May 2009

हमारा ताजा आंकलन (8 मई 2009)

यूपीए = कांग्रेस 144, ममता 11, पवार 11, करुणानिधि 08, शिबू 03, फारुख 02, अन्य 02 = 181,
यूपीए के सहयोगी भी जोड़ें, तो = लालू 08, मुलायम 22, पासवान 02 = 213,
लेफ्ट के 38 भी साथ जोड़ लें, तो = 249

एनडीए = भाजपा 149, जदयू 18, शिवसेना 13, अकाली 04, अगप 04, अजित 05, चौटाला 01, मीणा 01 = 195

थर्ड फ्रंट = लेफ्ट केरल 08, आंध्र 02, बंगाल 24, त्रिपुरा 02, तमिलनाडु 02 = 38,
मायावती यूपी 27, चंद्रबाबू 17, चंद्रशेखर राव 04, भजन 01, देवगौड़ा 03, जयललिता 28, नवीन पटनायक 10, कुल = 128

यूपीए का पहला विकल्प
213 + 27 (माया) + 28 (जयललिता)= 268, तो इसमें मुलायम और करुणानिधि के 30 निकालने पड़ेंगे।
तब बाकी बचेगा यूपीए = 238

यूपीए का दूसरा विकल्प
238 में लेफ्ट के 36 जोड़ें तो = 276, तो इसमें से ममता के 11 निकालने पड़ेंगे।
तब बाकी बचेगा यूपीए = 265

यूपीए का एकमात्र विकल्प
लेफ्ट सहित सारा सेक्युलर कुनबा = 251 + चंद्रशेखर राव (04) + भजन (01) +  देवगौड़ा (03) + मायावती (27) + जयललिता (28) + नवीन (10) =324,
तो इसमें ममता (11) + मुलायम (22) और करुणानिधि (08) निकालने पड़ेंगे। तब बाकी बचे = 283

थर्ड फ्रंट की संभावना
थर्ड फ्रंट 128 + लालू + पासवान (10) + पवार (11) + शिबू (03) + फारुख (02) = 154 + कांग्रेस (143) = 298

एनडीए की संभावना
195 + माया (27) + जयललिता (28) + बाबू, चंद्रशेखर (21) + नवीन (10) + भजन (01) = 282

राज्यवार सभी दलों की स्थिति

मुलायम भी रखने लगे समर्थन की दोटूक शर्त

चौथे फेज का चुनाव भी निपट गया। अब देश की सिर्फ 86 सीटें बाकी। चौथे फेज में वोटिंग बेहतर हुई। पिचहत्तर फीसदी वोटिंग से बंगाल अव्वल रहा। तो इसे ममता बनर्जी का फायदा मानिए। दूसरे नंबर पर पंजाब रहा। जहां सिर्फ चार सीटों पर वोट पड़े। अपन बंगाल और पंजाब की बात आगे करेंगे। फिलहाल हरियाणा और राजस्थान की बात। राजस्थान में तो दो सीटों पर गुर्जर-मीणा खूनी संघर्ष भी हुआ। दोनों राज्यों में सभी सीटें निपट गई। हरियाणा में कांग्रेस को नुकसान होगा। तो राजस्थान में फायदा। पर राजस्थान में सिर्फ 51 फीसदी वोटिंग। सिर्फ चार महीने पहले एसेंबली चुनाव हुए। तो 68 फीसदी हुई थी वोटिंग। जिसने कांग्रेस की सरकार बनवा दी। शायद वसुंधरा को इसका अंदाज था।

