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Exclusive Articles written by Ajay Setia

करार टला, सरकार पर खतरा नहीं

Publsihed: 17.Oct.2007, 09:31

तीन अगस्त को वन-टू-थ्री का ड्राफ्ट जारी हुआ। तो उसके बाद अपन बार-बार लिखते रहे- लेफ्ट सिर्फ न्यूक-डील पर सरकार नहीं गिराएगा। साथ में आर्थिक मुद्दे भी जोड़ेगा। अब जब एटमी करार ठंडे बस्ते में पड़ गया। तो कांग्रेस खेमे में भले ही मातम। लेफ्ट में किला फतेह होने पर कोई खुशी नहीं। असल में लेफ्ट को अभी भी कांग्रेस की नियत पर शक। सो लेफ्ट ने मंगलवार को जो नए तेवर दिखाए। उनका जिक्र अपन बाद में करेंगे। पहले अमेरिका में छाए मातम की बात कर लें। करार ठंडे बस्ते में पड़ने से बुश बेहद खफा।

अपने मंत्री रूस की ओर, सोनिया चीन की तरफ

Publsihed: 16.Oct.2007, 14:44

अपन ने यहीं पर बारह अक्टूबर को वह ब्रेकिंग न्यूज दी। जिसमें अपन ने लिखा- 'आईएईए-एनएसजी समझौते तीन महीने ठंडे बस्ते में पड़ेंगे।' जब आप लोग यह पढ़ चुके। तो उसी दिन मनमोहन-सोनिया के एचटी सम्मेलन में भाषण का लब्बोलुआब था- 'सरकार वक्त से पहले गिराने का इरादा नहीं। एटमी करार भले ही ठंडे बस्ते में पड़े।' यही अपन ने तेरह अक्टूबर को लिखा।

ताजा अक्ल, करार पर चुनाव अक्लमंदी नहीं

Publsihed: 13.Oct.2007, 12:32

मिड टर्म चुनाव हुए। तो बीस महीने पहले देश पर तीन सौ करोड़ का बोझ। यह तो सरकारी खर्च। कोई दस गुना राजनीतिक दलों का खर्च समझ लो। देश पर सवा तीन हजार करोड़ का बोझ पड़ेगा। तो महंगाई का अंदाजा लगा लो। वैसे भी महंगाई और कांग्रेस का चोली-दामन का साथ। आजकल प्याज से सेब सस्ता। सो इस महंगाई में चुनाव जितने दिन टलें। उतना अच्छा। गुरुवार को लालू-पवार ने चुनाव टलने की बात कही। तो शुक्र को खुद सोनिया-मनमोहन ने चुनाव से तौबा की। वैसे अपन को बजट के बाद अब भी चुनाव का अंदेशा।

तो रूस से एटमी करार तोड़ेगा लेफ्ट से गतिरोध

Publsihed: 12.Oct.2007, 13:47

मनमोहन-अल बरदई गुफ्तगू हो गई। डेढ़ घंटा सिर्फ खाना तो नहीं खाया होगा। या सौफे पर बैठे भारत-आस्टे्रलिया मैच तो नहीं देख रहे होंगे। जरूर रिएक्टरों की निगरानी पर बतियाए होंगे। पर लेफ्ट को क्यों बताएं। लेफ्ट ने पहले ही कह दिया था- 'बात की तो देख लेंगे।' बुधवार को प्रणव-बरदई मुलाकात हुई। तो बताया गया- 'सिर्फ एटमी ऊर्जा की जरूरत पर बात हुई। रिएक्टरों की निगरानी पर नहीं।' यों यूएन की इंटरनेशनल एटमी एनर्जी एजेंसी के प्रमुख बरदई कोई अमेरिकी एजेंट नहीं।

मिड टर्म से पहले राहुल का टर्मिनल

Publsihed: 11.Oct.2007, 13:47

अपन ने सितंबर में लिखा- 'यूपीए सरकार चार महीनों की मेहमान।' मंगलवार को यूपीए-लेफ्ट में युध्द विराम की नौटंकी ही हुई। युध्द विराम नहीं। यों तो लेफ्टिए धर्म-कर्म के विरोधी। पर दुर्गापूजा पर वोटरों को लुभाने में विघ्न न पड़े। सो दशहरे तक की मोहलत दी। अपने मुख्तार अब्बास नकवी की नजर में तो यह युध्द विराम में कमर्शियल ब्रेक। जो दोनों ने अपना कमर्शियल फायदा देखकर लगाई। तब तक कांग्रेसी हुकमरान अल बरदई से बतिया लेंगे।

दिल्ली की नौटंकी शुरू कर्नाटक का नाटक खत्म

Publsihed: 10.Oct.2007, 13:51

अपन को लगता था- अल बरदई भारत आएंगे। तो लेफ्ट आपे से बाहर होगा। पर लेफ्ट के नेता लालू से गलबहियां डाले बाहर निकले। प्रणव दा के माथे पर कोई शिकन नहीं दिखी। अलबत्ता बुढ़ापे में जैसे जोश आ गया हो। वैसे भागते हुए मीटिंग से बाहर निकले। ऐसे, जैसे कोई मोर्चा फतह कर लिया हो। बाहर तो हंसते हुए चेहरे दिखे। पर अंदर ऐसी बात नहीं थी। कुमारस्वामी ने साबित किया।

कर्नाटक का नाटक अब दिल्ली में भी शुरू

Publsihed: 09.Oct.2007, 13:53

ट्वंटी-20 विश्व कप आखिरी मैच में जैसा हुआ। हू-ब-हू वही चंडीगढ़ में हुआ। जहां अपने धोनी ने आस्ट्रेलिया को धो डाला। भले ही दो मैच हार कर धोया। पर बात ट्वंटी-20 के आखिरी मैच की। जो भारत-पाक में हुआ था। आखिरी ओवर ने खेल बदल डाला। हारता-हारता भारत जीत गया। जीत के करीब पहुंचकर पाक हार गया। अब कर्नाटक के ट्वंटी-20 में आखिरी ओवर रोमांचक। एक पल लगा बीजेपी-जेडीएस मैच फिक्स हो जाएगा। दूसरे पल लगा। बीजेपी-जेडीएस शादी टूटनी तय।

गेंद अब जल्द ही होगी गवर्नर के पाले में

Publsihed: 06.Oct.2007, 13:58

अब दिल्ली की कवायद एकदम बेकार। अपन ने तो शुरू में ही लिख था- 'येदुरप्पा-कुमारस्वामी की बेमेल जोड़ी कब तक?' बात तो तभी से साफ थी। बेंगलूर में जब बीजेपी की वर्किंग कमेटी हुई। तभी ही दिखने लगा था- कुमारस्वामी अपनी पारी पूरी करते ही पलट जाएंगे। सितंबर में बातें साफ होनी शुरू हो गई। देवगौड़ा परिवार को तब तक बीजेपी में कोई खोट नहीं दिखा। न ही येदुरप्पा में कोई खोट दिखा। जब तक तीन अक्टूबर नजदीक नहीं आ गई।

'मौकापरस्ती ही राजनीति' कुमारस्वामी उवाच

Publsihed: 05.Oct.2007, 13:58

बीजेपी को अभी भी उम्मीद। देवगौड़ा की नौटंकी अब अनाड़ियों को भी समझ आ चुकी। पर बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड को समझ नहीं आई। जमीनी हकीकत से कितनी दूर चली गई बीजेपी। जब छोटी-छोटी राजनीतिक चालें समझ न आएं। तो पार्टी का मेंटल लेवल कितना गिर गया होगा। अपन को अंदाज लगाने में मुश्किल नहीं। चेन्नई आईआईटी के एक प्रोफेसर हैं इंद्रसेन। उनने एक थ्योरी दी।

कर्नाटक ट्वंटी-20 में बीजेपी लड़खड़ाई

Publsihed: 04.Oct.2007, 14:00

अपन को येदुरप्पा का पंद्रह अगस्त वाला बयान नहीं भूलता। उनने कहा था- 'अगली बार बेंगलूर में झंडा मैं फहराऊंगा।' येदुरप्पा बहुत जल्दी में थे। पंद्रह अगस्त से भी पहले उनने बचकानी हरकत की। जब उनतीस जुलाई को विधानसभा में कहा- 'तीन अक्टूबर से मैं मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठूंगा।' यह बात उनने बगल में बैठे कुमारस्वामी की मौजूदगी में कही। जैसे कुमारस्वामी को कुर्सी खाली करने के लिए चिढ़ा रहे हों। स्याने लोग इतनी जल्दबाजी नहीं दिखाते।