September 2009

करुणानिधि के बाद ममता ने दिखाई आंख

एनसीपी-कांग्रेस का गठबंधन कैसा होगा। होकर भी कैसा निभेगा। पवार की दस सीटें घटेंगी। तो पीठ में छुरा वह भी घोपेंगे। विलासराव-पवार का टकराव इस हद तक तो पहुंच ही चुका। सो अपन इंतजार करेंगे चुनावी भीतरघात का। फिलहाल बात करुणानिधि और ममता की। करुणानिधि भड़केंगे। यह अंदाज तो अपन को पहले से था। राहुल गांधी जब चेन्नई में थे। तो अपन ने 11 सितंबर को लिखा था- 'बात तमिलनाडु में राहुल के राजनीतिक कंकड़ फेंककर आने की। वह तीन दिन तमिलनाडु में रहे। पर करुणानिधि से मुलाकात नहीं की।' ऊपर से राहुल नदियां जोड़ने की मुखालफत कर आए। भले ही यूपीए ने वाजपेयी के इस एजेंडे को छोड़ दिया। पर रिकार्ड में नहीं छोड़ा।

चोंचलेबाजी छोड़ सीमाओं की फिक्र करे सरकार

सोनिया का 'सादगी मंत्र' काबिल-ए-तारीफ। पर मीडिया जरूरत से कुछ ज्यादा लट्टू। अपन कारगिल की जंग का वक्त याद कराएं। तब वाजपेयी ने चुपके से सादगी मंत्र लागू किया। कोई शोर शराबा नहीं। कोई चोंचलेबाजी नहीं। वाजपेयी ने विदेश यात्राओं पर मंत्रियों का डेली एलाउंस भी घटा दिया था। पहले सौ डालर रोज था। घटाकर पचहत्तर डालर कर दिया। किसी मंत्री ने चूं तक नहीं की। अब तो पवार, फारुक, कमल, आनंद, मारन कितने मंत्री भड़के। तारीफ के काबिल हैं प्रणव मुखर्जी। जिनने सरकारी विमान छोड़ दिया। एसएम कृष्णा ने तो खुन्नस में छोड़ा। पर अपन को सरकारी विमान का बेजा इस्तेमाल नहीं भूलता। सोनिया सोमवार को इकनामी क्लास में मुंबई गई। तो अपन लोग बावले हो गए।

जयराम रमेश की गुस्ताखी

केन्द्रीय पर्यावरण एवम् वन राज्य मन्त्री (स्वतन्त्र प्रभार) जयराम रमेश ने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना को करोड़ों हिन्दुओं के आराध्य देव भगवान शंकर के समान बताकर एक और अनावश्यक विवाद तो खड़ा किया ही है, हजारों साल पुरानी भारतीय संस्कृति के अपमान का अक्षम्य अपराध भी किया है। श्री रमेश ने शनिवार को अपनी भोपाल यात्रा के दौरान महात्मा गान्धी की तुलना ब्रह्मा और नेहरूजी की तुलना भगवान विष्णु से कर डाली।

शिंदे बने 'इकनामी क्लास' के पहले केबिनेट मंत्री

सुशील शिंदे से अपनी मुलाकात सत्रह साल पुरानी। जब वह कांग्रेस महासचिव हुआ करते थे। मध्यप्रदेश के प्रभारी थे शिंदे। उन दिनों कांग्रेस की ढपली आधी रात को बजती थी। नरसिंह राव दिनभर सरकारी काम निपटाते। रात को पार्टी की बारी आती। वह सात रेसकोर्स  से लौटते। तो खबर की पुड़िया मिलती। कभी-कभी तो आधी रात को चाय पिलाकर लौटा देते। शिंदे जब आंध्र के गवर्नर थे। तो अपन कांग्रेस अधिवेशन के समय राजभवन में मिले। कांग्रेस के हैदराबाद अधिवेशन में ही चमके थे राहुल। जब वह मंच पर नहीं बैठे। डेलीगेटों के साथ नीचे बैठे। राहुल तब जमीन से जुड़े। तो जुड़ते ही चले गए। अपन राहुल-शिंदे की बात बाद में करेंगे। पहले हैदराबाद की बात।

पवार को नहीं मंजूर सोनिया का सादगी मंत्र

पहले बात तमिल नेता मणिशंकर अय्यर की। कनाट प्लेस को राहुल चौक बनाने वाले। पर वीर सावरकर के कट्टर विरोधी। महाराष्ट्र के चुनाव न होते। तो छत्रपति शिवाजी का भी विरोध करते। यूपी में मायावती मूर्तिबाजी में मशगूल। तो महाराष्ट्र में कांग्रेस का एजेंडा शिवसेना में सेंध। इसीलिए तो चुनावों के वक्त शिवाजी का स्मारक बना। जैसे कांग्रेस का चुनावी हथियार गांधी। वैसे ही शिवसेना का चुनावी हथियार छत्रपति शिवाजी। मायावती का विरोधी कर रहे मणिशंकर फंस गए। मेघनाद देसाई ने सरकारी धन के दुरुपयोग की बात की। तो वह बात यूपी से लेकर महाराष्ट्र तक थी। बुरे फंसे मणिशंकर को कुछ नहीं सूझा। तो लंदन में चर्चिल की मूर्ति पर आ गए। मेघनाद ठहरे ब्रिटिश। सो वह अपनी भाषा पर आ गए।

जगनमोहन के दूत ने छुटा दिए हाईकमान के पसीने

तो कांग्रेस की ओवरहालिंग कब होगी। एसेंबली चुनावों से पहले या बाद में। राजशेखर रेड्डी की मौत न होती। तो अब तक हो गई होती ओवरहालिंग। यों अपना अनुभव बताएं। तो कई बार टलकर कई महीने लटक जाती है ओवरहालिंग। चुनावों से पहले हुई। तो बीके हरिप्रसाद को हरियाणा मिलने की उम्मीद। वह चुनावों में पृथ्वीराज चव्हाण के साथ जुड़ चुके। यों तो पृथ्वीराज जुगाड़ू। पर कर्नाटक की नैय्या पार नहीं लगा पाए थे। बुधवार को हरियाणा के आबर्जवरों की मीटिंग हुई। तो पृथ्वीराज, हरिप्रसाद, हनुमंत के साथ विप्लव ठाकुर भी दिखी। बात हरियाणा की चली। तो अपने मूलचंद मीणा बोले- 'अब कांग्रेस को कोई खतरा नहीं। भजन-माया का गठजोड़ रहता। तो हुड्डा को मुश्किल होती।'

इशरत जहां को केंद्र ने भी तो कोर्ट में आतंकी कहा

इशरत जहां की मुठभेड़ भी फर्जी। मजिस्ट्रेट एसपी तामांग की इस रपट ने हंगामा बरपा दिया। तो अपन को नरसिंह राव का जुमला याद आया। वह कहा करते थे-'कानून अपना काम करेगा।' यह तो ठीक। पर यह भी कहा करते थे- 'जब तक सुप्रीम अदालत का फैसला न हो। तब तक किसी को दोषी नहीं कहा जा सकता।' चुनाव आयोग तो चाहता था- हर चार्जशीटेड नेता चुनाव लड़ने से महरूम किया जाए। पर कोई नहीं माना। इसीलिए तो मुकदमे झेल रहे दर्जनों नेता सांसद-विधायक। मनमोहन सिंह तो चार कदम आगे निकले। जब उनने पिछली सरकार में पांच चार्जशीटेड मंत्री बना डाले। यों उन दागियों से इस बार किनारा किया। सो मनमोहन पांच साल बाद तारीफ के हकदार। भले तब दागियों का बचाव करते रहे। पर अंदर से ग्लानी तो रही होगी।

अब झारखंड का नैतिक दबाव होगा कांग्रेस पर

तो चुनावी बुखार चढ़ने लगा। भले ही शरद पवार पूरी तैयारी कर रहे हों। पर गठबंधन टूटना नहीं। जनार्दन द्विवेदी बता रहे थे- 'बात जारी, गठबंधन होगा।' पवार की अकेले तैयारी का कारण भी बताते जाएं। उनके कान में किसी ने डाल दिया- 'कांग्रेस बात में उलझाकर रखेगी। आखिर में गठबंधन नहीं करेगी।' सो उनकी तैयारी दोनों तरह की। पवार का आंख-कान खोलकर चलना जायज। पर कांग्रेस दिग्गी-सत्यव्रत के कहने पर फैसला नहीं करेगी। अपन को कांग्रेस का एक जनरल सेक्रेट्री बता रहा था- 'महाराष्ट्र कोई यूपी-बिहार नहीं। जो अकेले लड़ लें। यूपी-बिहार में खोने को क्या था। महाराष्ट्र में तो खोने को सत्ता है। यों भी कांग्रेस-एनसीपी और शिवसेना-बीजेपी में टक्कर मुकाबले की। वोट बैंक में कोई ज्यादा फर्क नहीं दोनों गठबंधनों में।'

भावनाएं, विरासत और लोकतंत्र

आंध्र प्रदेश के कांग्रेसी विधायकों की ओर से राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन मोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग भावनात्मक तो है ही। कांग्रेस की राजनीतिक विरासत वाली वंशानुगत लोकतंत्र की परंपरा भी है।

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की हेलीकाप्टर दुर्घटना में हुई मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। दुर्घटना से जुड़े तकनीकी सवाल तो अपनी जगह हैं, लेकिन राजनीतिक सवाल ज्यादा गंभीर हैं। कांग्रेस के 156 में से 148 विधायकों ने राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन मोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग करके लोकतांत्रिक ढांचे की नई परिभाषा गढ़ दी है।

मुख्यमंत्री पद की दौड़ से स्तब्ध हुई सोनिया

लालकृष्ण आडवाणी भी श्रध्दांजलि देकर लौटे। तो जन सैलाब से अभिभूत थे। आखिर राजशेखर रेड्डी ने आंध्र में करिश्मा न किया होता। तो 2004 में एनडीए सरकार जाती ही नहीं। देर-सबेर आडवाणी पीएम हो जाते। सोनिया गांधी के बहुत करीब थे राजशेखर रेड्डी। पर अपन ने सालों पहले कहीं पढ़ा था- 'मरने वालों के साथ कोई मर नहीं जाता।' जीवन की यह सच्चाई सब जगह लागू नहीं होती। एमजीआर की मौत हुई। तो तमिलनाडु में दर्जनों ने आत्महत्या की। कन्नड़ हीरो राजकुमार का अपहरण हुआ। तो कर्नाटक में कई दीवाने जल मरे। अब ऐसी ही खबरें राजशेखर रेड्डी के दीवानों की। अपन राजशेखर रेड्डी के पुराने इतिहास पर नहीं जाते। इतिहास में सफेद हो तो काला भी होगा। पर आज बात सिर्फ सफेद की। राजशेखर के पास पहुंचकर कोई कभी खाली हाथ नहीं लौटा। अगर कोई कालेज में एडमिशन के लिए भी गया। तो सिर्फ सिफारिश हल नहीं होता था।