June 2009

मानसून और शतरंज की राजनीतिक गोटियां

अपनी निगाह तो बेंगलुरु पर थी। बेंगलुरु की किस्मत जगे। तो अपन बरसात की उम्मीद लगाएं। पर बेंगलुरु की खबर खराब मिली। मानसून ने अबके बेंगलुरु के भी पसीने छुटा दिए। सोमवार को भोपाल-इंदौर में झमाझम हुई। शिवराज सिंह चौहान का रुद्राभिषेक कामयाब रहा। प्री मानसून ने ही बल्ले-बल्ले कर दी। सोमवार को तो जयपुर के आसपास भी छींटे पड़ गए। भोपाल-इंदौर-जयपुर की खबरों से अपन को दिल्ली की किस्मत खराब लगी। अस्थमा वालों के लिए दिल्ली के ये दिन बहुत खराब। ऊपर से शीला दीक्षित का बिजली मैनेजमेंट चरमरा गया।

आपातकाल की वजह जेपी आंदोलन नहीं था

इंदिरा गांधी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुए जेपी आंदोलन के कारण आपातकाल नहीं लगाया था। अलबत्ता इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से लोकसभा में उनका निर्वाचन रद्द करने के फैसले के कारण लगाया था।

पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में पहली बार वोट डालने वाले 18 साल के नौजवान को उस आपातकाल के बारे में नहीं पता होगा। जो उसके जन्म से 16 साल पहले भारत में लगा था। बीते हफ्ते 25 जून को आपातकाल को 34 साल पूरे हो चुके थे। आज की पीढ़ी को लोकतंत्र के उस काले अध्याय के बारे में बताना जरूरी है, ताकि वह अपने वोट की कीमत समझ सके। आपातकाल में लोकसभा का कार्यकाल पांच साल से बढ़ाकर छह साल कर दिया गया था। अगर उसे बदल नहीं दिया जाता तो अप्रेल-मई 2009 में पंद्रहवीं लोकसभा के लिए पहली बार वोट डालने वाला नौजवान बारहवीं या तेरहवीं लोकसभा के लिए वोट डाल रहा होता।

सौ दिनी एजेंडे में उलझी मनमोहन की केबिनेट

अपन जानते हैं दसवीं के इम्तिहान का एक बोर्ड नहीं हो सकता। सो अपन ने कल इस पर ज्यादा तवज्जो नहीं दी। सभी प्रांतों की संस्कृति, इतिहास, भाषा-बोली अलग-अलग। मौसम के मुताबिक छुट्टियों-इम्तिहानों का वक्त भी अलग-अलग। सो एक बोर्ड की बात देश में नया बवाल खड़ा करेगी। अपन ने सिब्बल की उन्हीं योजनाओं की तारीफ की। जो तारीफ के काबिल। वैसे जितनी तारीफ अपन ने कर दी। उतनी कांग्रेसी भी करने को तैयार नहीं। शुक्रवार को कांग्रेस का एक महासचिव सिब्बल पर बरसा। महासचिव आन रिकार्ड कहने को तैयार नहीं। पर इसका मतलब यह नहीं- पार्टी में बवाल नहीं होगा।

अपनी यूनिवर्सिटियों को ही मिले एफडीआई का हक

बदलाव की बयार तो काम में भी बहने लगी। मनमोहन ने आडवाणी के सारे अच्छे काम अपना लिए। सुशासन की पूरी तैयारी। काला धन वापस लाने का वादा। आतंकवाद के खिलाफ प्रो-एक्टिव नीति। एक रैंक एक पेंशन। सब नागरिकों को पहचान पत्र। पहचान पत्र तो आडवाणी का पुराना सपना। जो वह अपने वक्त नहीं कर पाए। मनमोहन ने राष्ट्रपति के अभिभाषण में वादा किया। तो अभिभाषण के बीसवें दिन 25 जून को काम शुरू कर दिया। इंफोसिस के नंदन नीलेकणी को यूआईडी अथारिटी बनाकर चेयरमैन बना दिया। बात मुकाबले की चली। तो मुकाबला तो करना पड़ेगा।

कांग्रेस में बारी रेवड़ियों की, बीजेपी में बदलाव की

बदलाव की बयार बहने लगी। बदलाव की बयार दोनों तरफ बही। बीजेपी ने उत्तराखंड से बदलाव की शुरूआत की। तो कांग्रेस ने महासचिवों से पहले गवर्नर बदलने शुरू किए। बात बीजेपी-कांग्रेस की चली। तो बुधवार को दोनों एक मुद्दे पर सहमत दिखे। अशोका रोड से वेंकैया नायडू माओवादियों के मुद्दे पर लेफ्ट के रुख पर भड़के। तो अकबर रोड से मनीष तिवारी। पहले लेफ्ट के रुख की बात। बुधवार को लेफ्ट ने कहा- 'माओवादियों को आतंकवादी बताने से समस्या का समाधान नहीं होगा।' बता दें- चारों वामपंथी दल माओवादियों पर बैन से खफा। पर वामपंथी सीएम बुध्ददेव भट्टाचार्य अपने दल से सहमत नहीं। इसका धमाकेदार खुलासा श्रीप्रकाश जायसवाल ने किया।

बीजेपी की हार का पहला विकेट उत्तराखंड में गिरा

भुवन चंद्र खंडूरी का गुस्सा सातवें आसमान पर। बीजेपी आलाकमान ने इस्तीफा जो मांग लिया। यों फैसला हुआ सोमवार की कोर कमेटी में। पर अबके खबर लीक नहीं हुई। सो मंगलवार को लीक न होने पर खूब चुटकलेबाजी हुई। बीजेपी के नेता कहते मिले- 'यह फायदा है अरुण जेटली के विदेश में होने का।' वैसे अपन बता दें- आडवाणी का पहला विकेट गिरा। आडवाणी ही बचा रहे थे खंडूरी को। नहीं तो चुनावों से पहले ही निपट जाते। फौजी बैकग्राउंड के खंडूरी एमएलए साथ नहीं रख पाए। बीजेपी ने एसेंबली चुनाव में किसी को प्रोजेक्ट नहीं किया था। पर पार्टी के अध्यक्ष तब कोश्यारी थे। पर आडवाणी ने लोकसभा से इस्तीफा दिलाकर खंडूरी को सीएम बनवाया। मकसद था- नेशनल हाईवे जैसा करिश्मा उत्तराखंड में भी दिखे। पर खंडूरी के पांव जमीन पर नहीं रहे।

तो सांप्रदायिक हिंदुत्व पर चोट करे बीजेपी

वरुणवादी हिंदुत्व चलेगा न तोगड़ियावादी। बजरंगदली, रामसेना जैसा हिंदुत्व भी नहीं। वरुण को आडवाणी-राजनाथ का समर्थन मिला। तभी से भ्रम था। शाहनवाज और नकवी ने कुछ और नहीं पूछा। उनने पूछा था- 'बीजेपी में दीनदयाल उपाध्याय-आडवाणी का हिंदुत्व चलेगा। या पीलीभीत मार्का हिंदुत्व।' बीजेपी पीलीभीत मार्का हिंदुत्व कबूल करे। तो उसमें नकवियों-शाहनवाजों का क्या काम। सो बीजेपी ने अपने राजनीतिक प्रस्ताव में साफ किया- 'कट्टरपंथ कबूल नहीं। पर हिंदुत्व जीवन पध्दति। हिंदुत्व इस देश की आत्मा। हिंदुत्व ही भारतीय।'

बंगाल में पतन की ओर वामपंथी

ममता से मुकाबले के लिए माकपा ने खुद माओवादियों को बंगाल में बुलाया। अब माओवादी किसानों, मजदूरों, आदिवासियों के जख्मों पर मरहम रख खोद रहे हैं वामपंथी जमीन।

अंग्रेज देश की राजधानी तो कोलकाता से दिल्ली ले आए थे। लेकिन आजादी के बाद पचास के दशक तक कोलकाता देश की आर्थिक राजधानी बनी हुई थी। देश के राजस्व का चालीस फीसदी कोलकाता से आता था। साठ के दशक में ज्योति बसु और प्रमोद दासगुप्त नाम के दो वामपंथियों ने खेत मजदूरों और कामगारों की एटक में भर्ती शुरू की। बड़े पैमाने पर मार्क्सवादी थ्योरी पर आधारित पुस्तकें और पैंम्फलेट तैयार करके पढ़े-लिखे लोगों को प्रभावित करने में सफलता हासिल की गई। जमीनी तौर पर मजबूत होते ही कम्युनिस्टों ने अपने काडर के अलावा बाकी सभी को बुर्जुआ, सामंती, अमेरिका का पिट्ठू और सीआईए का एजेंट कहना शुरू कर दिया। प्रशासनिक पदों पर तैनात अधिकारियों, व्यापारिक संस्थानों और औद्योगिक घरानों को जनविरोधी, गरीब विरोधी, किसान विरोधी और वर्कर विरोधी कहा गया।

बीजेपी मीटिंग में जमकर चले जुबान के जूते

हार के बाद अब मंथन की बारी। शनिवार दिल्ली में सीपीएम और बीजेपी बैठे। तो पटना में लालू की टोली। हारने वाली यही तीनों पार्टियां। सीपीएम की मुसीबत सिर्फ हार नहीं। अलबत्ता एसेंबली की संभावित हार का भी डर। पर हार की सबसे ज्यादा छटपटाहट लालू को। सोनिया-मनमोहन ने भी दूध से मक्खी की तरह निकाल दिया। यों शकील अहमद बता रहे थे- 'लालू हमसे मिलकर लड़ते तो न उनका ऐसा हाल होता, न हमारा।' पर आज बात न लालू की, न सीपीएम की। आज बात बीजेपी की। जिसकी दो दिनी वर्किंग कमेटी शनिवार को शुरू हुई। अपन को पहले से अंदेशा था- जमकर चलेंगे जुबान के जूते। इसीलिए अपन ने 19 जून को लिखा था- 'अपन वर्किंग कमेटी की वजह नहीं जानते।

क्या केन्द्र लालगढ़ को मानेगा आर्गेनाइज्ड क्राइम

यों गुजकोक और लालगढ़ में कोई समानता नहीं। पर समानता इस लिहाज से। गुजकोक आर्गेनाइज्ड क्राइम के खिलाफ बिल। लालगढ़ आर्गेनाइज्ड क्राइम का सबूत। पहले बात गुजकोक की। बात उन दिनों की। जब अक्षरधाम में आतंकी हमला हुआ। तब मोदी ने महाराष्ट्र के मकोका जैसा बिल पास करवाया गुजकोक। यानी- 'गुजरात कंट्रोल ऑफ आर्गेनाइज्ड क्राइम।' आर्गेनाइज्ड क्राइम के खिलाफ दुनियाभर में कानून बने। वैसे जरूरी नहीं, जो सब जगह 'आर्गेनाइज्ड क्राइम' शब्द का इस्तेमाल हो। जैसे इटली में नहीं। पर क्रिमिनल एसोसिएशन का जिक्र है। इटली के संविधान की धारा 416 में लिखा है- 'जब तीन या ज्यादा जने एक से ज्यादा क्राइम के लिए इकट्ठे हों। तो उन्हें तीन से सात साल की सजा होनी चाहिए।'

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट