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कांग्रेस खुद बढ़ेगी, पर यूपीए को होगा नुकसान

कांग्रेस को मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, उड़ीसा, केरल और छत्तीसगढ़ में फायदा होगा। लेकिन असम, गुजरात, तमिलनाडु, हरियाणा में नुकसान होगा। सपा, राजद और द्रमुक को भी होगा अच्छा-खासा नुकसान।

भाजपा को गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार में बढ़ोत्तरी मिलेगी। वक्त देखकर जयललिता, मायावती दे सकती हैं एनडीए को समर्थन। पलड़ा किसी का भारी नहीं, टक्कर कांटे की।

यूपीए सरकार ने अल्पमत में होते हुए अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है। यूपीए लोकसभा में पहले वामपंथी दलों के समर्थन से और बाद में समाजवादी पार्टी के समर्थन से बहुमत में है। हालांकि यूपीए की स

भाजपा लोकसभा चुनाव में भी हिट विकेट को तैयार

देश की सियासत में इस हफ्ते की दो बड़ी घटनाएं रही झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का विधानसभा उप चुनाव हारना और पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत का सक्रिय राजनीति में लौटने का ऐलान। इन दोनों घटनाओं को हाल ही के विधानसभा चुनाव नतीजों की दूसरी कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। जम्मू कश्मीर और मिजोरम विधानसभाओं के चुनाव नतीजे उम्मीद के मुताबिक ही रहे थे। असल में महत्वपूर्ण रहे चार हिंदी भाषी राज्यों के नतीजे। इनमें से दो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा का फिर से जीतना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है, तो राजस्थान में हारना और दिल्ली नहीं जीत पाना भाजपा के लिए बड़ा झटका है। भाजपा चार में से तीन राज्य जीत जाती तो इसे लोकसभा चुनाव नतीजों का संकेत बताकर फूली नहीं समाती। इसी तरह कांग्रेस चार में से तीन राज्य जीत जाती तो अगली लोकसभा का स्वरूप उसके पक्ष में स्पष्ट दिखाई देता। सो जैसी स्थिति विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद दोनों राजनीतिक दलों के लिए बनी थी।

फूट से जितनी दु:खी सोनिया, उतने ही आडवाणी

छत्तीसगढ़ में हार के बाद सोनिया गांधी के दरबार में जोगी का रुतबा घटा। मध्यप्रदेश की हार ने दिग्गज नेताओं की चमक घटा दी। राजस्थान की हार के बाद भाजपा की फूट विस्फोटक होकर सामने आई।

दिल्ली और राजस्थान की हार से भारतीय जनता पार्टी में मायूसी छाई हुई है। उतनी ही मायूसी कांग्रेसी हलकों में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की हार पर भी है। लालकृष्ण आडवाणी ने राजस्थान की हार का कारण गुटबाजी बताया है और दिल्ली की हार का कारण टिकटों का गलत बंटवारा बताया है। सोनिया गांधी ने छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश दोनों ही राज्यों में पार्टी की हार का कारण स्थानीय नेताओं की गुटबाजी बताया है।  दोनों ही बड़े नेताओं ने अपनी-अपनी राय अपने-अपने संसदीय दल की बैठक में पेश की।

कांग्रेस ने दिल्ली को छोड़कर किसी राज्य में मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं किया था। हालांकि छत्तीसगढ़ में अजित जोगी को सांसद होने के बावजूद विधानसभा का टिकट देकर संकेत कर दिया था और मिजोरम में ललथनहवला को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक उम्मीदवार माना जाता था। राजस्थान में मुख्यमंत्री का फैसला करने में कांग्रेस को उतनी देर नहीं लगी, जितना छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में विधायक दल का नेता चुनने में लगी।

राहुल का ट्रायल था मध्यप्रदेश

पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश के बाद गुजरात और कर्नाटक में कांग्रेस लगातार हारी। अब उसमें मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ भी जुड़ गया। पंद्रहवीं लोकसभा के लिए कांग्रेस की सारी उम्मीद मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान पर टिकी थी। अब कांग्रेसी नेताओं के माथे पर परेशानी की लकीरें दिखने लगीं।

पांच राज्यों के चुनाव नतीजों से कांग्रेस और भाजपा में आत्ममंथन शुरू हो गया है। विधानसभा चुनावों को सेमीफाइनल मानकर चलने वाली दोनों ही पार्टियों को चुनाव नतीजों ने परेशानी में डाल दिया है। भारतीय जनता पार्टी राजस्थान की हार को लेकर उतनी चिंतित नहीं है, जितनी दिल्ली की हार को लेकर है। दूसरी तरफ कांग्रेस दिल्ली, मिजोरम और राजस्थान हासिल करने से उतनी खुश नहीं है, जितनी मध्यप्रदेश में हार से परेशान है। अगली लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने के लिए कांग्रेस की निगाह मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान पर ही टिकी हुई थी। तीनों ही राज्यों के चुनाव नतीजे कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेरने वाले हैं।

मुंबई का असर मतदान केन्द्रों में भी पड़ेगा

मध्यप्रदेश, दिल्ली, राजस्थान विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुई मुंबई की आतंकवादी वारदात ने कांग्रेसियों के माथे पर  पसीने की बूंदें झलका दी। कांग्रेस पर आतंकवाद के प्रति नरम होने का आरोप लगा रही भाजपा को इन तीनों राज्यों में फायदा होगा।

छह विधानसभाओं के चुनावों का ऐलान होने से पहले भाजपा दिल्ली को लेकर सबसे ज्यादा आश्वस्त थी। भाजपा यह मानकर चल रही थी कि दिल्ली तो उसे मिलेगा ही, कम से कम छत्तीसगढ़ और  मिल जाए, तो लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी की नाक बच जाएगी। मध्यप्रदेश को भाजपा हारा हुआ मानकर चल रही थी, राजस्थान को लेकर भी आश्वस्त नहीं थी। लेकिन जैसे-जैसे चुनावी शतरंज बिछनी शुरू हुई, भाजपा आलाकमान यह देखकर दंग रह गया कि मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान उम्मीद से ज्यादा नतीजा दिखा रहे थे, जबकि दिल्ली में विजय कुमार मल्होत्रा की उम्मीदवारी का ऐलान होते ही हालात ने नया मोड़ ले लिया।

एटीएस जांच को लोकसभा चुनाव तक खींचने की सियासत

श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड ने पलटी खाकर कांग्रेस का समर्थन शुरू कर दिया है, लेकिन कांग्रेस की निगाह मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान पर ज्यादा टिकी है, जहां 65 में से 56 लोकसभा सीटें भाजपा के पास हैं।

जिन छह राज्यों के विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उनमें से दो जम्मू कश्मीर और मिजोरम अत्यंत संवेदनशील राज्य हैं, लेकिन देशवासियों की निगाह इन दोनों राज्यों पर कम, बाकी चार राज्यों पर ज्यादा टिकी है। मिजोरम में सत्ता परिवर्तन के कोई आसार नहीं दिखते, लेकिन जम्मू कश्मीर में नए गठबंधन पैदा होने के आसार दिखाई देने लगे हैं। हालांकि नेशनल कांफ्रेंस का पलड़ा भारी है, लेकिन ऐसा नहीं दिखता कि वह अपने बूते पर सरकार बना पाएगी। पिछले विधानसभा चुनाव में भी नेशनल कांफ्रेंस की सीटें सबसे ज्यादा आई थी, लेकिन कांग्रेस और पीडीपी ने मिलकर सरकार बना ली थी।

टिकटों की बिक्री लोकतंत्र के लिए खतरा

चुनाव आयोग को चाहिए कि टिकटों की बिक्री के आरोपों की सीबीआई से जांच करवाए। आरोप सही पाए जाने पर राजनीतिक दल की मान्यता खत्म होनी चाहिए।

परिवारवाद न तो कांग्रेस में कोई अजूबा है और न ही अन्य राजनीतिक दलों में कोई नई बात। जिस तरह वकील का बेटा बड़ा होकर वकील बनने की सोचता है और डाक्टर का बेटा डाक्टर बनने की सोचता है उसी तरह सांसदों, विधायकों के बेटे भी अपने परिवेश में राजनीति की शिक्षा-दीक्षा हासिल करते हैं, इसलिए वे भी वैसा ही सोचते हैं। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी या उनकी मां सोनिया गांधी कतई राजनीति में नहीं होते अगर राजीव गांधी राजनीति में न होते।

एक बार जो सत्ता का स्वाद चख ले

दल-बदल की बीमारी ऐसे लोगों में ज्यादा पाई जाती है, जो सत्ता का स्वाद एक बार चख चुके होते हैं। चुनाव के मौके पर दल-बदल की बीमारी का मौसम आ जाता है। भाजपा ने टिकटों का ऐलान करने से पहले पार्टी के लिए काम करने की शपथ दिलाने का रास्ता ईजाद किया है। यह कितना कारगर होगा?

जिन छह राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, उनमें टिकट बंटवारे का काम अब करीब-करीब खत्म हो गया है। टिकट बंटवारे के बाद पार्टियों के दफ्तरों में तोड़फोड़ और बगावतों का सिलसिला भी थमने लगा है। चुनाव लड़ने की टिकट न मिलने के बाद अपनी ही पार्टी  के खिलाफ नारे लगाने, जिन नेताओं के पांव छूकर टिक

प्रज्ञा ठाकुर को कौन बनाएगा मुद्दा

प्रज्ञा को मोहरा बनाकर कांग्रेस पूरे देश में हिंदुओं को आतंकवादी बता रही है, लेकिन मध्यप्रदेश में खुद बचाव की मुद्रा में। कांग्रेस को डर है कहीं यह मुद्दा उल्टा ही न पड़ जाए।

कांग्रेस के लिए सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने वाली बात हुई। प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी सात के अंक को अपने लिए शुभ मानते हैं, इसलिए वह समझ रहे थे कि पच्चीस नवंबर उनके लिए शुभ होगा।

सोनिया का आशीर्वाद फिर जोगी को

विरोधियों को पछाड़ने के बाद खुद की रमण सिंह के मुकाबले चुनाव लड़ने की तैयारी। पत्नी और बेटे को भी टिकट दिलाने में जुटे। पहली ही नजर में कांग्रेस का पलड़ा भारी।

पूर्वोत्तर के मिजोरम और देश की राजधानी दिल्ली समेत पांच  हिन्दी भाषी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव की घोषणा हो चुकी है। इनमें से सबसे पहले छत्तीसगढ़ विधानसभा का चुनाव होगा। छत्तीसगढ़ का गठन पहली नवंबर 2000 को एनडीए शासनकाल के समय हुआ, हालांकि छत्तीसगढ़ अलग राज्य के लिए संघर्ष दो दशकों से चल रहा था। कांग्रेस ने हमेशा अलग छत्तीसगढ़ राज्य का विरोध किया, लेकिन जब राज्य का गठन हुआ, तो पहली सरकार उसी की बनी।

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