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सद्दाम को फांसी से पहले बुश का बंटाधार

अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डबलयू बुश ने 2003 में इराक पर हमला करने के बाद अपने देश में भारी विरोध के बावजूद जब दूसरी बार राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत लिया था, तो ऐसा लगता था कि रिपबिलकन पार्टी का दबदबा राष्ट्रपति पद पर अगले चुनाव तक रहेगा। लेकिन जॉर्ज बुश की दूसरी आधी अवधि भी अभी पूरी नहीं हुई कि अमेरिकी कांग्रेस और सीनेट दोनों में रिपबिलकन पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा है। कानून बनाने वाले इन दोनों ही सदनों में जॉर्ज बुश और उनकी रिपबिलकन पार्टी का कबजा नहीं रहा, अलबता दोनों ही जगह डेमोक्रेट्स का बहुमत हो गया है। डेमोक्रेट्स पार्टी के बिल क्लिंटन जब तक राष्ट्रपति रहे, खूब लोकप्रिय रहे। लेकिन जैसे ही उनका दूसरा कार्यकाल खत्म हुआ, डेमोक्रेट्स अपने नए उम्मीदवार को विजय नहीं दिला पाए।

भारतीय सड़कों पर वीआईपी आतंक

राजस्थान हाईकोर्ट ने वीआईपी मूवमेंट के दौरान जनता को होने वाली परेशानी पर एक अहम फैसला सुनाया है। पर हाईकोर्ट के इस फैसले पर कितना अमल हो पाएगा, मुझे आशंका है। हू--हू ऐसा ही फैसला पहले दिल्ली हाईकोर्ट भी दे चुकी है। लेकिन दिल्ली में वीवीआईपी मूवमेंट के समय ट्रैफिक जाम करने की पुलिस की ढींगामुश्ती खत्म नहीं हुई। वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे, तो उन्होंने इस मामले में कुछ नियम बनाए थे। इन नियमों के मुताबिक सिर्फ एक तरफ का टै्रफिक रोका जाता था, जबकि दूसरी तरफ का टै्रफिक चलता रहता था। लेकिन यूपीए सरकार आने के बाद जनता पर नेताओं और पुलिस की मिलीजुली ढींगामुश्ती फिर शुरू हो गई। वीआईपी सुरक्षा की वजह से आम जनता को जो परेशानी झेलनी पड़ती है, उसका कोई जवाब नहीं।

दो दशकों में बदल गया मीडिया

करीब एक साल पहले वीर सिंघवी ने हिंदुस्तान टाइम्स में एक लेख में दावा किया था कि सोनिया गांधी कभी भी देश की प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहती थी। उनका दावा था कि सोनिया गांधी ने 1999 में भी वाजपेयी सरकार गिरने के बाद खुद प्रधानमंत्री बनने का दावा नहीं किया था। बाद में इसी अखबार में लीड के तौर पर इससे मिलती जुलती खबर छपी, जिसमें कहा गया कि 2004 चुनाव नतीजों के फौरन बाद सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला कर लिया था। इन दोनों ही खबरों की के आर नारायणन के जीवित रहते किसी ने पुष्टि नहीं की। हालांकि 2004 का इतिहास बहुत पुराना नहीं हुआ और मेरे जैसे दर्जनों पत्रकार उस पूरे घटनाक्रम के गवाह हैं कि सोनिया गांधी के घर हुई बैठक में उन्हें सर्वसम्मति से प्रधानमंत्री की शपथ लेने के लिए नेता चुना गया था।

सेना का आधुनिकीकरण रोकने की साजिश

जॉर्ज फर्नाडिज के खिलाफ दायर एफआईआर के गुण दोष पर कुछ ज्यादा कहने की जरूरत नहीं। ऐसा मानने वालों की कमी नहीं, जो जॉर्ज फर्नाडिज को भ्रष्ट मानते हैं, लेकिन ऐसा मानने वालों की भी कमी नहीं, जो उन्हें जुझारू और सच्चा देश भक्त मानते हैं और इस केस को पूरी तरह राजनीति से प्रेरित समझते है। डीआरडीओ की आपत्ति को जॉर्ज के खिलाफ एफआईआर का मुख्य आधार बनाया गया है। कहा गया है कि डीआरडीओ के तत्कालीन अध्यक्ष अबदुल कलाम ने राजग सरकार को यह कहते हुए बराक मिसाइल खरीदने से रोका था कि एक तो वह पूरी तरह सक्षम नहीं है और दूसरा डीआरडीओ जल्द ही त्रिशूल बनाकर सेना को सौंप देगा।

कूटनीति की किरकिरी

अगर नेपाल के साथ भारत की प्रत्यार्पण संधि नहीं होती है तो मनमोहन सरकार कूटनीति के मामले में आजादी के इतिहास के बाद देश की सबसे नकारा साबित होगी। अगर नेपाल के साथ प्रत्यार्पण संधि होगी तो नक्सलवादियों का वहां हिंसा फैलाकर भारत में आकर खुले घूमना और भारत में हिंसा फैलाकर नेपाल में भाग जाना बंद हो जाएगा। मनमोहन सरकार को समर्थन दे रही दोनों वामपंथी पार्टियां ऐसा नहीं चाहती, इसलिए उनके दबाव में नेपाल के गृह मंत्री कृष्ण प्रसाद सितौला का आखिरी समय में प्रत्यार्पण संधि के लिए भारत आना टला। चीन सरकार और भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के षडयंत्र के तहत नेपाल पहले ही अपना हिंदू राष्ट्र का दर्जा खत्म करके खुद को सेक्युलर देश घोषित कर चुका है, हालांकि अपने पड़ोसी देश नेपाल में हुआ यह घटनाक्रम कूटनीति के लिहाज से बिलकुल ठीक नहीं है, लेकिन वामपंथियों के दबाव में मनमोहन सरकार चुप्पी साधकर बैठी रही।

संस्कृति, सभ्यता, संविधान और हिंदू

हाल ही में अल कायदा ने अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश को सलाह दी कि अगर वह बचना चाहते हैं तो उन्हें इस्लाम कबूल कर लेना चाहिए। इससे भी पहले एक खबर आई कि एक ईसाई महिला पत्रकार का अपहरण किया गया और उसका धर्म परिवर्तन करवा कर मुक्त कर दिया गया। उसे धमकी दी गई कि वह अब मुस्लिम के तौर पर ही रहेगी। ईरान और अफगान से आए मुगलों ने हिंदुस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन करवाने की मुहिम छेड़ी थी, इसी वजह से कश्मीर में ज्यादातर आबादी मुस्लिम हो गई, जबकि वहां सौ फीसदी आबादी ब्राह्मणों की थी। कश्मीरी पंडितों की फरियाद पर ही गुरु तेगबहादुर ने बलिदान दिया और उसके बाद सिख मत का उदय हुआ।

विकास के लिए जरुरी राजनीतिक स्थिरता

झारखंड में सता परिवर्तन के बाद मौजूदा संविधान पर एक बार फिर गौर करने का वक्त आ गया है। कई बार लगता है कि अमेरिका का संविधान भारत के संविधान से कहीं बेहतर है। शायद इसी वजह से अमेरिका में राजनीतिक स्थिरता कायम रहती है और विकास की गति मंद होने के सवाल ही पैदा नहीं होता। भारत के बारे में कहा जाता है कि या तो चुनाव हो रहे होते हैं, या चुनावों की तैयारी हो रही होती है। मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था ने सरकारों को इतना कमजोर और अस्थिर बना दिया है कि कोई भी निर्दलीय विधायक सरकार को गिराने की स्थिति में होता है। बड़े राजनीतिक दलों का जमीनी आधार खिसकने के बाद इस स्थिति ने विकराल रुप धारण कर लिया है।

मालेगांव से सबक लें मुसलमान

अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था- 'फटा हुआ बम अपने शिकार का धर्म या जाति नहीं पूछता।' मालेगांव में हुए बम धमाकों से यह बात सही साबित हो गई। इससे पहले आतंकवादी सिर्फ उन्हीं जगहों को निशाना बनाते थे, जहां हिंदू बहुल आबादी हो। पहली बार ऐसा हुआ है कि बम ऐसी जगह पर फटे हैं जो मुस्लिम बहुल आबादी वाला क्षेत्र है। हालांकि इस घटना के फौरन बाद किसी भी नतीजे पर पहुंचना नादानी होगा, लेकिन देश के गृहमंत्री शिवराज पाटिल और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने कई घंटों की समीक्षा और गुप्तचर एजेंसियों से मिली रिपोर्ट के बाद आतंकवादियों की वारदात कहकर उन अफवाहों को निराधार कर दिया, जिन्हें फैलाकर हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलने की शुरुआत हो चुकी थी।

विपदाओं पर राजनीतिक रोटियां

राजस्थान में आई बाढ़ ने उस राजनीति की याद फिर ताजा कर दी, जो एनडीए सरकार के समय देखने को मिली थी। सोनिया गांधी उस समय विपक्ष की नेता थी और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार थी। सोनिया गांधी बार-बार राजस्थान में जाकर केंद्र पर सूखा राहत में भेदभाव का आरोप लगा रही थी। यह आरोप मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मौजूदगी में लगाए जाते थे, इसलिए जनता का एक बड़ा तबका इन आरोपों को सही मानता था। लेकिन दिल्ली में बैठे एनडीए सरकार के कर्ताधर्ताओं ने सोनिया गांधी के आरोपों की आंकड़ों के साथ धाियां उड़ाना शुरू किया, तो खुद गहलोत सरकार कटघरे में खड़ी हो गई थी।

क्रीमीलेयर के लिए ही बिल बनाती सरकार

संविधान निर्माताओं ने जब अनुसूचित जाति और जनजाति को आरक्षण देने का फैसला किया, तो बहुत लंबा चौड़ा विचार विमर्श हुआ था। सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण नहीं देने और सदियो सदियों से पिछडे दोनों समुदायों को आरक्षण का फैसला बाकी समाज में लाकर खड़ा करने की सोच का नतीजा था। सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण नहीं देने का फैसला तो स्पष्ट है, इसलिए हुआ था, क्योंकि मुसलमानों ने अपना पाकिस्तान धार्मिक आधार पर ही बनाया था। जबकि भारत में जितने भी इसाई है, वे सभी के सभी पहले हिंदू अनुसूचित जाति और जनजाति के थे और धर्मांतरण की मुख्य वजह भी यही बताई जाती रही कि उनके साथ हिंदू समाज में बराबरी का व्यवहार नहीं होता था।

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