July 2009

भाजपा, कांग्रेस और लिब्राहन आयोग

बाबरी ढांचा टूटने के साढ़े सोलह साल बाद जस्टिस एमएस लिब्राहन ने तीस जून को अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी। जबकि आयोग के अध्यक्ष के नाते उनकी नियुक्ति ढांचा टूटने के दसवें दिन सोलह दिसंबर 1992 को हो गई थी। तीन-तीन महीने करके उन्होंने 48 बार अपना कार्यकाल बढ़वाया। भारतीय संसद के इतिहास में किसी भी आयोग ने इतना लंबा समय नहीं लिया। ढांचा टूटने और आयोग के गठन की घटना कांग्रेस शासन में हुई थी और रिपोर्ट भी कांग्रेस शासन में ही आई। सरकार किसी भी आयोग की रिपोर्ट ज्यादा से ज्यादा छह महीने अपने पास रख सकती है। छह महीने में उसे आयोग की रिपोर्ट संसद पटल पर रखनी ही होगी। मनमोहन सिंह सरकार फूंक-फूंककर कदम रखना चाहती है क्योंकि वह पहले भांप लेना चाहती है कि इससे राजनीतिक फायदा और नुकसान क्या होगा।

ममता दीदी का लालू की धुलाई करने वाला बजट

अपन को तो ममता का रेल बजट बढ़िया लगा। इसलिए नहीं, जो खबरचियों की पत्नियों-पतियों को तोहफा दिया। अलबत्ता इसलिए क्योंकि सबको कुछ न कुछ दिया। महिलाओं के लिए महिला ट्रेन। युवावों के लिए युवा ट्रेन। वह भी 1500 किमी तक 299 में। गरीब-गुरबों के लिए 'इज्जत' रखने वाला 25 रुपए का पास। लालू की तरह नहीं। जिनने एयरकंडीशंड गरीबरथ पर अमीरों को ऐश कराई। ममता ने सबसे बड़ा काम किया- रेलवे को नोट छापने वाली मशीन बनने से बचाया।

अब अटल की पेट्रोलियम नीति लगने लगी अच्छी

तो वही हुआ। संसद में सरकार घिर गई। पेट्रोल-डीजल की कीमतें महंगी पड़ी। सिर्फ विपक्ष एकजुट नहीं हुआ। यूपीए में भी दरार पैदा हो गई। कांग्रेस के 206 सांसदों के साथ कोई दिखा। तो सिर्फ ममता बनर्जी के सुदीप बनर्जी। सुदीप भी कुछ यों बोले- 'अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत घटने पर यहां भी घटे।' सुदीप ने ऐसा क्यों कहा। वह अपन बता दें। बंगाल की नगर पालिकाओं के नतीजे बुधवार को ही आए। सोलह में से तेरह पर तृणमूल का कब्जा। सो उनकी निगाह अब मंत्री पद की कुर्सी पर। सेंट्रल हाल में मिले। तो नतीजों से गदगद थे। बोले- 'अब ममता होंगी बंगाल की मुख्यमंत्री।' अपन ने तपाक से कहा- 'तो आप होंगे केन्द्र में मंत्री।' उनने कहा- 'आई होप सो।'

कोशिश होगी सेशन में 'लिब्राहन' से बचने की

आज शुरू होगा बजट सेशन। आज से ही पेट्रोल चार रुपए महंगा। डीजल दो रुपए। यह है आम आदमी के बजट की शुरूआत। 'आम आदमी' अब कांग्रेस की नई मुसीबत। सरकारी कमेटी की रिपोर्ट ने कहा है- 'देश की पचास फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे हो चुकी।' अपन प्रणव मुखर्जी का बजट तो नहीं जानते। पर ममता ने कहा है- 'रेल बजट आम आदमी का होगा।' पर पहले बात गुरुवार को सेशन शुरू होने की। अपन हफ्ते के बीच सेशन शुरूआत का राज नहीं जानते। चौदहवीं लोकसभा से पहले ऐसा नहीं होता था। सेशन हमेशा सोमवार को शुरू होता रहा। नौ साल बाद कांग्रेस सरकार में लौटी। तो दो बातें नई हुई। सेशन की शुरूआत गुरुवार को। सेशन के दौरान कांग्रेस की ब्रीफिंग चार बजे नहीं। अलबत्ता चार बजकर बीस मिनट पर। अगर यह किसी ज्योतिषी ने बताया था। तो ज्योतिषी सचमुच धांसू।

बाबरी रपट : बीजेपी की कंगाली में आटा गीला

तो अपन ने इक्कीस मई को क्या लिखा था- 'कांग्रेस इस बार हिसाब चुकता करेगी। आडवाणी-मोदी को चार्जशीट का इरादा। आडवाणी पर लिब्राहन आयोग की मार पड़ेगी। मोदी पर सुप्रीम कोर्ट जांच बिठा चुकी।' तो अपनी भविष्यवाणी के सिर्फ इकतालिसवें दिन आ गई रिपोर्ट। साढ़े सोलह साल लगे लिब्राहन आयोग को। छह दिसंबर 1992 को बाबरी ढांचा टूटा। सोलह दिसंबर को आयोग बना। तीन महीने का वक्त था। आयोग ने लगाए 198 महीने। वाजपेयी चाहते तो बार-बार अवधि बढ़ाने की मांग ठुकरा देते। अपने यहां एक बार जो आयोग का चेयरमैन बन जाए। फिर जांच तो उसी के हिसाब से पूरी होगी। जस्टिस लिब्राहन साढ़े सोलह साल सुप्रीम कोर्ट के जज नहीं रहे। पर साढ़े सोलह साल आयोग के चेयरमैन रह गए।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट