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June 2009

बाबरी रपट : बीजेपी की कंगाली में आटा गीला

तो अपन ने इक्कीस मई को क्या लिखा था- 'कांग्रेस इस बार हिसाब चुकता करेगी। आडवाणी-मोदी को चार्जशीट का इरादा। आडवाणी पर लिब्राहन आयोग की मार पड़ेगी। मोदी पर सुप्रीम कोर्ट जांच बिठा चुकी।' तो अपनी भविष्यवाणी के सिर्फ इकतालिसवें दिन आ गई रिपोर्ट। साढ़े सोलह साल लगे लिब्राहन आयोग को। छह दिसंबर 1992 को बाबरी ढांचा टूटा। सोलह दिसंबर को आयोग बना। तीन महीने का वक्त था। आयोग ने लगाए 198 महीने। वाजपेयी चाहते तो बार-बार अवधि बढ़ाने की मांग ठुकरा देते। अपने यहां एक बार जो आयोग का चेयरमैन बन जाए। फिर जांच तो उसी के हिसाब से पूरी होगी। जस्टिस लिब्राहन साढ़े सोलह साल सुप्रीम कोर्ट के जज नहीं रहे। पर साढ़े सोलह साल आयोग के चेयरमैन रह गए।

मानसून और शतरंज की राजनीतिक गोटियां

अपनी निगाह तो बेंगलुरु पर थी। बेंगलुरु की किस्मत जगे। तो अपन बरसात की उम्मीद लगाएं। पर बेंगलुरु की खबर खराब मिली। मानसून ने अबके बेंगलुरु के भी पसीने छुटा दिए। सोमवार को भोपाल-इंदौर में झमाझम हुई। शिवराज सिंह चौहान का रुद्राभिषेक कामयाब रहा। प्री मानसून ने ही बल्ले-बल्ले कर दी। सोमवार को तो जयपुर के आसपास भी छींटे पड़ गए। भोपाल-इंदौर-जयपुर की खबरों से अपन को दिल्ली की किस्मत खराब लगी। अस्थमा वालों के लिए दिल्ली के ये दिन बहुत खराब। ऊपर से शीला दीक्षित का बिजली मैनेजमेंट चरमरा गया।

आपातकाल की वजह जेपी आंदोलन नहीं था

इंदिरा गांधी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुए जेपी आंदोलन के कारण आपातकाल नहीं लगाया था। अलबत्ता इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से लोकसभा में उनका निर्वाचन रद्द करने के फैसले के कारण लगाया था।

पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में पहली बार वोट डालने वाले 18 साल के नौजवान को उस आपातकाल के बारे में नहीं पता होगा। जो उसके जन्म से 16 साल पहले भारत में लगा था। बीते हफ्ते 25 जून को आपातकाल को 34 साल पूरे हो चुके थे। आज की पीढ़ी को लोकतंत्र के उस काले अध्याय के बारे में बताना जरूरी है, ताकि वह अपने वोट की कीमत समझ सके। आपातकाल में लोकसभा का कार्यकाल पांच साल से बढ़ाकर छह साल कर दिया गया था। अगर उसे बदल नहीं दिया जाता तो अप्रेल-मई 2009 में पंद्रहवीं लोकसभा के लिए पहली बार वोट डालने वाला नौजवान बारहवीं या तेरहवीं लोकसभा के लिए वोट डाल रहा होता।

सौ दिनी एजेंडे में उलझी मनमोहन की केबिनेट

अपन जानते हैं दसवीं के इम्तिहान का एक बोर्ड नहीं हो सकता। सो अपन ने कल इस पर ज्यादा तवज्जो नहीं दी। सभी प्रांतों की संस्कृति, इतिहास, भाषा-बोली अलग-अलग। मौसम के मुताबिक छुट्टियों-इम्तिहानों का वक्त भी अलग-अलग। सो एक बोर्ड की बात देश में नया बवाल खड़ा करेगी। अपन ने सिब्बल की उन्हीं योजनाओं की तारीफ की। जो तारीफ के काबिल। वैसे जितनी तारीफ अपन ने कर दी। उतनी कांग्रेसी भी करने को तैयार नहीं। शुक्रवार को कांग्रेस का एक महासचिव सिब्बल पर बरसा। महासचिव आन रिकार्ड कहने को तैयार नहीं। पर इसका मतलब यह नहीं- पार्टी में बवाल नहीं होगा।

अपनी यूनिवर्सिटियों को ही मिले एफडीआई का हक

बदलाव की बयार तो काम में भी बहने लगी। मनमोहन ने आडवाणी के सारे अच्छे काम अपना लिए। सुशासन की पूरी तैयारी। काला धन वापस लाने का वादा। आतंकवाद के खिलाफ प्रो-एक्टिव नीति। एक रैंक एक पेंशन। सब नागरिकों को पहचान पत्र। पहचान पत्र तो आडवाणी का पुराना सपना। जो वह अपने वक्त नहीं कर पाए। मनमोहन ने राष्ट्रपति के अभिभाषण में वादा किया। तो अभिभाषण के बीसवें दिन 25 जून को काम शुरू कर दिया। इंफोसिस के नंदन नीलेकणी को यूआईडी अथारिटी बनाकर चेयरमैन बना दिया। बात मुकाबले की चली। तो मुकाबला तो करना पड़ेगा।

कांग्रेस में बारी रेवड़ियों की, बीजेपी में बदलाव की

बदलाव की बयार बहने लगी। बदलाव की बयार दोनों तरफ बही। बीजेपी ने उत्तराखंड से बदलाव की शुरूआत की। तो कांग्रेस ने महासचिवों से पहले गवर्नर बदलने शुरू किए। बात बीजेपी-कांग्रेस की चली। तो बुधवार को दोनों एक मुद्दे पर सहमत दिखे। अशोका रोड से वेंकैया नायडू माओवादियों के मुद्दे पर लेफ्ट के रुख पर भड़के। तो अकबर रोड से मनीष तिवारी। पहले लेफ्ट के रुख की बात। बुधवार को लेफ्ट ने कहा- 'माओवादियों को आतंकवादी बताने से समस्या का समाधान नहीं होगा।' बता दें- चारों वामपंथी दल माओवादियों पर बैन से खफा। पर वामपंथी सीएम बुध्ददेव भट्टाचार्य अपने दल से सहमत नहीं। इसका धमाकेदार खुलासा श्रीप्रकाश जायसवाल ने किया।

बीजेपी की हार का पहला विकेट उत्तराखंड में गिरा

भुवन चंद्र खंडूरी का गुस्सा सातवें आसमान पर। बीजेपी आलाकमान ने इस्तीफा जो मांग लिया। यों फैसला हुआ सोमवार की कोर कमेटी में। पर अबके खबर लीक नहीं हुई। सो मंगलवार को लीक न होने पर खूब चुटकलेबाजी हुई। बीजेपी के नेता कहते मिले- 'यह फायदा है अरुण जेटली के विदेश में होने का।' वैसे अपन बता दें- आडवाणी का पहला विकेट गिरा। आडवाणी ही बचा रहे थे खंडूरी को। नहीं तो चुनावों से पहले ही निपट जाते। फौजी बैकग्राउंड के खंडूरी एमएलए साथ नहीं रख पाए। बीजेपी ने एसेंबली चुनाव में किसी को प्रोजेक्ट नहीं किया था। पर पार्टी के अध्यक्ष तब कोश्यारी थे। पर आडवाणी ने लोकसभा से इस्तीफा दिलाकर खंडूरी को सीएम बनवाया। मकसद था- नेशनल हाईवे जैसा करिश्मा उत्तराखंड में भी दिखे। पर खंडूरी के पांव जमीन पर नहीं रहे।

तो सांप्रदायिक हिंदुत्व पर चोट करे बीजेपी

वरुणवादी हिंदुत्व चलेगा न तोगड़ियावादी। बजरंगदली, रामसेना जैसा हिंदुत्व भी नहीं। वरुण को आडवाणी-राजनाथ का समर्थन मिला। तभी से भ्रम था। शाहनवाज और नकवी ने कुछ और नहीं पूछा। उनने पूछा था- 'बीजेपी में दीनदयाल उपाध्याय-आडवाणी का हिंदुत्व चलेगा। या पीलीभीत मार्का हिंदुत्व।' बीजेपी पीलीभीत मार्का हिंदुत्व कबूल करे। तो उसमें नकवियों-शाहनवाजों का क्या काम। सो बीजेपी ने अपने राजनीतिक प्रस्ताव में साफ किया- 'कट्टरपंथ कबूल नहीं। पर हिंदुत्व जीवन पध्दति। हिंदुत्व इस देश की आत्मा। हिंदुत्व ही भारतीय।'

बंगाल में पतन की ओर वामपंथी

ममता से मुकाबले के लिए माकपा ने खुद माओवादियों को बंगाल में बुलाया। अब माओवादी किसानों, मजदूरों, आदिवासियों के जख्मों पर मरहम रख खोद रहे हैं वामपंथी जमीन।

अंग्रेज देश की राजधानी तो कोलकाता से दिल्ली ले आए थे। लेकिन आजादी के बाद पचास के दशक तक कोलकाता देश की आर्थिक राजधानी बनी हुई थी। देश के राजस्व का चालीस फीसदी कोलकाता से आता था। साठ के दशक में ज्योति बसु और प्रमोद दासगुप्त नाम के दो वामपंथियों ने खेत मजदूरों और कामगारों की एटक में भर्ती शुरू की। बड़े पैमाने पर मार्क्सवादी थ्योरी पर आधारित पुस्तकें और पैंम्फलेट तैयार करके पढ़े-लिखे लोगों को प्रभावित करने में सफलता हासिल की गई। जमीनी तौर पर मजबूत होते ही कम्युनिस्टों ने अपने काडर के अलावा बाकी सभी को बुर्जुआ, सामंती, अमेरिका का पिट्ठू और सीआईए का एजेंट कहना शुरू कर दिया। प्रशासनिक पदों पर तैनात अधिकारियों, व्यापारिक संस्थानों और औद्योगिक घरानों को जनविरोधी, गरीब विरोधी, किसान विरोधी और वर्कर विरोधी कहा गया।

बीजेपी मीटिंग में जमकर चले जुबान के जूते

हार के बाद अब मंथन की बारी। शनिवार दिल्ली में सीपीएम और बीजेपी बैठे। तो पटना में लालू की टोली। हारने वाली यही तीनों पार्टियां। सीपीएम की मुसीबत सिर्फ हार नहीं। अलबत्ता एसेंबली की संभावित हार का भी डर। पर हार की सबसे ज्यादा छटपटाहट लालू को। सोनिया-मनमोहन ने भी दूध से मक्खी की तरह निकाल दिया। यों शकील अहमद बता रहे थे- 'लालू हमसे मिलकर लड़ते तो न उनका ऐसा हाल होता, न हमारा।' पर आज बात न लालू की, न सीपीएम की। आज बात बीजेपी की। जिसकी दो दिनी वर्किंग कमेटी शनिवार को शुरू हुई। अपन को पहले से अंदेशा था- जमकर चलेंगे जुबान के जूते। इसीलिए अपन ने 19 जून को लिखा था- 'अपन वर्किंग कमेटी की वजह नहीं जानते।

क्या केन्द्र लालगढ़ को मानेगा आर्गेनाइज्ड क्राइम

यों गुजकोक और लालगढ़ में कोई समानता नहीं। पर समानता इस लिहाज से। गुजकोक आर्गेनाइज्ड क्राइम के खिलाफ बिल। लालगढ़ आर्गेनाइज्ड क्राइम का सबूत। पहले बात गुजकोक की। बात उन दिनों की। जब अक्षरधाम में आतंकी हमला हुआ। तब मोदी ने महाराष्ट्र के मकोका जैसा बिल पास करवाया गुजकोक। यानी- 'गुजरात कंट्रोल ऑफ आर्गेनाइज्ड क्राइम।' आर्गेनाइज्ड क्राइम के खिलाफ दुनियाभर में कानून बने। वैसे जरूरी नहीं, जो सब जगह 'आर्गेनाइज्ड क्राइम' शब्द का इस्तेमाल हो। जैसे इटली में नहीं। पर क्रिमिनल एसोसिएशन का जिक्र है। इटली के संविधान की धारा 416 में लिखा है- 'जब तीन या ज्यादा जने एक से ज्यादा क्राइम के लिए इकट्ठे हों। तो उन्हें तीन से सात साल की सजा होनी चाहिए।'

कांग्रेस में आज केक कटेंगे, बीजेपी में मातम

राहुल गांधी को जन्मदिन की बधाई। दिग्गी राजा अपनी पार्टी के राजकुमार का जन्मदिन मनाएंगे। अपन न तो राजा लिख सकते हैं, न राजकुमार। यह है कांग्रेस का नया फरमान। फरमान अपनी सिर आंखों पर। देर आयद, पर दुरुस्त आयद। अपन बात कर रहे थे राहुल के जन्म दिन की। तो दिग्विजय सिंह आज यूपी में जाएंगे। दलितों के साथ बैठकर लंच करेंगे। नाम रखा है समरसता दिवस। दिग्विजय सिंह खुद राज परिवार से। अपने जन्मदिन पर दलितों के साथ लंच करते। तो अच्छा भी लगता। जैसे राहुल महासचिव। वैसे ही वह खुद कांग्रेस के महासचिव। दस साल मध्यप्रदेश के सीएम भी रह चुके। पर बात सिर्फ दिग्विजय सिंह की नहीं। बात सारी कांग्रेस पार्टी की। अपन को यह तो नहीं पता- राहुल गांधी आज खुद कहां होंगे।

पाक की ईमानदारी ही तो शक के घेरे में

अपन पाक के लिए यह तो नहीं कहते- 'लातों के भूत बातों से नहीं मानते।' पाक के पास एटमी हथियार न होता। तो वाजपेयी संसद पर हमले के बाद यह फार्मूला अपनाते। फौजें तो उनने बार्डर पर भेज ही दी थी। भले देर लगी। पर वाजपेयी ने मुशर्रफ के घुटने टिकाकर ही दम लिया। जब उनने छह जनवरी 2004 को मुशर्रफ से कहलवाया- 'सरजमीं पाक से भारत के खिलाफ आतंकवाद नहीं होने देंगे।' अपन को वह 15 जुलाई 2001 का वाकया भी याद। जब आगरा में संपादकों से ब्रेक फास्ट में मुशर्रफ ने कहा था- 'कश्मीर में आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही है।' इसी बात पर टूट गई थी बात। मुशर्रफ ख्वाजा मुइन्नुद्दीन चिश्ती की दरगाह में नहीं जा सके।

न-न करते बात उन्हीं से कर बैठे

अपन नहीं जानते मनमोहन सिंह ने पहले चुप्पी क्यों साधी। दिल्ली से रूस उड़े थे। तो पूछा था- 'क्या जरदारी से बातचीत होगी?' उनने चुप्पी साध ली। शायद मनमोहन सिंह दुविधा में थे। राष्ट्रपति के अभिभाषण में दिखाई सख्ती पर चलें। या अमेरिकी दबाव में गतिरोध तोड़ें। अमेरिकी उपविदेश मंत्री विलियम बर्न्स दस जून को भारत आए। तो उनने साफ-साफ कहा था- 'अमेरिका चाहता है भारत-पाक बातचीत शुरू हो।' तब कृष्णा ने भी कह दिया था- 'बातचीत तभी शुरू होगी। जब पाक सीमा पार से आतंकवाद रोके।'

कांग्रेस ने जीत से सीखा, बीजेपी ने हार से भी नहीं

अपन ने तेरह जून को लिखा था- 'बीजेपी की महाभारत अभी तो शुरू ही हुई है।' अपन ने गलत तो नहीं लिखा था। उसी दिन यशवंत सिन्हा का बम फट गया। पर यशवंत के बाद कोई बम फटता। पहले ही राजनाथ ने धमकी दे दी- 'अब कोई फन्नेखां बनेगा। तो सख्त कार्रवाई होगी।' सो मुरली मनोहर जोशी का बम धरा रह गया। प्यारे लाल खंडेलवाल और विनय कटियार का भी। सुषमा स्वराज सोमवार को भोपाल में जो बोली। अनुशासनहीनता के दायरे में नहीं आता। तूफान तो बीजेपी में है ही। उसे वालकेनो कहें या रीटा या आईला। उससे फर्क नहीं पड़ता। पर उनने कहा- 'आडवाणी पांच साल विपक्ष के नेता रहेंगे।' तो अपन कतई सहमत नहीं। या तो वह चंदन मित्रा वाले मामले से डर कर बोली।

सामाजिक न्याय का महिला आरक्षण भी संभव

पाकिस्तान की तरह राजनीतिक दलों को आम चुनाव में मिली सीटों के अनुपात में महिलाओं को मनोनीत करने का अधिकार देकर 33 फीसदी आरक्षण सहजता से लागू किया जा सकता है। राजनीतिक दल सभी वर्गों की महिलाओं को मनोनीत करने की नैतिक जिम्मेदारी से बंध जांएगे।

मनमोहन सरकार ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील के लिए तैयार किए पहले अभिभाषण में अपनी सरकार की पहले सौ दिनों में लागू की जाने वाली पच्चीस प्राथमिकताएं गिनाई हैं। इन प्राथमिकताओं में सबसे ज्यादा चर्चा और विवाद संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण को लेकर है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मनमोहन सरकार अपने वादे को पूरा कर पाएगी।

बीजेपी की महाभारत अभी तो शुरू ही हुई है

जो खुद जीत नहीं सकता। बेटे को जिता नहीं सकता। दूसरी जमीन पर दूसरों की दया से जीते। वह जब युवा चेहरे पर आपत्ति उठाए। तो बीजेपी में हड़कंप मचना ही था। बीजेपी में अब चारों तरफ घमासान। कर्नाटक से लेकर दिल्ली तक। येदुरप्पा के खिलाफ पहले अनंत कुमार लठ्ठ लिए घूमते थे। अब बारी ईश्वरप्पा की। ईश्वरप्पा ने येदुरप्पा के खिलाफ मोर्चा खोल लिया। सेंट्रल हाल में अपन ने अनंत कुमार को इतना खुश पहले नहीं देखा। जितना इस बार सेशन के दौरान दिखे। कांग्रेस क्यों फायदा उठाने से चूके। सो कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार जयराम रमेश मैदान में। उनने बेल्लारी पर निगाह टिका ली। बेल्लारी बनी है बीजेपी की दूध देने वाली गाय।

लालू सोचते होंगे- अब आई सीपीएम की भैंस पानी में

अब सीपीएम भी बेदाग नहीं। सीपीएम के केरल सेक्रेटरी के खिलाफ भ्रष्टाचार की चार्जशीट। प्रकाश करात ने पिनराई विजयन को बचाने की लाख कोशिश की। सीबीआई को मुकदमा चलाने की इजाजत न मिले। अपने ही सीएम वीएस अच्युतानंदन पर दबाव डाला। एडवोकेट जनरल से विजयन के हक में रिपोर्ट लिखवाई। केबिनेट से विजयन के हक में फैसला करवाया। पर गवर्नर आरएस गवई ने केबिनेट की सिफारिश ठुकरा दी। सीबीआई को मुकदमा चलाने की इजाजत दे दी। गवर्नर ने वही किया। जो उन्हें करना चाहिए था। यह पहली बार नहीं हुआ। भाई महावीर जब एमपी के गवर्नर थे। तो उनने भी सीएम दिग्विजय की सिफारिश के खिलाफ मंत्रियों पर मुकदमे की इजाजत दी थी। कांग्रेस ने सिर्फ एक ही गवर्नर ऐसा बनाया- जो कांग्रेसी नहीं था।

सोनिया बोली- आसान नहीं महिला आरक्षण

सौ दिन का फंडा। फंडे का सबसे बड़ा फंदा है महिला आरक्षण। पर सौ दिन का सरकार को उतना बुखार नहीं। जितना यादवों-लोधों और मीडिया को। राष्ट्रपति से अभिभाषण में मनमोहन ने यही तो कहलवाया था- 'मेरी सरकार 100 दिनों के भीतर इन उपायों पर कदम उठाएगी।' जो पच्चीस मुद्दे गिनाए। उनमें महिला आरक्षण भी था। सो बात सिर्फ कदम उठाने की। सौ दिन में बिल पास कराने की तो बात नहीं। यों पवन बंसल बता रहे थे- 'आखिरी हफ्ते में शुरू होगा बजट सेशन।' अपना अंदाज 29 जून का। पहली जुलाई को ममता का रेल बजट। दो को इकनामिक सर्वे। तीन को प्रणव दा का बजट। पर बात महिला आरक्षण पर आल पार्टी मीटिंग की। फिलहाल तो सरकार के पास दूसरे कई काम।

बीस-पच्चीस फीसदी में सहमति की हवा

शरद-मुलायम-लालू यादवों के साथ अब लोध कल्याण सिंह भी। घर के भेदी ने लंका ढहाने का मन बना लिया। उनने सामने बैठे लालकृष्ण आडवाणी से तो कुछ नहीं कहा। एनडीए के कनवीनर शरद यादव से कहा- 'क्यों नहीं आडवाणी से कहते- महिला आरक्षण में पिछड़ों-अल्पसंख्यकों का कोटा हो। आडवाणी न मानें, तो खत्म करो एनडीए।' शरद चुप्पी साधकर बैठे रहे। पर इसे आप शरद की चुप्पी न समझिए। शरद ने ही सुकरात की तरह जहर का घूंट पीने की बात कही थी। सोमवार को मुलायम ने वह राह अपनाई। तो मंगलवार को लालू और कल्याण ने। बीजेपी छोड़ चुके कल्याण को मुलायम ने अपनी पार्टी में तो नहीं लिया। पर कल्याण का साथ लिया-दिया।

जेना को केबिनेट दर्जा देकर मनाएंगे मनमोहन

मनमोहन का मंत्रिमंडल तो बन चुका। प्लेनिंग कमिशन भी निपट चुका। संसद के गलियारों में अब रेवड़ियों की गुफ्तगू। गलियारों से लेकर सेंट्रल हाल तक। जिसे देखो, कोई नई अफवाह सुनाएगा। अफवाहों के जोर का नमूना देखिए। सेंट्रल हाल में बतिया रहे केबिनेट मंत्री से एक नियुक्ति के बारे पूछा। तो बोले- 'फलां नाम की अफवाह सुनी है।' मंत्री अफवाह की बात करें। तो अंदाज लगाइए क्या-क्या चल रहा होगा। मंत्री के मुंह से अफवाह का लफ्ज सुनते ही अपन मुस्कराए। तो उनने सफाई दी- 'पीएम ने मुझसे बात नहीं की। सो सुनी-सुनाई बात को मैं अफवाह ही कहूंगा।' बात अफवाहों की चल ही पड़ी। तो बताते जाएं- पीएम का मीडिया सलाहाकर कौन होगा? अब इस को लेकर कुछ अटकलें। तो कुछ अफवाहें। पर कुछ गंभीरता भी। मनमोहन ने पिछली बार संजय बारु को चुना था। संजय बारु न कांग्रेसी थे, न कांग्रेस के करीब। न ही राजनीतिक पत्रकारिता का इतिहास।

सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी युवाओं के प्रति

जो युवा राहुल गांधी के लिए पलक पांवड़े बिछाए हुए हैं, उनके सपने साकार नहीं हुए, तो वे सूपड़ा साफ करने में भी देर नहीं लगाएंगे। कांग्रेस की एक गलती उसे भारी पड़ सकती है।

पंद्रहवीं लोकसभा के साथ संसदीय इतिहास का नया अध्याय शुरू हुआ है। राजीव गांधी प्रचंड जीत के बाद पिछले बीस साल से संसद में भारी राजनीतिक टकराव का वातावरण बना रहा। छह साल सत्ता में रहने के बाद लगातार दूसरी हार ने भाजपा को हताश कर दिया है। वह अब टकराव का रास्ता छोड़ती हुई दिखाई दे रही है। अपनी मां इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी सहानुभूति की लहर पर सवार होकर लोकसभा की 414 सीटें जीतकर ले आए थे। विपक्ष की हालत 1952 से भी बुरी हो गई थी, जब देश का पहला लोकसभा चुनाव हुआ था। राजीव गांधी ने अपने कार्यकाल में अपनी मां की ओर से विरासत में मिली पंजाब, मिजोरम, नगालैंड, मणिपुर जैसी अनेक समस्याओं को हल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए थे। पड़ोसी देश चीन के साथ संबंध सुधारने के लिए उन्होंने खुद चीन का दौरा किया। ऐसे समय में जब सोवियत संघ का टूटना साफ दिखाई देने लगा था राजीव गांधी ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन को जिंदा रखने की कोशिश की थी। उन्होंने देश को एहसास दिलाया था कि युवा नेतृत्व चाहे तो क्या कुछ कर सकता है,

सिर मुड़ाने से अब जहर खाने तक की राजनीति

असल में संसद शुक्रवार को शुरू हुई। पहले ही दिन कोई सदन में सो जाए। वह भी चेयरमैन की कुर्सी पर बैठकर सो जाए। तो इसे अपशकुन न समझें। राज्यसभा में पहले ही दिन यह हो गया। जयंती नटराजन आसन पर बैठी-बैठी सोने लगी। तो अरुण जेटली ने जयंती को चिट भिजवाई- 'सदन में बैठकर सोने पर तब तक किसी को एतराज नहीं होगा। जब तक कोई सो कर खर्राटे न लेने लगे।' अर्दली ने चिट देकर चौंकाया। तो जयंती पढ़कर मुस्कुराई। यह फर्क अब राज्यसभा में अक्सर दिखा करेगा। यही फर्क है जसवंत और जेटली में। जेटली की 'सेंस आफ ह्यूमर' का जवाब नहीं। पर जेटली जब हमले करने को आएं। तो सामने वाले की बखियां उधेड़कर रख दें। यों तो जेटली जनता के फैसले पर फूल चढ़ाने की तैयारी से आए थे। 

दो राष्ट्रपति, दो भाषण वादा देश-दुनिया बदलने का

अपनी राष्ट्रपति का इस साल दूसरा अभिभाषण हुआ। हर साल के पहले सेशन में तो अभिभाषण होता ही है। नई लोकसभा चुनकर आए, तब भी अभिभाषण। सो 2004 के बाद 2009 में ऐसा हुआ। अपन जहां अपनी राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील के अभिभाषण की बात करें। वहीं गुरुवार को एक और राष्ट्रपति का भाषण हुआ। जिसकी चर्चा दुनियाभर में। यह हैं- अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक हुसैन ओबामा। अपन पहले भी इसी कालम में लिख चुके- बाराक ओबामा के पिता मुस्लिम थे। अब जब पूरी दुनिया के मुसलमान अमेरिका के खिलाफ। तो अपन को बाराक ओबामा से ही कुछ उम्मीद थी। सो ओबामा ने गुरुवार को मिश्र की राजधानी काहिरा जाकर शुरूआत की।

राजनाथ-आडवाणी-अरुण की तिकड़ी छह महीने ही

ज्योति बाबू-अटल बिहारी की रिटायरमेंट के बाद करुणानिधि ही सबसे बुजुर्ग नेता। अपन यह कहें- करुणानिधि सबसे बुजुर्ग एक्टिव नेता। तो गलत नहीं होगा। वाजपेयी-ज्योति बाबू के बाद अब रिटायरमेंट की बारी करुणानिधि की। करुणानिधि बुधवार को 86 साल के हो गए। तो बधाईयों का तांता लगा। करुणानिधि संन्यास का ऐलान कर ही देते। तो अच्छा रहता। जैसे वाजपेयी ने बीजेपी के मुंबई अधिवेशन में किया था। जैसे ज्योति बाबू ने सीएम पद की कुर्सी छोड़कर किया था। करुणानिधि बुधवार को ज्योतिबाबू का अनुसरण करते। तो हिस्ट्री में ज्योतिबाबू के बाद नाम लिखा लेते। यों करुणानिधि अपना राजनैतिक वारिस अपने बेटे स्टालिन को बना चुके। पिछले हफ्ते की ही तो बात। अब एसेंबली इलेक्शन में स्टालिन सीएम प्रोजेक्ट होंगे। मनमोहन-सोनिया की बधाई तो बनती थी। सो उनने दी। बधाई आडवाणी और डी राजा ने भी भेजी। पर बात जब राजनैतिक बुजुर्गों की चले।

स्पीकर-डिप्टी स्पीकर पर भी जातिवादी तड़का

तो बीजेपी ने अपना मन बदल दिया। सुमित्रा महाजन की बजाए अब करिया मुंडा डिप्टी स्पीकर होंगे। ब्राह्मण की जगह आदिवासी। यों महिला डिप्टी स्पीकर का आइडिया बीजेपी का था। जिसे कांग्रेस ने चुरा लिया। यों कांग्रेस ने पहले आदिवासी केशव देव को स्पीकर बनाना था। बीजेपी का आइडिया देख कांग्रेस ने मोर्चा मारा। केशव देव की बनी बनाई बात बिगड़ गई। कोर कमेटी में सोनिया ने कहा- 'क्यों न महिला स्पीकर बनाई जाए। हमने पहले महिला राष्ट्रपति बनाई।' अब सोनिया कहे, तो टोकने की हिम्मत कौन करे। महिलाओं पर विचार शुरू हुआ। तो टारगेट राहुल पर आकर अटका। तो वहां सिर्फ एक ही महिला तो जीतकर आई। मीरा कुमार, दलित भी। तो कांग्रेस के लिए यह सोने पर सुहागा हो गया। कांग्रेस ने दलित महिला कार्ड खेला। तो बीजेपी को भी टारगेट झारखंड का ख्याल आया। झारखंड के चुनाव बस आए-कि- आए। तो कांग्रेस के दलित कार्ड पर बीजेपी का आदिवासी कार्ड।