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September 2009

भ्रष्टाचार में सिर्फ बाबू धरे जाएंगे, कोई क्वात्रोची नहीं

संसद में घोटाला कबूल हो चुका। कबूल हो चुका- बोफोर्स तोपों की खरीद में दलाली हुई थी। पर कांग्रेस शुरू से पर्दा डाल रही थी। यही करना था एक दिन। यूपीए की पिछली सरकार ने क्वात्रोची की मदद की। क्वात्रोची के सील खाते खुलवाना शुरूआत थी। लेफ्ट की मदद से किया यह कांग्रेस ने। अब दूसरी बार सरकार बनी। तो बैसाखियां लेफ्ट से भी ज्यादा लाचार। सो सरकार ने तय कर लिया- 'क्वात्रोची के खिलाफ मुकदमे हटा लिए जाएं।' मंगलवार को कोर्ट में बता दिया। तीन अक्टूबर को मुकदमे हटा लेंगे। यह होना ही था। दलाली का आरोप विपक्ष का नहीं था। भारतीय मीडिया का भी नहीं।

एनपीटी-सीटीबीटी पर दस्तखत का दबाव

अमेरिका ने भारत को एनपीटी-सीटीबीटी करारों के दायरे में लाने के लिए चौतरफे दबाव शुरू कर दिए हैं। मनमोहन सरकार समझती थी कि एनएसजी और आईएईए से छूट मिलने के बाद अब भारत को इन दोनों प्रस्तावों पर दस्तखत की जरूरत नहीं पड़ेगी।

यह सवाल तो तब से उठ रहा है जबसे मनमोहन सरकार अमेरिका के करीब हुई है। लेकिन अब यह सवाल ज्यादा गंभीरता से पूछा जा रहा है- क्या भारत सीटीबीटी पर दस्तखत कर देगा? नरसिंह राव ने सीटीबीटी पर भी वही रुख अपनाया था, जो इंदिरा गांधी ने एनपीटी के समय अपनाया था। नरसिंह राव के बाद सभी प्रधानमंत्रियों ने भी अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों की ओर से तय की गई विदेश नीति अपनाई। इसलिए कोई अंतरराष्ट्रीय दबाव में नहीं झुका।

तो नेता पुत्रों ने बाजी मार ली दस जनपथ पर

तो वही हुआ। जिसका सभी को अंदेशा था। सोनिया गांधी नेता पुत्रों के आगे झुक गई। वाईएसआर के बेटे जगनमोहन पर कड़ा रुख अपनाया। तो अपन को लगता था- एसेंबली चुनावों में भी नेता पुत्रों की शामत आएगी।  सोनिया के करीबी बता रहे थे- आंध्र से सबक लिया है आलाकमान ने। अब नेता पुत्रों को टिकट देने से पहले दस बार सोचेंगे। दस जनपथ से छन-छनकर खबरें छपती रही- 'हरियाणा-महाराष्ट्र में नेता पुत्रों को टिकट नहीं दिया जाएगा।' हरियाणा में तो सोनिया की घुड़की काफी हद तक काम की। पर महाराष्ट्र में नेताओं की घुड़की ज्यादा काम कर गई।

