November 2011

जांच की सियासत

जनसत्ता, 22 नवंबर, 2011 : राजनीतिक गलियारों में लोग कहते सुने जाते हैं, राज तो कांग्रेस को ही करना आता है। कौन-सी चाल कब चलनी है, इस मामले में बाकी सब अनाड़ी हैं। मायावती चाहे लाख बार सवाल उठाती रहें कि जयराम रमेश की चिट्ठियां और गुलाम नबी आजाद के आरोपों की बाढ़ चुनावों के वक्त ही क्यों। भारतीय जनता पार्टी भी चाहे जितने आरोप लगाए कि राजग कार्यकाल के स्पेक्ट्रम आबंटन पर एफआईआर सीबीआई का बेजा इस्तेमाल है, पर यह कांग्रेस को ही आता है कि लालकृष्ण आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी रथयात्रा के समापन आयोजन की हवा कैसे निकालनी है। आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी रैली और संसद के शीत सत्र से

मीडिया की मर्यादा

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा को लगता है कि न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू की अध्यक्षता वाली प्रेस परिषद भंग कर देनी चाहिए। यह मांग उन्होंने इसलिए की क्योंकि काटजू ने दृश्य मीडिया को प्रेस परिषद के अधीन लाने की मांग की है। न्यायमूर्ति वर्मा अब दृश्य मीडिया की उस नेशनल ब्राडकास्टिंग अथॉर्टी के अध्यक्ष हैं जो प्रेस परिषद से भी ज्यादा दंतविहीन है, जो नहीं चाहती कि मीडिया पर कोई नियंत्रण होना चाहिए, जो प्रेस परिषद के दायरे में भी नहीं आना चाहती...

जिंदा कौमें और पांच साल का इंतजार

लोकपाल अभी बना नहीं। पता नहीं जनलोकपाल प्रारूप के अनुरूप बनेगा भी या नहीं। कहीं अन्ना हजारे को मजबूत लोकपाल के लिए फिर से आंदोलन न करना पड़े। लेकिन उससे पहले ही टीम अन्ना ने संसद को सुधारने का बीड़ा उठा लिया है। राइट-टू-रिकॉल के लिए आंदोलन की डुगडुगी बजनी शुरू हो गई है। राइट टू रिकॉल यानी जनता को अपने चुने हुए सांसदों-विधायकों को वापस बुलाने का अधिकार। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने भी आव देखा न ताव। जयप्रकाश नारायण का नाम लेकर राइट-टू-रिकॉल का समर्थन कर दिया। शरद यादव और नीतिश कुमार समाजवादी परंपरा की उपज हैं। उनके नेता राममनोहर लोहिया कहा करते थे- 'जिंदा कौमें

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट