Monthly archive

January 2010

महंगाई के मोल-तोल में सरकार एक कदम आगे, दो कदम पीछे

महंगाई पर केबिनेट कमेटी हुई। तो शरद पवार ने दावा ठोका था- 'अब महंगाई घटनी शुरू हो जाएगी। कम से कम चीनी के दाम जल्द घटेंगे।' प्रेस कांफ्रेंस का ऐलान छपा। अखबारों की स्याही सूखी नहीं थी। खुद पवार ने दूध की किल्लत का रोना रो दिया। बात पवार की चल ही रही। तो बताते जाएं- शरद पवार का मंत्रालय ही परस्पर विरोधी। उनका मंत्रालय है- कृषि एवं खाद्य आपूर्ति। एक तरफ उनका काम फसलों और किसानों का हित देखना। देश को अनाज सही समय पर मिलता रहे। इसकी निगरानी करना। दूसरी तरफ आम आदमी को वाजिब कीमत पर खाद्य आपूर्ति करना। अब अगर वह किसानों के हितों की रक्षा करें। तो किसानों को वाजिब कीमत दिलाने की जद्दोजहद करेंगे। किसानों की चीजों के दाम बढ़ेंगे। तो उसका असर बाजार पर होगा ही। यानी आम आदमी को अनाज महंगा मिलेगा ही। सो हुआ ना परस्पर विरोधी मंत्रालय। किसके हितों की रक्षा करें? किसानों की या उपभोक्ताओं की।

कंगारूओं की करतूतों से भरा सब्र का प्याला

आस्ट्रेलिया में हमले थम नहीं रहे। गुरुवार को फिर ताजा खबर आ गई। एक ही दिन में तीन हमले। तीन टैक्सी ड्राईवर निशाने पर थे। चौथा पिज्जा डिलिवरी करता था। अपन खुद ही हमलों की छानबीन कर लें। पिछले एक साल में जितने हमले हुए। सभी छोटे-मोटे करिंदों पर थे। या फिर उन भारतीय छात्रों पर। जो पढ़ाई के साथ काम भी करते थे। किसी रेस्टोरेंट, होटल, पेट्रोलपंप या डिपार्टमेंटल स्टोर पर। अपन ने पहली नजर में रंगभेदी हमले माने। गोरों को गेहुंआ रंग पसंद नहीं आता। शायद 'बिग ब्रदर' में शिल्पा शेट्टी से हुआ दुर्व्यवहार का असर होगा। सो अपन उसी लाईन पर सोचते रहे। सोचो, जेड गुड्डी हमलावर क्यों थी। शिल्पा को सबसे ज्यादा परेशान तो उसी ने किया। तो अपन सहज ही नतीजे पर पहुंचेंगे।

कांग्रेस पर हावी होने लगे यूपीए सरकार के मंत्री

यों तो पहले कांग्रेस की सरकारें रही हों। या बीजेपी की। पार्टियों का वजूद खत्म सा हो जाता रहा। इंदिरा-राजीव-नरसिंह राव पीएम थे। तो कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भी थे। सो कांग्रेस चौबीस अकबर रोड से नहीं। पीएम के घर से ही चलती थी। सरकार वाजपेयी की बनी। तो वाजपेयी बीजेपी के अध्यक्ष नहीं थे। न लालकृष्ण आडवाणी। पर पार्टी के अध्यक्ष इन दोनों के आगे बौने ही थे। सो सत्ता के समय कांग्रेस-बीजेपी को पीएम ही चलाते रहे। पर अब जब मनमोहन सिंह कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का रुतबा मनमोहन सिंह से ज्यादा। तो कायदे से दबदबा कांग्रेस पार्टी का होना चाहिए। पर हाल ही की घटनाएं इसे साबित नहीं करती। यूपीए सरकार के मंत्री। कांग्रेसी हों या गैर कांग्रेसी। कांग्रेस को हर बात पर ठेंगा दिखाने लगे।

