April 2011

एक शाम राम के नाम....

प्रतिभा आडवाणी का एसएमएस था। रामनवमी की पूर्व संध्या पर एक घंटे की डाक्यूमेंट्री देखने का न्यौता था। ताकीत थी- आ रहे हों, तो एसएमएस से पुष्टि कर दें। साथ में चाय का लालच भी था। सो अपन ने आने की पुष्टि कर दी। यों अपन जानते हैं- इस परिवार में चाय का मतलब होता है- कुछ चटपटा हो जाए। गोल-गप्पे, दही-भल्ले, पापड़ी-भल्ले, पाव-भाजी, छोले-कुल्चे, जलेबी वगैरहा।

दादागिरी पर भारी पडी अण्णागिरी

Anna Hazare and Manmohan Singh

मनमोहन सिहं इतने भोले भी नही। आधुनिक गांधी अण्णा हजारे की बातें नहीं मानने की पूरी कोशिश की थी उनने। तीन दिन तक मनमोहन सिंह के नुमाइंदे कपिल सिब्बल संविधान की दुहाई देकर समझाने-बुझाने की कोशिश कर रहे थे। अण्णा के नुमाइंदे अरविद केजरीवाल को बता रहे थे जो निवाचित नही हुए, वे कानून बनाने वाली कमेटी में कैसे आएंगे। आएंगे भी, तो सरकारी नोटिफिकेशन कैसे होगा। कपिल सिब्बल के मन में धुकधुकी भी थी, किसी ने सोनिया गांधी की रहनुमाई वाली एनएसी पर सवाल उठाया तो क्या होगा। एनएसी मैंबर कौन से चुनकर आए हैं, सारे सरकारी बिलों की हरी झंडी पहले उन्हीं से लेती है सरकार। उनके नामों की नोटिफिकेशन कैसे की थी सरकार ने।