September 2009

भ्रष्टाचार में सिर्फ बाबू धरे जाएंगे, कोई क्वात्रोची नहीं

संसद में घोटाला कबूल हो चुका। कबूल हो चुका- बोफोर्स तोपों की खरीद में दलाली हुई थी। पर कांग्रेस शुरू से पर्दा डाल रही थी। यही करना था एक दिन। यूपीए की पिछली सरकार ने क्वात्रोची की मदद की। क्वात्रोची के सील खाते खुलवाना शुरूआत थी। लेफ्ट की मदद से किया यह कांग्रेस ने। अब दूसरी बार सरकार बनी। तो बैसाखियां लेफ्ट से भी ज्यादा लाचार। सो सरकार ने तय कर लिया- 'क्वात्रोची के खिलाफ मुकदमे हटा लिए जाएं।' मंगलवार को कोर्ट में बता दिया। तीन अक्टूबर को मुकदमे हटा लेंगे। यह होना ही था। दलाली का आरोप विपक्ष का नहीं था। भारतीय मीडिया का भी नहीं।

एनपीटी-सीटीबीटी पर दस्तखत का दबाव

अमेरिका ने भारत को एनपीटी-सीटीबीटी करारों के दायरे में लाने के लिए चौतरफे दबाव शुरू कर दिए हैं। मनमोहन सरकार समझती थी कि एनएसजी और आईएईए से छूट मिलने के बाद अब भारत को इन दोनों प्रस्तावों पर दस्तखत की जरूरत नहीं पड़ेगी।

यह सवाल तो तब से उठ रहा है जबसे मनमोहन सरकार अमेरिका के करीब हुई है। लेकिन अब यह सवाल ज्यादा गंभीरता से पूछा जा रहा है- क्या भारत सीटीबीटी पर दस्तखत कर देगा? नरसिंह राव ने सीटीबीटी पर भी वही रुख अपनाया था, जो इंदिरा गांधी ने एनपीटी के समय अपनाया था। नरसिंह राव के बाद सभी प्रधानमंत्रियों ने भी अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों की ओर से तय की गई विदेश नीति अपनाई। इसलिए कोई अंतरराष्ट्रीय दबाव में नहीं झुका।

तो नेता पुत्रों ने बाजी मार ली दस जनपथ पर

तो वही हुआ। जिसका सभी को अंदेशा था। सोनिया गांधी नेता पुत्रों के आगे झुक गई। वाईएसआर के बेटे जगनमोहन पर कड़ा रुख अपनाया। तो अपन को लगता था- एसेंबली चुनावों में भी नेता पुत्रों की शामत आएगी।  सोनिया के करीबी बता रहे थे- आंध्र से सबक लिया है आलाकमान ने। अब नेता पुत्रों को टिकट देने से पहले दस बार सोचेंगे। दस जनपथ से छन-छनकर खबरें छपती रही- 'हरियाणा-महाराष्ट्र में नेता पुत्रों को टिकट नहीं दिया जाएगा।' हरियाणा में तो सोनिया की घुड़की काफी हद तक काम की। पर महाराष्ट्र में नेताओं की घुड़की ज्यादा काम कर गई।

एटमी पनडुब्बी तैयार अग्नि-5 की भी तैयारी

माना अपनी सैन्य तैयारियां पूरी नहीं। अपने सैनिकों की हिम्मत में कोई कमी नहीं। पर अपने सैनिक घुड़सवार तो नहीं। जो तलवार भांजते हुए दुश्मनों की छाती पर चढ़ दौड़ेंगे। इक्कसवीं सदी की जंग जहां आधुनिक हथियार मांगेगी। वहां अब कूटनीतिक जंग भी अहम हो चुकी। पहले बात हथियारों की। अपन एयर फोर्स और नेवी प्रमुखों से सहमत। हथियारों की तैयारियां चीन के बराबर नहीं। अपने हथियार सत्तर और अस्सी दशक के। पुराने हथियारों को बदलने की सख्त जरूरत। जरा गौर करिए। चीनी बार्डर पर तैनात हथियार 1974 की खरीद। हथियारों की मारक क्षमता सिर्फ पांच हजार फुट। जमीन से जमीन मारक क्षमता वाले हथियारों की बात करें। अपन ने पहली खरीद अस्सी के दशक में की। दूसरी नब्बे के दशक में। अग्रिम मार वाली तोपों की बात। तो अपन ने आखिरी खरीददारी 1995 में की। पहले बोफोर्स तोप घोटाले ने खरीददारी पर ब्रेक लगाई। फिर कारगिल के दौरान हुई छोटी-मोटी खरीद ने। दलाली की आरोपबाजी से नुकसान हुआ सैन्य तैयारी का। कई बार तोपों की खरीददारी करने का मामला उठा। पर बात कभी आखिर तक नहीं पहुंची। एक बार अपना इरादा होवित्जर तोपें खरीदने का था। होवित्जर विमान से कहीं भी उतारी जा सकती हैं। पर मंसूबे ही बनते रह गए।  डिफेंस मिनिस्टर डरते ही रह गए। दूसरी तरफ बात चीन की। हथियारों की बात तो छोड़ दीजिए। बार्डर तक इंफ्रास्ट्रक्चर भी मजबूत। लद्दाख सेक्टर में कराकोरम के पार की बात। चीन की कंस्ट्रक्शन गतिविधियां चौंकाने वाली। अपनी सारी गतिविधियों पर नजर रखने में सक्षम हो चुका चीन। इसी महीने पीएलए की हरकतों ने अपन को चौंकाया। ऐसा नहीं कि अपन फिक्रमंद नहीं। फिक्रमंद न होते। तो अपने वायु और नौसेनाध्यक्ष ऐसे नहीं बोलते। फिक्रमंद न होते। तो एमके नारायणन टॉप लेवल की मीटिंग क्यों बुलाते। यह अलग बात। जो मीटिग की खबर लीक हुई। तो सत्रह सितंबर की मीटिंग टल गई। पर मीटिंग टल जाए। तो यह न मानिए- अपन फिक्रमंद नहीं। अपनी तैयारियां अब दो तरफा होंगी। जिसका जिक्र अपन ने शुरू में किया। हथियारों की खरीद से भी। कूटनीतिक मोर्चेबंदी से भी। पहले बात वाजपेयी के जमाने की। वाजपेयी के वक्त एक थ्योरी चली थी- 'भारत-चीन-रूस गठबंधन की।' इस गठबंधन के लिए दो मीटिंगें भी हुई। पर मनमोहन सरकार बनते ही रणनीति बदल गई। अब अपन अमेरिका के ज्यादा करीब। सो चीन अपन से बेहद खफा। इसकी झलक अरुणाचल और लद्दाख बार्डर पर दिखी। सो अब बात अपनी दोतरफा तैयारी की। तो मनमोहन सरकार भले ही लापरवाह दिखे। पर ऐसा है नहीं। पहले बात नेवी की। अपन को विदेशी मामलों के अंदरूनी जानकार ने बताया- 'यों तो अपनी एटमी पनडुब्बी अरिहंत की तैयारी भी जोरों पर। पर रूसी एटमी पनडुब्बी भारत आने को तैयार।' अपन ने दस साल की लीज पर ली है पनडुब्बी। अपन ने लीज के 650 मिलियन डालर अदा किए। बुधवार को रूस ने ऐलान किया-'पनडुब्बी के ट्रायल का तीसरा चरण पूरा हो चुका। मार्च-अप्रेल तक भारत के सुपुर्द कर दी जाएगी।' बात अग्नि-5 मिसाइल की। तो उसकी तैयारियां भी पूरी। आप पूछोगे- अग्नि-4 कब तैयार हुई। तो बता दें- अग्नि-4 नहीं होगी। वह अग्नि-3 की ही एडवांस स्टेज। याद है अपन ने 2006 से 2008 तक अग्नि-3 के तीन टेस्ट किए। तो अब छह हजार किलोमीटर मारक क्षमता वाली अग्नि-5 की तैयारी। अग्नि-5 आते ही अपना पलड़ा भारी होगा। बात इंफ्रास्ट्रक्चर की। तो अपन लद्दाख से अरुणाचल तक पांच एयरफोर्स लेंडिंग ग्राउंड तैयार कर चुके। पर बात सिर्फ सैन्य तैयारी की नहीं। बात कूटनीतिक जंग की भी। सो चीन भी यों ही सफाई देता नहीं घूम रहा। पता है चीन को भी- अमेरिका-जापान-रूस इस वक्त भारत के साथ। अपन कूटनीतिज्ञों की मानें। तो अग्नि-5 पर इस बार चिल्ल-पौं नहीं करेगा अमेरिका। अमेरिका भी तो चाहता है चीन के मुकाबले खड़ा हो भारत।

माना अपनी सैन्य तैयारियां पूरी नहीं। अपने सैनिकों की हिम्मत में कोई कमी नहीं। पर अपने सैनिक घुड़सवार तो नहीं। जो तलवार भांजते हुए दुश्मनों की छाती पर चढ़ दौड़ेंगे। इक्कसवीं सदी की जंग जहां आधुनिक हथियार मांगेगी। वहां अब कूटनीतिक जंग भी अहम हो चुकी। पहले बात हथियारों की। अपन एयर फोर्स और नेवी प्रमुखों से सहमत। हथियारों की तैयारियां चीन के बराबर नहीं। अपने हथियार सत्तर और अस्सी दशक के। पुराने हथियारों को बदलने की सख्त जरूरत। जरा गौर करिए। चीनी बार्डर पर तैनात हथियार 1974 की खरीद। हथियारों की मारक क्षमता सिर्फ पांच हजार फुट। जमीन से जमीन मारक क्षमता वाले हथियारों की बात करें। अपन ने पहली खरीद अस्सी के दशक में की। दूसरी नब्बे के दशक में। अग्रिम मार वाली तोपों की बात। तो अपन ने आखिरी खरीददारी 1995 में की। पहले बोफोर्स तोप घोटाले ने खरीददारी पर ब्रेक लगाई।

परिवारवाद का जलवा कहीं पूरा, तो कहीं अधूरा

'टिवटर' के बाद आज 'फेस बुक' की बात। रेखा का भांजा है नवीद अजमन। अपन फिल्मी हिरोइन रेखा की बात कर रहे। मौसी टॉप हिरोइन हो। तो भांजे को उम्मीद होगी ही। जब नेताओं के बेटों-बेटियों को टिकट की उम्मीद। तो नवीद अजमन की उम्मीद फिल्म में रोल था। जब आमिर खान ने अपने भांजे इमरान को फिल्म दिला दी। तो नवीद अजमन की उम्मीद भी जायज। आखिर वह तो आमिर से बड़ी स्टार का भांजा। सो केलिफोर्निया से बड़ी हसरतें पालकर मुंबई पहुंचा था। सालभर मुंबई की खाक छानता रहा। पर रेखा ने धेले की मदद नहीं की। बड़े रुआंसे होकर केलिफोर्निया लौट गए। जाने से पहले अपनी फेसबुक पर लिखा- 'मुंबई का भूत उतर चुका। यहां परिवार की बैक न हो। तो किसी को हुनर दिखाने का मौका नहीं मिलता। सो मैं वापस लौट रहा हूं। कहीं ड्राइवर लग जाऊंगा। या किसी फाइनेंस फर्म में काम कर लूंगा।' पर आपने कभी ऐसा सुना- किसी नेता ने बेटे को छोड़ किसी और के लिए टिकट मांगा। सोचो, नवीद अजमन किसी नेता का भांजा होता। तो महाराष्ट्र या हरियाणा से टिकट ही ले मरता। सोनिया ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील के बेटे राजेंद्र शेखावत को टिकट दे ही दिया। अमरावती से चुनाव लड़ेंगे शेखावत। यहीं से 1995 में देवी सिंह शेखावत चुनाव लड़े थे। तो प्रतिभा ताई पाटील सांसद थीं। पर पति देवी सिंह शेखावत सिर्फ चुनाव नहीं हारे। बीजेपी उम्मीदवार से जमानत जब्त हुई। सो उसके बाद कभी टिकट मांगने की हिम्मत नहीं हुई। जगदीश गुप्ता ने हराया था देवीसिंह शेखावत को। पर उसी जगदीश गुप्ता को अगली बार डा. सुनील देशमुख ने हराया। एक नहीं अलबत्ता दो बार हरा चुके। अभी अशोक चव्हाण की केबिनेट में मंत्री भी। पर सोनिया ने राष्ट्रपति के बेटे को टिकट दिया। तो डा. सुनील क्या करें। पहले बगल की त्योसा या अचलपुर की पेशकश हुई। पर यह तो कोई बात न हुई। राजेंद्र शेखावत को ही मुंह मांगी सीट क्यों? सो डा. सुनील अमरावती लौट चुके। अपन को बगावत की पूरी उम्मीद। ऐसा नहीं, जो राष्ट्रपति का बेटा पहली बार चुनाव लड़ रहा हो। वीवी गिरी जब राष्ट्रपति थे। तो उनका बेटा वी शंकर गिरी चुनाव लड़ा था। पर वह जीत गया था। सोचो, राष्ट्रपति का बेटा हारा। तो कांग्रेस की कितनी भद्द पिटेगी। सोनिया ने मौजूदा एमएलए की टिकट काट दी। पर विलासराव के बेटे अमित को लटका दिया। सुशील कुमार शिंदे की बेटी प्रणीति को लटका दिया। शिवराज पाटिल की पुत्रवधु अर्चना को लटका दिया। पर बेटे-बेटियों को टिकट सिर्फ कांग्रेस से ही नहीं। वंशवादी राजनीति में अब बीजेपी भी पीछे नहीं। प्रमोद महाजन की बेटी पूनम को टिकट मिल ही चुका। अपन बता दें- पूनम महाजन के फूफा हैं गोपीनाथ मुंडे। सो फूफा-भतीजी दोनों चुनाव लड़ेंगे। यहीं पर बस होता। तो गनीमत थी। मुंडे की बेटी और दामाद भी टिकट पा गए। भतीजा धनंजय मुंडे का नाम अगली लिस्ट में हो। तो आप हैरान न होना। एक परिवार से पांच एमएलए हुए। तो रिकार्ड टूटेगा। विजय राजे सिंधिया, माधवराव सिंधिया और वसुंधरा एक ही वक्त सांसद थे। यों अब इसी परिवार के दो सांसद बुआ यशोधरा, भतीजा ज्योतिरादित्य। दूसरी बुआ वसुंधरा राजस्थान की एमएलए। चलते-चलते बात हरियाणा की। भजन लाल का बेटा चंद्रमोहन। वही फिजा वाला चांद मोहम्मद। अच्छा भला डिप्टी सीएम था। पर इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया। अब टिकट भी नहीं मिला। न खुद को, न पुरानी बीवी को। जिसके लिए घूम रहे थे दर-दर।

'टिवटर' के बाद आज 'फेस बुक' की बात। रेखा का भांजा है नवीद अजमन। अपन फिल्मी हिरोइन रेखा की बात कर रहे। मौसी टॉप हिरोइन हो। तो भांजे को उम्मीद होगी ही। जब नेताओं के बेटों-बेटियों को टिकट की उम्मीद। तो नवीद अजमन की उम्मीद फिल्म में रोल था। जब आमिर खान ने अपने भांजे इमरान को फिल्म दिला दी। तो नवीद अजमन की उम्मीद भी जायज। आखिर वह तो आमिर से बड़ी स्टार का भांजा। सो केलिफोर्निया से बड़ी हसरतें पालकर मुंबई पहुंचा था। सालभर मुंबई की खाक छानता रहा। पर रेखा ने धेले की मदद नहीं की। बड़े रुआंसे होकर केलिफोर्निया लौट गए।

तो क्या पाक से पर्दे के पीछे बात का इरादा

हाफिज मोहम्मद सईद की नजरबंदी हो गई। सोमवार अपने यहां इस खबर की खूब चर्चा रही। पर पाकिस्तान में उतनी चर्चा नहीं दिखी। पाकिस्तानी अखबारों की वेबसाइट में जिक्र तक नहीं हुआ। आखिर लाहौर के पुलिस सुप्रीटेंडेंट सोहेल सुखेरा ने खंडन किया। वह बोले- 'हमने सिर्फ ईद की नमाज करने जाने से रोका। वह भी सईद की सुरक्षा के कारण। नजरबंदी का हमें कोई हुक्म नहीं।' पर अपने यहां चिदम्बरम भी चैनलों की खबर से प्रभावित हुए। अपने चैनलों ने भी खबर पाकिस्तानी चैनलों से उठाई। दोनों देशों के चैनलों में कोई खास फर्क नहीं। यों कृष्णा-कुरैशी की मुलाकात से पहले गिरफ्तारी हो भी जाए। तो ताज्जुब नहीं होगा। आखिर शर्म-अल-शेख में जब मनमोहन-गिलानी मुलाकात होनी थी। तो पाक ने कसाब के पाकिस्तानी होने का कबूलनामा भेज दिया था। अब भी कृष्णा-कुरैशी मुलाकात से पहले सात के चार्जशीट होने की चर्चा। अपनी बात मानो।

सीमाओं पर लापरवाही

नेहरू की तरह मनमोहन सिंह भी सीमाओं पर चीन की घुसपैठ को वक्त रहते गंभीरता से नहीं ले रहे। अलबत्ता मीडिया पर घुसपैठ को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगा रहे हैं। सीमाओं पर हमारी सतर्कता और तैयारी आपराधिक लापरवाही की सीमा तक चली गई है।