पवार के मुंहतोड़ जवाब से कांग्रेस हुई लाजवाब

गणतंत्र दिवस की बधाई। खुशी के मौके पर महंगाई का रोना ठीक नहीं। सो मनमोहन ने मुख्यमंत्रियों की मीटिंग टाल दी। सोनिया ने सीडब्ल्यूसी की मीटिंग बुलाई। पर गणतंत्र दिवस के बाद। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली म्यूंग बाक दिल्ली पहुंच गए। वह आज गणतंत्र दिवस के खास मेहमान होंगे। ली के आने से पहले ही अपन ने मेहमाननवाजी शुरू कर दी थी। दक्षिण कोरिया की स्टील कंपनी पास्को को पर्यावरण मंत्रालय ने हरी झंडी दी। उड़ीसा में लगाया जाएगा स्टील प्लांट। सोमवार को चार समझौतों पर दस्तखत भी हुए। आने वाले साल अपने काम का रहेगा दक्षिण कोरिया। अपन को एशिया पेसेफिक को-आपरेशन फोर्म में मददगार होगा। हर साल अपन विदेशी मेहमान कोई यों ही नहीं चुन लेते। कूटनीतिक-आर्थिक हित देखकर ही होता है फैसला। पिछले सालों अपन ने कजाकिस्तान, फ्रांस और रूस के राष्ट्रपतियों को बुलाया। तीनों एटमी ईंधन मुहैया कराने वाले देश।

मंहगाई का ठीकरा फोड़ा तो पवार भी मुंहतोड़ जवाब देंगे

बात मंहगाई की। कांग्रेस मीडिया के सवालों से परेशान। ऊपर से पवार के चीनी-दूध की कीमतें बढ़ाने वाले बयान। यों भी कांग्रेस को मंहगाई पर कोई जवाब नहीं सूझ रहा। पीएम केबिनेट कमेटी की मीटिंग कर चुके। केबिनेट में चर्चा हो चुकी। चीनी की कीमतें घटाने के कुछ कदम भी उठाए। खासकर इम्पोर्टेड चीनी को किसी भी चीनी मिल में लाने की छूट। मायावती ने किसानों के दबाव में रोक लगाई थी। सो रॉ चीनी बंदरगाहों पर अटकी थी। फैसले से मायावती को बदनाम करने का मौका मिला। पर मायावती भी राजनीति की अनाड़ी नहीं। उनने मुख्यमंत्रियों की मीटिंग में आने की शर्त रख दी। बोली - 'पहले मंहगाई के जिम्मेदार पवार को हटाओ। फिर आएंगी मीटिंग में।' माया-पवार की तू तू - मैं मैं शुरू हो गई। कांग्रेस बाहर बैठकर तमाशा देखने लगी।

चिदंबरम फार्मूले में एनएसए के लिए कोई जगह नहीं होगी

नारायणन की जगह फिलहाल शिवशंकर मेनन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार। चिदंबरम के दिमाग में कुछ और। इसीलिए अपन ने फिलहाल लिखा। इसका खुलासा अपन बाद में करेंगे। पहले बात मेनन की। यूपीए सरकार के साढ़े पांच साल में वह तीसरे एनएसए। जेएन दीक्षित, नारायणन पहले रह चुके। एनडीए शासन के छह साल में सिर्फ बृजेश मिश्र थे। दीक्षित का तो देहांत हो गया। नारायणन की च्वाइस ही गलत थी। सो मनमोहन सिंह ने मेनन को बनाकर गलती सुधारी। अपन नहीं जानते नारायणन को हटाने का फैसला क्यों हुआ। मुंबई पर हमला वजह होता। तो मनमोहन अपने दूसरे कार्यकाल के शुरू में ही न बनाते। नारायणन का तब विरोध भी खूब हुआ था। पर अब हटाने की वजह शर्म-अल-शेख में बलूचिस्तान वाली गलती। यों मनमोहन लोकसभा में गलती अपने सिर ले चुके।

चीनी के बाद अब पवार ने दूध मंहगा करने की ठानी

दूध का वादा कारोबार कैसे होगा। दूध तो आज की बात आज। पर नहीं, दूध का वादा कारोबार भी होगा। दूध से बनी चीजों की मांग आज दूध से ज्यादा। जो बच्चे दूध नहीं पीते। उनको भी दूध का बना 'चीज' पसंद। इटली के 'पीजा' की डिमांड अब बड़े शहरों में तो घर-घर में। बिना 'चीज' के नहीं बनता 'पीजा'। संसद के सेंट्रल हाल में भी आजकल 'दोसा' से ज्यादा डिमांड 'पीजा' की। दूध से बने चॉकलेट भी खूब पसंद आते हैं बच्चों को। सो सूखे दूध का बिजनेस अब ताजा दूध से ज्यादा। दूध के कारोबार को अपन कुछ ऐसे समझ लें। अपने एक सांसद मित्र का बिलासपुर में पेट्रोल पंप था। जिन दिनों पेट्रोल की कीमतों पर अटकलें चलतीं। उन दिनों सांसद का फोन खूब आता। सवाल एक ही होता- 'क्या कल बढ़ जाएंगी कीमतें?' आखिर जनर्लिस्टों को एक दिन पहले तो लग ही जाती है भनक। यह अलग बात, जो कई बार पेट्रोलियम मंत्री का कहा भी गलत हो जाए।

युवा स्टेट मिनिस्टर रोए पीएम के सामने

अपन ने कल बताया था- 'मारे-मारे फिर रहे हैं युवा स्टेट मिनिस्टर।' उसमें अपन ने पीएम की बुलाई मीटिंग का खुलासा किया। तो मंगलवार को तय वक्त पर हो गई मीटिंग। मनमोहन खुलकर सुनने के मूड में थे। सो दो घंटे का वक्त तय हुआ। पर मीटिंग खत्म हो गई एक घंटे में। वजह थी- 'उत्साही युवा मंत्रियों का पीएम की बोलती बंद कर देना।' अपन आरपीएन सिंह, प्रणीत कौर, पलानीमनिक्कम, नमोनारायण मीणा को छोड़ दें। तो बाकी सबने अपने केबिनेट मंत्रियों की खाल खींची। मनिक्कम ने तो प्रणव दा को पिता तुल्य बता दिया।  मीणा और मनिक्कम के मुखारविंद से प्रणव दा की तारीफ हुई। आरपीएन के मुंह से कमलनाथ की। शशि थरुर आए नहीं। प्रणीत कौर ने एसएम कृष्णा की तारीफ की।

मारे-मारे फिर रहे हैं युवा स्टेट मिनिस्टर

गवर्नरों की तैनाती हो गई। मोहसिना किदवई और उर्मिलाबेन बनती-बनती रह गई। खबर उड़ाई- मोहसिना ने आखिर वक्त पर इनकार कर दिया। अपन यह मानने को तैयार नहीं। उनकी जगह पर एमओएच फारुकी का नाम अचानक नहीं आया। तीन दिन पहले छप चुका था। उर्मिलाबेन के नाम की गफलत तो मीडिया से हुई। नाम लीक हुआ था उर्मिला। उर्मिला सिंह का नाम तो किसी के ख्याल में ही नहीं आया। सबने उर्मिलाबेन समझ लिया। पिछली सरकार में मंत्री थी। पर दिग्विजय सिंह बड़ी सफाई से उर्मिला सिंह को गवर्नर बनवा ले गए। सीडब्ल्यूसी की मेंबर हैं उर्मिला। सरकारिया आयोग की सिफारिशें धरी रह गई। शिवराज पाटिल लंबे समय से कह रहे थे- 'मैंने गवर्नर बनने से इनकार कर दिया।' उनका कहा सही होता। तो कैसे बनते गवर्नर। सो इनकार कोई नहीं करता। न पहले पाटिल ने किया था। न अब मोहसिना किदवई ने किया। अपन को एक बात की बेहद खुशी।

अब फहराया जा सकेगा हुबली में राष्ट्रीय ध्वज

श्रीनगर के लाल चौक में आतंकवादियों ने और हुबली के ईदगाह मैदान में अंजुमन-ए-इस्लाम नाम के स्थानीय संगठन ने राष्ट्रीय ध्वज फहराने की मुखालफत की थी। इस गणतंत्र दिवस से पहले सुप्रीम कोर्ट ने ईदगाह मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराने की सारी अड़चनें दूर कर दी हैं।

अगले हफ्ते गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील इंडिया गेट पर आयोजित शानदार समारोह में राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगी। राष्ट्रीय ध्वज फहराना क्या कभी अल्पसंख्यकों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना हो सकता है? ऐसा सोचने पर भी रूह कांप उठती है। गणतंत्र दिवस के मौके पर ऐसी दो घटनाओं को याद करना बेहद जरूरी होगा। बीस साल पहले 1990 में आतंकवादियों ने लाखों कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से बाहर निकालने की सफलता के बाद श्रीनगर के लाल चौक में पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया था। उन्होंने चुनौती दी थी कि कोई भी पाकिस्तानी ध्वज को उतारकर भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराकर दिखाए।

नया फार्मूला लाएगी सरकार कम खाओ, महंगाई घटाओ

कांग्रेस ने महंगाई पर कोर कमेटी नहीं बुलाई। पर अब जब गवर्नरों की तैनाती की बात चली। तो कोर कमेटी में चर्चा हुई। पीएम के घर हुई मीटिंग में गवर्नरों पर चर्चा संविधान का कितना मजाक।  अत्यंत गोपनीय होना चाहिए यह मामला। तब तक किसी को केबिनेट के फैसले की भनक तक न लगे। जब तक राष्ट्रपति भवन से नोटिफिकेशन न हो। पर यह चर्चा करने का आज दिन नहीं। यह अच्छी बात। जो सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन को हटाने की सुगबुगाहट। सुरक्षा सलाहकार किसी रिटायर्ड आईएफएस को ही बनाना चाहिए। वाजपेयी ने बृजेश मिश्र को बनाकर सही शुरूआत की। पहली पारी में मनमोहन ने भी जेएन दीक्षित को ठीक ही चुना। पर अपन संसदीय गलियारों की अफवाहों पर भरोसा करें। तो नारायणन सरकार की च्वाइस नहीं थी। कहीं और से आया था नाम।

आडवाणी की कामना 'बीजेपी में हो संक्रांति'

आठ नवंबर को अपन दिल्ली में नहीं थे। उस दिन अपन 'विराट नगर' के 'बाल आश्रम' में थे। सो लालकृष्ण आडवाणी को जन्मदिन पर बधाई देने नहीं पहुंच सके। पर अपन उस दिन पिता पर बनी प्रतिभा की डॉक्यूमेंट्री से महरूम रह गए। गुरुवार को संक्रांति थी। सो प्रतिभा आडवाणी ने अपन जैसे उन कुछ लोगों को बुलाया। जो उस दिन नहीं आ पाए थे। आडवाणी की बेटी प्रतिभा कब राजनीति में आएगी। यह सवाल अब सब को मथ रहा। शायद यह वक्त अब दूर भी नहीं। पर आडवाणी की विरासत नहीं संभालेंगी प्रतिभा। खुद की प्रतिभा होगी। तो राजनीति में जमेंगी। कांग्रेस परिवार की तरह नहीं बनेगा आडवाणी का परिवार।

रामगोपाल के 'शोलों' ने 'आग' लगा दी सपा में

दिल्ली के एक अखबार ने 'थ्री इडिएट' को नए रंग में पेश किया। उन कुर्सियों पर रामगोपाल, मुलायम और अमर सिंह को बिठा दिया। अमर सिंह सिंगापुर से लौटेंगे। तो जरूर अखबार पर भड़केंगे। पर मंगलवार को तो उनकी रामगोपाल से तू-तू, मैं-मैं तेज हो गई। कड़कड़ाती ठंड में अमर-रामगोपाल के आग उगलते बयानों ने खूब तपिश दी। उन बयानों का जिक्र अपन करेंगे। पर पहले बात कड़कड़ाती ठंड की। हिमाचल-कश्मीर से आती बर्फीली हवाएं थमने का नाम नहीं ले रही। मंगलवार को न्यूनतम तापमान जरूर साढ़े छह से सात हुआ। पर अधिकतम तापमान 14.9 से घटकर 14.6 हो गया। राजस्थान-मध्यप्रदेश में बरसात ने रंग दिखाया। मध्यप्रदेश में तो उतनी नहीं। पर राजस्थान ने ठंड बढ़ा दी।

गली-मोहल्लों में भी आवारा ही देते हैं ऐसी गालियां

कमर तोड़ती महंगाई। जान निकालती सर्दी। इन दोनों के बीच हरदन हल्ली डोडेगौडा देवगौड़ा का बयान। जिसने कंपकंपाती सर्दी में भी गर्मी ला दी। पहले बात महंगाईकी। अपने कृषि मंत्री शरद पवार का भी जवाब नहीं। कभी कहते हैं- चीनी और महंगी होगी। कभी कहते हैं- मैं कोई योतिषी तो नहीं। जो बता सकूं कि कीमतें कब घटेंगी। कांग्रेस को हालात से निपटने का तरीका नहीं सूझ रहा। बीजेपी और सीपीएम लंबे अर्से बाद विरोधी दलों की भूमिका में दिखने लगी। अब दोनों का इरादा दिल्ली में रैलियों का। राजीव प्रताप रूढ़ी बता रहे थे- 'मनमोहन सरकार ने अढ़तालीस लाख टन चीनी निर्यात की। निर्यात का रेट था बारह रुपए किलो। कुछ महीने पहले सरकार की जाग खुली। तो पाया- चीनी की तो किल्लत होगी। सो अब तीस रुपए किलो के हिसाब से आयात कर रही है चीनी।' यह है सरकार की नालायकी का सबूत।

बांग्लादेश से मधुर संबंधों का वक्त

पाक और भारत की अदालतों और राजनीतिज्ञों की मानसिकता एक सी। भारत और आस्टे्रलिया में अपराध एक से। कोपेनहेगन की गलती का एहसास धीरे-धीरे।

मेरे नाम और उल्फा उग्रवादी अनूप चेतिया के नाम में बहुत फर्क है। फिर भी 1991 में जब मैंने गुवाहटी जाने के लिए रेल टिकट आरक्षित करवाया, तो आईबी के लोग अगले दिन मेरे घर पहुंच गए थे। उन्हें लगा कि अनूप चेतिया ही नाम बदलकर टे्रन पर सफर कर रहा होगा। अब जबकि बांग्लादेश की नई प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत आई हैं तो उनकी सरकार के एक मंत्री अशरफ उल रहमान ने खुलासा किया है कि कट्टरपंथी खालिदा जिया की सरकार के समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ जब ढाका आए थे, तो उन्होंने शैरटन होटल में अनूप चेतिया से मुलाकात की थी।

रोसैया के नाक में दम कर दिया कांग्रेसियों ने

आंध्र में सोनिया के जन्मदिन पर लगी आग बुझी नहीं। वाईएसआर चंद्रशेखर समर्थकों का नया तांडव शुरू हो गया। यों खबर नई नहीं। पर आंध्र प्रदेश के चैनल ने नई बनाकर पेश कर दी। खबर दी- 'वाईएसआर की हैलीकाप्टर दुर्घटना एक साजिश थी। साजिश के पीछे काम कर रहा था रिलायंस का हाथ।' याद है मुकेश अंबानी को केजी बेसिन में गैस मिली थी। गैस के बंटवारे में मुकेश-अनिल की लड़ाई अभी भी कोर्ट में। पेट्रोलियम मंत्रालय तो मुकेश का मददगार। पर वाईएसआर की दलील थी- 'यह रिलायंस की नहीं। आंध्र प्रदेश की संपदा। सो आंध्र को भी हक मिले।' आखिरी दिनों में मुकेश- वाईएसआर के संबंध अच्छे नहीं थे। तो दुर्घटना करवाने की साजिश कैसे हुई। यह खबर आई है रूसी वेबसाईट 'दि एक्जाइल्ड' से।

मोदी के साथ तारीफ जरा हाईकोर्ट की भी हो जाए

बिग बी ने नरेंद्र मोदी की तारीफ के पुल बांधे। तो कांग्रेस खफा हुई। कांग्रेस तो यों भी बिग बी से खफा। वजह अपन नहीं जानते। कोई राज की बात है गहरी। वरना इटली से आई सोनिया का पहला घर गुलमोहर पार्क ही था। गुलमोहर पार्क में अमिताभ बच्चन के घर ठहरी थी सोनिया। यों घर तो हरिवंशराय बच्चन का था। पर राजीव की दोस्ती अमिताभ से थी। इंदिरा गांधी ने गुलमोहर पार्क पत्रकारों के लिए बसाया था। पर पत्रकारों की उन दिनों तनख्वाहें भी क्या थी। सो कई तो प्लाट की पहली किस्त जमा नहीं करा पाए। खाली प्लाट इंदिरा ने चहेते साहित्यकारों-कलाकारों को बांट दिए। खैर अमिताभ का राजीव के जमाने सांसद बनना। बोफोर्स घोटाले में जोड़ा जाना। संसद से इस्तीफा। फिर सोनिया परिवार से खटास। इनकम टैक्स के छापे। यह सब लंबी कहानी।

