July 2009

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वाजपेयी को ढाल बनाकर पतली गली से निकले पीएम

यों तो मनमोहन पर भारी पड़े यशवंत सिन्हा। सिन्हा ही क्यों। मुलायम और शरद यादव भी। याद है गिलानी के साथ साझा बयान। अपन ने तेईस जुलाई को लिखा था- 'देखते हैं 29 जुलाई को संसद में क्या जवाब देते हैं मनमोहन।' सो 29 जुलाई को विदेशनीति पर बहस भी हो गई। मनमोहन का जवाब भी हो गया। विपक्ष भले सहमत नहीं हुआ। संतुष्ट भी नहीं हुआ। पर पिछली बार की तरह वाकआउट भी नहीं हुआ। भले मनमोहन बाहर जाकर कूटनीति में हार गए। पर यहां बैक डोर डिप्लोमेसी काम कर गई। वरना पीएम के इतने लच्चर जवाब पर वाकआउट न हो। अपन को हजम नहीं हुआ। कहां तो मुलायम कह रहे थे- 'जो गलती कर आए हो। जो दस्तखत कर आए हो। उसे कूड़ेदान में फेंकिए।' कहां शरद यादव कह रहे थे- 'आपने बलूचिस्तान का जिक्र ही क्यों किया। आपने 26 नवंबर के बाद बनी राजनीतिक सहमति क्यों तोड़ी।' यशवंत सिन्हा ने तो खिंचाई की कोई कसर नहीं छोड़ी।

राजनैतिक से नैतिकता विहीन राजनीति तक

पहले बात अपनी दो खबरों की। अपन ने 24 जुलाई को लिखा था- 'सरकार कूटनीति में पैदल, राहुल राजनीति में मस्त।' तो अपन ने उसमें लिखा था- 'राहुल ने चिदंबरम को मेमोरेंडम दिया। अब 28 या 29 को मनमोहन सिंह को भी देंगे।' तो 28 जुलाई को राहुल की हो गई मनमोहन से मुलाकात। यूपी के सारे एमपी-एमएलए साथ थे। मायावती की जमकर शिकायतें हुई। अब बात दूसरी खबर की। तो अपन ने 17 जुलाई को लिखा था- 'साझा बयान में हाफिज सईद का जिक्र तक नहीं। अब पाक की सुप्रीम कोर्ट से बरी होंगे। तो पाक बेशर्मी से कहेगा- अदालतें तो सरकार के बस में नहीं।' आखिर वही हुआ। अदालत के सिर ठीकरा फोड़ना तो दूर की बात।

मनमोहन संसद में सफाई दें, सोनिया फिर करेगी फैसला

जनार्दन द्विवेदी ने बयान जारी किया। तो अपन को लगा- अब धुंध छंट जाएगी। सोनिया का आशीर्वाद मिल चुका। अब मनमोहन के स्टैंड का समर्थन होगा। न यूसुफ रजा गिलानी से साझा बयान पर संशय। न जी-8 में हुए गड़बड़झाले पर। जनार्दन द्विवेदी का बयान बिना राय मशविरे के नहीं हुआ होगा। सोनिया के इशारे पर ही हुआ होगा। आखिर शुक्रवार की रात कोर कमेटी हो गई थी। मनमोहन के घर पर हुई कोर कमेटी में सोनिया पहुंची। तो मनमोहन ने तीनों-चारों विवादों पर सफाई दी। सो अपन ने समझा- जनार्दन का बयान उसी कोर कमेटी का नतीजा। पर एक शक जनार्दन द्विवेदी के ताजा बयान के बाद भी। बुधवार वाले जयंती के बयान को याद करिए।

विदेशनीति में भटकाव

मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में देश की विदेशनीति में भारी बदलाव देखने को मिल रहे हैं। नीति का झुकाव अमेरिका की तरफ दिखाई दे रहा है और पाकिस्तान के मामले में कूटनीतिक विफलताएं सामने आ रही हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने पर आम धारणा थी कि विदेशनीति का झुकाव अमेरिका की तरफ हो जाएगा। जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरसिंह राव तक देश की विदेशनीति गुटनिरपेक्ष की बनी रही थी। हालांकि नेहरू से लेकर नरसिंह राव तक कांग्रेस की हर सरकार का झुकाव दोनों में से एक गुट सोवियत संघ की तरफ बना रहा था। आम धारणा के विपरीत वाजपेयी सरकार की विदेशनीति अपेक्षाकृत ज्यादा गुटनिरपेक्ष साबित हुई।

नाकाम हुई सरकार पर हमलावर हुआ विपक्ष

दिल्ली में सावन के अजीब रंग-ढंग। कभी बारी पूर्वी दिल्ली की। तो कभी दक्षिण दिल्ली की। शुक्रवार को तो कमाल हुआ। संसद मार्ग में बरसात हुई। पर संसद में सूखा पड़ा रहा। फिर भी शरद पवार ने हिम्मत नहीं हारी। बोले- 'धीरे-धीरे सुधर रहे हालात। धीरे-धीरे हो रही बरसात। घबराने की नहीं जरूरत। अन्न का भरा है भंडार।' राज्यसभा में कालिंग एटेंशन मोशन का जवाब दे रहे थे। उनने माना- मौसम विभाग की भविष्यवाणी गलत निकली। वैसे पवार ने बहुत देर से माना। देश का आम आदमी तो उसी दिन से मान रहा था। जिस दिन भविष्यवाणी हुई। भविष्यवाणी तो जल्द बरसात की थी। जल्द तो दूर की बात। आधे से ज्यादा सावन बीत चला। पवार ने सिर्फ 17 फीसदी कमी बताई। पच्चीस फीसदी कम हो। तो सूखा घोषित करने का नियम। सो सरकार कहीं सूखा घोषित नहीं करेगी। विपक्ष चीखता-चिल्लाता रहे। जरूरत पड़ी, तो इम्पोर्ट करेगी। दोनों हाथों में लड्डू वाला इम्पोर्ट।

सरकार कूटनीति में पैदल राहुल राजनीति में मस्त

राजनीति अपनी जगह। कूटनीति अपनी जगह। राजनीति में होगा कांग्रेस का सितारा बुलंद। पर कूटनीति में कांग्रेस की चूल्हें हिल गई। नटवर सिंह के बिना तो कांग्रेस कूटनीति में लाचार। प्रणव दा भी काम चला ले गए थे। पर प्रणव दा कूटनीति करते। तो कांग्रेस घरेलू राजनीति में चप्पे-चप्पे पर फंसती। सो पहले बात राजनीति की। लालू-मुलायम अपनी सुरक्षा के लिए पहले चिदम्बरम से मिले। फिर मायावती से भिड़ंत शुरू हो गई। यूपी-बिहार वालों का गुरुवार का सारा दिन बॉडीगार्डों की राजनीति में बीता। संसद के दोनों सदन अखाड़ा बन गए। पृथ्वीराज चव्हाण ने राज्यसभा में सुरक्षा बरकरार रखने का वादा किया। तो वही वादा लोकसभा में ही दोहराने पर अड़ गए। अपने पवन बंसल भी क्या करते। चव्हाण का बयान दोहरा दिया।

विदेशनीति पर मनमेहन की क्लास लेंगी सोनिया

लालू-मुलायम यूपीए छोड़ विपक्ष में आने को बेताब। झलक बुधवार को साफ दिखी। लालू-मुलायम-राबड़ी की सुरक्षा घटाने की खबर लीक हुई। तो लोकसभा में हंगामा हुआ। सवाल उठाया मुलायमवादी शैलेन्द्र कुमार ने। पर लालू ने साफ कह दिया- 'मुझे कुछ हुआ, तो सुरक्षा घटाने वाले जेल जाने को तैयार रहें।' इशारा चिदम्बरम की ओर ही था। चिदम्बरम पर फब्ती कसते हुए कहा- 'राबड़ी को सुरक्षा दी कब थी। जो हटाने की खबरें छपवा रहे हो।' मुलायम ने तो खुद पर हुए चार हमलों का हवाला दिया। शरद यादव भी दोनों यादवों के साथ दिखे। बोले- 'नाम कैसे लीक हुए। क्या हत्यारों को बताना चाहते हैं- जो करना हो, कर लो।' पर बात मुलायम की। उनकी विपक्ष में जाने की बेताबी साफ दिखी।

अमेरिकी कानून लागू होंगे तो अपनी डेमोक्रेसी खतरे में

बात सिर्फ मनमोहन सिंह की नहीं। जिनके अमेरिका प्रेम से अब सोनिया भी खफा। सोनिया के खफा होने के चार सबूत अपन देंगे। बात यूपीए सरकार के बाकी मंत्रियों की। या तो वे मनमोहन के डर से चुप। या फिर अमेरिकी खौफ से भयभीत। आखिर बुश ने इराक को तबाह कर ही दिया। सामूहिक नरसंहार का कोई हथियार नहीं मिला। फिर भी बिना कसूर सद्दाम को फांसी पर चढ़ा ही दिया। तो क्या इसीलिए यूपीए सरकार अमेरिका से भयभीत? वरना क्या कारण रहा होगा। जो प्रफुल्ल पटेल तीन महीने अमेरिकी बद्तमीजी पर चुप्पी साधे रहे। बात चौबीस अप्रेल 2009 की। अब्दुल कलाम जा रहे थे अमेरिका। अमेरिकी कांटीनेंटल एयरलाइंस ने उनके जूते तक उतरवाए। यह बद्तमीजी न्यूयार्क या वाशिंगटन में नहीं। अलबत्ता दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर हुई। सीआईएसएफ ने कांटीनेंटल एयरलाइंस को बताया भी- 'अब्दुल कलाम देश के पूर्व राष्ट्रपति।

दुनिया के कटघरे में पाक देश के कटघरे में मनमोहन

मनमोहन को अब ज्यादा मुश्किल तो नहीं होनी चाहिए। देश को साझा बयान पर जितना गुस्सा शुक्रवार को था। उतना सोमवार को तो नहीं था। पर सोनिया गांधी को अभी भी संतुष्ट नहीं कर पाए मनमोहन सिंह। सोनिया संतुष्ट हो गई होती। तो अभिषेक मनु सिंघवी सोमवार को मनमोहन का बचाव करते। पर उनने नहीं किया। रूटीन ब्रीफिंग में पूछा गया। तो सवाल से आनाकानी करते रहे। ना साझा बयान का समर्थन। न मुखालफत। यों प्राइवेटली पूछो। तो हर कांग्रेसी सांसद का चेहरा तमतमाया हुआ दिखा। बातचीत को आतंकवाद से अलग करना किसी को नहीं जंचा। यह बात तो किसी को नहीं जंची- 'आतंकवाद पर कार्रवाई का समग्र बातचीत प्रक्रिया से संबंध नहीं होना चाहिए। दोनों को जोड़कर नहीं देखना चाहिए।' यों ऐसा नहीं।

ब्लूचिस्तान का जिक्र मनमोहन की विफलता

ऐसा नहीं है कि मनमोहन सिंह ने  बिना कुछ हासिल किए ही बातचीत दुबारा शुरु कर दी है। पाकिस्तान ने मुंबई हमले की पांच साजिश कर्ताओं के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी है। लेकिन ब्लूचिस्तान का साझा बयान में  जिक्र कूटनीतिक विफलता का  सबूत है।

कई बार ऐसा होता है, जो होता है वह दिखता नहीं, जो दिखता है वह होता नहीं। सरसरी नजर में 16 जुलाई 2009 को भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों की ओर से मिस्र में जारी किया गया सचिव स्तरीय बातचीत शुरु करने का साझा बयान भारत की करारी हार दिखाई देता है। पाकिस्तान ने ऐसे कोई ठोस सबूत नहीं दिए थे, जिनसे यह लगता हो कि वह मुंबई पर आतंकवादी हमला करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रहा है। मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान से हो रही समग्र वार्ता को बंद कर दिया था।