सितम्बर के शुरू में यह खबरें आनी शुरू हुई थी कि लद्दाख में चीनी सेना घुस आई है। पहले-पहल खबर सिर्फ वायु सीमा अतिक्रमण की थी, पर धीरे-धीरे छनकर खबर आई कि कुछ दिन पहले चीनी सेना ने मेकमाहोन रेखा भी पार की थी। यह घटना एक बार नहीं, बल्कि कई बार हुई थी लेकिन सरकार ने इसे देश की जनता से छुपाए रखा। एक बार चीनी सैनिकों ने हमारे क्षेत्र में घुसकर गडरियों को मारा-पीटा और वहां से चले जाने को कहा। उनका दावा था कि वह क्षेत्र चीन का है, भारत का नहीं। दूसरी बार वे अपने साथ लाल रंग और ब्रुश लाए थे, जिससे उन्होंने पत्थरों पर मेंडरिन भाषा में चीन लिखा।

तो बेबात का तूल लगा मनमोहन को

तीनों पड़ोसियों की शरारत भरी हरकतों पर सरकार की चुप्पी। शरारत सिर्फ चीन ने नहीं की। पाक और बांलादेश भी कम नहीं। अपन इन तीनों पर बात करेंगे। पर पहले बात कांग्रेस के 'सादगी मंत्र' की। 'सादगी मंत्र' का शिकार नए-नए खिलाड़ी शशि थरूर। पुराने कांग्रेसियों की आंख की किरकिरी तो थे ही थरूर। ऊपर से टिवटरबाजी। पुराने कांग्रेसियों को टिवटरबाजी समझ नहीं आती। पर थरूर से सीख अब मनमोहन भी टिवटर के शौकीन। वैसे टिवटर और फेसबुक अपनी राजनीति में फिट नहीं। सुधींद्र कुलकर्णी ने आडवाणी को सोशल नेटवर्किंग में खूब घुमाया। थरूर इससे ही सबक लेते। नेटवर्किंग में राजनीति का वही हश्र होना था। जो एनडीए का 2004 में 'इंडिया शाइनिंग' से हुआ।

राजनीति में फातिया पढ़ने वाले जरा सोचें

चार विधानसभाओं के चुनाव सिर पर। अपन महाराष्ट्र, हरियाणा, अरुणाचल के साथ झारखंड भी जोड़ लें। झारखंड के करीब आधी सीटें खाली हो चुकी। अब छह महीने भी नहीं बचे बाकी कार्यकाल में। पर कांग्रेस नौ महीने से सस्पेंड करके बैठी है। बैठी है, वक्त के इंतजार में। दिन अच्छे आएं, तो चुनाव कराएं। अपन को अभिषेक मनु सिंघवी की त्योहारों की दलील खोखली तो लगी। पर चंडूखाने की ज्यादा लगी। त्योहार महाराष्ट्र- हरियाणा- अरुणाचल में भी मनाए जाएंगे। तो झारखंड में चुनाव क्यों नहीं? बीजेपी ने बुधवार को इलेक्शन कमीशन में गुहार लगाई। तो गुरुवार को राष्ट्रपति भवन में जाकर। यों इलेक्शन कमीशन चाहे। तो आज चुनाव का ऐलान कर दे।

सादगी जरूरी, पर सुरक्षा उससे भी ज्यादा जरूरी

लो अब सादगी की पोल खुलने लगी। मंत्रियों ने केबिनेट में नाक-भौं सिकोड़ी ही थी। उनकी असलियत भी सामने आ गई। अपन ने तो दस सितंबर को ही लिखा था- 'यों कोठियों की रेनोवेशन- रख रखाव से फाइव स्टार सस्ते।' अब अपनी बात की पुष्टि नए खुलासे से हो गई। नया खुलासा मंत्रियों की कोठियों के रेनोवेशन का। उसमें भी खासकर बाथरूम। आनंद शर्मा कभी जननेता नहीं रहे। लोकसभा या विधानसभा चुनाव जीतते तो तब, जब लड़ते। पर सोनिया की कृपा से केबिनेट मंत्री बने। तो उद्योग भवन के दफ्तर का रेनोवेशन देखिए। चौदह लाख 78 हजार रुपया एक कमरे का खर्च हुआ। विलासराव पहली बार केंद्र में आए। महाराष्ट्र के दो बार सीएम रहे। सो खुला खाता रहा। विलासराव ने आनंद शर्मा से कुछ कम खर्च करवाया। चौदह लाख 54 हजार।