न्यूज को बड़े पैमाने पर प्रसारित करना शुरू किया है, जिससे मुझे वह जमाना याद आता है, जब धर्मयुग, रविवार, दिनमान, सारिका छपा करती थी। उन्हीं दिनों में अपराध जगत की मनोहर कहानियां, सत्य कथाएं, सच्ची कहानियां आदि छपा करती थी। आज इन निजी चैनलों को देखकर मुझे उनमें से कोई भी धर्मयुग, रविवार या सारिका नहीं लगता। अलबता सब मनोहर कहानियां, सत्य कथाएं और सच्ची कहानियों को विजुअलाइज करते हुए दिखाई देते हैं। हिंदी का कोई एक ऐसा बढ़िया चैनल नहीं जो इन बीमारियों से अछूता रहा हो। हालांकि अंग्रेजी के चैनलों की तारीफ करनी पड़ेगी कि वे अपराधीकरण की इस भेड़चाल में शामिल नहीं हुए। लेकिन अंग्रेजी के चैनल दूसरी बीमारी से ग्रस्त हैं। उनमें से ज्यादातर की दौड़ 24 अकबर रोड और सात रेसकोर्स तक सीमित होकर रह गई है। हिंदी चैनलों ने पिछले साल गुड़िया के साथ जो मजाक किया था, उसे कौन भूला होगा। एक टीवी चैनल ने गुड़िया को अपने चैनल पर बहस के दौरान ही अपना पति चुनने और उससे निकाह करने के लिए मजबूर कर दिया था। गुड़िया को अपना पति भी वही चुनना था, जो चैनल चाहता था। शायद उस सदमे से गुड़िया कभी उबर नहीं पाई और आखिर कुछ महीनों के अंदर ही इस संसार से विदा हो गई। निजी टीवी चैनलों ने किसी के भी व्यक्तिगत जीवन में झांकने की हिमाकत शुरू कर दी है। जिसकी न तो नैतिकता इजाजत देती है और न ही कोई कानून। मौजूदा सरकार अगर इस बाबत विजुअल मीडिया पर कोई प्रतिबंध लगाती है, तो उसकी इमरजेंसी से तुलना करना ठीक नहीं लगता। हालांकि सरकारें इस तरह के कानूनी प्रतिबंध लगाने से बच सकती हैं, लेकिन उसके लिए विजुअल मीडिया को खुद ही मेच्योरिटी और जिम्मेदारी दिखानी होगी। विजुअल मीडिया की इमेच्योरिटी का ताजा उदाहरण प्रोफेसर मटुक नाथ और उनकी प्रेमिका जूली के प्रकरण का है। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्नातकोतर की पढ़ाई कर रही जूली के अपने पूर्व प्रोफेसर मटुक नाथ के साथ प्रेम संबंध थे। ऐसे प्रेम संबंध कानून के दायरे में नहीं, लेकिन मीडिया को पुलिस बनने का अधिकार किसने दिया। जो मीडिया वैलेंटाइन डे पर एबीवीपी की ओर से विरोध किए जाने को पुलिसिंग बताता है और उसके खिलाफ जमकर खबरें प्रसारित करता है, उस मीडिया को खुद पुलिसिंग करने का अधिकार किसने दिया। ब्रेकिंग न्यूज की होड़ में कम से कम चार चैनलों ने मटुक नाथ की पत्नी आभा चौधरी के साथ मिलकर उन्हें अपनी प्रेमिका के साथ पकड़ने का सीधा प्रसारण करके सत्य कथाओं, मनोहर कहानियों और सच्ची कहानियों की याद ताजा कर दी। यह एक व्यक्तिगत मामला था, जिसे इस तरह मीडिया पर प्रसारित करना आचार संहिता का घोर उल्लंघन है। विजुअल मीडिया के चार चैनल इस खबर को बार-बार चटखारे लेकर प्रसारित करते रहे। प्रोफेसर कोई सेलिब्रेटी नहीं था और न ही उसकी पत्नी या प्रेमिका ऐसी हस्तियां थी कि जिनके पीछे पत्रकारों को सारा दिन कैमरे लेकर दौड़ना जरूरी होता। इस मामले में प्रबुध्द पत्रकारों की टिप्पणियां भी कम मजेदार नहीं थीं। एक संवाददाता कह रहा था कि प्रोफेसर की उम्र 55 की है पर दिल बचपन का है। एक अन्य की टिप्पणी थी- 'प्रोफेसर राधा-कृष्ण का प्रेम पढ़ाते-पढ़ाते खुद प्रेम में ढल गए।' एक चैनल के पत्रकार ने तो पुलिसिंग की भूमिका निभाते हुए कहा- 'प्रोफेसर और उसकी प्रेमिका सुरक्षा के लिए थाने में हैं, बाहर निकलेंगे, तो लोग पत्थर मारेंगे।' एक चैनल ने इस मामले में कानूनी विशेषज्ञों की टिप्पणियां प्रसारित करनी शुरू कर दीं, तो दूसरे ने विदेश में एमबीए की पढ़ाई कर रहे प्रोफेसर के बेटे से संपर्क साधा। इससे पहले जम्मू के अनारा केस में भी विजुअल मीडिया की भूमिका शर्मनाक रही। वह पुलिस के बनाए झूठे केस के आधार पर ही रिपोर्टिंग करती रही। हाल ही में राहुल महाजन के मामले में भी विजुअल मीडिया ने पहले पुलिस पर दबाव बनाया और बाद में उसी के दबाव में पुलिस की ओर से बनाई गई कहानी में नमक-मिर्च-मसाला लगाकर प्रसारित करता रहा। यह सब कुछ देखकर भारत के विजुअल मीडिया की इमेच्योरिटी तरस आने लायक दिखाई देती है। ऐसे मामले ही नहीं, अलबता गंभीर मामलों में भी विजुअल मीडिया के पत्रकार प्रिंट मीडिया के मुकाबले ज्यादा पक्षपाती दिखाई देते हैं। जैसे आमिर खान के मामले में विजुअल मीडिया ने गुजरात सरकार को इसलिए कटघरे में खड़ा कर दिया था, क्योंकि नर्मदा बांध की ऊंचाई बढ़ाने के विरोध में उनका बयान गुजरात के भारतीय जनता युवा मोर्चे को पसंद नहीं आया था और उसने आमिर खान की फिल्मों का बायकाट करने का एलान कर दिया था। हालांकि आमिर खान ने सिर्फ नर्मदा बांध की ऊंचाई के खिलाफ बयान नहीं दिया था, अलबता उन्होंने नरेंद्र मोदी और भाजपा को दंगाई भी कहा था। लेकिन विजुअल मीडिया ने सिर्फ एकतरफा रिपोर्टिंग करके इस मौके को भी नरेंद्र मोदी के खिलाफ इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वही विजुअल मीडिया उस समय चुप्पी साध गया, जब केंद्र सरकार ने नर्मदा बांध की ऊंचाई बढ़ाने के विरोध में धरने पर बैठी मेधा पाटेकर और आमिर खान के उस दावे को नकार दिया, जिसके मुताबिक मध्य प्रदेश में पुनर्वास नहीं हो रहा था। मेधा पाटेकर और आमिर खान का धरना नर्मदा बांध के खिलाफ था, जिस पर गुजरात में तीखी प्रतिक्रिया होनी ही थी, लेकिन विजुअल मीडिया ने इस घटना को सांप्रदायिक रंग देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब मुंबई के बम धमाकों के बाद तो विजुअल मीडिया की रिपोर्टिंग देखकर सिर धुनने का मन करता है। याद आती है सात जुलाई 2005 को लंदन में हुए बम धमाकों की। मुंबई की तरह लंदन में भी लोकल ट्रेन में बम धमाके हुए थे। सारी दुनिया ने लंदन के विजुअल मीडिया पर दिखाए गए सीधे प्रसारण को देखा था। एकाध तस्वीर को छोड़ दें तो पूरी रिपोर्टिंग में लाशें दिखाई नहीं गई थी, न ही इस तरह लहू-लुहान लोगों को दिखाया गया था। ऐसा दिखाने से सांप्रदायिक भावनाएं भड़कती हैं और तनाव पैदा होता है। गुजरात में हू--हू यही हुआ था, जब गोधरा ट्रेन में मारे गए हिंदुओं को विजुअल मीडिया पर दिखाया गया और विश्व हिंदू परिषद को मृतकों की लाशें उनके शहरों में ले जाकर जुलूस की शक्ल में अंतिम संस्कार करने की इजाजत दी गई। इसी ने हिंदुओं की भावनाएं भड़का दीं और गुजरात के दंगे हुए। अब यही काम मुंबई में विजुअल मीडिया ने किया, लेकिन शुकर है कि हिंदुओं की भावनाएं गुजरात की तरह नहीं भड़कीं।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट