December 2009

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सुप्रीम कोर्ट को बचाव में ढाल बनाया राठौर ने

शशि थरूर चुप हो गए। एसएम कृष्णा पहली बार कारगर मंत्री के रूप में दिखे। थरूर को बुलाकर साफ-साफ कहा- 'सरकारी नीतियां टि्वटर पर डिसकस नहीं हो सकती। आपने मंत्री पद की शपथ ली है। आप किसी एक मंत्रालय के खिलाफ नहीं बोल सकते।' मतलब साफ था- टि्वटर और मंत्री पद में से एक चुनना होगा। सो फिलहाल थरूर ने चुप्पी साध ली। टि्वटर पर रहेंगे। पर मंत्री और थरूर में फर्क दिखेगा। दूसरी बात जसवंत सिंह की। जो आज पीएसी की चेयरमैनी से मुक्त हो जाएंगे। तो अब स्पीकर के पास यशवंत सिन्हा के सिवा चारा नहीं। पीएसी में बीजेपी के बाकी मेंबर हैं शांता कुमार और गोपीनाथ मुंडे। मुंडे विपक्ष के उपनेता हो चुके। पीएसी की चेयरमैनी राज्यसभा से नहीं होती। सो शांता कुमार का भी कोई चांस नहीं।

सोनिया के गलत कदम से ब्रांड हैदराबाद का कचरा

अपन आंध्र की बिगड़ी हालत का खुलासा करें। उससे पहले चर्चा कुछ राजनीतिक बयानों की। मंगलवार को राजनीतिक गलियारों में इन बयानों पर खूब चटकारे सुने। पहला मामला शशि थरूर के टि्वटर का। उनने वीजा नियमों को सख्त करने की खिल्ली उड़ाई थी। जिस पर विदेशमंत्री एसएम कृष्णा ने फटकारने वाला बयान दिया। मंगलवार को उनने फिर टि्वटर पर लिखा- 'मैं दिल्ली में नहीं था। सो बड़े हंगामे से बच गया। कृष्णा का बयान आ गया। अब मुझे कुछ नहीं कहना।' सत्यव्रत चतुर्वेदी ने थरूर को उसी भाषा में धमकाया। जिस भाषा में अमर सिंह को धमकाया करते थे। बोले- 'पुरानी आदतें हैं, जल्दी से नहीं जाती। अपनी हद में रहना सीखें।' दूसरा मामला सोनिया-मनमोहन के बयानों का।

सुख रामों-शिबू सोरेनों वाली पार्टी विद डिफरेंस

अपन ने मनमोहन सिंह का भाषण पढ़ा। देवकांत बरुआ की याद आ गई। इमरजेंसी के दिन थे। चापलूसों का जमाना था। खुद्दार जेल में थे, चापलूस बाहर। इंदिरा गांधी ने बरुआ को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। तो उनने चापलूसी की सारी हदें पार कर दी थी। जब कहा- 'इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा।' यानी इंदिरा ही भारत है, भारत ही इंदिरा है। कोई नेता कितना भी बड़ा हो। देश से बड़ा नहीं होता, न बराबर। न कोई राजनीतिक दल देश से बड़ा होता है। नितिन गड़करी भाजपा के अध्यक्ष बने। तो उनने कहा- 'देश पहले, पार्टी बाद में, खुद आखिर में।' अब आप इस संदर्भ में देवकांत बरुआ के बयान को पढ़िए। इसी संदर्भ में मनमोहन सिंह का ताजा बयान देखिए। कांग्रेस का सवा सौ साला जश्न था। मनमोहन बोले- 'कांग्रेस कमजोर हुई। तो देश कमजोर होगा।' यानी इंदिरा है, तो देश है, कांग्रेस है तो देश है।

अपराधियों का किला भेद रहा मीडिया

साल 2009 बीत रहा है। यह साल मीडिया के लिए भी कई खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजरा है। साल की पहली तिमाही में जरनैल सिंह ने कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेंस में गृहमंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंककर मीडिया के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर दी थी। तो बाद में जरनैल सिंह एक सिख पत्रकार के तौर पर नाइंसाफी के खिलाफ लड़ने वाले जुझारू पत्रकार के रूप में मशहूर हुए। एक जमाना था जब मीडियाकर्मियों और मीडिया को नाइंसाफी के खिलाफ लड़ने वाला मिशनरी माना जाता था। स्वतंत्रा संग्राम के आंदोलन में मीडियाकर्मियों की भूमिका इसलिए ज्यादा अहम थी। बाजारीकरण ने पिछले एक दशक में मीडिया की जुझारू छवि को धूल धूसरित कर दिया था।

वाईएसआर की मौत के बाद आंध्र नित नए संकट में

चौदह साल की रुचिका से छेड़छाड़ पर उन्नीस साल बाद उबल पड़ा है देश। उन्नीस साल बाद पुलिस इंस्पेक्टर शंभू प्रताप सिंह राठौर को छह महीने की सजा मिली। इस बीच वह डीजीपी बनकर रिटायर भी हो चुका। ब्यूरोक्रेसी और पालीटिशियन बचाते रहे राठौर को। राठौर ने पहले रुचिका से छेड़छाड़ की। फिर स्कूल से सस्पेंड करवा दिया। रुचिका के भाई पर चोरी का केस चलवा दिया। जिनने राठौर के खिलाफ अदालत में पीआईएल लगाई। उन पर बिजली चोरी के केस बनवा दिए। तंग आकर रुचिका ने आत्महत्या कर ली। चौटाला, बंशीलाल, भजनलाल सब सरपरस्त थे राठौर के। अब देश चाहता है- राठौर को कड़ी सजा मिले। होम मिनिस्टरी की जाग भी अब खुली। पुलिस मैडल और पेंशन रोकने पर कर रही है विचार। पर ब्यूरोक्रेसी-पालीटिशियन की सांठ-गांठ का यह कोई पहला केस नहीं।

सत्ता नहीं, समाजसेवा होगा गडक़री की बीजेपी का लक्ष्य

अपन नितिन गड़करी से पहले मिले तो थे। पर ऐसे कभी नहीं। एक घंटे की प्रेस कांफ्रेंस। समां बांधकर रख दिया। उन लोगों को बहुत निराशा हुई। जो राष्ट्रीय राजनीति का अनाड़ी समझ बैठे थे। पहली प्रेस कांफ्रेंस में ही मनोबल तोड़ने के इरादे से पहुंचे थे कई धुंरधर। पर गड़करी को सुनकर खुद का मनोबल टूट गया। गड़करी का मुंह ताकते रह गए। बैठे-बैठे अपन को शिव खेड़ा की याद आ गई। प्रेरणा गुरु शिव खेड़ा। दिल्ली को दूसरा शिव खेड़ा मिल गया। युवाओं का मनोबल बढ़ाने वाला। श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देने वाला। पर शिव खेड़ा हौंसला बढ़ा सकता है। चुनाव नहीं जीत सकता। ताकि सनद रहे सो बता दें- लड़कर हार चुके हैं शिव खेड़ा। बीजेपी को चुनाव जिताने का ठेका लेकर गड़करी भी नहीं आए।

जवाब नहीं बना तो स्पिन डाक्टरी पर उतरे जयराम

अपन ने कल लिखा था- कटघरे में होंगे जयराम। सो जेटली और येचुरी ने कटघरे में खड़ा किया। दोनों पूरी तैयारी करके आए थे। येचुरी तो खुद कोपेनहेगन में थे। सो पूरे मसाले के साथ तैयार थे। मूल रूप से वकील जेटली की तैयारी का तो कहना ही क्या। अपन को पता था येचुरी पूरे जोर-शोर से नहीं घेरेंगे। आखिर जयराम रमेश का स्टैंड वही था। जो चीन का था। चीन वामपंथियों की सबसे बड़ी कमजोरी। पर येचुरी ने फिर भी उतना कम नहीं घेरा। जितना कोई वामपंथी विरोधी सोचता हो। पहले बात येचुरी की ही। पता है ना- येचुरी की सीपीएम पार्टी डी राजा की सीपीआई से बड़ी। सो अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे कुरियन ने जेटली के बाद राजा को बुलाया। तो येचुरी बिदक गए। पूछा- 'बुलाने का पैमाना क्या है?' कुरियन वामपंथियों में ऐसी जलन देख दंग रह गए। उनने कहा- 'जिसने पहले अपना नाम दिया।' बात खत्म हो गई। पर तभी कागज उलट-पलट कर देखे। तो येचुरी का लिस्ट में नाम ही नहीं मिला।

कल तो बच गए, आज कटघरे में होंगे जयराम

तेलंगाना के डर से लोकसभा तो सिमट गई। पिछले शुक्रवार को ही सिमट गई। पर राज्यसभा अभी भी जारी। यों सत्रावसान 21 दिसंबर को होना तय था। इक्कीस की तारीख तय करने की वजह थी। वजह थी- कोपेनहेगन में हुए समझौते पर संसद में बयान देना। यह विपक्ष की मांग थी- सत्रावसान कोपेनहेगन पर बयान के बाद हो। सरकार तैयार हो गई। सो मनमोहन-जयराम के लौटने पर सत्रावसान तय हुआ। ऐसा होता तो लालकृष्ण आडवाणी का इस्तीफा भी 21 को होता। पर अपने ही बिछाए तेलंगाना जाल में कांग्रेस फंसी। तो लोकसभा से 18 को ही निजात पा ली। बीजेपी को भी अपनी पार्लियामेट्री पार्टी की मीटिंग 18 को बुलानी पड़ी। बीजेपी पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग 21 को होती। तो पार्लियामेंट्री बोर्ड 22 को बैठता। उस दिन पूरा होता राजनाथ सिंह का कार्यकाल। पर कांग्रेस तेलंगाना में फंसी। तो  बीजेपी का जलवायु परिवर्तन वक्त से पहले हो गया।

तीसरी पीढ़ी के कंधों पर भाजपा की बागडोर

मुखर्जी-उपाध्याय, अटल-आडवाणी के बाद अब सुषमा-गड़करी

मोहन भागवत ने भाजपा के नए नेतृत्व के चयन की जिम्मेदारी लालकृष्ण आडवाणी को सौंपकर पिछले चार साल से चली गुटबाजी को विराम देने की कोशिश की है। आडवाणी की ओर से चुने गए पार्टी के तीनों नए नेता सुषमा स्वराज, नितिन गड़करी और अरुण जेटली अब पिछले चार साल की गलतियां सुधारने में जुटेंगे।

मौसम परिवर्तन को लेकर कोपेनहेगन में दुनियाभर के नेता कोई सर्वमान्य हल निकालने की मशक्कत कर रहे थे, लेकिन वहां कोई हल नहीं निकला। जबकि भारत में ठीक उसी समय भारतीय जनता पार्टी में मौसम परिवर्तन हो गया।

न राजनीति से संन्यास, न रथ से उतरेंगे आडवाणी

सरकार 21 तक संसद नहीं चला पाई। तो बीजेपी ने भी सत्रावसान के साथ ही नेता पद का फैसला निपटा लिया। बीजेपी शुक्रवार को अचानक पारदर्शी हो गई। पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग मीडिया के लिए खोल दी गई। मीडिया के सामने पार्लियामेंट्री पार्टी के संविधान में संशोधन हो गया। अब पार्लियामेंट्री पार्टी अपना नेता नहीं, अलबत्ता अध्यक्ष चुनेगी। चुना हुआ अध्यक्ष लोकसभा और राज्यसभा के नेता तय करेगा। संविधान संशोधन का प्रस्ताव पेश किया वेंकैया नायडू ने। समर्थन तो सबने किया ही। सिवा लालकृष्ण आडवाणी के। जब तक संशोधन नहीं हुआ। वह अध्यक्ष नहीं चुन लिए गए। चुप्पी साधकर बैठे रहे। संशोधन हो गया। तो राजनाथ सिंह ने प्रस्ताव रखा- 'तो क्यों न हाथोंहाथ अध्यक्ष चुन लिया जाए।' आडवाणी के नाम का प्रस्ताव पेश किया- यशवंत सिन्हा ने। अपन ने सिन्हा के बार-बार आडवाणी विरोधी बयानों का जिक्र किया ही था। तो इसे अब आप नई शुरूआत मानिए।