आडवाणी खारिज राहुल कबूल

अपना आकलन भले गलत निकला। क्षेत्रीय और जातीय राजनीति के मुंह पर तमाचा लगा। तीसरी ताकत के दिन भी लदने लगे। सो देश के लिए अच्छी बात। बीजेपी 138 से 121 पर आ गई। पर दो दलीय राजनीति को आवाम की मान्यता मिली। अब इसे बरकरार रखना बीजेपी के जिम्मे। बीजेपी वक्त के साथ न बदली। तो नेहरू-इंदिरा का एकदलीय दौर लौटने में देर नहीं। अपन कांग्रेस की जीत का सेहरा राहुल के सिर बांधेंगे। सोनिया की रहनुमाई में कांग्रेस दो चुनाव लड़ी। पहले चुनाव में 112 पर अटकी। दूसरे में 145 पर। तब तक राहुल सिर्फ उम्मीदवार थे। अबके कांग्रेस का चेहरा थे। सो राहुल के चेहरे पर कांग्रेस 200 के पार हो गई। राजीव कांग्रेस को 191 पर छोड़कर गए थे। उसके बाद तो कांग्रेस को कभी 150 भी नहीं मिली। सवा साल पहले की घटना बताना जरूरी। राजस्थान पत्रिका के संपादक गुलाब कोठारी के साथ बैठे थे। देश की राजनीति पर बात चली। तो उनने पूछा- 'त्रिशंकु लोकसभा कब तक बनती रहेगी?' अपन ने कहा- 'पंद्रहवीं-सोलहवीं लोकसभा तो त्रिशंकु ही होगी। सत्रहवीं लोकसभा में किसी दल को बहुमत मिलेगा।' तब गुलाब कोठारी ने कहा था- 'सोलहवीं लोकसभा में त्रिशंकु संकट खत्म हो जाएगा।' अपन ने तब नहीं माना। पर अब अपन को कोई शक नहीं। राहुल की रहनुमाई का नतीजा अपने सामने। कांग्रेस ने राहुल को पीएम प्रोजेक्ट नहीं किया। पर राहुल का चेहरा वोट बटोरू साबित हुआ। चुनावी डुगडुगी बजी। तो पहले इश्तिहार पर सिर्फ राहुल का चेहरा था। सोनिया-मनमोहन तो बाद में दिखे। अपन इसे मनमोहन की जीत नहीं मानते। मनमोहन खुद भी नहीं मानते। वह सोनिया के घर से निकले। तो बोले- 'जीत का सेहरा सोनिया-राहुल के सिर।' सोनिया का 'राहुल-मनमोहन' का 'युवा-अनुभवी' मिश्रण फार्मूला काम कर गया। आडवाणी का नेगेटिव प्रोपोगंडा उन्हीं के खिलाफ गया। मनमोहन को उसका नुकसान नहीं। अलबत्ता फायदा हुआ। पर जीत तो राहुल की। यूपी में अकेले लड़ने का फैसला राहुल का था। उनने यह फैसला सोच समझकर किया। उसके दो कारण थे। पहला- जातीय राजनीति से तंग आ चुकी जनता को राहत देना। दूसरा- गुंडागर्दी से तंग आ चुकी जनता को भरोसा दिलाना। एसेंबली चुनाव में मायावती का नारा था- 'चढ़ गुंडन की छाती पर। मोहर लगेगी हाथी पर।' चुनाव के बाद बीएसपी में गुंडे घुस गए। तो मुलायम जैसा गुंडाराज फिर लौट आया। सो गली-गली में नारा लगने लगा- 'गुंडे चढ़ गए हाथी पर। बंदूक तान दी छाती पर।' कांग्रेस मुलायम से गठबंधन करती। तो जातिवादी-गुंडई राजनीति का विकल्प न होता। सो राहुल ने ऐन वक्त पर अकेले लड़ने का फैसला किया। चुनाव नतीजों के पांच मतलब। पहला- जनता ने आडवाणी को ठुकराया। दूसरा- जनता ने राहुल को भावी नेता माना। तीसरा- जनादेश काम पर मिला। चौथा- जातीय-क्षेत्रीय राजनीति से जनता की तौबा। पांचवां- जनता ने विकास विरोधी-ब्लैकमेलर लेफ्ट को नकारा। बात जनादेश पर काम की। तो जनता ने नीतिश, नवीन, राजशेखर, गहलोत, हुड्डा, शीला, येदुरप्पा, धूमल, रमण सिंह, मोदी को ईनाम दिया। तो बादल, बुध्ददेव, शिवराज, करुणानिधि को वार्निंग। मायावती, खंडूरी, अच्युत्यानंदन पूरी तरह खारिज। बात खारिज की चली। तो लालू-पासवान की जातीय राजनीति खारिज हुई। दोनों को अच्छा सबक सिखाया बिहार ने। ऐसी जीत की उम्मीद कांग्रेस को कतई नहीं थी। कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा 170 का ख्वाब देखती थी। तभी तो कभी नीतिश को इशारे कर रही थी। कभी नवीन को। तो कभी जयललिता को। अब मनमोहन की सरकार सरपट दौड़ेगी। बिलकुल वैसे ही। जैसे 1999 के बाद वाजपेयी की सरकार पांच साल दौड़ी। न किसी करात का डर। न किसी जयललिता-माया का डर। पर बीजेपी में भूचाल आएगा। न आडवाणी विपक्ष के नेता रह पाएंगे। न राजनाथ पार्टी के अध्यक्ष। आडवाणी ने तो पार्लियामेंट्री बोर्ड में संन्यास का ऐलान कर दिया। पार्टी को भले अभी कबूल नहीं। पर आखिरकार होगा। तो कौन बनेगा विपक्ष का नेता? जसवंत, जोशी, राजनाथ या सुषमा। जसवंत-जोशी में से कोई हुआ। तो वैसी ही गलती होगी। जैसी दिल्ली में मल्होत्रा, देश में आडवाणी को प्रोजेक्ट करके हुई। जसवंत अब लोकसभा में। सो राज्यसभा में भी बदलेगा विपक्ष का नेता। वेंकैया या जेटली। पर सिर्फ चेहरा नहीं। दो दलीय राजनीति के लिए नीतियां भी बदलनी होंगी बीजेपी को।

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