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November 2009

लिब्राहन की रपट, 356 और विपक्ष की एकता

छह दिसम्बर दूर नहीं। बाबरी ढांचे की 17वीं बरसी होगी। पर इस बार छह दिसम्बर इतवार को। पांच दिसम्बर को भी संसद नहीं बैठेगी। सत्रह साल कांग्रेस गैर भाजपाई दलों का फायदा उठाती रही। इस बीच गैर भाजपाई सरकारें भी रह चुकी। भाजपाई सरकार भी रह चुकी। पर छह दिसम्बर का हंगामा कभी नहीं रुका। लंबे अर्से बाद विपक्ष गन्ने के मुद्दे पर एकजुट दिखा। तो कांग्रेस के होश फाख्ता थे। इसीलिए लीक की गई लिब्राहन रपट। पर गले की हड्डी बन गई। तो तुरत-फुरत संसद में पेश करनी पड़ी। फिर भी लिब्राहन रपट विपक्षी एकता तोड़ने में उतनी कारगर नहीं हुई। दो-चार दिन ही सेक्युलर दलों का एका दिखा। यों इस बात पर बीजेपी जरूर खफा होगी। बीजेपी किसी को सेक्युलर दल नहीं मानती। आडवाणी कहा करते हैं- सब छ्दम धर्मनिरपेक्ष। असली धर्मनिरपेक्ष तो बीजेपी है। पर अपन इस बहस में नहीं पड़ते। सवाल संसद में विपक्षी एकता का।

शिवसेना पतन की ओर

भतीजे राज ठाकरे के बाद अब पुत्रवधु स्मिता का भी बाल ठाकरे का साथ छोड़ने का फैसला। महाराष्ट्र में भाजपा गिरते ग्राफ वाली उध्दव की शिवसेना को अपना हमराही बनाए रखे, या उत्तर-दक्षिण भारत विरोधी राजठाकरे को नया हमराही बनाए। भाजपा के आगे कुआं है, तो पीछे खाई।

केशव सीताराम का जन्म महाराष्ट्र के एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। फिर भी वह बड़े होनहार थे और उन्होंने 'प्रबोधन' नाम से एक पाक्षिक पत्रिका निकालकर मराठी भाषा और मराठी सभ्यता के लिए काम किया। हालांकि वह खुद मूलरूप से मराठी नहीं थे। पचास के दशक में जब मराठी भाषा और संस्कृति के आधार पर महाराष्ट्र राज्य निर्माण की मांग उठी तो केशव सीताराम और उनकी पाक्षिक पत्रिका ने उसमें अहम भूमिका निभाई थी। वह जातिवाद के कट्टर विरोधी थे और एक ऐसे महाराष्ट्र की कल्पना करते थे जिसका विकास तुच्छ राजनीतिक मुद्दों में न फंसे। वह संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन का हिस्सा ही नहीं, अलबत्ता अग्रणी नेता थे। मोरारजी देसाई मुंबई को महाराष्ट्र में शामिल करने के खिलाफ थे लेकिन केशव सीताराम ठाकरे ऐसे मराठी भाषी राज्य की कल्पना करते थे जिसमें बहुभाषी मुंबई को भी शामिल किया जाए। ठीक उसी समय सीताराम ठाकरे के बेटे बाला साहेब ठाकरे ने मुंबई के अंग्रेजी अखबार फ्री प्रैस जनरल में कार्टूनिस्ट के तौर पर काम शुरू किया।

मक्का-मदीना से फिदायिन हमलों के खिलाफ फतवा

अपन ने वंदेमातरम् के खिलाफ फतवे की आलोचना की। तो आतंकवाद के खिलाफ फतवे की तारीफ भी होनी चाहिए। मक्का-मदीना से इस बार मुसलमानों को नया संदेश मिला। जेहाद के नाम पर आतंकवाद फैलाने वालों को सबक। संदेश मक्का-मदीना से आया। सो दुनियाभर के मुसलमानों को मानना चाहिए। वह भी बकरीद के मौके पर। सो इसे मोहम्मद पैगंबर का संदेश मानना चाहिए। देबबंद के जिस दारूल उलूम का देश की आजादी में योगदान रहा। जिस दारूल-उलूम ने बंटवारे की मुखालफत की। उसी दारूल-उलूम से वंदेमातरम् के खिलाफ फतवा चुभा था। सिर्फ हिंदुओं को नहीं। सच्चे मुसलमानों को भी चुभा था। जैसा गुजरात के डीआईजी ने अपने लेख में लिखा- 'नमाज पढ़कर जमीं को चूमना वंदेमातरम् ही है। तो फिर वंदेमातम की मुखालफत क्यों।' अपन को तसल्ली हुई। जब हजारों सच्चे मुसलमानों ने फतवे की मुखालफत की। बैतूल में तो मस्जिद के सामने वंदेमातरम् गाकर की। अपन कहेंगे- भारतीय मुसलमानों को कट्टरपन छोड़ना चाहिए। तो कोई बुरा मान लेगा। पर ज्यादातर मुस्लिम देशों के शासक आधुनिक हो चुके।

आप चुनाव हार चुके, हम से न पूछो सवाल

अपन राजस्थान के चुनावों की बात नहीं कर रहे। जहां नगर पालिका चुनावों में बीजेपी चारों गढ़ों में चारों खाने चित्त हो गई। जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, कोटा सब किले ढह गए। वसुंधरा विरोधियों का कलेजा ठंडा हुआ होगा। पर अपन राजस्थान की बात कर ही नहीं रहे। अपन महंगाई की बात भी नहीं कर रहे। जिस पर गुरुवार को विपक्ष ने सवाल उठाया। महंगाई पर कांग्रेस गंभीर नहीं। यह बात तो लोकसभा में दिखी। पर विपक्ष भी गंभीर नहीं दिखा। प्रणव दा महंगाई पर बहस से ठीक पहले उठकर चले गए। तो आडवाणी बहस शुरू होते ही उठ गए। सोनिया नहीं थी, सो कांग्रेसी सांसद भी नाममात्र थे। विपक्ष भी हाजिरी के हिसाब से गंभीर नहीं दिखा। पर अपन न राजस्थान के चुनाव नतीजों की बात कर रहे। न महंगाई की। अपन बात कर रहे आतंकवाद पर जीत की। क्यों, अपन ने लिखा था न कल।

सबक जो हमने फिर भी नहीं सीखा

आज उस आतंकी वारदात को एक साल हो गया। आज की शाम शुरु हुआ था आतंकी हमला। तीन दिन तक आतंकियों से लड़ना पड़ा। वे सिर्फ दस थे। साठ घंटे तक देश को बंधक बनाए रखा। अपने और कुछ विदेशी भी मिलाकर 183 लोग मारे गए। इनमें 15 तो सुरक्षाकर्मी ही थे। एनएसजी जवानों से लेकर एटीएस चीफ तक। एटीएस चीफ हेमंत करकरे की मौत से भी अपन ने कितना सिखा। बुलेटप्रुफ जैकेट पहनी हुई थी करकरे ने। अपन सब ने सीधे प्रसारण वाले हमले को देखा। अलबत्ता साठ घंटे तक लगातार देखा। तो अपन ने देखा था- करकरे बुलेटप्रुफ जैकेट पहन रहे थे। नेताओं-अफसरों ने रिश्वत लेकर खरीदी थी जैकेटें। जो आतंकी की गोली भेद गई। तो क्या अपन ने कुछ सीखा करकरे की मौत से। क्या रिश्वतखोरी पर नकेल लगाई अपन ने इस एक साल में।

कटघरे में अटल-आडवाणी नहीं, खुद जस्टिस लिब्राहन

तो यूपीए सरकार तीन दिन में तीन बार झुकी। पहले गन्ना मूल्य के आर्डिनेंस पर। फिर विपक्ष के दबाव में लिब्राहन आयोग की रपट पेश करने पर। और इस बीच मंगलवार को विपक्ष के दबाव में ही लाटरी बिल वापस नहीं ले पाई। लिब्राहन आयोग की रपट पेश हो गई। खोदा पहाड़ निकली चूहिया। रपट में ऐसा कुछ भी नहीं। जो अपन सबको पता न हो। वही सब कुछ- 'बीजेपी-शिवसेना हालात को इस मोड़ पर ले आए थे। आडवाणी ने रथयात्रा से माहौल बनाया। आरएसएस-वीएचपी ने भीड़ जुटा दी। वाजपेयी-बाल ठाकरे रणनीति के तहत मौजूद नहीं थे। ढांचा भीड़ ने तोड़ दिया।' अब इस रपट में नया क्या है। वाजपेयी पर लिब्राहन आयोग का आरोप किसी जज की टिप्पणी नहीं लगती।

अटल के नाम से लिब्राहन रपट की साख दाव पर

लिब्राहन आयोग की रपट कब पेश होगी। यह पी. चिदंबरम ने अभी भी नहीं बताया। सोमवार को 'रपट' लीक हो गई। रपट में अटल बिहारी वाजपेयी का नाम चौंकाने वाला। छपी 'रपट' पर भरोसा करें। तो वाजपेयी, आडवाणी, जोशी बराबर के जिम्मेदार। 'रपट' के मुताबिक नरसिंह राव सरकार जिम्मेदार नहीं। पर वाजपेयी का नाम सुन आडवाणी खुद चौंक गए। सो उनने खुद कामरोको का नोटिस दिया। बीजेपी में फुलझड़ी चलती रही- 'मेहनत आडवाणी ने की थी। पीएम वाजपेयी बने। अयोध्या आंदोलन भी आडवाणी ने चलाया। पर ढांचा टूटने का सेहरा भी वाजपेयी के सिर बंध गया।' सुषमा बोली- 'हम खुद हैरान हैं। वाजपेयी उस आंदोलन में थे ही नहीं।' पर अपन को याद है- वाजपेयी 5 दिसंबर को लखनऊ में थे।

मनमोहन की अमेरिका यात्रा टली क्यों नही

अपना दौरा टालकर बाराक ओबामा को उनकी कश्मीर नीति पर मुंह तोड़ जवाब दे सकते थे मनमोहन सिंह। यों भी संसद सत्र के समय प्रधानमंत्री को विदेश दौरों से परहेज करना चाहिए।

संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है और हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा की मेहमानबाजी का लुत्फ उठा रहे हैं। भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी आतंकवादी घटना 26/11 की कड़वी यादों को जब एक साल बाद इस 26/11 संसद में याद किया जाएगा, तो प्रधानमंत्री नदारद होंगे। कोई अंतरराष्ट्रीय समारोह या बैठक न हो तो प्रधानमंत्री संसद सत्र के समय विदेश यात्राओं से परहेज किया करते थे। जिस संसद में बहुमत के बूते कोई प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचता है, उस संसद का उसे सम्मान करना ही चाहिए। खासकर तब जब सत्र साल में सिर्फ तीन बार होता हो और वह भी पूरे साल में कुल मिलाकर सौ दिन से भी कम चलता हो।

झेंप मिटाने को पी-3 बोला यह तो यूपीए का फैसला

सो संसद दूसरे दिन भी नहीं चली। चलनी भी नहीं थी। यही लिखा था अपन ने कल। कांग्रेस खाम ख्याली में थी। सोचा था- शुक्रवार को बुंदेलखंड के पैकेज पर राहुल को बधाई देंगे। खाम ख्याली की बात चली। तो एक किस्सा बताते जाएं। बात पिछले सेशन की। वीरप्पा मोइली लोधी गार्डन में घूम रहे थे। वहीं पर अरुण जेतली से मुलाकात हुई। तो बोले- 'आज जजों वाला बिल पास करवा दो।' जेतली बोले- 'बिल बोगस है, मैं तो पेश होने की स्टेज पर ही विरोध करूंगा।' जेतली की बात सुनकर मोइली बोले- 'वह तो कर लेनां। पर पास आज ही करवा देना।' आखिर बिल पेश होने की स्टेज पर ही वापस लेना पड़ा था। अब अध्यादेश का ठीकरा भी मोइली के सिर फूटने लगा। जिसे शुक्रवार को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला हुआ।

यूपीए के गले में महंगाई, भ्रष्टाचार, बाबरी का फंदा

अपन ने कल सवाल उठाया था- 'ओबामा-जिंताओं की आपसी बात में भारत-पाक जिक्र क्यों?' विदेश मंत्रालय के अपने प्रवक्ता विष्णु प्रकाश ने भी यही एतराज उठाया। भारत-पाक संबंधों में चीन का दखल अपन को मंजूर नहीं। पर पाक को मंजूर। सो ओबामा की यह हरकत अपने लिए खतरे की घंटी। बुधवार को अमेरिकी राजदूत ने सफाई दी- 'राष्ट्रपति खुद मनमोहन को बात का ब्योरा देंगे।'मनमोहन अगले हफ्ते अमेरिका में होंगे। भारत के बुधवार को दिखाए तेवर तो काबिल-ए-तारीफ। पर क्या 24 नवंबर को मनमोहन के तेवर ऐसे ही रहेंगे। अपन को शक। बात अमेरिका-चीन की होगी। तो आज से शुरू सेशन में अरुणाचल और दलाई लामा की भी होगी। देश की सरहदों में घुसे चीनी हेलीकाप्टरों की भी होगी। सर-जमीं हिंदुस्तान छोड़ते ही मनमोहन को तेवर बदलने की आदत। बात सर जमीं की चली। तो वंदेमातरम् की बात करते चलें।

तो 26/11 की निगरानी कर रहे थे हेडली-राणा

शनिवार को अपन ने खुफिया तंत्र की पोल खोली। तो अपन ने नागरिकता पहचान पत्र का मुद्दा उठाया था। यों तो नीलकेणी उस काम में जुट चुके। पर काम की रफ्तार बेहद धीमी। उसमें भी फिर कितने सुराख निकलेंगे। अपन अभी क्या कहें। जब पासपोर्ट बनाना मुश्किल नहीं। तो नागरिकता पहचान पत्र क्या मुश्किल होगा। कितने ही बांग्लादेशियों ने राशन कार्ड बनवा लिए। वोटर बनकर सरकारें बनाने का जिम्मा ले लिया। जी हां, कुछ पार्टियों की सरकार बनाने के ठेकेदार हैं अब बांग्लादेशी। वही उन्हें भारत से बेदखल नहीं होने देते। बेदखल की बात चलेगी। तो मानवता की दुहाई देंगे। पर अपन बात कर रहे थे फर्जी पासपोर्ट की। पाकिस्तानी जासूस सईद अमीर अली एयरपोर्ट पर पकड़ा गया। लखनऊ से भारतीय पासपोर्ट बनवा चुका था। मंगलवार को दो सहयोगी पकड़े गए। पासपोर्ट बनवाने में सहयोगी थे मो. अरशद और चांद। दोनों भारतीय।

अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे

लौट के 'कल्याण' घर को आए। यह उस कहावत जैसा ही लगा। जिसे अपन आमतौर पर बोल-चाल में इस्तेमाल करते। बीजेपी वालों ने 'एप्रोच' शुरू भी कर दी। अब खरा हो, खोटा हो, है तो अपना ही। कहते हैं पूत कपूत हो जाते हैं, मापे कु-मापे नहीं होते। मुलायम को मुस्लिम वोटों की फिक्र। तो बीजेपी को कल्याण के भरोसे 'राम' रथ पर चढ़ने की उम्मीद। वैसे भी राजनाथ सिंह जा रहे हैं। तो कल्याण को लौटने में क्या हर्ज। राजनाथ जिद करके अशोक प्रधान को टिकट न देते। तो कल्याण सिंह छोड़कर जाते भी नहीं। अशोक प्रधान हार गए। कल्याण सिंह जीत गए। खैर अपन ने मुलायम-कल्याण की दोस्ती देखी। अब दुश्मनी भी देखेंगे। सोमवार को अमर सिंह का बड़बड़ शुरू भी हो गया। कुछ दिन पहले यही मुलायम अमर कह रहे थे- 'छोड़ेंगे न तेरा साथ, ओ साथी मरते दम तक।'

भाजपा की गुटबाजी संघ का सिरदर्द

नितिन गडकरी को भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाने के पीछे संघ की दलील यह है कि पार्टी के सभी मौजूदा राष्ट्रीय नेता गुटबाजी में शामिल हैं। हालांकि राजनाथ सिंह को जब पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था तब वह गुटबाजी की राजनीति का शिकार नहीं थे। लेकिन उनके चार साल के कार्यकाल में पार्टी भयंकर रूप से गुटबाजी की शिकार हुई है। इस गुटबाजी का पहला कारण यह था कि राजनाथ सिंह ने पार्टी के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी को साथ लेकर चलने की जहमत नहीं उठाई। संघ ने क्योंकि लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने की मुहिम छेड़ी थी इसलिए राजनाथ सिंह यह मानकर चल रहे होंगे कि संघ लालकृष्ण आडवाणी को पसंद नहीं करता। राजनाथ सिंह ने संघ की इच्छा मानकर आडवाणी की अनदेखी और उनके समर्थकों को प्रमुख पदों से हटाने की मुहिम छेड़ दी थी। राजनाथ सिंह यहीं पर भूल कर गए,

खुली खुफिया तंत्र की पोल

अपने यहां तो खुफिया विभाग में कोई खबर तक नहीं थी। डेविड हेडली और राना अमेरिका में पकड़े गए। तब जाकर पता चला- हेडली-राना तो भारत में सक्रिय थे। मुंबई पर आतंकी हमले के बाद भी अपन ने कई ऐंगल निकाले। पुलिस ने कई थ्योरियां पेली। पाकिस्तान से सीधे तार जुड़े। मोटर बोट की मोटरें खरीदने तक के सबूत ढूंढ लिए। अब एक साल होने को। पर हेडली-राना का कोई ऐंगल तो कभी सामने नहीं आया। यह ऐंगल खुला, तो अमेरिका में जाकर खुला। अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई ने खोला। अब मुंबई के सन्नी सिंह कहते हैं-'हेडली मेरे पास फ्लैट किराए पर लेने आया था। ऐना नाम की एक विदेशी महिला साथ थी। बोलचाल का ढंग विदेशी था। मैने फ्लैट दिला भी दिया। पर जब पासपोर्ट-वीजा की बात आई। तो हेडली उत्तेजित हो गया।'

बीजेपी अध्यक्ष का चुनाव हो, तो मोदी जैसा कोई नहीं

संघ ने बंद मुट्ठी खोल ली। बीजेपी की साख बढ़ेगी या घटेगी। यह तो बीजेपी वाले या संघ वाले जाने। पर एनडीए का कुनबा बिखरेगा। एनडीए का आडवाणी को नेता मानना भी आसान नहीं था। पर शरद यादव-नीतीश कुमार जैसों ने आडवाणी को करीब से देखा था। तो आडवाणी को कबूल करना आसान हुआ। वरना मीडिया ने आडवाणी की ऐसी इमेज बना दी थी। अपन को तो वाजपेयी के बाद ही कुनबा बिखरने का अंदेशा था। आडवाणी का असली व्यक्तित्व मीडिया की बनाई इमेज से कोसों दूर। शरद यादव ने एक बार कहा था-'हमने आडवाणी के साथ छह साल काम किया। हमें उन्हें एनडीए का नेता मानने में कोई प्रॉब्लम नहीं।' मीडिया की नजर में मोदी की इमेज तो आडवाणी से भी बुरी।

आडवाणी पर भविष्यवाणी करने वाले अब कहां हैं

अपनी स्पीकर मीरा कुमार जा रही हैं अमेरिका। उन्नीस नवंबर को लौटेंगी। तब सेशन से पहले मीटिंग का वक्त नहीं होगा। सो उनने आज ही मीटिंग बुला ली। सेशन से एक हफ्ता पहले। यों तो इस मीटिंग के मुताबिक सेशन नहीं चलना। मीरा कहेंगी-'सबको मौका मिलेगा। सेशन को हंगामों से बचाओ।' पर हंगामें तो होकर रहेंगे। मंहगाई पर अब विपक्ष जरूर एकजुट होगा। मुलायम को भी कांग्रेस से हाथ मिलाने की अकल आ चुकी। सोचो, एटमी करार पर सरकार गिर जाती। तो कांग्रेस को 206 सीटें मिल पातीं। कतई नहीं। अलबत्ता 1989 के हालात बनते। पर बात मंहगाई की।

गलतियों का दूसरा दौर शुरू करने को तैयार बीजेपी

कांग्रेस यूपी-केरल में लौट आएगी। बीजपी का सितारा डूबना बरकरार। यह है मंगलवार को निकले नतीजों का लब्बोलुआब। सबसे ज्यादा महत्व यूपी के नतीजों का। न मुलायम अपनी पुत्रवधू को जीता पाए। न अखिलेश अपनी सीट अपनी बीवी के नाम कर पाए। सो यह बाप-बेटे दोनों की हार हुई। अपन भी फिरोजाबाद को यादव सीट समझते थे। तो फिरोजाबाद से जातिवाद राजनीति का भूत उतर गया। राज बब्बर की जीत इसका साफ इशारा। अपन को लगता था- फतेहपुर सीकरी के बाद फिरोजाबाद भी हारेंगे राज बब्बर। पर फिरोजाबाद ने सिर्फ यादव महारथियों को नहीं हराया। आने वाले कल के यूपी की इबारत लिख दी। राहुल गांधी ने दाव लगाया था फिरोजाबाद पर। राहुल कोई सीएम पद के उम्मीदवार तो नहीं होंगे। पर 2012 की यूपी एसेंबली चुनाव के कांग्रेसी दूल्हे जरूर होंगे।

महाराष्ट्र-कर्नाटक राजनीतिक गिरावट का आईना

कर्नाटक, महाराष्ट्र और हरियाणा तीनों राज्यों के उदाहरण हमारे सामने हैं। सियासत किस तरह व्यापारिक हितों की सीढ़ी बन चुकी है। हरियाणा में वक्त तय होने के बाद भी इसलिए शपथ ग्रहण नहीं हो सका क्योंकि सौदेबाजी सिरे नहीं चढ़ सकी। महाराष्ट्र में चुनाव नतीजे आने के चौदहवें दिन तक मलाईदार विभागों का लेन-देन सिरे नहीं चढ़ा। इसलिए नई सरकार का गठन होने में देर लगी। कर्नाटक में भाजपा के ही कुछ मंत्रियों ने अपने आर्थिक हितों में रुकावट बनने वाली सरकार को तलवार की धार पर लाकर खड़ा कर दिया।

अगर महाराष्ट्र में गैर कांग्रेसी सरकार बननी होती तो वहां गवर्नर की सिफारिश से राष्ट्रपति राज लग गया होता। उत्तर प्रदेश में रोमेश भंडारी और बिहार में बूटा सिंह ने ऐसा ही किया था। अफसोस यह है कि मलाईदार मंत्रालयों का लेन-देन खुलेआम हो रहा है और संविधान का कोई ऐसा प्रावधान नहीं है जो लूट-खसूट को रोक सके। इस लूट-खसूट को सिर्फ गवर्नर ही रोक सकता है, लेकिन गवर्नर अपने राजनीतिक आकाओं के इशारों पर काम करने के आदी हो गए हैं। अपने पूर्व राजनीतिक आकाओं को खुश करते रंगे हाथों पकड़े गए रामलाल ठाकुर, रोमेश भंडारी, बूटा सिंह सुप्रीम कोर्ट की डांट फटकार सह चुके हैं। इसके बावजूद गवर्नरों की कार्यशैली में कोई सुधार नहीं दिखता।

न लाग, न लपेट, खरी-खोटी वाले थे प्रभाष जी

Prabhas Joshiकोई माने, न माने। प्रभाष जोशी के साथ ही मिशनरी पत्रकारिता का अंत हो गया। मिशनरी पत्रकारिता के वही थे आखिरी स्तंभ। यों उनके जमाने में ही पत्रकारिता व्यवसायिक हो गई। प्रभाष जी का आखिरी साल तो व्यवसायिकता के खिलाफ जंग में बीता। चुनावों में जिस तरह अखबारों ने न्यूज कंटेंट बेचने शुरू किए। उनने उसके खिलाफ खम ठोक लिया। उनने लिखा- 'ऐसे अखबारों का रजिस्ट्रेशन रद्द कर प्रिटिंग प्रेस के लाइसेंस देने चाहिए।' इन्हीं महाराष्ट्र, हरियाणा, अरुणाचल के चुनावों में उनने निगरानी कमेटियां बनाई। पत्रकारिता की स्वतंत्रता को जिंदा रखने की आग थी प्रभाष जी में। प्रभाष जी पांच नवंबर को भारत-आस्ट्रेलिया मैच देखते-देखते सिधार गए। प्रभाष जी की दो दिवानगियां देखते ही बनती थी। उन्हीं में एक दिवानगी उनके सांस पखेरू उड़ा ले गई। क्रिकेट मैच में हार का सदमा नहीं झेल पाए। हार्ट अटैक से चले गए। दूसरी दिवानगी थी- पाखंडी नेताओं की चङ्ढी उतारना।

तो बनते-बनते बिगड़ गई कर्नाटक की बात

अपन ने कल बीजेपी की कंगाली में आटा गीला होने की कहानी बताई। बिहार में सुशील मोदी के खिलाफ नई बगावत। झारखंड में जेडीयू के साथ गठबंधन में फच्चर। कर्नाटक में रेड्डी ब्रदर्स का येदुरप्पा के खिलाफ खम ठोकना। अब आगे। सुशील मोदी के खिलाफ दो साल पहले भी बिगुल बजा था। तब बीजेपी ने डेमोक्रेटिक फार्मूला निकाला। बीजेपी के सारे एमएलए दिल्ली बुलाए गए। बंद कमरे में एक-एक को बुलाकर पूछा। फैसला मोदी के हक में निकला। मोदी बच गए। पर यह फार्मूला न खंडूरी को हटाते समय उत्तराखंड में लागू हुआ। न वसुंधरा को हटाते समय राजस्थान में। अब सुशील मोदी के खिलाफ दुबारा बिगुल बजा। तो अपन को इंतजार करना होगा हाईकमान के नए रुख का। झारखंड में फंसा गठबंधन का फच्चर गुरुवार को निकल गया।

भाजपा का तो कंगाली में आटा ही गीला

अपन ने कल लिखा ही था- 'आडवाणी होम मिनिस्टर रहते वीएचपी की मीटिंग में जाते। तो जमकर बवाल होता। पर चिदंबरम जमात-उलेमा-ए-हिंद की मीटिंग में गए। तो पत्ता भी नहीं हिला।' देवबंद की उसी कांफ्रेंस में वंदेमातरम् के खिलाफ फतवा हो गया। पी चिदंबरम ने दिल्ली आकर सफाई दी- 'मेरे सामने कोई फतवा नहीं हुआ। मुझे तो पता भी नहीं।' चिदंबरम् ठहरे चतुर सुजान। जमात-उलेमा-ए-हिंद का प्रस्ताव ही फतवे का आगाज था। यह प्रस्ताव पास हुआ था सोमवार को। चिदंबरम पहुंचे मंगल को। कहते हैं- 'मुझे तो पता भी नहीं।' चतुर सुजान चिदंबरम का किस्सा तो अरुण जेटली ने सुनाया। मौका था- 'डायरेक्ट टैक्स पर सेमीनार का।' सेमीनार किया था- 'कनफैडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स ने।' जेटली बोले- 'उदारीकरण शुरू हुआ। तो टैक्स घटने शुरू हुए। लक्ष्य था- लगातार टैक्स घटाते जाना। ताकि भारतीय उद्योग धंधे अंतरराष्ट्रीय बाजार के मुकाबले खड़े हों। पर चिदंबरम जब-जब वित्त मंत्री बने। उनने टैक्सों का बोझ लादा। चिदंबरम बजट की पैकेजिंग के माहिर।

ए आर रहमान ने बनाया वंदेमातरम को विश्वगीत

वोट बैंक की राजनीति देश को कहां ले जाएगी। इसका ताजा उदाहरण देवबंद में दिखा। देश का होम मिनिस्टर पहुंच गया जमात-उलेमा-ए-हिंद की मीटिंग में। आडवाणी होम मिनिस्टर होते हुए वीएचपी की मीटिंग में जाते। तो सोचो कितना बवाल होता। कांग्रेस-लेफ्ट-सपा-राजद सब चढ़ दौड़ते। पर चिदंबरम मुस्लिम सम्मेलन में जाकर धन्य हो गए। तो देश में पत्ता भी नहीं हिला। चिदंबरम को पौने दो साल पहले के फतवे की तारीफ करना याद रहा। पर ताजा फतवे पर चुप्पी साध गए। चिदंबरम ने जिस आतंकवाद विरोधी फतवे की तारीफ की। वह देवबंद से 25 फरवरी 2008 को जारी हुआ था। पर ताजा फतवा हुआ वंदेमातरम के खिलाफ। जमायत-उलेमा-ए-हिंद के इसी सम्मेलन में प्रस्ताव पास हुआ- 'मुसलमानों को 'वंदे मातरम्' नहीं गाना चाहिए।' वजह बताई- 'वंदे मातरम् में देश के लिए सजदा है। मुसलमान अल्लाह के अलावा किसी की इबादत नहीं करते।'

दलाईलामा के अरुणाचल दौरे का मतलब

क्या मौजूदा 14वें दलाईलामा इतिहास को उसी मोड़ पर लाने की सोच रहे हैं जहां से पांचवें दलाईलामा ने सत्ता संभालने की शुरूआत की थी। क्या वह अपने इसी तवांग दौरे के दौरान ऐसा ऐतिहासिक ऐलान करने की सोच रहे हैं, जैसी चीन की आशंका है।

आठ नवंबर का दिन जैसे-जैसे करीब आ रहा है, अरुणाचल का सुरक्षा घेरा उतना ही बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ से मुलाकात के बाद भारत-चीन में तनाव कुछ कम हुआ है, लेकिन इसका असर अरुणाचल में दिखाई नहीं देता। जैसे-जैसे दलाई लामा के अरुणाचल पहुंचने की तारीख नजदीक आ रही है, वहां के लोगों में दहशत फैल रही है। दलाईलामा के दौरे को लेकर अरुणाचल के लोग उत्साह से भरे हैं, उनके स्वागत की तैयारियां हो रही हैं, लेकिन एक डर भी समाया हुआ है कि कहीं उस दिन चीन अक्टूबर 1962 की याद ताजा न कर दे।