चिदंबरम बोले- सो जाओ नहीं तो भालू आ जाएगा

तो अपन बात कल से ही शुरू करें। अपन ने लिखा था- 'कांग्रेस तो खुद बंटी हुई दिखेगी तेलंगाना मीटिंग में।' आखिर कांग्रेस ने के.एस. राव और उत्तमकुमार को भेजा था। मकसद था- दोनों अपनी-अपनी बात कह दें। पर जब मीटिंग से पहले ही जगहंसाई होने लगी। तो सोमवार की रात प्रणव दा ने दोनों को तलब किया। दोनों के हाथ में चार लाईन का बयान थमा दिया। कहा- 'मीटिंग में जाकर सिर्फ यह बयान पढ़ना है।' पता है न- प्रणव दा मामलों को सुलझाने और लटकाने के कितने माहिर। पिछली लोकसभा में पांच साल तेलंगाना कमेटी के अध्यक्ष रहे। पर कोई रिपोर्ट नहीं आई। सो प्रणव दा ने दोनों के हाथ में जो चार लाईनें थमाई। उनमें लिखा था- 'हम केंद्र सरकार से अपील करते हैं कि वह विचार-विमर्श का ढांचा तैयार करें।' पर बाहर आकर दोनों ने वह बात कही। जो उनने अंदर कही ही न थी। उत्तम कुमार बोले- 'मैंने तय समय सीमा के भीतर तेलंगाना के गठन की मांग रखी।' के.एस. राव बोले- 'मैंने युनाइटेड आंध्र प्रदेश का पक्ष लिया।' पर जो लड़ाई कांग्रेसी नुमाइंदों में नहीं हुई। वह टीडीपी के नुमाइंदों में जमकर हुई।

कांग्रेस तो खुद बंटी हुई दिखेगी तेलंगाना मीटिंग में

सरकार का बेहतरीन फैसला साठ साल बाद आया। अब सजायाफ्ता अफसरों के मैडल छीने जाएंगे। पहला मैडल एसपीएस राठौर का छीना गया। नई पॉलिसी का सेहरा भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के सिर बंधेगा। उनने ही मैडल छीनने की सिफारिश भेजी थी। जिस पर होम मिनिस्ट्री ने पॉलिसी बना दी। बात रुचिका मामले की चल पड़ी। तो बताते जाएं- पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने नई पहल की है। आदेश दिया है- 'उन पुलिस अफसरों, आईएस अफसरों, राजनीतिज्ञों की लिस्ट दी जाए। जिन पर मुकदमे अदालतों में विचाराधीन।' कोर्ट का इरादा अब ऐसे मामले बिना दबाव के जल्द निपटाने का। हाईकोर्ट की तारीफ की जानी चाहिए। पर यह भी याद रखें- इसी हाईकोर्ट ने ही राठौर पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला खारिज किया था। रुचिका के संबंधी सुप्रीम कोर्ट गए। तो सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले पर मोहर लगाई।

लोकतंत्र खड़ा चौराहे पर

एक आईपीएस अफसर पूरे तंत्र को अपनी ऊंगलियों पर नचा रहा था। स्कूल, अस्पताल, पुलिस थाना, सीबीआई, मुख्यमंत्री, न्यायपालिका सबको चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है एक आईपीएस अफसर ने।

हमारा प्रशासनिक राजनीतिक ढांचा चरमरा रहा है। प्रशासनिक सुधार आयोगों की रिपोटें असली मर्ज को पहचानने की कोशिश भी नहीं करतीं। राजनीतिक नेता और नौकरशाही का मकड़जाल देश के लोकतंत्र को घुन की तरह खा रहा है। नौकरशाह देश को चूसने वाले गिध्द बन गए हैं और राजनीतिक नेता उन पर नकेल कसने की बजाए छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए उनके हाथों का खिलौना बन गए हैं। कई मुख्यमंत्रियों को निजी बातचीत में यह कहते सुना है कि ब्यूरोक्रेसी से काम लेना आसान नहीं।