एटमी पनडुब्बी तैयार अग्नि-5 की भी तैयारी

माना अपनी सैन्य तैयारियां पूरी नहीं। अपने सैनिकों की हिम्मत में कोई कमी नहीं। पर अपने सैनिक घुड़सवार तो नहीं। जो तलवार भांजते हुए दुश्मनों की छाती पर चढ़ दौड़ेंगे। इक्कसवीं सदी की जंग जहां आधुनिक हथियार मांगेगी। वहां अब कूटनीतिक जंग भी अहम हो चुकी। पहले बात हथियारों की। अपन एयर फोर्स और नेवी प्रमुखों से सहमत। हथियारों की तैयारियां चीन के बराबर नहीं। अपने हथियार सत्तर और अस्सी दशक के। पुराने हथियारों को बदलने की सख्त जरूरत। जरा गौर करिए। चीनी बार्डर पर तैनात हथियार 1974 की खरीद। हथियारों की मारक क्षमता सिर्फ पांच हजार फुट। जमीन से जमीन मारक क्षमता वाले हथियारों की बात करें। अपन ने पहली खरीद अस्सी के दशक में की। दूसरी नब्बे के दशक में। अग्रिम मार वाली तोपों की बात। तो अपन ने आखिरी खरीददारी 1995 में की। पहले बोफोर्स तोप घोटाले ने खरीददारी पर ब्रेक लगाई। फिर कारगिल के दौरान हुई छोटी-मोटी खरीद ने। दलाली की आरोपबाजी से नुकसान हुआ सैन्य तैयारी का। कई बार तोपों की खरीददारी करने का मामला उठा। पर बात कभी आखिर तक नहीं पहुंची। एक बार अपना इरादा होवित्जर तोपें खरीदने का था। होवित्जर विमान से कहीं भी उतारी जा सकती हैं। पर मंसूबे ही बनते रह गए।  डिफेंस मिनिस्टर डरते ही रह गए। दूसरी तरफ बात चीन की। हथियारों की बात तो छोड़ दीजिए। बार्डर तक इंफ्रास्ट्रक्चर भी मजबूत। लद्दाख सेक्टर में कराकोरम के पार की बात। चीन की कंस्ट्रक्शन गतिविधियां चौंकाने वाली। अपनी सारी गतिविधियों पर नजर रखने में सक्षम हो चुका चीन। इसी महीने पीएलए की हरकतों ने अपन को चौंकाया। ऐसा नहीं कि अपन फिक्रमंद नहीं। फिक्रमंद न होते। तो अपने वायु और नौसेनाध्यक्ष ऐसे नहीं बोलते। फिक्रमंद न होते। तो एमके नारायणन टॉप लेवल की मीटिंग क्यों बुलाते। यह अलग बात। जो मीटिग की खबर लीक हुई। तो सत्रह सितंबर की मीटिंग टल गई। पर मीटिंग टल जाए। तो यह न मानिए- अपन फिक्रमंद नहीं। अपनी तैयारियां अब दो तरफा होंगी। जिसका जिक्र अपन ने शुरू में किया। हथियारों की खरीद से भी। कूटनीतिक मोर्चेबंदी से भी। पहले बात वाजपेयी के जमाने की। वाजपेयी के वक्त एक थ्योरी चली थी- 'भारत-चीन-रूस गठबंधन की।' इस गठबंधन के लिए दो मीटिंगें भी हुई। पर मनमोहन सरकार बनते ही रणनीति बदल गई। अब अपन अमेरिका के ज्यादा करीब। सो चीन अपन से बेहद खफा। इसकी झलक अरुणाचल और लद्दाख बार्डर पर दिखी। सो अब बात अपनी दोतरफा तैयारी की। तो मनमोहन सरकार भले ही लापरवाह दिखे। पर ऐसा है नहीं। पहले बात नेवी की। अपन को विदेशी मामलों के अंदरूनी जानकार ने बताया- 'यों तो अपनी एटमी पनडुब्बी अरिहंत की तैयारी भी जोरों पर। पर रूसी एटमी पनडुब्बी भारत आने को तैयार।' अपन ने दस साल की लीज पर ली है पनडुब्बी। अपन ने लीज के 650 मिलियन डालर अदा किए। बुधवार को रूस ने ऐलान किया-'पनडुब्बी के ट्रायल का तीसरा चरण पूरा हो चुका। मार्च-अप्रेल तक भारत के सुपुर्द कर दी जाएगी।' बात अग्नि-5 मिसाइल की। तो उसकी तैयारियां भी पूरी। आप पूछोगे- अग्नि-4 कब तैयार हुई। तो बता दें- अग्नि-4 नहीं होगी। वह अग्नि-3 की ही एडवांस स्टेज। याद है अपन ने 2006 से 2008 तक अग्नि-3 के तीन टेस्ट किए। तो अब छह हजार किलोमीटर मारक क्षमता वाली अग्नि-5 की तैयारी। अग्नि-5 आते ही अपना पलड़ा भारी होगा। बात इंफ्रास्ट्रक्चर की। तो अपन लद्दाख से अरुणाचल तक पांच एयरफोर्स लेंडिंग ग्राउंड तैयार कर चुके। पर बात सिर्फ सैन्य तैयारी की नहीं। बात कूटनीतिक जंग की भी। सो चीन भी यों ही सफाई देता नहीं घूम रहा। पता है चीन को भी- अमेरिका-जापान-रूस इस वक्त भारत के साथ। अपन कूटनीतिज्ञों की मानें। तो अग्नि-5 पर इस बार चिल्ल-पौं नहीं करेगा अमेरिका। अमेरिका भी तो चाहता है चीन के मुकाबले खड़ा हो भारत।

माना अपनी सैन्य तैयारियां पूरी नहीं। अपने सैनिकों की हिम्मत में कोई कमी नहीं। पर अपने सैनिक घुड़सवार तो नहीं। जो तलवार भांजते हुए दुश्मनों की छाती पर चढ़ दौड़ेंगे। इक्कसवीं सदी की जंग जहां आधुनिक हथियार मांगेगी। वहां अब कूटनीतिक जंग भी अहम हो चुकी। पहले बात हथियारों की। अपन एयर फोर्स और नेवी प्रमुखों से सहमत। हथियारों की तैयारियां चीन के बराबर नहीं। अपने हथियार सत्तर और अस्सी दशक के। पुराने हथियारों को बदलने की सख्त जरूरत। जरा गौर करिए। चीनी बार्डर पर तैनात हथियार 1974 की खरीद। हथियारों की मारक क्षमता सिर्फ पांच हजार फुट। जमीन से जमीन मारक क्षमता वाले हथियारों की बात करें। अपन ने पहली खरीद अस्सी के दशक में की। दूसरी नब्बे के दशक में। अग्रिम मार वाली तोपों की बात। तो अपन ने आखिरी खरीददारी 1995 में की। पहले बोफोर्स तोप घोटाले ने खरीददारी पर ब्रेक लगाई।

परिवारवाद का जलवा कहीं पूरा, तो कहीं अधूरा

'टिवटर' के बाद आज 'फेस बुक' की बात। रेखा का भांजा है नवीद अजमन। अपन फिल्मी हिरोइन रेखा की बात कर रहे। मौसी टॉप हिरोइन हो। तो भांजे को उम्मीद होगी ही। जब नेताओं के बेटों-बेटियों को टिकट की उम्मीद। तो नवीद अजमन की उम्मीद फिल्म में रोल था। जब आमिर खान ने अपने भांजे इमरान को फिल्म दिला दी। तो नवीद अजमन की उम्मीद भी जायज। आखिर वह तो आमिर से बड़ी स्टार का भांजा। सो केलिफोर्निया से बड़ी हसरतें पालकर मुंबई पहुंचा था। सालभर मुंबई की खाक छानता रहा। पर रेखा ने धेले की मदद नहीं की। बड़े रुआंसे होकर केलिफोर्निया लौट गए। जाने से पहले अपनी फेसबुक पर लिखा- 'मुंबई का भूत उतर चुका। यहां परिवार की बैक न हो। तो किसी को हुनर दिखाने का मौका नहीं मिलता। सो मैं वापस लौट रहा हूं। कहीं ड्राइवर लग जाऊंगा। या किसी फाइनेंस फर्म में काम कर लूंगा।' पर आपने कभी ऐसा सुना- किसी नेता ने बेटे को छोड़ किसी और के लिए टिकट मांगा। सोचो, नवीद अजमन किसी नेता का भांजा होता। तो महाराष्ट्र या हरियाणा से टिकट ही ले मरता। सोनिया ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील के बेटे राजेंद्र शेखावत को टिकट दे ही दिया। अमरावती से चुनाव लड़ेंगे शेखावत। यहीं से 1995 में देवी सिंह शेखावत चुनाव लड़े थे। तो प्रतिभा ताई पाटील सांसद थीं। पर पति देवी सिंह शेखावत सिर्फ चुनाव नहीं हारे। बीजेपी उम्मीदवार से जमानत जब्त हुई। सो उसके बाद कभी टिकट मांगने की हिम्मत नहीं हुई। जगदीश गुप्ता ने हराया था देवीसिंह शेखावत को। पर उसी जगदीश गुप्ता को अगली बार डा. सुनील देशमुख ने हराया। एक नहीं अलबत्ता दो बार हरा चुके। अभी अशोक चव्हाण की केबिनेट में मंत्री भी। पर सोनिया ने राष्ट्रपति के बेटे को टिकट दिया। तो डा. सुनील क्या करें। पहले बगल की त्योसा या अचलपुर की पेशकश हुई। पर यह तो कोई बात न हुई। राजेंद्र शेखावत को ही मुंह मांगी सीट क्यों? सो डा. सुनील अमरावती लौट चुके। अपन को बगावत की पूरी उम्मीद। ऐसा नहीं, जो राष्ट्रपति का बेटा पहली बार चुनाव लड़ रहा हो। वीवी गिरी जब राष्ट्रपति थे। तो उनका बेटा वी शंकर गिरी चुनाव लड़ा था। पर वह जीत गया था। सोचो, राष्ट्रपति का बेटा हारा। तो कांग्रेस की कितनी भद्द पिटेगी। सोनिया ने मौजूदा एमएलए की टिकट काट दी। पर विलासराव के बेटे अमित को लटका दिया। सुशील कुमार शिंदे की बेटी प्रणीति को लटका दिया। शिवराज पाटिल की पुत्रवधु अर्चना को लटका दिया। पर बेटे-बेटियों को टिकट सिर्फ कांग्रेस से ही नहीं। वंशवादी राजनीति में अब बीजेपी भी पीछे नहीं। प्रमोद महाजन की बेटी पूनम को टिकट मिल ही चुका। अपन बता दें- पूनम महाजन के फूफा हैं गोपीनाथ मुंडे। सो फूफा-भतीजी दोनों चुनाव लड़ेंगे। यहीं पर बस होता। तो गनीमत थी। मुंडे की बेटी और दामाद भी टिकट पा गए। भतीजा धनंजय मुंडे का नाम अगली लिस्ट में हो। तो आप हैरान न होना। एक परिवार से पांच एमएलए हुए। तो रिकार्ड टूटेगा। विजय राजे सिंधिया, माधवराव सिंधिया और वसुंधरा एक ही वक्त सांसद थे। यों अब इसी परिवार के दो सांसद बुआ यशोधरा, भतीजा ज्योतिरादित्य। दूसरी बुआ वसुंधरा राजस्थान की एमएलए। चलते-चलते बात हरियाणा की। भजन लाल का बेटा चंद्रमोहन। वही फिजा वाला चांद मोहम्मद। अच्छा भला डिप्टी सीएम था। पर इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया। अब टिकट भी नहीं मिला। न खुद को, न पुरानी बीवी को। जिसके लिए घूम रहे थे दर-दर।

'टिवटर' के बाद आज 'फेस बुक' की बात। रेखा का भांजा है नवीद अजमन। अपन फिल्मी हिरोइन रेखा की बात कर रहे। मौसी टॉप हिरोइन हो। तो भांजे को उम्मीद होगी ही। जब नेताओं के बेटों-बेटियों को टिकट की उम्मीद। तो नवीद अजमन की उम्मीद फिल्म में रोल था। जब आमिर खान ने अपने भांजे इमरान को फिल्म दिला दी। तो नवीद अजमन की उम्मीद भी जायज। आखिर वह तो आमिर से बड़ी स्टार का भांजा। सो केलिफोर्निया से बड़ी हसरतें पालकर मुंबई पहुंचा था। सालभर मुंबई की खाक छानता रहा। पर रेखा ने धेले की मदद नहीं की। बड़े रुआंसे होकर केलिफोर्निया लौट गए।

तो क्या पाक से पर्दे के पीछे बात का इरादा

हाफिज मोहम्मद सईद की नजरबंदी हो गई। सोमवार अपने यहां इस खबर की खूब चर्चा रही। पर पाकिस्तान में उतनी चर्चा नहीं दिखी। पाकिस्तानी अखबारों की वेबसाइट में जिक्र तक नहीं हुआ। आखिर लाहौर के पुलिस सुप्रीटेंडेंट सोहेल सुखेरा ने खंडन किया। वह बोले- 'हमने सिर्फ ईद की नमाज करने जाने से रोका। वह भी सईद की सुरक्षा के कारण। नजरबंदी का हमें कोई हुक्म नहीं।' पर अपने यहां चिदम्बरम भी चैनलों की खबर से प्रभावित हुए। अपने चैनलों ने भी खबर पाकिस्तानी चैनलों से उठाई। दोनों देशों के चैनलों में कोई खास फर्क नहीं। यों कृष्णा-कुरैशी की मुलाकात से पहले गिरफ्तारी हो भी जाए। तो ताज्जुब नहीं होगा। आखिर शर्म-अल-शेख में जब मनमोहन-गिलानी मुलाकात होनी थी। तो पाक ने कसाब के पाकिस्तानी होने का कबूलनामा भेज दिया था। अब भी कृष्णा-कुरैशी मुलाकात से पहले सात के चार्जशीट होने की चर्चा। अपनी बात मानो।

सीमाओं पर लापरवाही

नेहरू की तरह मनमोहन सिंह भी सीमाओं पर चीन की घुसपैठ को वक्त रहते गंभीरता से नहीं ले रहे। अलबत्ता मीडिया पर घुसपैठ को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगा रहे हैं। सीमाओं पर हमारी सतर्कता और तैयारी आपराधिक लापरवाही की सीमा तक चली गई है।

सितम्बर के शुरू में यह खबरें आनी शुरू हुई थी कि लद्दाख में चीनी सेना घुस आई है। पहले-पहल खबर सिर्फ वायु सीमा अतिक्रमण की थी, पर धीरे-धीरे छनकर खबर आई कि कुछ दिन पहले चीनी सेना ने मेकमाहोन रेखा भी पार की थी। यह घटना एक बार नहीं, बल्कि कई बार हुई थी लेकिन सरकार ने इसे देश की जनता से छुपाए रखा। एक बार चीनी सैनिकों ने हमारे क्षेत्र में घुसकर गडरियों को मारा-पीटा और वहां से चले जाने को कहा। उनका दावा था कि वह क्षेत्र चीन का है, भारत का नहीं। दूसरी बार वे अपने साथ लाल रंग और ब्रुश लाए थे, जिससे उन्होंने पत्थरों पर मेंडरिन भाषा में चीन लिखा।

तो बेबात का तूल लगा मनमोहन को

तीनों पड़ोसियों की शरारत भरी हरकतों पर सरकार की चुप्पी। शरारत सिर्फ चीन ने नहीं की। पाक और बांलादेश भी कम नहीं। अपन इन तीनों पर बात करेंगे। पर पहले बात कांग्रेस के 'सादगी मंत्र' की। 'सादगी मंत्र' का शिकार नए-नए खिलाड़ी शशि थरूर। पुराने कांग्रेसियों की आंख की किरकिरी तो थे ही थरूर। ऊपर से टिवटरबाजी। पुराने कांग्रेसियों को टिवटरबाजी समझ नहीं आती। पर थरूर से सीख अब मनमोहन भी टिवटर के शौकीन। वैसे टिवटर और फेसबुक अपनी राजनीति में फिट नहीं। सुधींद्र कुलकर्णी ने आडवाणी को सोशल नेटवर्किंग में खूब घुमाया। थरूर इससे ही सबक लेते। नेटवर्किंग में राजनीति का वही हश्र होना था। जो एनडीए का 2004 में 'इंडिया शाइनिंग' से हुआ।

राजनीति में फातिया पढ़ने वाले जरा सोचें

चार विधानसभाओं के चुनाव सिर पर। अपन महाराष्ट्र, हरियाणा, अरुणाचल के साथ झारखंड भी जोड़ लें। झारखंड के करीब आधी सीटें खाली हो चुकी। अब छह महीने भी नहीं बचे बाकी कार्यकाल में। पर कांग्रेस नौ महीने से सस्पेंड करके बैठी है। बैठी है, वक्त के इंतजार में। दिन अच्छे आएं, तो चुनाव कराएं। अपन को अभिषेक मनु सिंघवी की त्योहारों की दलील खोखली तो लगी। पर चंडूखाने की ज्यादा लगी। त्योहार महाराष्ट्र- हरियाणा- अरुणाचल में भी मनाए जाएंगे। तो झारखंड में चुनाव क्यों नहीं? बीजेपी ने बुधवार को इलेक्शन कमीशन में गुहार लगाई। तो गुरुवार को राष्ट्रपति भवन में जाकर। यों इलेक्शन कमीशन चाहे। तो आज चुनाव का ऐलान कर दे।

सादगी जरूरी, पर सुरक्षा उससे भी ज्यादा जरूरी

लो अब सादगी की पोल खुलने लगी। मंत्रियों ने केबिनेट में नाक-भौं सिकोड़ी ही थी। उनकी असलियत भी सामने आ गई। अपन ने तो दस सितंबर को ही लिखा था- 'यों कोठियों की रेनोवेशन- रख रखाव से फाइव स्टार सस्ते।' अब अपनी बात की पुष्टि नए खुलासे से हो गई। नया खुलासा मंत्रियों की कोठियों के रेनोवेशन का। उसमें भी खासकर बाथरूम। आनंद शर्मा कभी जननेता नहीं रहे। लोकसभा या विधानसभा चुनाव जीतते तो तब, जब लड़ते। पर सोनिया की कृपा से केबिनेट मंत्री बने। तो उद्योग भवन के दफ्तर का रेनोवेशन देखिए। चौदह लाख 78 हजार रुपया एक कमरे का खर्च हुआ। विलासराव पहली बार केंद्र में आए। महाराष्ट्र के दो बार सीएम रहे। सो खुला खाता रहा। विलासराव ने आनंद शर्मा से कुछ कम खर्च करवाया। चौदह लाख 54 हजार।

करुणानिधि के बाद ममता ने दिखाई आंख

एनसीपी-कांग्रेस का गठबंधन कैसा होगा। होकर भी कैसा निभेगा। पवार की दस सीटें घटेंगी। तो पीठ में छुरा वह भी घोपेंगे। विलासराव-पवार का टकराव इस हद तक तो पहुंच ही चुका। सो अपन इंतजार करेंगे चुनावी भीतरघात का। फिलहाल बात करुणानिधि और ममता की। करुणानिधि भड़केंगे। यह अंदाज तो अपन को पहले से था। राहुल गांधी जब चेन्नई में थे। तो अपन ने 11 सितंबर को लिखा था- 'बात तमिलनाडु में राहुल के राजनीतिक कंकड़ फेंककर आने की। वह तीन दिन तमिलनाडु में रहे। पर करुणानिधि से मुलाकात नहीं की।' ऊपर से राहुल नदियां जोड़ने की मुखालफत कर आए। भले ही यूपीए ने वाजपेयी के इस एजेंडे को छोड़ दिया। पर रिकार्ड में नहीं छोड़ा।

चोंचलेबाजी छोड़ सीमाओं की फिक्र करे सरकार

सोनिया का 'सादगी मंत्र' काबिल-ए-तारीफ। पर मीडिया जरूरत से कुछ ज्यादा लट्टू। अपन कारगिल की जंग का वक्त याद कराएं। तब वाजपेयी ने चुपके से सादगी मंत्र लागू किया। कोई शोर शराबा नहीं। कोई चोंचलेबाजी नहीं। वाजपेयी ने विदेश यात्राओं पर मंत्रियों का डेली एलाउंस भी घटा दिया था। पहले सौ डालर रोज था। घटाकर पचहत्तर डालर कर दिया। किसी मंत्री ने चूं तक नहीं की। अब तो पवार, फारुक, कमल, आनंद, मारन कितने मंत्री भड़के। तारीफ के काबिल हैं प्रणव मुखर्जी। जिनने सरकारी विमान छोड़ दिया। एसएम कृष्णा ने तो खुन्नस में छोड़ा। पर अपन को सरकारी विमान का बेजा इस्तेमाल नहीं भूलता। सोनिया सोमवार को इकनामी क्लास में मुंबई गई। तो अपन लोग बावले हो गए।

जयराम रमेश की गुस्ताखी

केन्द्रीय पर्यावरण एवम् वन राज्य मन्त्री (स्वतन्त्र प्रभार) जयराम रमेश ने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना को करोड़ों हिन्दुओं के आराध्य देव भगवान शंकर के समान बताकर एक और अनावश्यक विवाद तो खड़ा किया ही है, हजारों साल पुरानी भारतीय संस्कृति के अपमान का अक्षम्य अपराध भी किया है। श्री रमेश ने शनिवार को अपनी भोपाल यात्रा के दौरान महात्मा गान्धी की तुलना ब्रह्मा और नेहरूजी की तुलना भगवान विष्णु से कर डाली।

शिंदे बने 'इकनामी क्लास' के पहले केबिनेट मंत्री

सुशील शिंदे से अपनी मुलाकात सत्रह साल पुरानी। जब वह कांग्रेस महासचिव हुआ करते थे। मध्यप्रदेश के प्रभारी थे शिंदे। उन दिनों कांग्रेस की ढपली आधी रात को बजती थी। नरसिंह राव दिनभर सरकारी काम निपटाते। रात को पार्टी की बारी आती। वह सात रेसकोर्स  से लौटते। तो खबर की पुड़िया मिलती। कभी-कभी तो आधी रात को चाय पिलाकर लौटा देते। शिंदे जब आंध्र के गवर्नर थे। तो अपन कांग्रेस अधिवेशन के समय राजभवन में मिले। कांग्रेस के हैदराबाद अधिवेशन में ही चमके थे राहुल। जब वह मंच पर नहीं बैठे। डेलीगेटों के साथ नीचे बैठे। राहुल तब जमीन से जुड़े। तो जुड़ते ही चले गए। अपन राहुल-शिंदे की बात बाद में करेंगे। पहले हैदराबाद की बात।

पवार को नहीं मंजूर सोनिया का सादगी मंत्र

पहले बात तमिल नेता मणिशंकर अय्यर की। कनाट प्लेस को राहुल चौक बनाने वाले। पर वीर सावरकर के कट्टर विरोधी। महाराष्ट्र के चुनाव न होते। तो छत्रपति शिवाजी का भी विरोध करते। यूपी में मायावती मूर्तिबाजी में मशगूल। तो महाराष्ट्र में कांग्रेस का एजेंडा शिवसेना में सेंध। इसीलिए तो चुनावों के वक्त शिवाजी का स्मारक बना। जैसे कांग्रेस का चुनावी हथियार गांधी। वैसे ही शिवसेना का चुनावी हथियार छत्रपति शिवाजी। मायावती का विरोधी कर रहे मणिशंकर फंस गए। मेघनाद देसाई ने सरकारी धन के दुरुपयोग की बात की। तो वह बात यूपी से लेकर महाराष्ट्र तक थी। बुरे फंसे मणिशंकर को कुछ नहीं सूझा। तो लंदन में चर्चिल की मूर्ति पर आ गए। मेघनाद ठहरे ब्रिटिश। सो वह अपनी भाषा पर आ गए।

जगनमोहन के दूत ने छुटा दिए हाईकमान के पसीने

तो कांग्रेस की ओवरहालिंग कब होगी। एसेंबली चुनावों से पहले या बाद में। राजशेखर रेड्डी की मौत न होती। तो अब तक हो गई होती ओवरहालिंग। यों अपना अनुभव बताएं। तो कई बार टलकर कई महीने लटक जाती है ओवरहालिंग। चुनावों से पहले हुई। तो बीके हरिप्रसाद को हरियाणा मिलने की उम्मीद। वह चुनावों में पृथ्वीराज चव्हाण के साथ जुड़ चुके। यों तो पृथ्वीराज जुगाड़ू। पर कर्नाटक की नैय्या पार नहीं लगा पाए थे। बुधवार को हरियाणा के आबर्जवरों की मीटिंग हुई। तो पृथ्वीराज, हरिप्रसाद, हनुमंत के साथ विप्लव ठाकुर भी दिखी। बात हरियाणा की चली। तो अपने मूलचंद मीणा बोले- 'अब कांग्रेस को कोई खतरा नहीं। भजन-माया का गठजोड़ रहता। तो हुड्डा को मुश्किल होती।'

