October 2011

उत्तराखंड से हुई आदर्श लोकायुक्त की शुरुआत

कहते हैं, दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंककर पीता है। कर्नाटक में लोकायुक्त की मार से सहमी भारतीय जनता पार्टी पर यह कहावत कितनी लागू होती है, यह तो अभी नहीं कहा जा सकता। लेकिन जिस तेजी से भाजपा ने उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बदला, उससे कर्नाटक का सबक सीखने की भनक तो लगी ही। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप सुर्खियों में नहीं आए थे। गाहे-बगाहे अदालतों में भ्रष्टाचार के मामले जरूर आए। अदालतों ने तीखी टिप्पणियां भी की, सरकार के कुछ फैसले रद्द भी किए। विपक्ष भ्रष्टाचार के मामले उजागर करता, उससे पहले ही कर्नाटक के लोकायुक्त की रिपोर्ट आ गई। कर्नाटक के मुख्यमंत्री को

आरटीआई और राजनीतिज्ञों-नौकरशाहों का गठजोड़

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अचानक अपने ही बनाए एक कानून पर चिंतित हो उठे हैं। उनकी पार्टी के मंत्री और कई सांसद तो पहले से ही चिंतित थे। अकसर सत्ताधारी दल के सांसदों को अपनी ही सरकार से तरह-तरह की शिकायतें रहती हैं। उनके काम तीव्र गति से नहीं होते या कई बार होते ही नहीं। उन्हीं की पार्टी के मंत्री उनकी सुनते नहीं या कई बार मिलने तक का समय नहीं देते। पर यह अनोखा उदाहरण सामने आया है जब प्रधानमंत्री को अपने ही बनाए कानून पर फिक्रमंद देखा जा रहा है। यह चिंता है सूचना के अधिकार कानून के तहत जनता को मिल रही सरकार और अफसरों के दुष्कर्मो की सूचनाओं को लेकर। संभवत: यूपीए सरकार ने अपन

हिसार भाजपा के लिए भी सबक

हिसार का चुनाव नतीजा कांग्रेस के लिए ही नही, भाजपा के लिए भी सबक लेने का मौका है. कांग्रेस ने अपनी साख बेह्द खराब कर ली है. जमानत जब्त होना कांग्रेस के लिए चिंता का विषय होना चाहिए. टीम अन्ना कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करने ना जाती तो उसकी जमानत कतई जब्त नही होती. टीम अन्ना भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने में कामयाब रही. इससे यह भी जाहिर हो गया है कि देश की जनता भ्रष्टाचार से कितनी त्रस्त है. जो लोग यह मानते हैं कि भ्रष्टाचार अब चुनावी मुद्दा नही बनता उनके लिए भी यह चुनाव बडा सबक है. देश की जनता को अगर कोई सही वकत पर जगा दे, तो वह जग भी जाती है.

जनाक्रोश और जनतंत्र

अन्ना  टीम के सदस्य और प्रसिध वकील प्रशांत भूषण के चेम्बर में घुस कर तीन युवकों ने उनकी पिटाई कर दी. जिस की जितनी निंदा की जाए कम है. जनतंत्र में ऐसी हिंसा की इजाजत नहीं दी जा सकती. उनका कसूर सिर्फ यह था कि उन्होंने कश्मीर पर एक ऐसा बयान दे दिया था, जो इन युवकों को पसंद नही था. वह बयान ज्यादतर भारतीयों को पसंद नहीं आया होगा. बिना लाग-लपेट बयान को प्रस्तुत करें तो उन्होंने कहा था कि कश्मीरियों को साथ रखने की कोशिश करनी चाहिए, लेकिन अगर वे साथ नहीं रहना चाहें तो उन्हें अलग होने देना चाहिए.

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट