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July 2009

वाजपेयी को ढाल बनाकर पतली गली से निकले पीएम

यों तो मनमोहन पर भारी पड़े यशवंत सिन्हा। सिन्हा ही क्यों। मुलायम और शरद यादव भी। याद है गिलानी के साथ साझा बयान। अपन ने तेईस जुलाई को लिखा था- 'देखते हैं 29 जुलाई को संसद में क्या जवाब देते हैं मनमोहन।' सो 29 जुलाई को विदेशनीति पर बहस भी हो गई। मनमोहन का जवाब भी हो गया। विपक्ष भले सहमत नहीं हुआ। संतुष्ट भी नहीं हुआ। पर पिछली बार की तरह वाकआउट भी नहीं हुआ। भले मनमोहन बाहर जाकर कूटनीति में हार गए। पर यहां बैक डोर डिप्लोमेसी काम कर गई। वरना पीएम के इतने लच्चर जवाब पर वाकआउट न हो। अपन को हजम नहीं हुआ। कहां तो मुलायम कह रहे थे- 'जो गलती कर आए हो। जो दस्तखत कर आए हो। उसे कूड़ेदान में फेंकिए।' कहां शरद यादव कह रहे थे- 'आपने बलूचिस्तान का जिक्र ही क्यों किया। आपने 26 नवंबर के बाद बनी राजनीतिक सहमति क्यों तोड़ी।' यशवंत सिन्हा ने तो खिंचाई की कोई कसर नहीं छोड़ी।

राजनैतिक से नैतिकता विहीन राजनीति तक

पहले बात अपनी दो खबरों की। अपन ने 24 जुलाई को लिखा था- 'सरकार कूटनीति में पैदल, राहुल राजनीति में मस्त।' तो अपन ने उसमें लिखा था- 'राहुल ने चिदंबरम को मेमोरेंडम दिया। अब 28 या 29 को मनमोहन सिंह को भी देंगे।' तो 28 जुलाई को राहुल की हो गई मनमोहन से मुलाकात। यूपी के सारे एमपी-एमएलए साथ थे। मायावती की जमकर शिकायतें हुई। अब बात दूसरी खबर की। तो अपन ने 17 जुलाई को लिखा था- 'साझा बयान में हाफिज सईद का जिक्र तक नहीं। अब पाक की सुप्रीम कोर्ट से बरी होंगे। तो पाक बेशर्मी से कहेगा- अदालतें तो सरकार के बस में नहीं।' आखिर वही हुआ। अदालत के सिर ठीकरा फोड़ना तो दूर की बात।

मनमोहन संसद में सफाई दें, सोनिया फिर करेगी फैसला

जनार्दन द्विवेदी ने बयान जारी किया। तो अपन को लगा- अब धुंध छंट जाएगी। सोनिया का आशीर्वाद मिल चुका। अब मनमोहन के स्टैंड का समर्थन होगा। न यूसुफ रजा गिलानी से साझा बयान पर संशय। न जी-8 में हुए गड़बड़झाले पर। जनार्दन द्विवेदी का बयान बिना राय मशविरे के नहीं हुआ होगा। सोनिया के इशारे पर ही हुआ होगा। आखिर शुक्रवार की रात कोर कमेटी हो गई थी। मनमोहन के घर पर हुई कोर कमेटी में सोनिया पहुंची। तो मनमोहन ने तीनों-चारों विवादों पर सफाई दी। सो अपन ने समझा- जनार्दन का बयान उसी कोर कमेटी का नतीजा। पर एक शक जनार्दन द्विवेदी के ताजा बयान के बाद भी। बुधवार वाले जयंती के बयान को याद करिए।

विदेशनीति में भटकाव

मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में देश की विदेशनीति में भारी बदलाव देखने को मिल रहे हैं। नीति का झुकाव अमेरिका की तरफ दिखाई दे रहा है और पाकिस्तान के मामले में कूटनीतिक विफलताएं सामने आ रही हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने पर आम धारणा थी कि विदेशनीति का झुकाव अमेरिका की तरफ हो जाएगा। जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरसिंह राव तक देश की विदेशनीति गुटनिरपेक्ष की बनी रही थी। हालांकि नेहरू से लेकर नरसिंह राव तक कांग्रेस की हर सरकार का झुकाव दोनों में से एक गुट सोवियत संघ की तरफ बना रहा था। आम धारणा के विपरीत वाजपेयी सरकार की विदेशनीति अपेक्षाकृत ज्यादा गुटनिरपेक्ष साबित हुई।

नाकाम हुई सरकार पर हमलावर हुआ विपक्ष

दिल्ली में सावन के अजीब रंग-ढंग। कभी बारी पूर्वी दिल्ली की। तो कभी दक्षिण दिल्ली की। शुक्रवार को तो कमाल हुआ। संसद मार्ग में बरसात हुई। पर संसद में सूखा पड़ा रहा। फिर भी शरद पवार ने हिम्मत नहीं हारी। बोले- 'धीरे-धीरे सुधर रहे हालात। धीरे-धीरे हो रही बरसात। घबराने की नहीं जरूरत। अन्न का भरा है भंडार।' राज्यसभा में कालिंग एटेंशन मोशन का जवाब दे रहे थे। उनने माना- मौसम विभाग की भविष्यवाणी गलत निकली। वैसे पवार ने बहुत देर से माना। देश का आम आदमी तो उसी दिन से मान रहा था। जिस दिन भविष्यवाणी हुई। भविष्यवाणी तो जल्द बरसात की थी। जल्द तो दूर की बात। आधे से ज्यादा सावन बीत चला। पवार ने सिर्फ 17 फीसदी कमी बताई। पच्चीस फीसदी कम हो। तो सूखा घोषित करने का नियम। सो सरकार कहीं सूखा घोषित नहीं करेगी। विपक्ष चीखता-चिल्लाता रहे। जरूरत पड़ी, तो इम्पोर्ट करेगी। दोनों हाथों में लड्डू वाला इम्पोर्ट।

सरकार कूटनीति में पैदल राहुल राजनीति में मस्त

राजनीति अपनी जगह। कूटनीति अपनी जगह। राजनीति में होगा कांग्रेस का सितारा बुलंद। पर कूटनीति में कांग्रेस की चूल्हें हिल गई। नटवर सिंह के बिना तो कांग्रेस कूटनीति में लाचार। प्रणव दा भी काम चला ले गए थे। पर प्रणव दा कूटनीति करते। तो कांग्रेस घरेलू राजनीति में चप्पे-चप्पे पर फंसती। सो पहले बात राजनीति की। लालू-मुलायम अपनी सुरक्षा के लिए पहले चिदम्बरम से मिले। फिर मायावती से भिड़ंत शुरू हो गई। यूपी-बिहार वालों का गुरुवार का सारा दिन बॉडीगार्डों की राजनीति में बीता। संसद के दोनों सदन अखाड़ा बन गए। पृथ्वीराज चव्हाण ने राज्यसभा में सुरक्षा बरकरार रखने का वादा किया। तो वही वादा लोकसभा में ही दोहराने पर अड़ गए। अपने पवन बंसल भी क्या करते। चव्हाण का बयान दोहरा दिया।

विदेशनीति पर मनमेहन की क्लास लेंगी सोनिया

लालू-मुलायम यूपीए छोड़ विपक्ष में आने को बेताब। झलक बुधवार को साफ दिखी। लालू-मुलायम-राबड़ी की सुरक्षा घटाने की खबर लीक हुई। तो लोकसभा में हंगामा हुआ। सवाल उठाया मुलायमवादी शैलेन्द्र कुमार ने। पर लालू ने साफ कह दिया- 'मुझे कुछ हुआ, तो सुरक्षा घटाने वाले जेल जाने को तैयार रहें।' इशारा चिदम्बरम की ओर ही था। चिदम्बरम पर फब्ती कसते हुए कहा- 'राबड़ी को सुरक्षा दी कब थी। जो हटाने की खबरें छपवा रहे हो।' मुलायम ने तो खुद पर हुए चार हमलों का हवाला दिया। शरद यादव भी दोनों यादवों के साथ दिखे। बोले- 'नाम कैसे लीक हुए। क्या हत्यारों को बताना चाहते हैं- जो करना हो, कर लो।' पर बात मुलायम की। उनकी विपक्ष में जाने की बेताबी साफ दिखी।

अमेरिकी कानून लागू होंगे तो अपनी डेमोक्रेसी खतरे में

बात सिर्फ मनमोहन सिंह की नहीं। जिनके अमेरिका प्रेम से अब सोनिया भी खफा। सोनिया के खफा होने के चार सबूत अपन देंगे। बात यूपीए सरकार के बाकी मंत्रियों की। या तो वे मनमोहन के डर से चुप। या फिर अमेरिकी खौफ से भयभीत। आखिर बुश ने इराक को तबाह कर ही दिया। सामूहिक नरसंहार का कोई हथियार नहीं मिला। फिर भी बिना कसूर सद्दाम को फांसी पर चढ़ा ही दिया। तो क्या इसीलिए यूपीए सरकार अमेरिका से भयभीत? वरना क्या कारण रहा होगा। जो प्रफुल्ल पटेल तीन महीने अमेरिकी बद्तमीजी पर चुप्पी साधे रहे। बात चौबीस अप्रेल 2009 की। अब्दुल कलाम जा रहे थे अमेरिका। अमेरिकी कांटीनेंटल एयरलाइंस ने उनके जूते तक उतरवाए। यह बद्तमीजी न्यूयार्क या वाशिंगटन में नहीं। अलबत्ता दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर हुई। सीआईएसएफ ने कांटीनेंटल एयरलाइंस को बताया भी- 'अब्दुल कलाम देश के पूर्व राष्ट्रपति।

दुनिया के कटघरे में पाक देश के कटघरे में मनमोहन

मनमोहन को अब ज्यादा मुश्किल तो नहीं होनी चाहिए। देश को साझा बयान पर जितना गुस्सा शुक्रवार को था। उतना सोमवार को तो नहीं था। पर सोनिया गांधी को अभी भी संतुष्ट नहीं कर पाए मनमोहन सिंह। सोनिया संतुष्ट हो गई होती। तो अभिषेक मनु सिंघवी सोमवार को मनमोहन का बचाव करते। पर उनने नहीं किया। रूटीन ब्रीफिंग में पूछा गया। तो सवाल से आनाकानी करते रहे। ना साझा बयान का समर्थन। न मुखालफत। यों प्राइवेटली पूछो। तो हर कांग्रेसी सांसद का चेहरा तमतमाया हुआ दिखा। बातचीत को आतंकवाद से अलग करना किसी को नहीं जंचा। यह बात तो किसी को नहीं जंची- 'आतंकवाद पर कार्रवाई का समग्र बातचीत प्रक्रिया से संबंध नहीं होना चाहिए। दोनों को जोड़कर नहीं देखना चाहिए।' यों ऐसा नहीं।

ब्लूचिस्तान का जिक्र मनमोहन की विफलता

ऐसा नहीं है कि मनमोहन सिंह ने  बिना कुछ हासिल किए ही बातचीत दुबारा शुरु कर दी है। पाकिस्तान ने मुंबई हमले की पांच साजिश कर्ताओं के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी है। लेकिन ब्लूचिस्तान का साझा बयान में  जिक्र कूटनीतिक विफलता का  सबूत है।

कई बार ऐसा होता है, जो होता है वह दिखता नहीं, जो दिखता है वह होता नहीं। सरसरी नजर में 16 जुलाई 2009 को भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों की ओर से मिस्र में जारी किया गया सचिव स्तरीय बातचीत शुरु करने का साझा बयान भारत की करारी हार दिखाई देता है। पाकिस्तान ने ऐसे कोई ठोस सबूत नहीं दिए थे, जिनसे यह लगता हो कि वह मुंबई पर आतंकवादी हमला करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रहा है। मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान से हो रही समग्र वार्ता को बंद कर दिया था।

पाक को जो धमकियां थी, वो गीदड़ भभकियां निकली

तो वैसा बवाल नहीं हुआ। जैसा अपन  सोचकर बैठे थे। दलितों का गुस्सा उलटा पड़ता दिखा। तो न कांग्रेस ने संसद में मायावती के खिलाफ हल्ला किया। न राहुल गांधी अमेठी जाते लखनऊ में रुके। रास्ते में रीता बहुगुणा का जला घर देखने जाते। तो मामला तूल पकड़ता। कांग्रेस को बचाव मुद्रा में आता देख माया शेर हो गई। बोली- 'कांग्रेस हमारे वर्करों को गीदड़ न समझे। वे भी सड़कों पर आ गए। तो कांग्रेसी चूहे की तरह दुबकेंगे।' गलत मुद्दे पर फंसी कांग्रेस ने चुप्पी में ही भला समझा। राहुल ने अपना रास्ता पकड़ा। रीता बहुगुणा का जिक्र तक नहीं किया। यों मायावती पर हमलों में कमी नहीं की। बिजली कमी की मूर्तियों से तुलना कर मायावती की खिल्ली उड़ाई। पर बात संसद की। जहां बीजेपी ने भी शुक्रवार का दिन नहीं गंवाया।

तो मनमोहन सिंह मिस्र में जीती बाजी हार कर आए

अपन को जो शक था वही हुआ। अपन ने कल लिखा था- 'हफीज पर कहीं रुख नरम न कर दें पीएम।' अपन को डर था- पाक मुंबई वारदात से पिंडे छुड़ाने की कोशिश करेगा। पर अपन को लगता था- मनमोहन नहीं झुकेंगे। आखिर मनमोहन बार-बार कह रहे थे- 'पाक पहले मुंबई के हमलावरों पर कार्रवाई का सबूत दे।' पर अपना डर सही निकला। मनमोहन का रुख नरम हो गया। साझा बयान में हफीज सईद का तो जिक्र तक नहीं। अपन अगर साझा बयान से हफीज सईद को ढूंढें भी। तो मनमोहन सिंह हारे हुए निकलेंगे। साझा बयान में कहा गया-  'गिलानी ने भरोसा दिलाया- मुंबई के हमलावरों को सजा दिलाने की पाक हर संभव कोशिश करेगा। उतनी कोशिश करेगा, जितनी उसके बस में हुई।' इसका मतलब समझते हैं आप।

हफीज पर कहीं रुख नरम न कर दें पीएम

अपन ने कल लिखा ही था- पाक नहीं बदला। जो अपन ने लश्कर -ए-तोएबा चीफ हाफिज सईद के मामले में देखा। इसका असर मंगलवार की रात मिस्र में भी दिखा। जब शिवशंकर मैनन की सलमान बशीर से गुफ्तगू हुई। मैनन अपने विदेश सचिव। बशीर पाकिस्तान के। अपन ने जो समझा। हाफिज सईद पर बात वैसे ही बिगड़ी। जैसे आगरा में मुशर्रफ-वाजपेयी में बिगड़ी थी। बशीर ने पाकिस्तानी जर्नलिस्ट बाकिर सज्जाद सईद से कहा- 'सफलता के लिए धीरज की जरूरत।' तो अपन को समझने में देर नहीं लगी। मैनन ने समग्र बातचीत शुरू करने से इनकार किया होगा। आज मनमोहन-गिलानी गुफ्तगू होगी। यों मनमोहन-गिलानी मीटिंग से पहले मैनन-बशीर फिर बैठ चुके होंगे। पर अपन को किसी साझा बयान की उम्मीद नहीं।

पाक नहीं बदला, फिर भी मनमोहन बात को राजी

अपने यहां फैमिली प्लानिंग की आवाज उठाना गुनाह। जब-जब कानून की बात उठी। खुदा की नियामत बताकर मुखालफत हुई। बंदे मातरम् पर भी बंट जाती है अपनी संसद। फैमिली प्लानिग तो दूर की बात। अपन आज यह सवाल न उठाते। अगर मुस्लिम देश में कानून की बात न उठती। पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली में उठा है सवाल। पीएमएल-क्यू के मेंबर रियाज फालियाना ने एसेंबली में कहा- 'दो से ज्यादा बच्चों पर टैक्स लगाया जाए। तभी आबादी पर कंट्रोल होगा।' यों दकियानुसियों ने मुखालफत की। पर बहुतेरे मेंबर समर्थन में भी उठे। बाकायदा बहस हो गई। अपने यहां तो संसद में बहस भी नहीं होती।

इटली ने चौंकाया देश को, सोनिया को भी

सावन का पहला सोमवार भी बीत गया। मेघ नहीं बरसे। बरसने की रिहर्सल करते रहे। इटली से लौटे पीएम ने मायूस होकर समीक्षा की। मौसम विभाग ने वही चंडूखाने की पेली। कहा- ''देर से ही सही। आज आएगा मानसून। घबराइए नहीं।'' मनमोहन अब बेफिक्र होकर पांच दिन फ्रांस और मिस्र में बिताएंगे। तो एक उम्मीद बंधी रहेगी। पर फिलहाल इटली की। सोमवार को लोकसभा में दो बार इटली का जिक्र आया। सो सोनिया रह रह कर चौंकी। एक का संबंध तो मनमोहन के दौरे से। दूसरे बार इटली का जिक्र मुलायम ने किया।

जाहिर होने लगा एटमी करार का सच

ईरान-पाक-भारत गैस पाइप लाईन को रद्द करने का अमेरिकी मकसद पूरा होता दिखाई दे रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय पाइप लाईन को घाटे का सौदा बताकर खारिज करने के पक्ष में है। यही था अमेरिका का मकसद।

अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री बनने के पौने दो महीने बाद ही 11 मई 1998 को अपने घर पर जल्दबाजी में बुलाई एक प्रेस कांफ्रेंस में देश के परमाणु शक्ति संपन्न हो जाने का ऐलान किया था। उस समय हम कांग्रेस दफ्तर में थे और प्रेस कांफ्रेंस की जानकारी मिलते ही प्रधानमंत्री आवास सात रेस कोर्स की ओर दौड़े थे। वाजपेयी के लिए रखी कुर्सी के पीछे दोनों ओर राष्ट्रीय ध्वज लगाए गए थे। तब तक ऐसा मंच अमेरिकी राष्ट्रपति की प्रेस कांफ्रेंस में दिखाई देता था,

गांधी के गुजरात में शराब और हिंसा

आसिफ अली जरदारी ने आखिर सच बोला। मुंबई में आतंकी हमला हुआ। तो जरदारी ने कहा था- 'पाक का कोई हाथ नहीं। पाकिस्तानी पकड़ा गया होगा। तो नान स्टेट एक्टर होगा।' वैसे कसाब के कबूलिया बयान का जिक्र अपन बाद में करेंगे। पहले राष्ट्रपति जरदारी की ही बात। उनने मान लिया- 'पाकिस्तान ने आतंकवाद को शह दी। आतंकवादियों को ट्रेनिंग दी। अब वही आतंकी पाक को बर्बाद करने पर उतारू।' यही बात तो अपन शुरू से कह रहे थे। यह बात जियाउल हक के बाद पाक का हर राष्ट्रपति जानता था। हर प्रधानमंत्रीं जानता था।

आंकड़ों की बाजीगिरी में तो महंगाई है ही नहीं

अपन ने पच्चीस जून को लिखा था- 'कांग्रेस में बारी रेवडियों की, बीजेपी में बदलाव की।' तो गवर्नरी रूपी रेवड़ियां बंटती-बंटती अटक गई। यूपी के गवर्नर टीवी राजेश्वर की टर्म आठ जुलाई को खत्म हो गई। पर बदलाव का फैसला नहीं हुआ। सो जब तक नया गवर्नर न आए। तब तक राजेश्वर बने रहेंगे। अपन समझते थे राजेश्वर को एक टर्म और मिलेगी। पर अब ऐसा नहीं लगता। सोनिया का इरादा सारे घर के बदल डालने का। बलराम जाखड़ तो अबोहर के पास पंजकोसी में जाकर बैठ चुके। अगले महीने पंडित नवल किशोर शर्मा भी रिटायर होंगे। पर बीजेपी में बदलाव शुरू हो चुका।

सावरकर की मूर्ति फ्रांस में लगाने पर भी परेशानी

अपने नमो नारायण मीणा। पवन बंसल का दर्जा बढ़ा। तो इस बार वित्त राज्यमंत्री हो गए। सो झारखंड का बजट पेश करने का मौका मिला। पता है ना- झारखंड में इस समय राष्ट्रपति राज। यूपीए की झारखंडी सरकार के चार मंत्री भ्रष्टाचार में फंस चुके। पर सोनिया का इरादा अभी भी उन्हीं के साथ सरकार बनाने का। सो विधानसभा भंग नहीं हुई। पर बात बजट की। बजट पेश होने से दो दिन पहले लीक हो गया। अखबारों में छप गया। बुधवार को मीणा ने बजट पेश किया। तो यशवंत सिन्हा ने  कहा- 'बजट तो अखबारों में छप चुका। किसने लीक किया। सरकार जांच कराए।' पर सरकार किस-किस 'लीक' की जांच कराएगी। जांच करवाएगी तो खुद फंसेगी। लीक का दूसरा मामला सुनिए।

स्पीकर के साथ टकराव की यह तो शुरूआत भर

फूंक-फूंककर कदम रखें। हर किसी पर शक करें। अपने नए सांसदों को यह संदेश है लालकृष्ण आडवाणी का। कहते हैं ना दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक पीता है। सो आडवाणी को डर- कहीं नए सांसद फजीहत न करा दें। जैसे चौदहवीं लोकसभा में आठ सांसदों ने कराई थी। सदन में सवाल पूछने के बदले पैसा लेने का मामला। याद आया आपको। ग्यारह सांसदों की मेंबरी गई थी। सो उनने अपने सांसदों को चेताया- 'किसी के झांसे में न आएं। कारपोरेट घरानों की जंग में न कूदें। एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए आपको इस्तेमाल करेंगे। सवालों के झोले लिए घूम रहे हैं। बिना सोचे-समझे किसी कागज पर दस्तखत न करें। प्राईवेट सेक्रेट्री भी सोच-समझ कर रखें।' आडवाणी की बात से अपन को याद आया। उनने वोटिंग मशीनों पर सवाल उठा दिया। कईयों की दुखती रग पर हाथ रख दिया।

भाजपा, कांग्रेस और लिब्राहन आयोग

बाबरी ढांचा टूटने के साढ़े सोलह साल बाद जस्टिस एमएस लिब्राहन ने तीस जून को अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी। जबकि आयोग के अध्यक्ष के नाते उनकी नियुक्ति ढांचा टूटने के दसवें दिन सोलह दिसंबर 1992 को हो गई थी। तीन-तीन महीने करके उन्होंने 48 बार अपना कार्यकाल बढ़वाया। भारतीय संसद के इतिहास में किसी भी आयोग ने इतना लंबा समय नहीं लिया। ढांचा टूटने और आयोग के गठन की घटना कांग्रेस शासन में हुई थी और रिपोर्ट भी कांग्रेस शासन में ही आई। सरकार किसी भी आयोग की रिपोर्ट ज्यादा से ज्यादा छह महीने अपने पास रख सकती है। छह महीने में उसे आयोग की रिपोर्ट संसद पटल पर रखनी ही होगी। मनमोहन सिंह सरकार फूंक-फूंककर कदम रखना चाहती है क्योंकि वह पहले भांप लेना चाहती है कि इससे राजनीतिक फायदा और नुकसान क्या होगा।

ममता दीदी का लालू की धुलाई करने वाला बजट

अपन को तो ममता का रेल बजट बढ़िया लगा। इसलिए नहीं, जो खबरचियों की पत्नियों-पतियों को तोहफा दिया। अलबत्ता इसलिए क्योंकि सबको कुछ न कुछ दिया। महिलाओं के लिए महिला ट्रेन। युवावों के लिए युवा ट्रेन। वह भी 1500 किमी तक 299 में। गरीब-गुरबों के लिए 'इज्जत' रखने वाला 25 रुपए का पास। लालू की तरह नहीं। जिनने एयरकंडीशंड गरीबरथ पर अमीरों को ऐश कराई। ममता ने सबसे बड़ा काम किया- रेलवे को नोट छापने वाली मशीन बनने से बचाया।

अब अटल की पेट्रोलियम नीति लगने लगी अच्छी

तो वही हुआ। संसद में सरकार घिर गई। पेट्रोल-डीजल की कीमतें महंगी पड़ी। सिर्फ विपक्ष एकजुट नहीं हुआ। यूपीए में भी दरार पैदा हो गई। कांग्रेस के 206 सांसदों के साथ कोई दिखा। तो सिर्फ ममता बनर्जी के सुदीप बनर्जी। सुदीप भी कुछ यों बोले- 'अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत घटने पर यहां भी घटे।' सुदीप ने ऐसा क्यों कहा। वह अपन बता दें। बंगाल की नगर पालिकाओं के नतीजे बुधवार को ही आए। सोलह में से तेरह पर तृणमूल का कब्जा। सो उनकी निगाह अब मंत्री पद की कुर्सी पर। सेंट्रल हाल में मिले। तो नतीजों से गदगद थे। बोले- 'अब ममता होंगी बंगाल की मुख्यमंत्री।' अपन ने तपाक से कहा- 'तो आप होंगे केन्द्र में मंत्री।' उनने कहा- 'आई होप सो।'

कोशिश होगी सेशन में 'लिब्राहन' से बचने की

आज शुरू होगा बजट सेशन। आज से ही पेट्रोल चार रुपए महंगा। डीजल दो रुपए। यह है आम आदमी के बजट की शुरूआत। 'आम आदमी' अब कांग्रेस की नई मुसीबत। सरकारी कमेटी की रिपोर्ट ने कहा है- 'देश की पचास फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे हो चुकी।' अपन प्रणव मुखर्जी का बजट तो नहीं जानते। पर ममता ने कहा है- 'रेल बजट आम आदमी का होगा।' पर पहले बात गुरुवार को सेशन शुरू होने की। अपन हफ्ते के बीच सेशन शुरूआत का राज नहीं जानते। चौदहवीं लोकसभा से पहले ऐसा नहीं होता था। सेशन हमेशा सोमवार को शुरू होता रहा। नौ साल बाद कांग्रेस सरकार में लौटी। तो दो बातें नई हुई। सेशन की शुरूआत गुरुवार को। सेशन के दौरान कांग्रेस की ब्रीफिंग चार बजे नहीं। अलबत्ता चार बजकर बीस मिनट पर। अगर यह किसी ज्योतिषी ने बताया था। तो ज्योतिषी सचमुच धांसू।