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December 2009

सुप्रीम कोर्ट को बचाव में ढाल बनाया राठौर ने

शशि थरूर चुप हो गए। एसएम कृष्णा पहली बार कारगर मंत्री के रूप में दिखे। थरूर को बुलाकर साफ-साफ कहा- 'सरकारी नीतियां टि्वटर पर डिसकस नहीं हो सकती। आपने मंत्री पद की शपथ ली है। आप किसी एक मंत्रालय के खिलाफ नहीं बोल सकते।' मतलब साफ था- टि्वटर और मंत्री पद में से एक चुनना होगा। सो फिलहाल थरूर ने चुप्पी साध ली। टि्वटर पर रहेंगे। पर मंत्री और थरूर में फर्क दिखेगा। दूसरी बात जसवंत सिंह की। जो आज पीएसी की चेयरमैनी से मुक्त हो जाएंगे। तो अब स्पीकर के पास यशवंत सिन्हा के सिवा चारा नहीं। पीएसी में बीजेपी के बाकी मेंबर हैं शांता कुमार और गोपीनाथ मुंडे। मुंडे विपक्ष के उपनेता हो चुके। पीएसी की चेयरमैनी राज्यसभा से नहीं होती। सो शांता कुमार का भी कोई चांस नहीं।

सोनिया के गलत कदम से ब्रांड हैदराबाद का कचरा

अपन आंध्र की बिगड़ी हालत का खुलासा करें। उससे पहले चर्चा कुछ राजनीतिक बयानों की। मंगलवार को राजनीतिक गलियारों में इन बयानों पर खूब चटकारे सुने। पहला मामला शशि थरूर के टि्वटर का। उनने वीजा नियमों को सख्त करने की खिल्ली उड़ाई थी। जिस पर विदेशमंत्री एसएम कृष्णा ने फटकारने वाला बयान दिया। मंगलवार को उनने फिर टि्वटर पर लिखा- 'मैं दिल्ली में नहीं था। सो बड़े हंगामे से बच गया। कृष्णा का बयान आ गया। अब मुझे कुछ नहीं कहना।' सत्यव्रत चतुर्वेदी ने थरूर को उसी भाषा में धमकाया। जिस भाषा में अमर सिंह को धमकाया करते थे। बोले- 'पुरानी आदतें हैं, जल्दी से नहीं जाती। अपनी हद में रहना सीखें।' दूसरा मामला सोनिया-मनमोहन के बयानों का।

सुख रामों-शिबू सोरेनों वाली पार्टी विद डिफरेंस

अपन ने मनमोहन सिंह का भाषण पढ़ा। देवकांत बरुआ की याद आ गई। इमरजेंसी के दिन थे। चापलूसों का जमाना था। खुद्दार जेल में थे, चापलूस बाहर। इंदिरा गांधी ने बरुआ को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। तो उनने चापलूसी की सारी हदें पार कर दी थी। जब कहा- 'इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा।' यानी इंदिरा ही भारत है, भारत ही इंदिरा है। कोई नेता कितना भी बड़ा हो। देश से बड़ा नहीं होता, न बराबर। न कोई राजनीतिक दल देश से बड़ा होता है। नितिन गड़करी भाजपा के अध्यक्ष बने। तो उनने कहा- 'देश पहले, पार्टी बाद में, खुद आखिर में।' अब आप इस संदर्भ में देवकांत बरुआ के बयान को पढ़िए। इसी संदर्भ में मनमोहन सिंह का ताजा बयान देखिए। कांग्रेस का सवा सौ साला जश्न था। मनमोहन बोले- 'कांग्रेस कमजोर हुई। तो देश कमजोर होगा।' यानी इंदिरा है, तो देश है, कांग्रेस है तो देश है।

अपराधियों का किला भेद रहा मीडिया

साल 2009 बीत रहा है। यह साल मीडिया के लिए भी कई खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजरा है। साल की पहली तिमाही में जरनैल सिंह ने कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेंस में गृहमंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंककर मीडिया के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर दी थी। तो बाद में जरनैल सिंह एक सिख पत्रकार के तौर पर नाइंसाफी के खिलाफ लड़ने वाले जुझारू पत्रकार के रूप में मशहूर हुए। एक जमाना था जब मीडियाकर्मियों और मीडिया को नाइंसाफी के खिलाफ लड़ने वाला मिशनरी माना जाता था। स्वतंत्रा संग्राम के आंदोलन में मीडियाकर्मियों की भूमिका इसलिए ज्यादा अहम थी। बाजारीकरण ने पिछले एक दशक में मीडिया की जुझारू छवि को धूल धूसरित कर दिया था।

वाईएसआर की मौत के बाद आंध्र नित नए संकट में

चौदह साल की रुचिका से छेड़छाड़ पर उन्नीस साल बाद उबल पड़ा है देश। उन्नीस साल बाद पुलिस इंस्पेक्टर शंभू प्रताप सिंह राठौर को छह महीने की सजा मिली। इस बीच वह डीजीपी बनकर रिटायर भी हो चुका। ब्यूरोक्रेसी और पालीटिशियन बचाते रहे राठौर को। राठौर ने पहले रुचिका से छेड़छाड़ की। फिर स्कूल से सस्पेंड करवा दिया। रुचिका के भाई पर चोरी का केस चलवा दिया। जिनने राठौर के खिलाफ अदालत में पीआईएल लगाई। उन पर बिजली चोरी के केस बनवा दिए। तंग आकर रुचिका ने आत्महत्या कर ली। चौटाला, बंशीलाल, भजनलाल सब सरपरस्त थे राठौर के। अब देश चाहता है- राठौर को कड़ी सजा मिले। होम मिनिस्टरी की जाग भी अब खुली। पुलिस मैडल और पेंशन रोकने पर कर रही है विचार। पर ब्यूरोक्रेसी-पालीटिशियन की सांठ-गांठ का यह कोई पहला केस नहीं।

सत्ता नहीं, समाजसेवा होगा गडक़री की बीजेपी का लक्ष्य

अपन नितिन गड़करी से पहले मिले तो थे। पर ऐसे कभी नहीं। एक घंटे की प्रेस कांफ्रेंस। समां बांधकर रख दिया। उन लोगों को बहुत निराशा हुई। जो राष्ट्रीय राजनीति का अनाड़ी समझ बैठे थे। पहली प्रेस कांफ्रेंस में ही मनोबल तोड़ने के इरादे से पहुंचे थे कई धुंरधर। पर गड़करी को सुनकर खुद का मनोबल टूट गया। गड़करी का मुंह ताकते रह गए। बैठे-बैठे अपन को शिव खेड़ा की याद आ गई। प्रेरणा गुरु शिव खेड़ा। दिल्ली को दूसरा शिव खेड़ा मिल गया। युवाओं का मनोबल बढ़ाने वाला। श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देने वाला। पर शिव खेड़ा हौंसला बढ़ा सकता है। चुनाव नहीं जीत सकता। ताकि सनद रहे सो बता दें- लड़कर हार चुके हैं शिव खेड़ा। बीजेपी को चुनाव जिताने का ठेका लेकर गड़करी भी नहीं आए।

जवाब नहीं बना तो स्पिन डाक्टरी पर उतरे जयराम

अपन ने कल लिखा था- कटघरे में होंगे जयराम। सो जेटली और येचुरी ने कटघरे में खड़ा किया। दोनों पूरी तैयारी करके आए थे। येचुरी तो खुद कोपेनहेगन में थे। सो पूरे मसाले के साथ तैयार थे। मूल रूप से वकील जेटली की तैयारी का तो कहना ही क्या। अपन को पता था येचुरी पूरे जोर-शोर से नहीं घेरेंगे। आखिर जयराम रमेश का स्टैंड वही था। जो चीन का था। चीन वामपंथियों की सबसे बड़ी कमजोरी। पर येचुरी ने फिर भी उतना कम नहीं घेरा। जितना कोई वामपंथी विरोधी सोचता हो। पहले बात येचुरी की ही। पता है ना- येचुरी की सीपीएम पार्टी डी राजा की सीपीआई से बड़ी। सो अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे कुरियन ने जेटली के बाद राजा को बुलाया। तो येचुरी बिदक गए। पूछा- 'बुलाने का पैमाना क्या है?' कुरियन वामपंथियों में ऐसी जलन देख दंग रह गए। उनने कहा- 'जिसने पहले अपना नाम दिया।' बात खत्म हो गई। पर तभी कागज उलट-पलट कर देखे। तो येचुरी का लिस्ट में नाम ही नहीं मिला।

कल तो बच गए, आज कटघरे में होंगे जयराम

तेलंगाना के डर से लोकसभा तो सिमट गई। पिछले शुक्रवार को ही सिमट गई। पर राज्यसभा अभी भी जारी। यों सत्रावसान 21 दिसंबर को होना तय था। इक्कीस की तारीख तय करने की वजह थी। वजह थी- कोपेनहेगन में हुए समझौते पर संसद में बयान देना। यह विपक्ष की मांग थी- सत्रावसान कोपेनहेगन पर बयान के बाद हो। सरकार तैयार हो गई। सो मनमोहन-जयराम के लौटने पर सत्रावसान तय हुआ। ऐसा होता तो लालकृष्ण आडवाणी का इस्तीफा भी 21 को होता। पर अपने ही बिछाए तेलंगाना जाल में कांग्रेस फंसी। तो लोकसभा से 18 को ही निजात पा ली। बीजेपी को भी अपनी पार्लियामेट्री पार्टी की मीटिंग 18 को बुलानी पड़ी। बीजेपी पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग 21 को होती। तो पार्लियामेंट्री बोर्ड 22 को बैठता। उस दिन पूरा होता राजनाथ सिंह का कार्यकाल। पर कांग्रेस तेलंगाना में फंसी। तो  बीजेपी का जलवायु परिवर्तन वक्त से पहले हो गया।

तीसरी पीढ़ी के कंधों पर भाजपा की बागडोर

मुखर्जी-उपाध्याय, अटल-आडवाणी के बाद अब सुषमा-गड़करी

मोहन भागवत ने भाजपा के नए नेतृत्व के चयन की जिम्मेदारी लालकृष्ण आडवाणी को सौंपकर पिछले चार साल से चली गुटबाजी को विराम देने की कोशिश की है। आडवाणी की ओर से चुने गए पार्टी के तीनों नए नेता सुषमा स्वराज, नितिन गड़करी और अरुण जेटली अब पिछले चार साल की गलतियां सुधारने में जुटेंगे।

मौसम परिवर्तन को लेकर कोपेनहेगन में दुनियाभर के नेता कोई सर्वमान्य हल निकालने की मशक्कत कर रहे थे, लेकिन वहां कोई हल नहीं निकला। जबकि भारत में ठीक उसी समय भारतीय जनता पार्टी में मौसम परिवर्तन हो गया।

न राजनीति से संन्यास, न रथ से उतरेंगे आडवाणी

सरकार 21 तक संसद नहीं चला पाई। तो बीजेपी ने भी सत्रावसान के साथ ही नेता पद का फैसला निपटा लिया। बीजेपी शुक्रवार को अचानक पारदर्शी हो गई। पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग मीडिया के लिए खोल दी गई। मीडिया के सामने पार्लियामेंट्री पार्टी के संविधान में संशोधन हो गया। अब पार्लियामेंट्री पार्टी अपना नेता नहीं, अलबत्ता अध्यक्ष चुनेगी। चुना हुआ अध्यक्ष लोकसभा और राज्यसभा के नेता तय करेगा। संविधान संशोधन का प्रस्ताव पेश किया वेंकैया नायडू ने। समर्थन तो सबने किया ही। सिवा लालकृष्ण आडवाणी के। जब तक संशोधन नहीं हुआ। वह अध्यक्ष नहीं चुन लिए गए। चुप्पी साधकर बैठे रहे। संशोधन हो गया। तो राजनाथ सिंह ने प्रस्ताव रखा- 'तो क्यों न हाथोंहाथ अध्यक्ष चुन लिया जाए।' आडवाणी के नाम का प्रस्ताव पेश किया- यशवंत सिन्हा ने। अपन ने सिन्हा के बार-बार आडवाणी विरोधी बयानों का जिक्र किया ही था। तो इसे अब आप नई शुरूआत मानिए।

अगला हफ्ता बीजेपी में उथल-पुथल का

सुषमा स्वराज को रोकने के लिए ब्राह्मणवाद का फच्चर। पर अपन को कतई नहीं लगता यह फच्चर सुषमा को रोक पाएगा। आडवाणी ने सुषमा को अपनी कुर्सी देना तय कर लिया। राजनाथ सिंह की निगाह इस कुर्सी पर होगी। पर इस मामले में संघ का दखल नहीं चलेगा। संघ में जातिवाद से पद नहीं भरे जाते। सो सवाल जातीय संतुलन का होता। तो गडकरी अध्यक्ष तय न होते। आडवाणी न सिर्फ सुषमा को अपनी भावी रणनीति बता चुके थे। अलबत्ता मोहन भागवत को भी बता चुके थे। मंगलवार को आडवाणी ने सुषमा-जेटली की पीठ थपथपाई। तो वह कोई अंदरूनी राजनीतिक चाल नहीं थी। जो सुषमा की दावेदारी मजूबत करने को ऐसा कहते। आडवाणी जब फैसला कर चुके। तो उसका कारण बताने की जरूरत नहीं।

पच्चीस साल बाद खुलकर हुई चौरासी पर बहस

पहले ज्ञानी जैल सिंह ने राष्ट्रपति होते हुए माफी मांगी। फिर सोनिया गांधी ने भी माफी मांगी। पर जख्म इतनी जल्दी नहीं भरा करते। कई बार तो भरते भी नहीं। सिखों के कत्ल-ए-आम के जख्म माफियों से नहीं भरेंगे। कांग्रेस तो बहस से भी आंख चुराती रही। आयोगों ने कत्ल-ए-आम का खुलासा कम किया। छुपाया ज्यादा। सोमवार को राज्यसभा में पहली बार खुलकर बहस हुई। तो उसका सेहरा अपन हामिद अंसारी के सिर बांधेंगे। जिनने पहली बार बहस की इजाजत दी। ऐसी बहस की इजाजत। जिसमें सिख सांसदों ने जमकर भड़ास निकाल दी। अपन त्रिलोचन को सुन रहे थे। उनने बखिया उधेड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपन हैरान थे- त्रिलो

लघु ही सुंदर है

पीएमके प्रमुख रामदौस भी राज्यों के विभाजन की दौड़ में शामिल हो गए हैं। तेलंगाना की मांग के हिंसक रूप लेने पर केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश के बंटवारे की बात सिध्दांतत: मंजूर कर ली। केंद्र का यह फैसला मक्खियों के छत्ते में हाथ मारने जैसा साबित हो रहा है क्योंकि लगभग हर राज्य में बंटवारे की मांग खड़ी हो गई है। पीएमके प्रमुख रामदौस ने दस साल पहले तमिलनाडु के विभाजन का आंदोलन शुरू किया था, लेकिन चारों तरफ से विरोध का सामना हुआ तो चुप्पी साध ली थी। अब देशभर में राज्यों के विभाजन की मांग उठने पर उन्होंने छोटे राज्यों के पक्ष में अंग्रेजी की एक कहावत का सहारा लेकर कहा है- 'स्माल इज ब्यूटीफुल।'

वैसे संविधान के मुताबिक किसी राज्य का विभाजन करने के लिए वहां की विधानसभा से प्रस्ताव पास होना जरूरी नहीं है। ऐसे प्रस्ताव का कोई मतलब नहीं है, लेकिन छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड बनाते समय सरकार ने विधानसभा के प्रस्तावों को ढाल की तरह इस्तेमाल किया था।

कांग्रेस अब तटीय आंध्र रायलसीमा हिंसा से डरी

कांग्रेस ने मक्खियों के छत्ते में हाथ डाल लिया। तेलंगाना का ऐलान मक्खियों का छत्ता साबित हुआ। बोडोलैंड, गोरखालैंड, विदर्भ, हरितप्रदेश, बुंदेलखंड की मांग उठ गई। गोरखों ने भी चंद्रशेखर राव की तरह आमरण अनशन का ऐलान कर दिया। गोरखों को इंसाफ का वादा दिलाकर संसद में पहुंचे हैं अपने जसवंत सिंह। सो शुक्रवार को वह भी आंदोलन की आग में कूद गए। बोले- 'गोरखालैंड की मांग जायज। सरकार उसे वक्त रहते मंजूर करे।' उनने पीएम को चिट्ठी भी लिख मारी। चिट्ठी न लिखते। तो गोरखे दिल्ली में आकर घेर लेते। वैसे भी उनने सीट बीजेपी को दी थी। जसवंत सिंह को नहीं। सो जसवंत सिंह ने घेराव से डरकर गोरखालैंड का समर्थन कर दिया। अब 21 दिसंबर से गोरखालैंड समर्थक दिल्ली पहुंचेंगे। तो जसवंत सिंह आगवानी करेंगे। राहुल गांधी बुंदेलखंड का समर्थन कर ही आए थे। अब मायावती ने भी चिंगारी में फूंक मार दी।

चंद्रबाबू -जगनरेड्डी की हवा निकालेगा तेलंगाना

लिब्रहान रपट पर चौथे दिन की बहस निपट गई। राज्यसभा में भी वही रुख रहा। बीजेपी के स्टार स्पीकर थे वेंकैया नायडू। कांग्रेस के स्टार स्पीकर थे कपिल सिब्बल। वेंकैया बोले- 'रपट को बंगाल की खाड़ी में फेंक दो।' कपिल बोले- 'बीजेपी देश से माफी मांगे।' लोकसभा और राज्यसभा की बहस में फर्क सिर्फ एक रहा। लोकसभा में रपट की खामियां गिनाती रही बीजेपी। पर राज्यसभा में जेटली और वेंकैया का जोर रामजन्म भूमि के इतिहास पर रहा। जन्मभूमि का मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने के सबूत बताते रहे। पर पतनाला वहीं का वहीं। बुधवार की रात से लिब्रहान पर तेलंगाना हावी हो चुका था। कांग्रेस ने चंद्रशेखर राव के सामने घुटने टेक दिए। अमर अनशन रख चंद्रशेखर राव ने घुटने टिकवा दिए। वैसे चंद्रशेखर राव ने तो हफ्ताभर पहले अनशन तोड़ दिया था। बाकायदा नीबू-पानी पी लिया था।

आयोग स्वरोजगार योजना बन गई थी लिब्रहान की

आप अरुण जेटली की दलीलों से न भी सहमत हों। तो भी आप कहे बिना नहीं रहेंगे- 'मजा आ गया।' लिब्रहान रपट पर जेटली का भाषण खत्म हुआ। तो उनके पास जाकर ऐसा कहने वालों की लाईन लग गई। सेंट्रल हाल में आए। तो राहुल बजाज तक ने बधाई दी। बीजेपी वालों ने तो दी ही। मुरली मनोहर जोशी ने भी सेंट्रल हाल में बधाई दी। जेटली का पूरा परिवार गैलरी में मौजूद था। अपन बीजेपी के तीन नेताओं की तुलना करें। तो जेटली पहले नंबर पर। सुषमा दूसरे नंबर पर। राजनाथ सिंह तीसरे नंबर पर रहे। पर बेनीप्रसाद वर्मा की 'नीच टिप्पणीं' पर मोर्चा राजनाथ ने ही संभाला। बुधवार को खुद पीएम मनमोहन सिंह ने माफी मांगी। तो इसका सेहरा राजनाथ के सिर ही। पर पीएम से माफी मंगवाकर भी जरा शर्मसार नहीं हुए बेनीप्रसाद। पुराने सोशलिस्ट ठहरे।

चिदंबरम बोले- आपने तोड़ी, सुषमा बोली- हां

सत्रह साल क्या कम थे। अब पिनाकी मिश्र ने मांग कर दी- 'एचएस ज्ञानी की रहनुमाई में लीक जांच आयोग बनाओ।' आयोग की रपट लीक हुई थी। तो अपन ने इसी 'ज्ञानी' पर ऊंगली उठाई थी। अब संसद में भी ज्ञानी की तरफ इशारा। अलबत्ता सुषमा स्वराज का तो आरोप- चिदंबरम ने ज्ञानी से ही मनमर्जी की रपट लिखाई। वह बोली- 'यह विकृत मानसिकता से लिखी अवसरवादी राजनीतिक रपट है। इसके निष्कर्ष अपने ही सबूतों के खिलाफ हैं। कहां है साजिश का सबूत।' रपट की खामियों का खुलासा जारी रहा। सुषमा ने जिन्ना की टिप्पणीं दीनदयाल उपाध्याय के मत्थे मढ़ने की खामी उजागर की। तो अनंत गीते ने ढांचा टूटते वक्त बाल ठाकरे की मौजूदगी की खामी बताई। यों तो लोकसभा में दूसरे दिन की बहस के हीरो सुषमा और चिदंबरम थे। पर नए-नए मुल्ला ने ऊंची बांग देकर माहौल खूब बिगाड़ा।

जगदम्बिका से ओपनिंग कराकर फंसी कांग्रेस

बहुत शोर सुनते थे पहलू में। जो चीरा, तो कतरा-ए-खूं न निकला। सत्रह साल तक हंगामा होता रहा। पर सोमवार को लिब्रहान आयोग की रपट पर बहस शुरू हुई। तो बहस में कोई जोश नहीं था। ओपनिंग बैट्समैन गुरुदास दासगुप्त जरूर जोशीले थे। उनके जहर बुझे तीर कभी कांग्रेस पर चले। तो कभी बीजेपी पर। एनडीए को तोड़ने की कोशिश भी करते दिखे। जब उनने कहा- 'जिनका नाम आया है, उन्हें राजनीतिक अछूत बनाया जाए।' कोशिश थी- एनडीए के घटक दलों को तीसरे मोर्चे का न्योता देना। जब उनने कहा- 'सिर्फ राज्य सरकार फेल नहीं हुई। केंद्र सरकार भी फेल हुई। सुप्रीम कोर्ट भी फेल हुई। हमने कहा था- राष्ट्रपति राज लगाया जाए। पर नरसिंह राव ने नहीं लगाया। रपट में केंद्र सरकार का जिक्र भी नहीं। इसलिए रपट पक्षपाती।'

उल्फा के बहाने बात मूल निवासियों के हक की

पूर्वोत्तर के कई राज्य ब्रिटिश भारत के मानचित्र में भी नहीं थे। अलग भाषा और नस्ल के कारण पूर्वोत्तर में अलगाववादी आंदोलन तो था ही, विकास के असंतुलन ने आग में घी का काम किया है।

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना 19 दिसम्बर को भारत आ रही हैं। उनके भारत आने से ठीक पहले बांग्लादेश सीमा से लगते असम राज्य  के अलगाववादी संगठन उल्फा के बड़े नेता गिरफ्तार कर भारत के सुपुर्द किए गए हैं। असम में बाहरी लोगों के खिलाफ लड़ाई के दो पहलुओं पर गौर करने की जरूरत है। पहला आंदोलन आसू ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ शुरू किया था। आंदोलन मूल आबादी का राज्य पर राजनीतिक अधिकार बनाए रखने का था।

अब नार्थ-ईस्ट में शांति की उम्मीद जगी

आज बात नार्थ-ईस्ट में अलगाववाद की। पर पहले बात भारत पर मंडराते खतरों की। अपन खतरों को तीन हिस्सों में बांटें। तो गलत नहीं होगा। पहला खतरा पाक और चीन से। दूसरा खतरा नक्सलवादियों से। तीसरा खतरा- अंदरूनी विद्रोहियों से। नार्थ-ईस्ट का अलगाववाद तीसरे खतरे का हिस्सा। पर पहले बात पाक और चीन की। तो पाक में होने वाले आतंकी हमलों से अपन को प्रभावित नहीं होना चाहिए। जैसे अपने नरम दिल पीएम हो जाते हैं। तभी तो पहले अमेरिका में कह आए- भारत और पाक दोनों ही आतंकवाद के शिकार। तो बाद में शर्म-अल-शेख में कह आए- 'बातचीत ही समझदारी का रास्ता। आतंकवाद बातचीत में बाधक नहीं बनेगा।' इसका मतलब था- आतंकवाद होता रहे। तब भी बातचीत जारी रहेगी।

आम आदमी रोटी को मोहताज पीएम बोले- कोठी खरीदिए

इसे कहते हैं- दिन में सपने दिखाना। पीएम दिन में ही बोल रहे थे। सो दिन में ही सपने दिखा रहे थे। मौका था जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण मिशन का सालाना समारोह। जमीन पर काम हुआ हो, न हुआ हो। समारोह से तो दिखेगा। पिछले चार साल में बिल्डरों की कमाई खूब हुई। मनमोहन सरकार ने 2005 में शुरू की थी यह योजना। तब से शहरों में जमीनों को आग लग चुकी। दिल्ली अब मिडिल क्लास के बूते में नहीं। दिल्ली की तो बात न पूछिए। बाकी शहरों की हालत भी अलग नहीं। आम आदमी की तो बात ही छोडिए। अब मिडिल क्लास भी छत का मोहताज। मनमोहन पीएम बने, तो एनसीआर में फ्लैट मिल जाता था- हजार रुपए स्केयर फुट के हिसाब। अब नसीब नहीं तीन हजार रुपए स्केयर फुट।

सदन में बैठ अपने सांसदों को शर्मसार करेंगी सोनिया

अपन नहीं जानते मीरा कुमार क्या 'एक्शन' लेंगी। लालकृष्ण आडवाणी अपने सांसदों को कैसे समझाएंगे। यह सवाल भी जवाब का मोहताज। सोनिया गांधी इन दोनों से ज्यादा खफा। अपन पिछले दस साल के गवाह। सोनिया जबसे कांग्रेस संसदीय दल की नेता बनी। तब से सांसदों की हर मीटिंग में एक बात जस की तस रही। वह थी- सांसदों की सदन में गैर हाजिरी पर चिंता। दस साल में सोनिया अपने सांसदों को नहीं समझा पाई। सो उनका खफा होना बेहद जायज। सोमवार को जब प्रश्नकाल में सत्रह सवालों के पूछने वाले नहीं मिले। तो मीरा कुमार के पास चारा नहीं था। उनने आधा घंटा लोकसभा ठप्प कर दी। बात सांसदों के गायब होने की। अपन किसी की नियत पर सवाल नहीं उठा रहे।