February 2010

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कांग्रेस बोली- 'नई बात नहीं महंगाई तो हम साथ लाए थे'

यह अपनी मनगढ़ंत बात नहीं। खुद कांग्रेस ने कहीं है यह बात। वह भी कोई छोटे-मोटे नेता ने नहीं। अलबत्ता सोनिया की बगल में खड़े होकर कही गई। वह भी ताल ठोककर। कहां कही, किसने कही, कब कही। उस सबका खुलासा अपन बाद में करेंगे। पहले बात संसद ठप्प होने की। पहले ही दिन दोनों हाऊस नहीं चले। शुकर है इस बार विपक्ष ने जनता का मुद्दा उठाया। महंगाई का। जिस पर कांग्रेस के सहयोगी भी घुटन महसूस कर रहे। खासकर ममता और करुणानिधि की पार्टियां। लालू-मुलायम भी। जो सरकार के साथ हैं, या नहीं। वे खुद भी नहीं जानते। सहयोगियों की बात छोड़िए। कांग्रेस की सांसद मीरा कुमार भी बोली- 'महंगाई से सचमुच जनता त्रस्त। सदन में प्रभावी बहस होनी चाहिए।' पर यह बात उनने कही बाहर आकर। अंदर काम रोको प्रस्ताव उन्हीं ने मंजूर नहीं किया। नामंजूर भी नहीं किया।

अमीर हो गए हैं लोग, मंहगाई का असर नहीं

अपन को भी पार्लियामेंट कवर करते दो दशक होने को। ऐसा ढुलमुल अभिभाषण किसी सरकार का नहीं सुना। अभिभाषण पढ़ते भले ही राष्ट्रपति हों। तैयार करती है सरकार। मंजूरी देती है केबिनेट। सो मनमोहन सरकार का अभिभाषण बेअसर सा रहा। ढुलमुल सा रहा। जैसे बचाव की मुद्रा में खड़ी हो सरकार। समस्याओं के बचाव में अजीबोगरीब दलीलें पेश हुई। कुछ समस्याओं से तो कबूतर की तरह आंख ही मूंद लीं। जैसे तेलंगाना का जिक्र तक नहीं। नौ दिसंबर का ऐलान कांग्रेस के जी का जंजाल बन चुका। न बनते बन पड़ रहा है, न उगलते। टाइमपास करने को कमेटी बनी। तो उसकी शर्तें बदनीयती की पोल खोल गई। अब तेलंगाना राष्ट्र समिति की मुखालफत तो अपनी जगह। तेलंगाना के कांग्रेसियों को भी अपने आलाकमान की नीयत पर शक। अपने प्रधानमंत्री की नीयत पर शक। बजट सत्र के पहले दिन ही कांग्रेस को मुखालफत का स्वाद चखना पड़ा।

सत्ता चिड़िया की आंख बीजेपी ने तान लिया बाण

शुक्रवार बीजेपी अधिवेशन का आखिरी दिन था। आंदोलन की रूपरेखा सामने आई। दूसरे दिन राम मंदिर की तान अलापी गई। तो तीसरे दिन गंगा मैया और मुस्लिम आरक्षण छाया। तीनों मुद्दे हिंदुत्व के। यों नितिन गड़करी कट्टर हिंदूवादी नहीं। पर संघ की लाईन तो लेनी पड़ेगी। यों बात महंगाई, राष्ट्रीय सुरक्षा और कश्मीर की भी हुई। जिनका देश की जनता से सीधा वास्ता। पर मीडिया को चाहिए वे तीनों मुद्दे। जिनसे बीजेपी को सांप्रदायिक ठहराया जाए। जो नितिन गड़करी ने थमा दिए। मंदिर का मुद्दा तो जैसे मीडिया से डरकर आया। कहा- 'मैं मंदिर का मुद्दा नहीं उठाऊंगा। तो मीडिया कहेगा- मुद्दा छोड़ दिया।' वैसे उनने कोई नई बात नहीं कही। कांग्रेस 'मंदिर दो, मस्जिद लो' फार्मूले से भी परेशान सी दिखी। पर खुद कांग्रेस को नरसिंह का वादा याद नहीं। उनने मस्जिद बनाने का वादा किया था। गड़करी ने राम मुद्दे पर सिर्फ रस्म अदायगी की।

ब्यूरोक्रेसी की अकल ठिकाने लगाई तीन दस जनपथियों ने

सरदार पटेल के समय में जरूर ऐसा होता था। जब कोई मंत्री पीएम से उलझने की हिम्मत करे। इंदिरा के जमाने से वैसी हिम्मत फिर किसी ने नहीं की। जिसने भी हिम्मत की। वह केबिनेट से बाहर हो गया। वीपी सिंह का राजीव से टकराव पुरानी बात नहीं। अरुण नेहरू, अरुण सिंह और आरिफ मोहम्मद खान टकराव पर आए। तो केबिनेट से बाहर होना पड़ा। पर नेहरू से टकराव मोल लेकर भी पटेल मंत्री बने रहे। पटेल ने तो दो बार इस्तीफा भी दिया। पर नेहरू की इतनी हिम्मत नहीं थी। जो पटेल का इस्तीफा मंजूर कर लेते। श्यामाप्रसाद मुखर्जी का भी नेहरू से टकराव रहा। मुखर्जी कांग्रेस में नहीं थे। फिर भी गांधी के कहने पर केबिनेट में थे। कश्मीर जाने के लिए परमिट के मुद्दे पर टकराव हुआ तो इस्तीफा दे दिया। सरदार पटेल का तो हैदराबाद और कश्मीर पर नेहरू से खुला टकराव था। नेहरू के साथ टकराव तो पहले राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू के साथ भी हुआ। हिंदू कोड बिल के खिलाफ थे राजेंद्र बाबू। उनने दो बार बिल वापस लौटाया। तीसरी बार दस्तखत करने पड़े। पर राजेंद्र बाबू ने विरोध जता दिया था। तिब्बत पर भी कड़ा टकराव था नेहरू और राजेंद्र बाबू में। तिब्बत को चीन का हिस्सा नहीं मानना चाहते थे राजेंद्र बाबू। राजेंद्र बाबू का असली टकराव तो नेहरू के साथ सोमनाथ मंदिर पर हुआ।

मुंबई के बाद हो गया पुणे, बात से फिर भी नहीं परहेज

बारह फरवरी को अपन ने लिखा था- 'अमेरिकी दबाव में बात, पर आतंकियों का घर है पाक।' इसी में अपन ने खुलासा किया था- 'कुरैशी ने होलबु्रक को भारत में मुंबई नहीं दोहराने की गारंटी नहीं दी।' और तेरह फरवरी को पुणे में मुंबई दोहराया गया। कौन हैं कुरैशी। कौन हैं होलबु्रक। पाक के विदेशमंत्री हैं शाह महमूद कुरैशी। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के दक्षिण एशिया दूत हैं होलबु्रक। भले ही एसएम कृष्णा इंकार करें। या चिदंबरम और एंटनी। पर अपन को शक। बातचीत का न्योता होलबु्रक के हाथ ही गया था। अठारह-उन्नीस जनवरी को होलबु्रक दिल्ली में थे। बीस-इक्कीस को इस्लामाबाद में। चार फरवरी को न्योता भेजे जाने का खुलासा हुआ। तो कहा गया था- 'न्योता पंद्रह दिन पहले भेजा गया था।' अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। कुरैशी ने वादा नहीं किया। अपन ने फिर भी न्योता वापस नहीं लिया।

तेलंगाना में आग भड़की तो कबूतर ने आंखें मूंद ली

तेलंगाना पर आयोग बनाकर आग बुझाई थी। आयोग की शर्तों ने आग फिर भड़का दी। नौ दिसंबर कांग्रेस के जी का जंजाल बन गया। उस दिन सोनिया का जन्म दिन था। तेलंगाना के कांग्रेसी नेता बधाई देने पहुंचे। तो तेलंगाना का रिटर्न गिफ्ट मांग लिया। सोनिया ने उसी दिन कोर कमेटी की धड़ाधड़ा मीटिंगे बुलाई। रात ग्यारह बजे तीसरी कोर कमेटी से निकले चिदंबरम ने कहा- 'सरकार तेलंगाना बनाने पर सहमत।' न सहयोगी दलों से पूछा। न केबिनेट से फैसला हुआ। नादिरशाही का जो नतीजा निकलना था। वही निकला। सोनिया ने सोचा था- तेलंगाना बनेगा। तो चंद्रबाबू और जगनरेड्डी कहीं के नहीं रहेंगे। दोनों सिर्फ चार जिलों वाले रायलसीमा के नेता रह जाएंगे। ग्यारह जिलों वाले तटीय आंध्र से कांग्रेस का नया नेतृत्व उभरेगा।

पवार की हरकतों पर कांग्रेस की तिरछी नजर

देवीसिंह शेखावत के खिलाफ कोर्ट फैसले से कांग्रेस में हड़कंप। चौबीस अकबर रोड और दस जनपथ ने फौरी पड़ताल की। अभिषेक मनु सिंघवी को खबर नहीं थी। ब्रीफिंग खत्म हुई। तो उनने सवाल पूछने वाले से डिटेल पूछी। तभी एक मराठी मानुष खबरची ने कहा- 'जमीन घोटाले का मामला नया नहीं। अभी तो कई और घोटाले खुलेंगे।' सिंघवी ने साफ किया- 'राष्ट्रपति के परिवार को कानूनी कार्रवाई से छूट नहीं।' राष्ट्रपति भवन ने भी मुकदमे से नाता तोडा। कहा- 'किसी निजी व्यक्ति के मामले से राष्ट्रपति भवन का ताल्लुक नहीं।' अपन को राष्ट्रपति चुनाव में हुए आरोप-प्रत्यारोप नहीं भूले। कांग्रेस ने तब यह कहकर पीछा छुड़ाया था- 'उम्मीदवार पर तो कोई आरोप नहीं।' सवाल दागे गए। तो जवाब अब भी वही होगा।

तो कांग्रेस का आपरेशन आजमगढ़ शुरू होगा अब

तो दिग्गी राजा ने कांग्रेसी प्रवक्ताओं की हवा खिसका दी। अपन भी हैरान थे। दस जनपथ के इशारे बिना तो आजमगढ़ नहीं गए होंगे दिग्गीराजा। वही सच निकला। दिग्गी राजा ने सोनिया को आजमगढ़ दौरे की रपट दी। तो कांग्रेसी प्रवक्ताओं की घिग्गी बंध गई। अभिषेक मनु सिंघवी, मनीष तिवारी, शकील अहमद को पता ही नहीं था। इसीलिए परेशानी का इजहार कर गए। प्रवक्ताओं को पता ही नहीं लगती- सोनिया-राहुल की रणनीति। खुद सोनिया गांधी और राहुल ने दिग्गी को सौंपा था आपरेशन आजमगढ़। जो दिग्गी राजा की रपट से पूरा नहीं हुआ। अलबत्ता आपरेशन तो अब शुरू होगा। सोनिया को सौंपी लिखित रपट दाखिल खारिज नहीं होगी। अलबत्ता रपट की एक-एक सिफारिश पर अमल होगा।

पवार की ठाकरे वंदना से राहुल ब्रिगेड भड़की

राहुल बाबा ने उस दिन गलती से बिहार की जगह गुजरात कह दिया। तो बवाल खड़ा हो गया। बवाल से नरेन्द्र मोदी गदगद हुए। अब वरुण बाबा ने मंहगाई पर दोधारी तलवार चलाई। तो फिर विवादों में फंस गए। उनने कहा - 'केन्द्र में रावण, तो प्रदेश में सूर्पनखा।' दोनों बाबाओं का विवादों से पुराना रिश्ता। खैर सोमवार राहुल और वरुण का नहीं। आरक्षण और मुखपत्रों की जंग का रहा। जिनके अपने मुखपत्र नहीं। उनने ब्लागों से जंग-ए-एलान कर दिया। कई दिन अमर सिंह ब्लाग पर तीर चलाते रहे। अमर सिंह तो मुलायम के कुनबे पर तीर चला रहे थे। पर लालकृष्ण आडवाणी ने मनमोहन पर निशाना साधा है। अमर सिंह निकाल बाहर किए गए। मुलायम ने अमर सिंह की जगह दूसरा ठाकुर मोहन सिंह भिड़ा दिया। मोहन सिंह अब मनमोहन-माया पर उतना नहीं बरसते। जितना अमर सिंह पर। ऐसे लगता है- जैसे ठाकुरों की जंग शुरु हो गई हो।

गुटबाजी पर भारी पड़ रहे गड़करी

नितिन गड़करी के अध्यक्ष बनते ही भारतीय जनता पार्टी की धोती उतर गई। राजनाथ सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, वेंकैया नायडू, जना कृष्णामूर्ति सब धोती वाले अध्यक्ष थे। सूटेड-बूटेड अध्यक्ष नितिन गड़करी ने अपनी पहली ही प्रेस कांफ्रेंस में बदली हुई भाजपा के दर्शन करवाए। प्रेस कांफ्रेंस के बाद परोसे गए दोपहर भोज में मांसाहारी व्यंजनों ने सबको चौंकाया। भाजपा दफ्तर में मांसाहारी सार्वजनिक भोजन का आयोजन पहली बार हुआ था। इससे पहले मांसाहारी भोजन के शौकीन वेंकैया नायडू साल में एक बार अपने घर पर ही दोपहर भोज का आयोजन करते थे। जनसंघ के जमाने से भाजपा दफ्तर शुध्द ब्राह्मणवादी छुआछूत के अंदाज से चल रहा था।