बात आकर टिकेगी ममता, माया और जयललिता पर

ममता ने आंख दिखाई। लालू-पासवान भड़के। तो कांग्रेस की घिग्गी बंध गई। राहुल ने नीतिश की तारीफ की। तो लालू-पासवान को भड़कना ही था। ममता तो राजनीति में राहुल से ज्यादा स्पष्टवादी। सो उनने दो टूक कह दिया- 'तृणमूल-वामपंथियों में एक को चुनना होगा।' अपन नहीं जानते राहुल को दाना फेंकने की जल्दी क्या थी। बंगाल-बिहार का चुनाव तो निपटने देते। बात चंद्रबाबू नायडू की। राहुल ने तारीफ क्या की। राजशेखर रेड्डी की तो नींद उड़ गई। आराम फरमा रहे थे शिमला में। नींद उड़ी, तो बिना सोनिया-राहुल से मिले हैदराबाद उड़ गए। चुनाव निपटाकर राजशेखर शिमला में आराम फरमा रहे थे। तो चंद्रबाबू छुट्टी मनाने यूरोप चले गए। सीएम बनकर जाते। तो केंद्र से इजाजत लेनी पड़ती।

जमीनी हकीकत से नावाकिफ नहीं राहुल

अपन ने कल कांग्रेस की रणनीति का खुलासा किया ही था। उसी रणनीति के तहत राहुल मीडिया से रू-ब-रू हुए। दो मकसद भी अपन  ने बताए थे। पहला- राहुल को वरुण से ज्यादा राजनीतिक समझ वाला बताना। दूसरा- प्रियंका-दिग्गी राजा के बयानों से मची खलबली रोकना। आखिर अभी एक तिहाई सीटों में चुनाव बाकी। अभी हथियार क्यों डालें। दोनों मकसद पूरे हुए। राहुल ने अपनी राजनीतिक समझ दिखा दी। अब वरुण अपनी समझ दिखाएं। पर जैसी हैसियत राहुल की कांग्रेस में। वैसी वरुण की बीजेपी में नहीं। राहुल ने बेझिझक माना- 'मेरी हैसियत पारिवारिक बैकग्राउंड के कारण। यह सब जगह है, कहां नहीं। पर मैं इसे खत्म करना चाहता हूं।' पर बात राहुल के उन दो मकसदों की। राहुल का नया रूप दिखाई दिया।

हमारा ताजा आंकलन (5 मई 2009)

यूपीए = कांग्रेस 143, ममता 11, पवार 11, करुणानिधि 08, शिबू 03, फारुख 02, अन्य 01 = 179,
यूपीए के सहयोगी भी जोड़ें, तो = लालू 10, मुलायम 22, पासवान 02 = 213,
लेफ्ट भी साथ जोड़ लें, तो = 249

एनडीए = भाजपा 151, जदयू 16, शिवसेना 13, अकाली 04, अगप 04, अजित 03, चौटाला 01 = 192

थर्ड फ्रंट = लेफ्ट केरल 08, आंध्र 02, बंगाल 24, त्रिपुरा 02 = 36,
मायावती यूपी 32, चंद्रबाबू 17, चंद्रशेखर राव 04, भजन 01, देवगौड़ा 03, जयललिता 28, नवीन पटनायक 10, कुल = 131

यूपीए का पहला विकल्प
213 + 32(माया) + 28(जयललिता)= 273, तो इसमें मुलायम और करुणानिधि के 30 निकालने पड़ेंगे।
तब बाकी बचेगा यूपीए = 243

यूपीए का दूसरा विकल्प
243 में लेफ्ट के 36 जोड़ें तो = 279, तो इसमें से ममता के 11 निकालने पड़ेंगे।
तब बाकी बचेगा यूपीए = 268

यूपीए का एकमात्र विकल्प
लेफ्ट सहित सारा सेक्युलर कुनबा = 249 + चंद्रशेखर+ भजन + देवगौड़ा + मायावती + जयललिता + नवीन =327,
तो इसमें ममता+ मुलायम और करुणानिधि निकालने पड़ेंगे। तब बाकी बचे = 289

थर्ड फ्रंट की संभावना
थर्ड फ्रंट 131 + लालू + पासवान = 143 + पवार 11 + शिबू 03, फारुख 02 = 159 + कांग्रेस 143 = 302

एनडीए की संभावना
192 + 32 (माया) + 28 (जयललिता) + 21 (बाबू, चंद्रशेखर) + 10 (नवीन) + 01 (भजन) = 284

राज्यवार सभी दलों की स्थिति

अपन गांधी-गांधी खेल रहे, चीन बढ़ रहा अपनी ओर

चुनाव नतीजे आने में अब दस दिन बाकी। अपन को अगली सरकार के अस्थिर होने का पूरा खतरा। पर गांधी परिवार के वारिसों में जंग एक-दूसरे पर हावी होने की। वरुण की मार्किट वैल्यू बढ़ने लगी। तो दस जनपथ में बेचैनी। दो दिन पत्रकारों से राहुल को मिलवाया। बात बनती नहीं दिखी। तो अब अशोका होटल में प्रेस कांफ्रेंस। मकसद राहुल को वरुण से ज्यादा राजनीतिक समझ वाला बताने की। राहुल कांग्रेसियों की वह बेचैनी भी दूर करेंगे। जो प्रियंका और दिग्गी राजा ने पैदा की। दोनों ने कुछ ऐसे कहा- "सरकार न भी बनी। तो आसमान नहीं टूट जाएगा।" राहुल ने मनमोहन की जिद पकड़ तो ली। पर सेक्युलर दलों में मनमोहन पर ऐतराज अब और ज्यादा। बोफोर्स ने आग में घी डाल दिया। मनमोहन ने क्वात्रोची की पैरवी कर कमाल ही किया। ऐसी पैरवी तो राजीव गांधी ने भी कभी नहीं की। हां, सोनिया ने 1999 में जरूर की थी।

इम्तिहान तो दोनों राष्ट्रीय दलों का

लोकतंत्र का मतलब ही यही है कि देश हर पांच साल बाद अपनी नई सरकार और उसका मुखिया चुने। लोकतंत्र किसी एक राजनीतिक दल को ही सत्ता हासिल करने या उसी को प्रधानमंत्री पद हासिल करने का हकदार नहीं बनाता। लोकतंत्र का मतलब जनादेश से सत्ता तक पहुंचकर अपनी नीतियों से सरकार चलाना है। भारत के संसदीय लोकतंत्र में दो दलीय व्यवस्था भी नहीं है, कि छोटे-छोटे दलों को अपना विकास करके प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने का हक न हो। इसलिए इस बार जब प्रधानमंत्री पद के कई दावेदार दिखाई दे रहे हैं, तो इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यही लोकतंत्र की विशेषता है। पांच साल के शासनकाल के बाद भी कांग्रेस अगर देशभर में 150 सीटों का आंकड़ा पार नहीं करती है, तो जनादेश उसके खिलाफ माना जाएगा।

सेक्युलरिज्म दिखाने के दांत, खाने के नहीं

वेंकैया नायडू गलतफहमी में रहें। तो अपन टोकने वाले नहीं। नायडू का दावा सुन अपन हंसे। उनने कहा- 'सीबीआई ने बीजेपी के दबाव में आकर क्वात्रोची पर कार्रवाई का वक्त मांगा।' वेंकैया सीबीआई की ताजा अर्जी पर बोल रहे थे। सीबीआई ने कोर्ट से दो महीने की मोहलत मांगी। वेंकैया ने सीबीआई की अर्जी तो देखी। पर हंसराज भारद्वाज का बयान नहीं देखा। उनने कहा- 'बोफोर्स केस में कोई दम-खम नहीं।' अपन नहीं जानते वेंकैया क्यों गलतफहमी में। आडवाणी और जेटली को कोई गलतफहमी नहीं। दोनों की राय- 'कांग्रेस ने अपना काम कर दिया।' वेंकैया के तो उस दावे में भी अपन को दम नहीं लगा। उनने कहा- 'एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिलेगा।' अपन को आडवाणी-जेटली असलियत के करीब दिखे।