करात-बाबू में थर्डफ्रंट की गुफ्तगू

मौका था किसानों की समस्याओं पर सेमीनार। यूएनपीए के नेता दिल्ली में एकजुट हुए। कृषि विशेषज्ञ स्वामीनाथन को सामने किया गया। स्वामीनाथन को किसानों की समस्याओं पर रपट दिए अरसा हो चुका। पर यूपीए सरकार ने रपट पर अमल नहीं किया। अब यूएनपीए रपट पर अमल के लिए आंदोलन करेगी। पर पर्दे के पीछे बनी थर्ड फ्रंट की रणनीति। मंगलवार इस मामले में अहम रहा। पिछली बार थर्ड फ्रंट की सरकार थी। तो चंद्रबाबू नायडू यूएफ के कर्ता-धर्ता थे।

नंदीग्राम के जख्म फिर उधड़े

बुध्ददेव भट्टाचार्य नंदीग्राम कांड पर माफी मांगकर कोलकाता लौटे। तो ममता बनर्जी लोकसभा में लौट आईं। पिछले दिनों उन्होंने दूसरी बार इस्तीफा भेजा था। बुध्ददेव कोलकाता लौटे, ममता दिल्ली आई। इस बीच नंदीग्राम से जुड़ी दो बड़ी खबरें आ गई। पहली खबर- सीपीएम के खुन्नस निकालने की शैली से संबंधित। सीपीएम ने महिला फिल्मोत्सव का उद्धाटन अपर्णा सेन से करवाने पर एतराज किया है।

कर्नाटक विधानसभा कल भंग होने के आसार

कर्नाटक में राज्यपाल की सिफारिश पर राष्ट्रपति राज लागू किए जाने की रिपोर्ट आज संसद के दोनों सदनों में रख दी गई। रिपोर्ट के साथ राज्यपाल की ओर से भेजी गई सिफारिश की प्रति भी सदन पटल पर रखी गई। सूत्रों के मुताबिक शुक्रवार को दोनों सदनों से राष्ट्रपति शासन की मंजूरी मिलने के बाद देर रात तक विधानसभा भंग की जा सकती है।

नंदीग्राम पर हो जाए तहलका

लेफ्ट ने गवर्नर की आलोचना के बाद अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एस. राजेंद्र बाबू को कटघरे में खड़ा किया। नंदीग्राम का जिक्र जो भी करेगा। लेफ्ट के निशाने पर आ जाएगा। गुजरात की तरह नंदीग्राम पर स्टिंग आपरेशन हुआ। तो मीडिया भी लेफ्ट के निशाने पर होगा। वैसे भी सांसदों को लिखी खुली चिट्ठी में सीपीएम ने कहा- 'मीडिया की रिपोर्टिंग एकतरफा।' लेफ्ट चाहता है- 'जो वह कहे, मीडिया वही छापे।' मीडिया को नंदीग्राम में घुसने की इजाजत नहीं।

पर अंगद का पांव नहीं कर्नाटक

येदुरप्पा कर्नाटक के मुख्यमंत्री हो गए। दक्षिण में खाता खुलना बीजेपी के लिए बड़ा जश्न। पर पहले ही दिन पांव लड़खडाने शुरू हो चुके। कर्नाटक में रखा गया कदम अंगद का पांव साबित होता दिखाई नहीं देता। नरेंद्र मोदी का जश्न में मौजूद रहना देवगौड़ा को खटका होगा। सरकार पर देवगौड़ा की सहमति अभी भी शक के घेरे में। एन वक्त पर वह बेंगलुरु से गायब हो गए। शपथ ग्रहण में देवगौड़ा की गैर मौजूदगी आने वाले तूफान का इशारा।

बनी, तो टिकाऊ होगी येदुरप्पा सरकार

कर्नाटक के सवा सौ एमएलए राष्ट्रपति भवन में परेड करके लौट गए। उसके छत्तीस घंटे बाद भी केंद्र सरकार के सिर पर जूं नहीं रेंगी। बीजेपी-जेडीएस को दावा पेश किए बारह दिन हो चुके। अगर कांग्रेस की सरकार बननी होती। तो इतनी देरी कभी नहीं होती। संघवाद पर दिल्ली में चल रही मीटिंग में गवर्नर की जगह येदुरप्पा आते। गवर्नर की रपट जगजाहिर नहीं हुई। एसेंबली बहाल कर सरकार बनाने की सिफारिश होती। तो इतनी देर नहीं लगती। गवर्नर ने फैसला  केंद्र पर छोड़ा। अब निगाह केबिनेट की अगली मीटिंग पर। अगली मीटिंग में भी कर्नाटक का फैसला नहीं हुआ।

गवर्नर की गेंद केंद्र के पाले में

राजनीति इसी का नाम। सुषमा स्वराज बेंगलुरु में गांधी की मूर्ति के सामने बोली। तो गवर्नर रामेश्वर ठाकुर का कोई लिहाज नहीं किया। अपनी शैली बरकरार रखते हुए गरजी। येदुरप्पा को सरकार बनाने का न्यौता न मिलने पर आंदोलन की चेतावनी दी। पहले से दी गई दो दिन की मोहलत का भी ख्याल नहीं रखा। शाम तक की चेतावनी दे डाली।

देवगौड़ा की टेढी चालें

पिछले दो सालों में एचडी देवगौड़ा ने घाघ राजनीतिज्ञ की छवि भले ही बनाई। मक्कार राजनीतिज्ञ का लेबल भी खुद पर चिपका लिया। कब कौन सी राजनीतिक चाल चलेंगे, कब कौन सी करवट ले लेंगे। इसे समझना आसान नहीं। शुक्रवार को पुराने साथी एमपी प्रकाश को कांग्रेस से गठबंधन करने की हरी झंडी दी। शनिवार को बीजेपी को समर्थन की चिट्ठी दे दी। बीजेपी इस चिट्ठी से फूली नहीं समाई और सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया।

मोटे तौर पर चुनावी तैयारियां शुरू

मोटे तौर पर चुनावी तैयारियां शुरू हो चुकी। एटमी करार पर यूपीए-लेफ्ट की पांचवीं मीटिंग के बाद मंगलवार को लेफ्ट की तीसरे मोर्चे से गुफ्तगू साफ संकेत। तीसरे मोर्चे में अब फिलहाल चौटाला, चंद्रबाबू और मुलायम। तीनों के साथ प्रकाश करात और एबी वर्धन ने संसद सत्र की रणनीति बनाई। पंद्रह नवंबर को शुरू होने वाला सत्र संभवत: आखिरी होगा। संभवत: करार पर लेफ्ट-यूपीए की अगले दिन होने वाली मीटिंग भी आखिरी होगी। करार की खामियां समझने का काम पूरा हो चुका। लेफ्ट का रुख पहले से ही स्पष्ट।

जमीनी हकीकत ने बदली चुनावी रणनीति

लोकसभा पर मंडराए बादल फिलहाल छंट गए। एटमी करार को ठंडे बस्ते में डाल मनमोहन इतवार को पांच  दिन की विदेश यात्रा पर रवाना होंगे। नेहरू के बाद मनमोहन द्विपक्षीय  बातचीत के सिलसिले में नाइजीरिया जाने वाले पहले पीएम होंगे। नेहरू 1962 में नाइजीरिया गए थे। वाजपेयी 2003 में नाइजीरिया जरूर गए, पर कामन वेल्थ सम्मेलन के सिलसिले में। मध्यावधि चुनाव टालने के बाद सोनिया भी मंगलवार को रायबरेली रवाना होंगी।

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