इशरत जहां को केंद्र ने भी तो कोर्ट में आतंकी कहा

इशरत जहां की मुठभेड़ भी फर्जी। मजिस्ट्रेट एसपी तामांग की इस रपट ने हंगामा बरपा दिया। तो अपन को नरसिंह राव का जुमला याद आया। वह कहा करते थे-'कानून अपना काम करेगा।' यह तो ठीक। पर यह भी कहा करते थे- 'जब तक सुप्रीम अदालत का फैसला न हो। तब तक किसी को दोषी नहीं कहा जा सकता।' चुनाव आयोग तो चाहता था- हर चार्जशीटेड नेता चुनाव लड़ने से महरूम किया जाए। पर कोई नहीं माना। इसीलिए तो मुकदमे झेल रहे दर्जनों नेता सांसद-विधायक। मनमोहन सिंह तो चार कदम आगे निकले। जब उनने पिछली सरकार में पांच चार्जशीटेड मंत्री बना डाले। यों उन दागियों से इस बार किनारा किया। सो मनमोहन पांच साल बाद तारीफ के हकदार। भले तब दागियों का बचाव करते रहे। पर अंदर से ग्लानी तो रही होगी।

अब झारखंड का नैतिक दबाव होगा कांग्रेस पर

तो चुनावी बुखार चढ़ने लगा। भले ही शरद पवार पूरी तैयारी कर रहे हों। पर गठबंधन टूटना नहीं। जनार्दन द्विवेदी बता रहे थे- 'बात जारी, गठबंधन होगा।' पवार की अकेले तैयारी का कारण भी बताते जाएं। उनके कान में किसी ने डाल दिया- 'कांग्रेस बात में उलझाकर रखेगी। आखिर में गठबंधन नहीं करेगी।' सो उनकी तैयारी दोनों तरह की। पवार का आंख-कान खोलकर चलना जायज। पर कांग्रेस दिग्गी-सत्यव्रत के कहने पर फैसला नहीं करेगी। अपन को कांग्रेस का एक जनरल सेक्रेट्री बता रहा था- 'महाराष्ट्र कोई यूपी-बिहार नहीं। जो अकेले लड़ लें। यूपी-बिहार में खोने को क्या था। महाराष्ट्र में तो खोने को सत्ता है। यों भी कांग्रेस-एनसीपी और शिवसेना-बीजेपी में टक्कर मुकाबले की। वोट बैंक में कोई ज्यादा फर्क नहीं दोनों गठबंधनों में।'

भावनाएं, विरासत और लोकतंत्र

आंध्र प्रदेश के कांग्रेसी विधायकों की ओर से राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन मोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग भावनात्मक तो है ही। कांग्रेस की राजनीतिक विरासत वाली वंशानुगत लोकतंत्र की परंपरा भी है।

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की हेलीकाप्टर दुर्घटना में हुई मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। दुर्घटना से जुड़े तकनीकी सवाल तो अपनी जगह हैं, लेकिन राजनीतिक सवाल ज्यादा गंभीर हैं। कांग्रेस के 156 में से 148 विधायकों ने राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन मोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग करके लोकतांत्रिक ढांचे की नई परिभाषा गढ़ दी है।

मुख्यमंत्री पद की दौड़ से स्तब्ध हुई सोनिया

लालकृष्ण आडवाणी भी श्रध्दांजलि देकर लौटे। तो जन सैलाब से अभिभूत थे। आखिर राजशेखर रेड्डी ने आंध्र में करिश्मा न किया होता। तो 2004 में एनडीए सरकार जाती ही नहीं। देर-सबेर आडवाणी पीएम हो जाते। सोनिया गांधी के बहुत करीब थे राजशेखर रेड्डी। पर अपन ने सालों पहले कहीं पढ़ा था- 'मरने वालों के साथ कोई मर नहीं जाता।' जीवन की यह सच्चाई सब जगह लागू नहीं होती। एमजीआर की मौत हुई। तो तमिलनाडु में दर्जनों ने आत्महत्या की। कन्नड़ हीरो राजकुमार का अपहरण हुआ। तो कर्नाटक में कई दीवाने जल मरे। अब ऐसी ही खबरें राजशेखर रेड्डी के दीवानों की। अपन राजशेखर रेड्डी के पुराने इतिहास पर नहीं जाते। इतिहास में सफेद हो तो काला भी होगा। पर आज बात सिर्फ सफेद की। राजशेखर के पास पहुंचकर कोई कभी खाली हाथ नहीं लौटा। अगर कोई कालेज में एडमिशन के लिए भी गया। तो सिर्फ सिफारिश हल नहीं होता था।

गुड गवर्नेंस के जनूनी सीएम का ऐसे चले जाना

बात स्पीड हादसों की। कुछ सड़क हादसे। तो कुछ हवाई हादसे। दो नेता तो ट्रेन में कत्ल कर दिए गए। दीन दयाल उपाध्याय तब जनसंघ के अध्यक्ष थे। ललित नारायण मिश्र तो तब खुद रेलमंत्री थे। राजेश पायलट, साहिब सिंह वर्मा सड़क पर स्पीड के सवार शिकार हुए। तो संजय गांधी, माधवराव सिंधिया, बालयोगी, ओपी जिंदल-सुरेंद्र सिंह हवाई हादसों के। अब राजशेखर रेड्डी। राजेश पायलट खुद की स्पीड ड्राइविंग का शिकार हुए। तो राजशेखर भी गुड गवर्नेंस के जुनून का शिकार हुए। बुधवार को वह हेलीकाप्टर पर चढ़े। तो मौसम ठीक नहीं था। बारीश हो रही थी। सीएम हवाई दौरे पर जा रहे होंगे। तो मौसम विभाग से पूछताछ जरूर हुई होगी। पर राजशेखर ने दौरे पर निकलना ठान लिया। दौरे पर निकलने से ठीक पहले उनने कहा- 'मैं हर महीने दो-तीन गांवों में अचानक जाया करूंगा। देखूंगा सरकारी योजनाओं पर जमीनी अमल कितना?' यह था गुड गवर्नेंस का जनून।

करनूल के जंगलों में सीएम का हेलीकाप्टर गायब

हड़कंप मचना ही था। आंध्र के सीएम राजशेखर रेड्डी का हेलीकाप्टर लापता हो गया। वाईएस राजशेखर रेड्डी से अपनी पहली मुलाकात शिमला में हुई। मौका था- कांग्रेस कनक्लेव। जब आठ जुलाई 2003 को अपनी मुलाकात हुई। तो वह उनका जन्मदिन था। उस दिन 54 साल के हुए थे राजशेखर। मुलाकात शिमला के उस होटल में हुई। जहां वह ठहरे हुए थे। राजशेखर की राजनीतिक किस्मत तब जागी। जब सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनी। बीस साल तक बागी कांग्रेसी के तौर पर जाने गए राजशेखर। चेन्ना रेड्डी, जनार्दन रेड्डी, विजय भास्कर रेड्डी सभी के बागी। सो अस्सी से तिरासी के तीन साल ही मंत्री रह पाए। यों पांच बार एमएलए और चार बार एमपी बने। सोनिया कांग्रेस की अध्यक्ष बनी। तब जाकर 1998 में प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने। हालांकि कईयों ने इसकी वजह राजशेखर का ईसाई होना माना। पर राजशेखर ने अपनी काबिलियत साबित की।

अब दोनों गठबंधनों को फिक्र चुनावों की

तो बीजेपी में शांति लौटने लगी। वसुंधरा ने बुखार के बहाने गच्चा दिया। तो भी राजनाथ सिंह का पारा नहीं चढ़ा। यों राजनाथ सिंह अब किनारे। वैसे पहले ही खुद पिक्चर में न आते। तो वसुंधरा भी खम न ठोकती। जैसे अब वेंकैया नायडू को सौंपा। सो वसुंधरा को ठीक होने तक मोहलत। यह बात सुनी। तो अपन को अजीत जोगी का किस्सा याद आया। बात पिछली लोकसभा की। छत्तीसगढ़ एसेंबली के चुनाव हुए। तो जोगी को सरकार बनने की उम्मीद थी। सो उनने एसेंबली चुनाव लड़ लिया। पर सरकार नहीं बनी। तो लोकसभा में रहने का इरादा था। पर सोनिया चाहती थी- एसेंबली में जाएं। जोगी अस्पताल में भर्ती हो गए। यही गलती कर दी उनने। पंद्रह दिन बाद लोकसभा की मेंबरशिप खत्म हो गई। जोगी की चालाकी काम नहीं आई। पर यह बात वसुंधरा पर लागू नहीं होगी। यह एसेंबली या लोकसभा का नहीं। अलबत्ता पार्टी का अंदरूनी मामला।

आडवाणी की रवानगी वाली 'ब्रेकिंग न्यूज' की कपाल क्रिया

अपन को पहले भी कोई भ्रम नहीं था। भ्रम तो उनको था। जो पांच दिन से भ्रम फैलाते रहे। अपन ने तो चार जून को ही दो टूक लिख दिया था- 'राजनाथ-आडवाणी-अरुण की तिकड़ी छह महीने ही।' अपन कुछ ज्यादा कहें। तो अच्छा नहीं लगता। पर पिछले पांच दिन विजुअल मीडिया ने जो कहा। जरा कमरा बंद करके अपनी सीडी दुबारा देख लें। लिखाड़ भी अपना लिखा-छपा दुबारा पढ़ लें। राजनाथ से तुरत-फुरत इस्तीफे की उम्मीद लगाए बैठे थे। आडवाणी की तो उल्टी गिनती शुरू कर दी थी। पर न ऐसा होना था, न हुआ। अब आपको बता दें- इतना बवाल मचा क्यों। मोहन भागवत की प्रेस कांफ्रेंस का ऐलान हुआ। तो बीजेपी बीट वालों को लगा- 'भागवत ने शौरी का कहा मान लिया। अब चलाएंगे चाबुक।' यों भागवत की जगह सुदर्शन होते। तो इतने राजनीतिक सवालों का जवाब ही न देते।