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October 2009

इंदिरा के जमाने से ही शुरू हो गई थी सियासत व्यापार बननी

महाराष्ट्र-हरियाणा के चुनाव नतीजे आए आज दसवां दिन। जीत का जश्न मनाने के बावजूद सरकारें नहीं बन पाई। दोनों जगह बहुमत का जुगाड़ तो हो गया। पर राजनीतिक मलाई पर सौदेबाजी नहीं निपट रही। महाराष्ट्र - हरियाणा की बात बताएं। पर उससे पहले आरके धवन की बात। जो भजनलाल को फिर से कांग्रेस में लाने की कोशिश में। धवन ने इंदिरा गांधी का स्टेनो बनकर सफर शुरू किया। सो इंदिरा गांधी को करीब से समझने वालों में धवन भी। इंदिरा की बरसी पर धवन ने कहा- 'इंदिरा ने इमरजेंसी और ब्ल्यू स्टार के कदम मजबूरी में उठाए। दोनों का बहुत अफसोस था बाद में।' ताकि सनद रहे। सो बताना जरूरी।

पवार के लंच में भी नहीं हो पाई 'पावर' की बंदरबांट

पाकिस्तान ने हिलेरी क्लिंटन से कहा- 'भारत को समग्र बात के लिए राजी करो।' मनमोहन सिंह ने श्रीनगर में कहा- 'किसी के दबाव में कोई बात नहीं होगी। पाक पहले आतंकवाद पर नकेल डाले। तभी बात होगी।' यों दबी जुबान में उनने कह दिया- 'यह शर्त नहीं।' मनमोहन तलवार की धार पर। शर्म-अल-शेख में कहा था- 'आतंकवाद बातचीत में बाधा नहीं बनना चाहिए।' पर दिल्ली में सोनिया का दबाव बना। तो संसद में कहा-'आतंकवाद रुके, तो बातचीत होगी।' अब दोनों बातों का संतुलन रखना पड़ता है मनमोहन को। बात समग्र बातचीत की। तो मनमोहन के लिए आसान बात नहीं। सोनिया गांधी का फच्चर न होता। तो मनमोहन शुरू करा चुके होते।

मनमोहन से ज्यादा तो हिलेरी ने खोली आईएसआई की पोल

शर्म-अल-शेख के बयान से अपन सहमत नहीं थे। मनमोहन सिंह ने आतंकवाद को किनारे रख पाक से बात शुरू की थी। तो अपन क्या सारा देश खफा था। देश खफा हुआ। तो सोनिया गांधी के कान भी खड़े हुए। सोनिया ने तब तक मनमोहन का समर्थन नहीं किया। जब तक उनने संसद में पलटी नहीं खाई। मनमोहन के अब समझ में आ चुका। अमेरिका के कहने पर पाक से नरमी कितनी महंगी पड़ेगी। सो मनमोहन अब बिना सोचे-समझे नहीं बोलते। पाक से निपटने का ठेका अमेरिका को देने का जोखिम भी नहीं उठाते। मनमोहन ही नहीं। एसएम कृष्णा के बयानों में मर्दानगी झलकने लगी।

ममता समर्थकों का ट्रेन पर कब्जा, बुध्ददेव छुड़ाने गए

ममता की ट्रेन बंधक बनकर छूट गई। ममता को चिदंबरम की मदद मांगनी पड़ी। 'रेल रोको' आंदोलन भी ममता समर्थकों का था। सो ट्रेन अपहरण की जिम्मेदार भी ममता ही हुई। ममता मंत्री न होती। तो खुद भी पटरी पर बैठी होती। वक्त का फेर देखिए। बुध्ददेव की पुलिस ममता की ट्रेन को छुड़ाने गई। पर पुलिस अत्याचारों के खिलाफ बनी ममता समर्थक जनकमेटी भी मुस्तैद थी। बांसतला से चार किलोमीटर ही पहुंची थी पुलिस। कमेटी के लठैतों ने पुलिस पार्टी पर हमला बोल दिया। बुध्ददेव की पुलिस जन कमेटी के सामने धूल चाटने को मजबूर हुई।

यह सत्ता और घोटाले में वाजिब हिस्से की जंग

जून 2008 में खुलता है एक घोटाला। यूपीए सरकार के डीएमके मंत्री कटघरे में खड़े थे। करुणानिधि के करीबी ए. राजा। राजा ने मनमोहन सिंह को ढाल बना लिया। कहा- 'मैंने जो कुछ किया, पीएम की जानकारी में था। पीएम की इजाजत से किया।' मनमोहन सिंह ने भी बचाव में परहेज नहीं किया। मनमोहन आज भी अपनी उसी जुबान पर कायम। अब जब सीबीआई छापे मार चुकी। तो भी मनमोहन सिंह ने ए. राजा का बचाव किया। मनमोहन भी कटघरे में खड़े होने से बचेंगे नहीं। अरुण जेटली ने ए. राजा के साथ मनमोहन सिंह को कटघरे में खड़ा कर भी दिया। शीत सत्र शुरू होने में ज्यादा देर नहीं। उन्नीस नवबंर को शुरू होगा। सत्र का एजेंडा सीबीआई ने तय कर दिया।

बीजेपी आलाकमान के नाम खुली चिट्ठी

हमें आपकी नहीं, देश की फिक्र है, आप सुधरोगे तो लोकतंत्र मजबूत होगा। लोकतंत्र मजबूत होगा तो देश मजबूत होगा। आपने अपने अनुभव से कुछ नहीं सीखा तो युवा पीढ़ी के नए तौर तरीकों से राजनीति का क ख ग सीखिए। राहुल गांधी से सीखिए।

वैसे तो आपको आलाकमान कहूं या नहीं। इस पर मन में असमंजस है। पर परंपरा निभाने के लिए आलाकमान शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूं। वैसे तो भाजपा में आलाकमान का होना ही हास्यास्पद सा लगता है। राजनीति में आलाकमान शब्द का इस्तेमाल कांग्रेस में ही शोभा देता है। इंदिरा गांधी के जमाने में आलाकमान शब्द चलन में आया। उससे पहले कांग्रेस में सिंडिकेट हुआ करता था, जिसे आम भाषा में सामूहिक नेतृत्व कह सकते हैं। नेहरू की मौत के बाद कांग्रेस में सामूहिक नेतृत्व का चलन शुरू हुआ था। इंदिरा गांधी ने सामूहिक नेतृत्व को तहश-नहश करके कमान अपने हाथ में ली। वह कांग्रेस की आलाकमान बन गई। इस तरह राजनीति में आलाकमान की शुरूआत हुई।

कांग्रेस को हरियाणा में झटका, बीजेपी को सब जगह

हरियाणा में अपन ने ऐसा तो नहीं सोचा था। झटका लगेगा, यह तो पता था। पर बहुमत नहीं मिलेगा। अपन को ऐसी आशंका नहीं थी। पर कांग्रेस आलाकमान को आशंका हो गई थी। आशंका न हुई होती। तो मोती लाल वोरा और आरके धवन पोलिंग के बाद भजन लाल से न मिलते। चुनाव शुरू हुआ। तो हालात ऐसी नहीं थी। पर चुनाव रोहतक बनाम बाकी हरियाणा बन गया। तो हालात बदल गए। चौटाला जब कहा करते थे- 'हुड्डा हरियाणा के नहीं, रोहतक के सीएम।' तो कांग्रेस ने उसे गंभीरता से नहीं लिया। पर यह बात चुनावों में साफ दिखने लगी थी। हुड्डा ने वक्त से पहले चुनाव करवाए। हालात तो हुड्डा के पक्ष में थे। पहले मायावती-भजनलाल गठबंधन टूटा। फिर चौटाला-बीजेपी गठबंधन टूटा। फिर कुलदीप-बीजेपी गठबंधन होते-होते टूटा। पांच कोणीय चुनावों में भी कांग्रेस की दुर्गति हुई।

अरुणाचल का जनादेश लेकर जियाबाओ से भिड़ेंगे मनमोहन

आज होगी तीन राज्यों के वोटों की गिनती। उधर गिनती निपटेगी। इधर झारखंड के चुनाव का रास्ता खुलेगा। झारखंड का चुनाव तीन राज्यों के साथ न होना। सत्ता के दुरुपयोग का कांग्रेसी उदाहरण। सरकार न बननी थी, न बनानी थी। पर एसेंबली को जानबूझकर सस्पेंड किए रखा। कांग्रेस की मदद वाली मधु कोड़ा की सरकार सबसे भ्रष्ट साबित हुई। कोई पांच हजार करोड़ की जायदाद बनाई कोड़ा ने। अब सीबीआई जांच के घेरे में। शिबू सोरेन विरोध करते रहे। पर मधु कोड़ा सरकार चलाती रही कांग्रेस। पांच हजार करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार का जिम्मेदार कौन। यह नतीजा आप खुद निकालिए। पर आज बात झारखंड की नहीं। बात तीन राज्यों के चुनाव नतीजों की। मनमोहन आज रात को थाईलैंड रवाना होंगे। तो अपने साथ अरुणाचल का जनादेश ले जाएंगे। चलते-चलते बताते जाएं- इस बार पीएम अलग उड़नखटोले पर सवार होंगे। टीम अलग उड़नखटोले पर।

मनमोहन कन्फ्यूजन से निकले तो अब चिदंबरम की बारी

बात अपने मनमोहन सिंह की। जिनने पीएम बनते ही 2005 में हवाना जाकर कहा- 'पाकिस्तान भी आतंकवाद का शिकार।' महाराजा रणजीत सिंह के बारे में मशहूर था। वह सबको एक नजर से देखते थे। उसी तरह मनमोहन सिंह ने भी आतंकवाद को एक ही नजर से देखा। भारत और पाक के आतंकवाद का फर्क नहीं समझे। भारत का आतंकवाद पाक की देन। आतंकवाद में पाक फौज और आईएसआई शामिल। पर पाक का आतंकवाद घरेलू अमेरिकापरस्ती के खिलाफ। पाक ने जिस तालिबान-अलकायदा को पाला पोसा। उसी को मारने में अमेरिका की मदद की। तो तालिबान-अलकायदा के निशाने पर आया पाक। माना, कूटनीति में अनाड़ी हैं मनमोहन सिंह। पर आतंकवाद को समझने में इतनी नादानी। किसी पीएम को तो शोभा नहीं देती।

चीन से दो टूक बात के दो मौके अगले हफ्ते

भारत-चीन के शब्दबाण चरम पर। नवंबर में दलाईलामा तवांग जाएंगे। जा पाएंगे क्या? गए तो नवंबर में तनाव तेज होगा। यों अब नवंबर में वक्त भी क्या। दलाईलामा तवांग के रास्ते ही भारत में घुसे थे। ऐसा नहीं जो तवांग पहली बार जा रहे हों दलाईलामा। आठ-दस बार जा चुके। वाजपेयी के वक्त 2003 में भी गए थे। पर तब तनाव इतना नहीं हुआ। शब्दबाण भी इतने तीखे नहीं थे। अब तो जैसे जंग की तैयारी कर रहा चीन। इसकी वजह सिर्फ दलाईलामा नहीं। अपनी अमेरिका से बढ़ती दोस्ती भी। पर यह कैसी दोस्ती। अब्दुल कलाम के बाद अब शाहनवाज हुसैन का अपमान।

अपना तो पटाखों से परहेज पर पाकिस्तान में फूट रहे बम

अपने यहां सिर्फ मिठाई का परहेज ही नहीं। पटाखों का भी परहेज। मिठाई की पोल तो दीवाली से ठीक पहले खुल गई। पूरे देश में नकली मावा पकड़ा गया। मिठाई की मांग से हलवाईयों के मुंह में पानी भरने का असर। मांग ज्यादा होगी। तो फर्जीवाड़ा भी बढ़ेगा। सो इस बार ड्राई फ्रूट का चलन बढ़ा। चाकलेट बनाने वाली इंटरनेशनल एजेंसियों की भी चांदी। थोड़ा मीठा हो जाए। पर मिठाई से ज्यादा बात पटाखों की। अपन ने सालों साल शिवकाशी में पटाखे बनाते बच्चों को मरते देखा। विस्फोटों में हाथ-पैर उड़ते देखे। पटाखे हर साल न जाने कितनों का बचपन छीन रहे। सो समझदार लोगों ने पटाखों के खिलाफ मुहिम छेड़ी। जो अब परवान चढ़ने लगी। आपने बुलंदशहर में पटाखों की मंडी तो जलते देखी ही। दीवाली से एक दिन पहले ही बज गए सारे पटाखे।

तालिबान का एजेंडा पाक में अलकायदा सरकार का

बुजुर्गोँ ने कहा था- जैसी करोगे, वैसी भरोगे। बुजुर्गों ने यह भी कहा था- जो बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहां से होय। अब पाकिस्तान को करनी की भरनी का वक्त। तड़ातड़ बम फट रहे हैं पाक में। गुरुवार को पांच जगह बम फटे। तीन जगह तो सिर्फ लाहौर में ही। पेशावर और कोहाट में भी बम फटे। पहले अपन पेशावर की बात ही करें। निशाना कोई बड़ा आदमी नहीं था। मरा भी सिर्फ एक ही। वह भी एक मासूम बच्चा। नार्थ-वेस्ट फरंटियर प्रोविंस के सीएम के ड्राइवर का घर था। घर के ठीक सामने कार बम फटा। पेशावर के साथ ही लगता है कोहाट। जहां दस लोग मारे गए। कोहाट में इस्लामाबाद दोहराया गया। याद है- तीन साल पहले का आतंकी हमला। इस्लामाबाद के फाइव स्टार होटल में घुसा था विस्फोटक भरा ट्रक।

चुनाव की पूर्वसंध्या पर फूटा भ्रष्टाचार का बम

तो आज तीन राज्यों में वोट पड़ेंगे। महाराष्ट्र, हरियाणा, अरुणाचल। हरियाणा में कांग्रेस का पलड़ा भारी। बहुमत पा ही जाएगी कांग्रेस। पर हुड्डा की बजाए शैलजा सीएम होंगी। इस खुलासे ने कांग्रेस के होश उड़ा दिए। यों सोनिया का इरादा यही था। अपन ने छह अक्तूबर को किया था खुलासा। हवा उड़ी थी तो जाटों में खलबली मची। जाट चौटाला की तरफ दौड़ने लगे। हुड्डा कैंप के तो होश फाख्ता हो गए। खुद हुड्डा ने सोनिया से अर्ज किया- 'चुनाव से पहले मेरे नाम का ऐलान न किया। तो जाट वोट बैंक खिसक जाएगा।' सो इतवार को सोनिया ने वक्त की नजाकत को पहचाना। हुड्डा के नाम का ऐलान कर दिया। सो अब हुड्डा कैंप में राहत। बात अरुणाचल की। तो कांग्रेस की सरकार वहां भी बनेगी। यों भी वहां जिसका केंद्र उसका राज्य की परंपरा।

अमेरिकी शर्तें भारत के अनुकूल

पाक में जमहूरियत समर्थक और विरोधी आमने-सामने आ गए हैं क्योंकि अमेरिकी असैन्य आर्थिक मदद की शर्तें सेना और आईएसआई की बेजा हरकतों पर अंकुश लगाने वाली हैं।

सार्क सम्मेलन के मौके पर जनवरी 2004 में पाकिस्तान जाना हुआ तो जियो टीवी के मौजूदा सीईओ आमिर मीर के साथ बातचीत का मौका मिला। होटल के बाहर सड़क पर ही काफी देर टहलते-टहलते बात होती रही। आमिर मीर की भारत से शिकायत थी कि वह पाकिस्तान के चुने हुए शासकों के साथ बातचीत नहीं करता, लेकिन जब-जब सैनिक शासक आ जाता है, बातचीत तेजी से शुरू कर देता है। उनका कहना था कि भारत के इस रवैये ने पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत नहीं होने दिया। आमिर मीर की यही शिकायत अमेरिका के साथ भी थी।

कौन से सुरखाब के पर लगे होते हैं अमेरिकी राष्ट्रपति को

तो नोबेल शांति पुरस्कार का ऐलान हो गया। लाटरी निकली बाराक ओबामा के नाम। यों किसी भारतीय को मिलने की अपन को उम्मीद नहीं थी। जो अपन तिलमिलाएं। पांच-सात साल पहले जरूर वाजपेयी को मिलने की उम्मीद थी। पर अपनी उम्मीदों पर पानी फिरा। वैसे भी जब महात्मा गांधी को शांति पुरस्कार नहीं मिला। तो वाजपेयी क्या चीज। वाजपेयी को तो अब 'भारत रत्न' की भी उम्मीद नहीं। इंदिरा गांधी ने खुद ही 'भारत रत्न' ले लिया था। इस साल जब वाजपेयी को 'भारत रत्न' की मांग उठी। तो अपन को फिजूल की मांग लगी।

काबुल में अपन ही क्यों 'आतंकियों' का निशाना

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल। काबुल में अपना दूतावास फिर बना आतंकियों का निशाना। आईएसआई का हाथ बताना अभी जल्दबाजी होगा। वरना पाकिस्तान फिर कहेगा- 'जांच से पहले पाक पर तोहमत की अपनी आदत।' पर काबुल में कोई और भारतीय दूतावास को निशाना बनाएगा ही क्यों। अपन तो 42 देशों की नाटो फोर्स में भी शामिल नहीं। जो अफगानिस्तान में तालिबान से लड़ रहीं। अपना रोल तो सिर्फ अफगानिस्तान के नव निर्माण का। सड़कों का निर्माण। अस्पतालों-स्कूलों-इमारतों का निर्माण। अपन आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई से सीधे नहीं जुडे। सीधा जुड़ा है पाकिस्तान। फिर बार-बार भारतीय दूतावास पर हमले क्यों। समझना मुश्किल नहीं। अफगानिस्तान में अपनी मौजूदगी से जली-भुनी बैठी है आईएसआई।

पाकिस्तान को लेकर उलझन में अपने मंत्री

लोक दिखावे और असलियत का फर्क अब दिखने लगा। सताईस सितंबर को एसएम कृष्णा और कुरैशी की मुलाकात हुई। तो अपन को खबर दी गई- 'सख्त कार्रवाई के बिना बात नहीं।' पर कुरैशी ने बुधवार को इस्लामाबाद में कहा- 'सकारात्मक रुख दिखाई दिया।' अपन को पहले से ही आशंका थी। महाराष्ट्र का चुनाव हो जाने दीजिए। मनमोहन की याद धुंधली हो जाएगी। मुंबई का हमला महत्वहीन तो नहीं होगा। पर पाक से बातचीत में अड़चन भी नहीं होगा। अपन ने 23 सितंबर को लिखा था- 'महाराष्ट्र चुनाव के बाद मिलेंगे मनमोहन-गिलानी।' सो अब नवंबर के तीसरे हफ्ते की मुलाकात तय।

कामनवेल्थ फैडरेशन पहुंची तो पीएम के होश हुए फाख्ता

जिनने 1984 का चुनाव नहीं देखा। उनने चुनावों में सांपों-बिच्छुओं का इस्तेमाल नहीं देखा। अपन यहां लाहौर की कहावत का इस्तेमाल मुनासिब नहीं समझते। पर लाहौर की कहावत बताना वक्त की जरूरत। वहां एक कहावत है- 'जिन्ने लाहौर नहीं वेख्या, ओ जाम्या ही नहीं।' यानी जिसने लाहौर नहीं देखा, वह पैदा ही नहीं हुआ। आजादी के बाद दूर दराज के कस्बों-गांवों में जितना मोह दिल्ली देखने का। उतना आजादी से पहले लाहौर देखने का था। कम से कम उत्तर भारत में तो था ही। पर अपन बात कर रहे थे चुनाव की। महाराष्ट्र के चुनावों में चूहों-बिल्लियों-सांपों-मेढकों का इस्तेमाल हुआ। तो अपन को 1984 के चुनाव याद आए। जब कांग्रेस ने इश्तिहारों में अपने विरोधियों को कहीं बिच्छू। तो कहीं सांप दिखाया था। अब महाराष्ट्र के चुनाव में वही आलम।

केंद्र का इम्तिहान नहीं होते विधानसभा चुनाव

हरियाणा में विपक्ष कई हिस्सों में बंटा हुआ है, जिसका कांग्रेस को सीधा फायदा होगा। लेकिन महाराष्ट्र में ऐसी बात नही है। जहां  लोकसभा में सीटें बढ़ने के बावजूद विधानसभा क्षेत्रों में हारी है कांग्रेस। अरुणाचल में चीन की सीमा पर इंफ्रांस्टक्चर की कमी मुख्य चुनावी मुद्दा।

पंद्रहवीं लोकसभा का गठन हुए पांच महीने हो चले हैं। इस बीच हुए विभिन्न विधानसभाओं के उपचुनावों को यूपीए सरकार की लोकप्रियता में गिरावट का पैमाना नहीं माना जा सकता। इन उप चुनावों में मोटे तौर पर उन्हीं राजनीतिक दलों की जीत हुई, जिनकी उन राज्यों में सरकारें थी। यूपीए सरकार की लोकप्रियता या अलोकप्रियता का पैमाना राज्य विधानसभा चुनावों के नतीजों को भी नहीं माना जाना चाहिए।

मंदी में थरूर का नया टि्वटर मंत्र

गांधी जयंती पर यों तो खबरों का अकाल सा था। सिवा दो खबरों के। एक तो कर्नाटक-आंध्र में बाढ़ की। दूसरी बिहार में नक्सली हिंसा पर लालू के राजनीतिक तीरों की। पर दिन गांधी जयंती का था। सो अपन गांधी की ही बात करें। तो सरकार को भी गांधी की याद आ ही गई। ग्रामीण रोजगार योजना अब गांधी के नाम होगी। वरना तो गांधी के नाम पर इंदिरा, राजीव, सोनिया, प्रियंका और राहुल ही थे। अपन पक्के तौर पर तो नहीं कह सकते। पर कनाट प्लेस का नाम महात्मा गांधी के नाम पर होता। तो शायद चल निकलता। वैसे भी देशभर के हर कस्बे में एक गांधी मैदान। एक गांधी चौक। पर दिल्ली में गांधी के नाम पर एक गांधी समाधि। दूसरा पूर्वी दिल्ली का गांधी नगर।

नेहरू-पटेल पर मोदी सोनिया में कहा-सुनी

दिनशा पटेल अपनी जिद्द पर अड़े न रह सके। सरदार पटेल मेमोरियल ट्रस्ट के फंक्शन में मोदी को बुलाना पड़ा। मोदी पहुंचे। तो फिर वही हुआ। जिसका दिनशा पटेल को अंदेशा था। यों मोदी न बुलाए जाते। तो कोई सोनिया को जवाब देने वाला न होता। यों फंक्शन तो ट्रस्ट का था। पर दिनशा पटेल चाहते थे- कांग्रेस का मुशायरा हो जाए। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील को बुलाया। गवर्नर एससी जमीर को बुलाया। पर बात सीएम की चली। तो बोले- 'यह तो प्राइवेट फंक्शन, सरकारी नहीं।' पर ना-ना करते न्योता दिया। तो कार्ड में सीएम का नाम नहीं छापा। चाहते थे सीएम का भाषण ही न हो। पर सोनिया गांधी का भाषण लिखा कर ले गए।

किसी के पास बेटी है तो किसी के पास मां

कलावती के घर रात बिताना आसान। पर जेएनयू में एक घंटा बिताना भी मुश्किल होगा। राहुल गांधी ने ऐसा सोचा नहीं था। जेएनयू के नौजवानों ने राहुल के छक्के छुड़ा दिए। पहले तो अंदर घुसते ही काले झंडों का सामना हुआ। पर तनाव में नहीं आए राहुल। पर जब सवालों का सिलसिला शुरू हुआ। तो पसीने छूट गए। सवाल हुआ- 'कार्पोरेट घरानों को सब्सिडी। पर हायर एजुकेशन के लिए पैसा नहीं?' राहुल को जवाब नहीं सूझा। वह बोले- 'लगता है आप वामपंथी विचारधारा को मानते हैं।' यह सच भी। जेएनयू पर शुरू से ही वामपंथियों का कब्जा। प्रकाश करात से लेकर सीताराम येचुरी तक जेएनयू की देन। पर बात राहुल के फंसने की। इस सवाल ने तो राहुल के बारह बजा दिए।