May 2009

कमजोर निकला मजबूत तो मजबूत पड़ा कमजोर

कांग्रेस की खुशी का ठिकाना नहीं। कितनी खुशियां एक साथ आ गई। बोफोर्स के कलंक से पीछा छूटा। मंडलवादी लालुओं-पासवानों-मुलायमों से भी। बताते जाएं- तीनों को मीटिंग में नहीं बुलाया सोनिया ने। पासवान तो पूरी तरह निपट गए चुनाव में। लालू भी निपटे जैसे ही। मुलायम की नाक जरूर बची। पर रीता बहुगुणा ने दिल्ली आकर खम ठोक दिया है- 'मुलायम से दूरी बरकरार रखी जाए।' अपन को उसका असर भी दिखा। जब बताया गया- 'सोनिया ने बुधवार को यूपीए मीटिंग में नहीं बुलाया।' यों लालू ने बिना शर्त समर्थन का एलान किया। और करते भी क्या। पर सोनिया भाव नहीं देगी। कैसे तीन सीटों की ऑफर कर रहे थे। अब कहते हैं- 'गलती हुई।' गलती हुई, तो भुगतो। पर अपन बात कर रहे थे कांग्रेस को मिली खुशियों की। तो खुदा जब देता है, छप्पर फाड़कर देता है।

आडवाणी खारिज राहुल कबूल

अपना आकलन भले गलत निकला। क्षेत्रीय और जातीय राजनीति के मुंह पर तमाचा लगा। तीसरी ताकत के दिन भी लदने लगे। सो देश के लिए अच्छी बात। बीजेपी 138 से 121 पर आ गई। पर दो दलीय राजनीति को आवाम की मान्यता मिली। अब इसे बरकरार रखना बीजेपी के जिम्मे। बीजेपी वक्त के साथ न बदली। तो नेहरू-इंदिरा का एकदलीय दौर लौटने में देर नहीं। अपन कांग्रेस की जीत का सेहरा राहुल के सिर बांधेंगे। सोनिया की रहनुमाई में कांग्रेस दो चुनाव लड़ी। पहले चुनाव में 112 पर अटकी। दूसरे में 145 पर। तब तक राहुल सिर्फ उम्मीदवार थे। अबके कांग्रेस का चेहरा थे। सो राहुल के चेहरे पर कांग्रेस 200 के पार हो गई। राजीव कांग्रेस को 191 पर छोड़कर गए थे। उसके बाद तो कांग्रेस को कभी 150 भी नहीं मिली। सवा साल पहले की घटना बताना जरूरी। राजस्थान पत्रिका के संपादक गुलाब कोठारी के साथ बैठे थे। देश की राजनीति पर बात चली। तो उनने पूछा- 'त्रिशंकु लोकसभा कब तक बनती रहेगी?' अपन ने कहा- 'पंद्रहवीं-सोलहवीं लोकसभा तो त्रिशंकु ही होगी। सत्रहवीं लोकसभा में किसी दल को बहुमत मिलेगा।' तब गुलाब कोठारी ने कहा था- 'सोलहवीं लोकसभा में त्रिशंकु संकट खत्म हो जाएगा।' अपन ने तब नहीं माना। पर अब अपन को कोई शक नहीं।

मुस्करा कर मुरझा से गए कांग्रेसियों के चेहरे

अब मीडिया ही ऐसी हरकतें करेगा। तो नेता दुर्गति करेंगे ही। अपन नीतिश को लेकर मीडिया की पतंगबाजी बताएंगे। पर पहले बात वामपंथियों के गुस्से की। ए बी वर्धन ने भीड़ के सामने एक खबरची को डांटा। कहा- 'आपका चैनल ज्यादा ही पतंगबाजी पर उतारू।' वृंदा करात ने कहा- 'समझ नहीं आ रहा विजुअल मीडिया को हो क्या गया। बेसिर पैर की खबरें चला रहा है।' पतंगबाजी का लाईव प्रदर्शन तो तब हुआ। जब एक चैनल मुखिया ने कहा- 'वेंकैया नायडू हैदराबाद में डेरा डाले बैठे हैं। चंद्रबाबू मिलने का वक्त नहीं दे रहे।' रविशंकर प्रसाद ने डांटते हुए कहा- 'जरा तथ्य जांचकर खबर चलाओ। वेंकैया नायडू तो दिल्ली में ही हैं।' चैनल मुखिया ने माफी नहीं मांगी। वह अपनी गलत खबर पर खिलखिलाया। फिर खबर चलाई- 'जयललिता बीजेपी की फोन काल नहीं उठा रही। सारी कोशिशें नाकाम।' फिर खबर चली- 'कांग्रेस ने जयललिता से संपर्क साधा।' जयललिता ने बयान जारी करके कहा- 'कांग्रेस या बीजेपी ने मुझ से संपर्क नहीं साधा।' हू-ब-हू ऐसी खबर आडवाणी-मायावती मुलाकात की चली। तो मायावती को भी खंडन करवाना पड़ा। खबर बड़ी दिलचस्प थी। मायावती मारुति-800 पर बैठकर आडवाणी से मिली।

आडवाणी को रोकने का वामपंथी तटस्थ फार्मूला

ख्याली पुलाव पकाना अलग बात। हकीकत में पुलाव पके। यह एकदम अलग। बात लेफ्ट के ख्याली पुलाव की। तो उनकी रणनीति- पहले राष्ट्रपति को केविएट लगाने की। जाकर कहेंगे- 'हमें मौका दो।' पर प्रतिभा पाटील कहेंगी- 'आप नेता तो चुनो।' समर्थन की चिट्ठियां तो दूर की बात। पहली बात तो नेता पर ही अटकेगी। क्या मायावती लिखकर देंगी- नेता शरद पवार। क्या जयललिता लिखकर देंगी। क्या लेफ्ट खुद पवार को नेता बनाएगा। इन सभी की नौटंकी अपन ने राष्ट्रपति चुनाव में देखी। ये वही शरद पवार। जिनने अपने भैरों सिंह शेखावत को धोखा दिया। चलो नहीं। तो क्या जयललिता को नेता मानेगी मायावती। या क्या मायावती को अपना नेता मान लेगी जयललिता। सो पुलाव की बात छोड़िए। खिचड़ी भी नहीं पकनी। पूत के पांव पालने में पहचाने जाने लगे। चुनाव निपटते ही प्रकाश करात ने ईटी को इंटरव्यू में कहा- 'बीजेपी को रोकने के लिए हम कांग्रेस के रास्ते में नहीं आएंगे।' डी राजा ने कहा- 'हम कांग्रेस को किसी हालत में समर्थन नहीं देंगे। पर न ही हालात का फायदा बीजेपी को उठाने देंगे।' तो इन दोनों बातों का मतलब हुआ।

थर्ड फ्रंट का इरादा दावा ठोक कांग्रेस से समर्थन का

इस बार सेफोलोजिस्टों की तो वॉट लग गई। मुकाबला इतना कड़ा था। एग्जिट पोल भी हांफते से दिखे। यूपीए समर्थक चैनल एनडीए को आगे दिखाते रहे। एनडीए समर्थक चैनल यूपीए को। पूरे चुनाव में सर्वेक्षण नहीं हुए। अब जब नतीजों में तीन दिन बाकी। तो एग्जिट पोल सेफोलोजिस्टों का अपना इम्तिहान। अपन दावा तो नहीं कर सकते। पर अपना अनुमान भी एनडीए-यूपीए में बराबरी की टक्कर का। दोनों में दर्जनभर का फर्क रहेगा। अपन ने यूपीए की बात की। तो उसमें अपन लालू-पासवान-मुलायम नहीं जोड़ते। लालू-पासवान-मुलायम और जाएंगे कहां। सो इन तीनों के साथ यूपीए थोड़ा आगे होगा। वरना एनडीए आगे। अब सात रेसकोर्स की चाबी उसी के हाथ होगी। जिसके साथ थर्ड फ्रंट होगा।

हमारा ताजा आंकलन (13 मई 2009)

यूपीए = कांग्रेस 144, ममता 11, पवार 11, करुणानिधि 08, शिबू 03, फारुख 02, अन्य 02 = 181,
यूपीए के सहयोगी भी जोड़ें, तो = लालू 08, मुलायम 22, पासवान 02 = 213,
लेफ्ट के 38 भी साथ जोड़ लें, तो = 249

एनडीए = भाजपा 149, जदयू 18, शिवसेना 13, अकाली 04, अगप 04, अजित 05, चौटाला 01, मीणा 01 = 195

थर्ड फ्रंट = लेफ्ट केरल 08, आंध्र 02, बंगाल 24, त्रिपुरा 02, तमिलनाडु 02 = 38,
मायावती यूपी 27, चंद्रबाबू 17, चंद्रशेखर राव 04, भजन 01, देवगौड़ा 03, जयललिता 28, नवीन पटनायक 10, कुल = 128

यूपीए का पहला विकल्प
213 + 27 (माया) + 28 (जयललिता)= 268, तो इसमें मुलायम और करुणानिधि के 30 निकालने पड़ेंगे।
तब बाकी बचेगा यूपीए = 238

यूपीए का दूसरा विकल्प
238 में लेफ्ट के 36 जोड़ें तो = 276, तो इसमें से ममता के 11 निकालने पड़ेंगे।
तब बाकी बचेगा यूपीए = 265

यूपीए का एकमात्र विकल्प
लेफ्ट सहित सारा सेक्युलर कुनबा = 251 + चंद्रशेखर राव (04) + भजन (01) + देवगौड़ा (03) + मायावती (27) + जयललिता (28) + नवीन (10) =324,
तो इसमें ममता (11) + मुलायम (22) और करुणानिधि (08) निकालने पड़ेंगे। तब बाकी बचे = 283

थर्ड फ्रंट की संभावना
थर्ड फ्रंट 128 + लालू + पासवान (10) + पवार (11) + शिबू (03) + फारुख (02) = 154 + कांग्रेस (143) = 298

एनडीए की संभावना
195 + माया (27) + जयललिता (28) + बाबू, चंद्रशेखर (21) + नवीन (10) + भजन (01) = 282

राज्यवार सभी दलों की स्थिति

हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है

लुधियाना की रैली आडवाणी का मास्टर स्ट्रोक रहा। छह मई को राहुल ने मास्टर स्ट्रोक मारा था। जब उनने जया, नीतिश, चंद्रबाबू को लाने की रणनीति समझाई। यों उनने तीनों को सेक्युलरिज्म के सर्टिफिकेट नहीं बांटे। पर नीतिश का दांव उलटा पड़ा। तो मनमोहन सर्टिफिकेट वापस मांगने लगे। नीतिश ने मनमोहन पर फब्ती कसी। जब कहा- 'मनमोहन सिंह यूनिवर्सिटी ऑफ सेक्युलरिज्म के वायस चांसलर नहीं।' नीतिश ने दो टूक कह दिया- 'बिहार की जनता को धोखा नहीं दूंगा।' इसे आप बुध्ददेव भट्टाचार्य को भी जवाब समझिए। जो नीतिश से बात होने का दावा ठोक रहे थे। बात लुधियाना की चली। तो बता दें- बाढ़ राहत पर मनमोहन उलटे पांव दौड़ते दिखे। जब वह मंगलवार को नीतिश से फुनियाए। कहा- 'बाढ़ राहत के मुद्दे पर नए सिरे से देख लेंगे।' यानी मान मनोव्वल की एक और कोशिश। पर लुधियाना का मास्टर स्ट्रोक मोदी-नीतिश नहीं।

हाथ मिलाकर अछूत हो गए नीतिश कुमार

चेन्नई वाली अम्मा की भविष्यवाणी करना आसान नहीं। लखनऊ वाली बहन जी के बारे में भी कुछ नहीं कह सकते। एक बात तय- जिधर करुणानिधि होंगे। उधर जयललिता जयराम अम्मा नहीं होगी। जिधर मुलायम होंगे। उधर बहन मायावती नहीं होंगी। अब मनमोहन सिंह को अम्मा-बहन जी चाहिए। तो सीधा सा रास्ता। करुणानिधि-मुलायम से पिंड छुड़ा लेते। अम्मा ने चुनाव से पहले मौका भी दिया। याद होगा 18 फरवरी का बयान। जब उनने कहा- 'डीएमके डूबता हुआ जहाज। कांग्रेस उसमें बैठी रहेगी। तो डूबेगी ही। सो वक्त रहते डीएमके सरकार से समर्थन वापस ले ले। केंद्र से डीएमके मंत्रियों को भी हटा दे। तभी वोटरों का सामना कर सकेगी कांग्रेस।' यों यह गठबंधन की पेशकश तो नहीं थी। पर इशारा साफ था। कांग्रेस या तो हकीकत नहीं समझी। या इशारा नहीं समझी। वीरप्पा मोइली ने टका सा जवाब देते हुए कहा- 'कांग्रेस-डीएमके गठजोड़ मजबूत।'

राष्ट्रपति के सामने विकल्प

यह तो तय ही है कि पंद्रहवीं लोकसभा में किसी राजनीतिक दल को बहुमत नहीं मिल रहा। यह भी तय ही है कि किसी चुनाव पूर्व गठबंधन को भी बहुमत नहीं मिल रहा। मोटा-मोटा अनुमान यह है कि कांग्रेस और भाजपा आठ-दस सीटों के अंतर से 150 के आसपास आगे-पीछे होंगी। यह अनुमान लगाना गलत नहीं होगा कि यूपीए और एनडीए में से कोई भी 200 का आंकड़ा पार नहीं कर पाएगा। वैसे लोकसभा चुनावों में यूपीए एक गठबंधन के तौर पर चुनाव मैदान में नहीं था। चुनावों का ऐलान होने से ठीक पहले कांग्रेस कार्यसमिति ने यूपीए के तौर पर चुनाव नहीं लड़ने का फैसला कर लिया था। सिर्फ एनडीए एकमात्र गठबंधन था। तीसरे मोर्चे का भी विधिवत कोई गठन नहीं हुआ था।

बच्चे का फैलाया रायता मां ही तो पोंछेगी

कांग्रेस में तो मिनिस्ट्रियां बंटने लगी। कपिल सिब्बल ने कहा है- 'साईंस एंड टेक्नोलॉजी तो लूंगा ही। कुछ और भी मिलने की उम्मीद।' अपन को अच्छी तरह याद। सिब्बल पिछली बार लॉ मिनिस्ट्री मांग रहे थे। पर सोनिया ने हंसराज भारद्वाज को दी। भारद्वाज ने रिजल्ट भी दिखाया। खासकर क्वात्रोची के मामले में। सिब्बल इतना बाखूबी नहीं निपटा पाते। सो सिब्बल की निगाह अब लॉ पर नहीं। अलबत्ता आई एंड बी और अर्बन डेवलपमेंट पर। पर मंत्री तो तब बनेंगे। जब सरकार बनेगी। यों अपन को कांग्रेस के दूसरे नंबर पर आने की उम्मीद। बात पहले और दूसरे नंबर की चली। तो बताते चलें। अरुण जेटली और अभिषेक मनु में एक सहमति तो हो गई। दोनों ने राजदीप सरदेसाई के सामने कह दिया- 'राष्ट्रपति को सिंगल लारजेस्ट को ही न्योता देना चाहिए।' यानी दोनों को सबसे बड़ी पार्टी उभरने का भरोसा।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट