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May 2009

चेहरा, चाल और चरित्र भी बदलना होगा

भाजपा के दो पावर सेंटर पार्टी की हार का कारण बने। कांग्रेस खुद को और मजबूत करने में लगी है, जबकि भाजपा अभी भी गुटबाजी का शिकार। चेहरे और चाल के साथ चरित्र भी बदलना होगा भाजपा को। भाजपा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को छोड़कर राजनीतिक राष्ट्रवाद अपनाए, तो उसका आधार ज्यादा व्यापक हो सकता है।

मनमोहन सिंह का मंत्रिमंडल बन जाने के बाद अब सोनिया गांधी का ध्यान कांग्रेस की तरफ लग गया है। इस बार कांग्रेस संगठन के बदलाव में राहुल गांधी की अहम भूमिका होगी। राहुल गांधी ने अपने भारत दर्शन के दौरान संगठन के ढांचे और पदों पर बैठे नेताओं की कार्यशैली को बारीकी से देखा है। सरकार बन जाने के बाद राहुल गांधी अपना भारत दर्शन फिर से चालू करने वाले हैं। उनके इस बार के भारत दर्शन में काफी बदलाव देखने को मिलेगा। वह जहां भी जाएंगे उनका स्वागत 1975 से 1977 के समय हुए संजय गांधी के स्वागत की याद ताजा करेगा। अब वह उतने ही ताकतवर हो गए हैं, जितने उस समय संजय गांधी हो गए थे।

यह है डायनेस्टिक डेमोक्रेसी मेरे भाई

बीजेपी ने कर्नाटक में छह मंत्रियों के रिश्तेदारों को टिकट दिए। तो कितना बवाल मचा। पर कर्नाटक का नतीजा ही बेहतरीन रहा। सीएम येदुरप्पा का बेटा राघवेंद्र भी जीत गया। हिमाचल के सीएम धूमल का बेटा अनुराग तो दूसरी बार जीता। जसवंत सिंह के बेटे को टिकट मिला तो बवाल। वसुंधरा के बेटे को टिकट मिला तो बवाल। पर परिवारवाद का विरोध करने वाली पार्टी बेटों-बेटियों को टिकट दे। तो बवाल होगा ही। बीजेपी को पंद्रहवीं लोकसभा से सबक लेना चाहिए। सौ से ज्यादा सांसदों के बाप-दादा भी एमपी या एमएलए थे। अपनी जम्हुरियत सौ परिवारों में सीमित हो गई। एक दलील अपन खूब सुनते हैं- 'जब डाक्टर का बेटा डाक्टर हो सकता है। जब पत्रकार का बेटा पत्रकार हो सकता है। तो सांसद का बेटा सांसद क्यों नहीं। मंत्री का बेटा मंत्री क्यों नहीं।' पर ऐसी दलील देने वाले धंधे और जम्हुरियत में फर्क नहीं समझते। धंधे और समाज सेवा में फर्क नहीं समझते।

दिखा राहुल का 'टच' मनमोहन की 'पसंद'

बात अपनी पीठ थपथपाने की नहीं। शोभा भी नहीं देता। पर आपका अखबार सबसे आगे निकला। सबसे ज्यादा भरोसेमंद निकला। पीएमओ से चौबीस घंटे पहले जारी पूरी लिस्ट देख अपन चौंके। बाईस मई को अपन ने 47 नाम लिखे थे। सिर्फ पांच गलत निकले, 42 सही। संगमा की बेटी अगास्था का 43 वां नाम अपन ने 26 मई को जोड़ा। जब अपन ने लिखा- 'तो प्रफुल्ल पटेल इंडीपेंडेंट चार्ज के मंत्री होंगे। पीए संगमा की बेटी अगास्था स्टेट मिनिस्टर।' तो अब यह साफ- मनमोहन समेत 34 केबिनेट। सात इंडिपेंडेंट चार्ज के स्टेट मिनिस्टर और 38 स्टेट मिनिस्टर। राजस्थान से जोशी के साथ मीणा और पायलट मंत्री बनेंगे। यह तो अपन ने बाईस मई को ही लिखा। पर ओला की जगह महादेव सिंह खंडेला की लाटरी निकलेगी। अपन को अंदाज नहीं था। यानी ब्राह्मण, मीणा, गुर्जर, जाट।

सात रेसकोर्स में चल रहा लिखने-मिटाने का खेल

तो बजट चार जुलाई को पेश करने का इरादा। यों तो चार जुलाई को शनिवार। पर मनमोहन-प्रणव ठान लें। तो कौन रोकेगा। ठान लिया, तो कोई पहली बार नहीं बैठेगी संसद। प्रणव दा ने खुलासा किया- 'वोट ऑन अकाउंट की दूसरी किस्त पेश करने का इरादा नहीं।' आपको याद होगा। चिदंबरम ने जुलाई तक का वोट ऑन अकाउंट पेश किया था। तो अब बजट पर अटकलें शुरू होंगी। इस बार कांग्रेस ने बीजेपी को शहरों में भी पीटा। सो शहरियों को भी मिलेगा तोहफा। नौकरीपेशा को भी, छोटे धंधे वालों को भी। चुनाव फंड का बंदोबस्त करने वालों को एफबीटी से राहत। नौकरीपेशा को इनकम टेक्स से। चिदंबरम पूंजीवादियों के हमदर्द दिखते थे। तो प्रणव बजट को समाजवादी पुट देंगे। मंदी से निपटना कोई खाला जी का घर नहीं। सरकार का खजाना पहले से खाली। एनडीए की सरकार आती। तो अपन इन दिनों खाली खजाने की खबरें पढ़ते। पर अब खजाना प्रणव दा के हवाले। तो थोड़े में गुजारा प्रणव दा का मंत्र होगा।

करुणानिधि की केकैई बनी तीसरी बीवी राजाथी अम्मल

अपन को पहले से शक था। इतनी जल्दी झगड़ा नहीं निपटना। सो अपन ने शनिवार को लिख दिया था- 'मंगल-बुध को मंत्रिमंडल विस्तार होगा।' वही हुआ, तैयारी करके टालना पड़ा मंगल का शपथग्रहण। यों वजह तो बंगाल में आया तूफान बताया। जो उड़ीसा की ओर बढ़ गया। पंजाब में फैले जातीय दंगे भी वजह बताया। पर असल वजह करुणानिधि के घर में मचा बवाल। अपन ने इस बवाल का जिक्र पिछले शुक्रवार भी किया। उसी की वजह से शनिवार को सिर्फ कांग्रेस परिवार की शपथ हुई। बात कांग्रेस परिवार की चली। तो बताते जाएं- करुणानिधि के फच्चर का फायदा पवार ने उठाया। उनके खाते दो मंत्री ही होते। पर अब तीन हो जाएंगे। बुधवार को शपथ ग्रहण हुआ। तो प्रफुल्ल पटेल इंडिपेंडेंट चार्ज के मंत्री होंगे। पीए संगमा की बेटी अगास्था स्टेट मिनिस्टर। पवार खुद बन गए। तो अब सुप्रिया सूले नहीं। पवार की रणनीति एक तीर से दो शिकारों की।

नीच अंदर नीच जात, नानक तिन के संग

आस्ट्रिया की राजधानी वीएना में गुरु रविदास के अनुयाइयों पर सिखों के हमले ने सिख समुदाय में जातिवाद को सतह पर ला दिया है। वीएना की इस घटना के बाद पंजाब में शुरू हुए दंगों से सिखों में व्याप्त जातिवाद का जहर सबके सामने आ गया है।
गुरु नानक देव जाति प्रथा के बेहद खिलाफ थे। उनके जमाने में जातिवाद शिखर पर था। ऊंची जाति के लोग दलितों को छू लेने पर खुद को अपवित्र मानकर गंगाजल से नहाते थे। दलित की छाया को अपवित्र मानते थे ऊंची जाति के लोग, खासकर ब्राह्मण। ऐसे वक्त में गुरुनानक देव ने भाई लालो को अपना परम सहयोगी चुना था, जो दलित था। गुरुनानक देव ने कहा था- 'नीच अंदर नीच जात, नानक तिन के संग, साथ वढ्डयां, सेऊ क्या रीसै।'

इंडिया शायनिंग की जगह इंटरनेट पर सवार थी भाजपा

भाजपा राजस्थान और उत्तराखंड में पार्टी की गुटबाजी के कारण हारी। मध्यप्रदेश में घमंड पर सवार होकर हारी। हरियाणा में गलत गठबंधन के कारण हारी। इन चारों राज्यों में भाजपा को 30 सीटों से हाथ धोना पड़ा। ये सभी तीस सीटें कांग्रेस को मिली हैं। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने शिवराज सिंह चौहान को नरेंद्र मोदी की तरह पार्टी के भावी नेता के रूप में देखना शुरू कर दिया था। यह छोटी सी जीत पर शायनिंग मध्यप्रदेश दिखाई देने जैसी हालत ही थी। राजस्थान में भाजपा की हार का सिलसिला पांच महीने पहले विधानसभा चुनावों में शुरू हो गया था। जहां भाजपा भारी गुटबाजी के चलते हारी थी और यह गुटबाजी पार्टी की केंद्रीय गुटबाजी का ही नतीजा था। पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत ने भी चुनाव के दौरान अपनी नाराजगी को सार्वजनिक करके भाजपा को नुकसान पहुंचाया।

सोनिया की रणनीति से हुई सिर्फ कांग्रेसियों की शपथ

फारुख अब्दुल्ला ने खुलासा किया। तो अपने कान खड़े हुए। दक्षिण अफ्रीका जाने से पहले बोले- 'मंत्री तय करना मनमोहन-सोनिया का काम। पीएम ने मुझे फोन किया। उनने कहा- डीएमके का मामला फंस गया है। उसे पहले निपटा लें।' पर फारुख को फोन भी तब गया। जब उमर ने गुरुवार की रात खुलासा किया- 'फारुख अब्दुल्ला शुक्रवार को मैच देखने दक्षिण अफ्रीका जाएंगे। शपथ ग्रहण में नहीं होंगे। कांग्रेस घमंडी हो गई है। फोन तक नहीं किया।' अपन ने टीवी पर अभिषेक मनु को मिमियाते देखा। बोले- 'फारुख को चौबीस घंटे तो इंतजार करना चाहिए।' टीवी पर हुए इस ब्रेकिंग खुलासे के बाद फारुख को फोन गया। फब्ती कसते हुए फारुख बोले- 'मैं नहीं होऊंगा तो शपथ ग्रहण नहीं रुकेगा।' चीफ मिनिस्टर बेटे ने कहा- 'शपथ ग्रहण का न्योता नहीं आया। पर आईपीएल का न्योता था। सो वह दक्षिण अफ्रीका चले गए।' पर अब खबर है- 'मंगल-बुध को मंत्रिमंडल विस्तार होगा। तो फारुख के साथ बालू, राजा, अजगरी, कन्नीमुरी की शपथ भी होगी।' एक जमाना था- जब शपथ लेने वाले को 24 घंटे पहले फोन जाता।

करुणानिधि के फच्चर से उड़ी मनमोहन की नींद

अपन को लगता था- करुणानिधि जिद्द छोड़ देंगे। पर न मनमोहन ने जिद्द छोड़ी। न करुणानिधि जिद्द छोड़ने को तैयार। जिद्द का जिक्र अपन बाद में करेंगे। पहले बात दो दिन चली कसरत की। बुधवार को यूपीए मीटिंग निपटी। तो बंद कमरों में शुरू हुई मंत्रालयों की मलाई बांटने की बात। करुणानिधि, ममता, पवार, फारुख, शिबू से हो रही थी बात। रात भर चली कसरत। करुणानिधि के सामने प्रस्ताव था- दो केबिनेट, दो स्टेट मिनिस्टर। वह पहले ही मिनट नामंजूर हो गया। करुणानिधि बोले- 'फार्मूला वही चलेगा। जो 2004 में था।' वैसे अपन बता दें- 2004 में कोई फार्मूला नहीं था। जो मांगा, सो मिल गया। मनमोहन सड़क परिवहन मंत्रालय से नाखुश थे। पर टीआर बालू को हटा नहीं पाए। आईटी मंत्री ए राजा की शिकायतें थी। पर हटा नहीं पाए। अबके कांग्रेस की 206 सीटें आई। तो मनमोहन-सोनिया ने कई अहम फैसले किए। जैसे लालू-शिबू-मुलायम को मिनिस्ट्री में नहीं लेंगे। बात लालू की चली। तो बता दें- गुरुवार को भड़कते हुए बोले- 'मुझे दूध से मक्खी की तरह निकाल दिया।'

न्योता मनमोहन को अटकलें राहुल की

राहुल गांधी का कद अब यूपीए में भी ऊंचा। यूपीए की पहली मीटिंग में मौजूद थे राहुल। प्रणव, एंटनी, चिदंबरम तो मंत्री। सोनिया यूपीए की चेयरपर्सन। बुध को दुबारा भी चुनी गई। सो मीटिंग में कांग्रेस के दो नुमाइंदे थे- 'राहुल और अहमद पटेल।' पटेल कांग्रेस अध्यक्ष के पालिटिकल सेक्रेट्री। वैसे भी जब गैर दलों के तीन-तीन मुस्लिम चेहरे हों। तो एक अपना भी होना चाहिए। यूपीए मीटिंग में बाकी तीन मुस्लिम चेहरे थे- 'मुस्लिम लीग के ई. अहमद, इत्तेहदुल मुस्लमीन के असदुदीन ओवेसी और नेशनल कांफ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला।' तीनों मंत्री बनेंगे। फारुख की अहम बात अपन बाद में बताएंगे। पहले बात राहुल की। मंत्री बनने से आनाकानी कर उदाहरण पेश किया। बात युवा चेहरे की चली। तो बताते जाएं- चौदहवीं लोकसभा का चुनाव हुआ। तो राहुल, नवीन जिंदल, सचिन, जतिन, मिलिंद का फोटू छपा था। इस बार ज्योति मिर्धा, श्रुति चौधरी और मौसम बेनजीर नूर का। तीनों कांग्रेस की नई युवा सांसद। पर बीजेपी का दिखाने लायक युवा चेहरा सिर्फ वरुण।

पवार को ठिकाने लगाने का नौ पर दो का फार्मूला

इस बार नौटंकी की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। कोई इमोशनल ब्लैकमेल नहीं। स्क्रिप्ट, डायलाग पहले से तय थे। अपने प्रणव दा ने नाम पेश किया सोनिया का। शुरूआत हुई तो बीस ने नाम पेश किया। बीस ने समर्थन किया। सोनिया चेयरपरसन चुनी गई। तो बाकी काम रहा सोनिया का। उनने मनमोहन को पीएम के लिए नोमीनेट किया। सबने तालियां बजा दी। प्रणव दा लोकसभा में नेता होंगे। मनमोहन लोकसभा के मेंबर नहीं। सोनिया-मनमोहन के भाषण हुए। पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग खत्म। अब चर्चा सरकार की। तो आज यूपीए मीटिंग से शुरूआत होगी। फिर सोनिया-मनमोहन-प्रणव दा महामहिम से मिलेंगे। अपन ने कल लिखा ही था- बाईस मई। तो अब तक 22 मई का ही फैसला। बात सरकार की चली। तो बता दें- मायावती ने बिन मांगा समर्थन दे दिया। माया बाजी मार ले गई। तो मुलायम की धुकधुकी तेज हुई। सो उनने अमर सिंह को सीधे राष्ट्रपति भवन भेज दिया। अमर सिंह कांग्रेस को समर्थन की चिट्ठी दे आए। है ना अजब बात।

कमजोर निकला मजबूत तो मजबूत पड़ा कमजोर

कांग्रेस की खुशी का ठिकाना नहीं। कितनी खुशियां एक साथ आ गई। बोफोर्स के कलंक से पीछा छूटा। मंडलवादी लालुओं-पासवानों-मुलायमों से भी। बताते जाएं- तीनों को मीटिंग में नहीं बुलाया सोनिया ने। पासवान तो पूरी तरह निपट गए चुनाव में। लालू भी निपटे जैसे ही। मुलायम की नाक जरूर बची। पर रीता बहुगुणा ने दिल्ली आकर खम ठोक दिया है- 'मुलायम से दूरी बरकरार रखी जाए।' अपन को उसका असर भी दिखा। जब बताया गया- 'सोनिया ने बुधवार को यूपीए मीटिंग में नहीं बुलाया।' यों लालू ने बिना शर्त समर्थन का एलान किया। और करते भी क्या। पर सोनिया भाव नहीं देगी। कैसे तीन सीटों की ऑफर कर रहे थे। अब कहते हैं- 'गलती हुई।' गलती हुई, तो भुगतो। पर अपन बात कर रहे थे कांग्रेस को मिली खुशियों की। तो खुदा जब देता है, छप्पर फाड़कर देता है।

आडवाणी खारिज राहुल कबूल

अपना आकलन भले गलत निकला। क्षेत्रीय और जातीय राजनीति के मुंह पर तमाचा लगा। तीसरी ताकत के दिन भी लदने लगे। सो देश के लिए अच्छी बात। बीजेपी 138 से 121 पर आ गई। पर दो दलीय राजनीति को आवाम की मान्यता मिली। अब इसे बरकरार रखना बीजेपी के जिम्मे। बीजेपी वक्त के साथ न बदली। तो नेहरू-इंदिरा का एकदलीय दौर लौटने में देर नहीं। अपन कांग्रेस की जीत का सेहरा राहुल के सिर बांधेंगे। सोनिया की रहनुमाई में कांग्रेस दो चुनाव लड़ी। पहले चुनाव में 112 पर अटकी। दूसरे में 145 पर। तब तक राहुल सिर्फ उम्मीदवार थे। अबके कांग्रेस का चेहरा थे। सो राहुल के चेहरे पर कांग्रेस 200 के पार हो गई। राजीव कांग्रेस को 191 पर छोड़कर गए थे। उसके बाद तो कांग्रेस को कभी 150 भी नहीं मिली। सवा साल पहले की घटना बताना जरूरी। राजस्थान पत्रिका के संपादक गुलाब कोठारी के साथ बैठे थे। देश की राजनीति पर बात चली। तो उनने पूछा- 'त्रिशंकु लोकसभा कब तक बनती रहेगी?' अपन ने कहा- 'पंद्रहवीं-सोलहवीं लोकसभा तो त्रिशंकु ही होगी। सत्रहवीं लोकसभा में किसी दल को बहुमत मिलेगा।' तब गुलाब कोठारी ने कहा था- 'सोलहवीं लोकसभा में त्रिशंकु संकट खत्म हो जाएगा।' अपन ने तब नहीं माना। पर अब अपन को कोई शक नहीं।

मुस्करा कर मुरझा से गए कांग्रेसियों के चेहरे

अब मीडिया ही ऐसी हरकतें करेगा। तो नेता दुर्गति करेंगे ही। अपन नीतिश को लेकर मीडिया की पतंगबाजी बताएंगे। पर पहले बात वामपंथियों के गुस्से की। ए बी वर्धन ने भीड़ के सामने एक खबरची को डांटा। कहा- 'आपका चैनल ज्यादा ही पतंगबाजी पर उतारू।' वृंदा करात ने कहा- 'समझ नहीं आ रहा विजुअल मीडिया को हो क्या गया। बेसिर पैर की खबरें चला रहा है।' पतंगबाजी का लाईव प्रदर्शन तो तब हुआ। जब एक चैनल मुखिया ने कहा- 'वेंकैया नायडू हैदराबाद में डेरा डाले बैठे हैं। चंद्रबाबू मिलने का वक्त नहीं दे रहे।' रविशंकर प्रसाद ने डांटते हुए कहा- 'जरा तथ्य जांचकर खबर चलाओ। वेंकैया नायडू तो दिल्ली में ही हैं।' चैनल मुखिया ने माफी नहीं मांगी। वह अपनी गलत खबर पर खिलखिलाया। फिर खबर चलाई- 'जयललिता बीजेपी की फोन काल नहीं उठा रही। सारी कोशिशें नाकाम।' फिर खबर चली- 'कांग्रेस ने जयललिता से संपर्क साधा।' जयललिता ने बयान जारी करके कहा- 'कांग्रेस या बीजेपी ने मुझ से संपर्क नहीं साधा।' हू-ब-हू ऐसी खबर आडवाणी-मायावती मुलाकात की चली। तो मायावती को भी खंडन करवाना पड़ा। खबर बड़ी दिलचस्प थी। मायावती मारुति-800 पर बैठकर आडवाणी से मिली।

आडवाणी को रोकने का वामपंथी तटस्थ फार्मूला

ख्याली पुलाव पकाना अलग बात। हकीकत में पुलाव पके। यह एकदम अलग। बात लेफ्ट के ख्याली पुलाव की। तो उनकी रणनीति- पहले राष्ट्रपति को केविएट लगाने की। जाकर कहेंगे- 'हमें मौका दो।' पर प्रतिभा पाटील कहेंगी- 'आप नेता तो चुनो।' समर्थन की चिट्ठियां तो दूर की बात। पहली बात तो नेता पर ही अटकेगी। क्या मायावती लिखकर देंगी- नेता शरद पवार। क्या जयललिता लिखकर देंगी। क्या लेफ्ट खुद पवार को नेता बनाएगा। इन सभी की नौटंकी अपन ने राष्ट्रपति चुनाव में देखी। ये वही शरद पवार। जिनने अपने भैरों सिंह शेखावत को धोखा दिया। चलो नहीं। तो क्या जयललिता को नेता मानेगी मायावती। या क्या मायावती को अपना नेता मान लेगी जयललिता। सो पुलाव की बात छोड़िए। खिचड़ी भी नहीं पकनी। पूत के पांव पालने में पहचाने जाने लगे। चुनाव निपटते ही प्रकाश करात ने ईटी को इंटरव्यू में कहा- 'बीजेपी को रोकने के लिए हम कांग्रेस के रास्ते में नहीं आएंगे।' डी राजा ने कहा- 'हम कांग्रेस को किसी हालत में समर्थन नहीं देंगे। पर न ही हालात का फायदा बीजेपी को उठाने देंगे।' तो इन दोनों बातों का मतलब हुआ।

थर्ड फ्रंट का इरादा दावा ठोक कांग्रेस से समर्थन का

इस बार सेफोलोजिस्टों की तो वॉट लग गई। मुकाबला इतना कड़ा था। एग्जिट पोल भी हांफते से दिखे। यूपीए समर्थक चैनल एनडीए को आगे दिखाते रहे। एनडीए समर्थक चैनल यूपीए को। पूरे चुनाव में सर्वेक्षण नहीं हुए। अब जब नतीजों में तीन दिन बाकी। तो एग्जिट पोल सेफोलोजिस्टों का अपना इम्तिहान। अपन दावा तो नहीं कर सकते। पर अपना अनुमान भी एनडीए-यूपीए में बराबरी की टक्कर का। दोनों में दर्जनभर का फर्क रहेगा। अपन ने यूपीए की बात की। तो उसमें अपन लालू-पासवान-मुलायम नहीं जोड़ते। लालू-पासवान-मुलायम और जाएंगे कहां। सो इन तीनों के साथ यूपीए थोड़ा आगे होगा। वरना एनडीए आगे। अब सात रेसकोर्स की चाबी उसी के हाथ होगी। जिसके साथ थर्ड फ्रंट होगा।

हमारा ताजा आंकलन (13 मई 2009)

यूपीए = कांग्रेस 144, ममता 11, पवार 11, करुणानिधि 08, शिबू 03, फारुख 02, अन्य 02 = 181,
यूपीए के सहयोगी भी जोड़ें, तो = लालू 08, मुलायम 22, पासवान 02 = 213,
लेफ्ट के 38 भी साथ जोड़ लें, तो = 249

एनडीए = भाजपा 149, जदयू 18, शिवसेना 13, अकाली 04, अगप 04, अजित 05, चौटाला 01, मीणा 01 = 195

थर्ड फ्रंट = लेफ्ट केरल 08, आंध्र 02, बंगाल 24, त्रिपुरा 02, तमिलनाडु 02 = 38,
मायावती यूपी 27, चंद्रबाबू 17, चंद्रशेखर राव 04, भजन 01, देवगौड़ा 03, जयललिता 28, नवीन पटनायक 10, कुल = 128

यूपीए का पहला विकल्प
213 + 27 (माया) + 28 (जयललिता)= 268, तो इसमें मुलायम और करुणानिधि के 30 निकालने पड़ेंगे।
तब बाकी बचेगा यूपीए = 238

यूपीए का दूसरा विकल्प
238 में लेफ्ट के 36 जोड़ें तो = 276, तो इसमें से ममता के 11 निकालने पड़ेंगे।
तब बाकी बचेगा यूपीए = 265

यूपीए का एकमात्र विकल्प
लेफ्ट सहित सारा सेक्युलर कुनबा = 251 + चंद्रशेखर राव (04) + भजन (01) + देवगौड़ा (03) + मायावती (27) + जयललिता (28) + नवीन (10) =324,
तो इसमें ममता (11) + मुलायम (22) और करुणानिधि (08) निकालने पड़ेंगे। तब बाकी बचे = 283

थर्ड फ्रंट की संभावना
थर्ड फ्रंट 128 + लालू + पासवान (10) + पवार (11) + शिबू (03) + फारुख (02) = 154 + कांग्रेस (143) = 298

एनडीए की संभावना
195 + माया (27) + जयललिता (28) + बाबू, चंद्रशेखर (21) + नवीन (10) + भजन (01) = 282

राज्यवार सभी दलों की स्थिति

हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है

लुधियाना की रैली आडवाणी का मास्टर स्ट्रोक रहा। छह मई को राहुल ने मास्टर स्ट्रोक मारा था। जब उनने जया, नीतिश, चंद्रबाबू को लाने की रणनीति समझाई। यों उनने तीनों को सेक्युलरिज्म के सर्टिफिकेट नहीं बांटे। पर नीतिश का दांव उलटा पड़ा। तो मनमोहन सर्टिफिकेट वापस मांगने लगे। नीतिश ने मनमोहन पर फब्ती कसी। जब कहा- 'मनमोहन सिंह यूनिवर्सिटी ऑफ सेक्युलरिज्म के वायस चांसलर नहीं।' नीतिश ने दो टूक कह दिया- 'बिहार की जनता को धोखा नहीं दूंगा।' इसे आप बुध्ददेव भट्टाचार्य को भी जवाब समझिए। जो नीतिश से बात होने का दावा ठोक रहे थे। बात लुधियाना की चली। तो बता दें- बाढ़ राहत पर मनमोहन उलटे पांव दौड़ते दिखे। जब वह मंगलवार को नीतिश से फुनियाए। कहा- 'बाढ़ राहत के मुद्दे पर नए सिरे से देख लेंगे।' यानी मान मनोव्वल की एक और कोशिश। पर लुधियाना का मास्टर स्ट्रोक मोदी-नीतिश नहीं।

हाथ मिलाकर अछूत हो गए नीतिश कुमार

चेन्नई वाली अम्मा की भविष्यवाणी करना आसान नहीं। लखनऊ वाली बहन जी के बारे में भी कुछ नहीं कह सकते। एक बात तय- जिधर करुणानिधि होंगे। उधर जयललिता जयराम अम्मा नहीं होगी। जिधर मुलायम होंगे। उधर बहन मायावती नहीं होंगी। अब मनमोहन सिंह को अम्मा-बहन जी चाहिए। तो सीधा सा रास्ता। करुणानिधि-मुलायम से पिंड छुड़ा लेते। अम्मा ने चुनाव से पहले मौका भी दिया। याद होगा 18 फरवरी का बयान। जब उनने कहा- 'डीएमके डूबता हुआ जहाज। कांग्रेस उसमें बैठी रहेगी। तो डूबेगी ही। सो वक्त रहते डीएमके सरकार से समर्थन वापस ले ले। केंद्र से डीएमके मंत्रियों को भी हटा दे। तभी वोटरों का सामना कर सकेगी कांग्रेस।' यों यह गठबंधन की पेशकश तो नहीं थी। पर इशारा साफ था। कांग्रेस या तो हकीकत नहीं समझी। या इशारा नहीं समझी। वीरप्पा मोइली ने टका सा जवाब देते हुए कहा- 'कांग्रेस-डीएमके गठजोड़ मजबूत।'

राष्ट्रपति के सामने विकल्प

यह तो तय ही है कि पंद्रहवीं लोकसभा में किसी राजनीतिक दल को बहुमत नहीं मिल रहा। यह भी तय ही है कि किसी चुनाव पूर्व गठबंधन को भी बहुमत नहीं मिल रहा। मोटा-मोटा अनुमान यह है कि कांग्रेस और भाजपा आठ-दस सीटों के अंतर से 150 के आसपास आगे-पीछे होंगी। यह अनुमान लगाना गलत नहीं होगा कि यूपीए और एनडीए में से कोई भी 200 का आंकड़ा पार नहीं कर पाएगा। वैसे लोकसभा चुनावों में यूपीए एक गठबंधन के तौर पर चुनाव मैदान में नहीं था। चुनावों का ऐलान होने से ठीक पहले कांग्रेस कार्यसमिति ने यूपीए के तौर पर चुनाव नहीं लड़ने का फैसला कर लिया था। सिर्फ एनडीए एकमात्र गठबंधन था। तीसरे मोर्चे का भी विधिवत कोई गठन नहीं हुआ था।

बच्चे का फैलाया रायता मां ही तो पोंछेगी

कांग्रेस में तो मिनिस्ट्रियां बंटने लगी। कपिल सिब्बल ने कहा है- 'साईंस एंड टेक्नोलॉजी तो लूंगा ही। कुछ और भी मिलने की उम्मीद।' अपन को अच्छी तरह याद। सिब्बल पिछली बार लॉ मिनिस्ट्री मांग रहे थे। पर सोनिया ने हंसराज भारद्वाज को दी। भारद्वाज ने रिजल्ट भी दिखाया। खासकर क्वात्रोची के मामले में। सिब्बल इतना बाखूबी नहीं निपटा पाते। सो सिब्बल की निगाह अब लॉ पर नहीं। अलबत्ता आई एंड बी और अर्बन डेवलपमेंट पर। पर मंत्री तो तब बनेंगे। जब सरकार बनेगी। यों अपन को कांग्रेस के दूसरे नंबर पर आने की उम्मीद। बात पहले और दूसरे नंबर की चली। तो बताते चलें। अरुण जेटली और अभिषेक मनु में एक सहमति तो हो गई। दोनों ने राजदीप सरदेसाई के सामने कह दिया- 'राष्ट्रपति को सिंगल लारजेस्ट को ही न्योता देना चाहिए।' यानी दोनों को सबसे बड़ी पार्टी उभरने का भरोसा।

हमारा ताजा आंकलन (8 मई 2009)

यूपीए = कांग्रेस 144, ममता 11, पवार 11, करुणानिधि 08, शिबू 03, फारुख 02, अन्य 02 = 181,
यूपीए के सहयोगी भी जोड़ें, तो = लालू 08, मुलायम 22, पासवान 02 = 213,
लेफ्ट के 38 भी साथ जोड़ लें, तो = 249

एनडीए = भाजपा 149, जदयू 18, शिवसेना 13, अकाली 04, अगप 04, अजित 05, चौटाला 01, मीणा 01 = 195

थर्ड फ्रंट = लेफ्ट केरल 08, आंध्र 02, बंगाल 24, त्रिपुरा 02, तमिलनाडु 02 = 38,
मायावती यूपी 27, चंद्रबाबू 17, चंद्रशेखर राव 04, भजन 01, देवगौड़ा 03, जयललिता 28, नवीन पटनायक 10, कुल = 128

यूपीए का पहला विकल्प
213 + 27 (माया) + 28 (जयललिता)= 268, तो इसमें मुलायम और करुणानिधि के 30 निकालने पड़ेंगे।
तब बाकी बचेगा यूपीए = 238

यूपीए का दूसरा विकल्प
238 में लेफ्ट के 36 जोड़ें तो = 276, तो इसमें से ममता के 11 निकालने पड़ेंगे।
तब बाकी बचेगा यूपीए = 265

यूपीए का एकमात्र विकल्प
लेफ्ट सहित सारा सेक्युलर कुनबा = 251 + चंद्रशेखर राव (04) + भजन (01) +  देवगौड़ा (03) + मायावती (27) + जयललिता (28) + नवीन (10) =324,
तो इसमें ममता (11) + मुलायम (22) और करुणानिधि (08) निकालने पड़ेंगे। तब बाकी बचे = 283

थर्ड फ्रंट की संभावना
थर्ड फ्रंट 128 + लालू + पासवान (10) + पवार (11) + शिबू (03) + फारुख (02) = 154 + कांग्रेस (143) = 298

एनडीए की संभावना
195 + माया (27) + जयललिता (28) + बाबू, चंद्रशेखर (21) + नवीन (10) + भजन (01) = 282

राज्यवार सभी दलों की स्थिति

मुलायम भी रखने लगे समर्थन की दोटूक शर्त

चौथे फेज का चुनाव भी निपट गया। अब देश की सिर्फ 86 सीटें बाकी। चौथे फेज में वोटिंग बेहतर हुई। पिचहत्तर फीसदी वोटिंग से बंगाल अव्वल रहा। तो इसे ममता बनर्जी का फायदा मानिए। दूसरे नंबर पर पंजाब रहा। जहां सिर्फ चार सीटों पर वोट पड़े। अपन बंगाल और पंजाब की बात आगे करेंगे। फिलहाल हरियाणा और राजस्थान की बात। राजस्थान में तो दो सीटों पर गुर्जर-मीणा खूनी संघर्ष भी हुआ। दोनों राज्यों में सभी सीटें निपट गई। हरियाणा में कांग्रेस को नुकसान होगा। तो राजस्थान में फायदा। पर राजस्थान में सिर्फ 51 फीसदी वोटिंग। सिर्फ चार महीने पहले एसेंबली चुनाव हुए। तो 68 फीसदी हुई थी वोटिंग। जिसने कांग्रेस की सरकार बनवा दी। शायद वसुंधरा को इसका अंदाज था।

बात आकर टिकेगी ममता, माया और जयललिता पर

ममता ने आंख दिखाई। लालू-पासवान भड़के। तो कांग्रेस की घिग्गी बंध गई। राहुल ने नीतिश की तारीफ की। तो लालू-पासवान को भड़कना ही था। ममता तो राजनीति में राहुल से ज्यादा स्पष्टवादी। सो उनने दो टूक कह दिया- 'तृणमूल-वामपंथियों में एक को चुनना होगा।' अपन नहीं जानते राहुल को दाना फेंकने की जल्दी क्या थी। बंगाल-बिहार का चुनाव तो निपटने देते। बात चंद्रबाबू नायडू की। राहुल ने तारीफ क्या की। राजशेखर रेड्डी की तो नींद उड़ गई। आराम फरमा रहे थे शिमला में। नींद उड़ी, तो बिना सोनिया-राहुल से मिले हैदराबाद उड़ गए। चुनाव निपटाकर राजशेखर शिमला में आराम फरमा रहे थे। तो चंद्रबाबू छुट्टी मनाने यूरोप चले गए। सीएम बनकर जाते। तो केंद्र से इजाजत लेनी पड़ती।

जमीनी हकीकत से नावाकिफ नहीं राहुल

अपन ने कल कांग्रेस की रणनीति का खुलासा किया ही था। उसी रणनीति के तहत राहुल मीडिया से रू-ब-रू हुए। दो मकसद भी अपन  ने बताए थे। पहला- राहुल को वरुण से ज्यादा राजनीतिक समझ वाला बताना। दूसरा- प्रियंका-दिग्गी राजा के बयानों से मची खलबली रोकना। आखिर अभी एक तिहाई सीटों में चुनाव बाकी। अभी हथियार क्यों डालें। दोनों मकसद पूरे हुए। राहुल ने अपनी राजनीतिक समझ दिखा दी। अब वरुण अपनी समझ दिखाएं। पर जैसी हैसियत राहुल की कांग्रेस में। वैसी वरुण की बीजेपी में नहीं। राहुल ने बेझिझक माना- 'मेरी हैसियत पारिवारिक बैकग्राउंड के कारण। यह सब जगह है, कहां नहीं। पर मैं इसे खत्म करना चाहता हूं।' पर बात राहुल के उन दो मकसदों की। राहुल का नया रूप दिखाई दिया।

हमारा ताजा आंकलन (5 मई 2009)

यूपीए = कांग्रेस 143, ममता 11, पवार 11, करुणानिधि 08, शिबू 03, फारुख 02, अन्य 01 = 179,
यूपीए के सहयोगी भी जोड़ें, तो = लालू 10, मुलायम 22, पासवान 02 = 213,
लेफ्ट भी साथ जोड़ लें, तो = 249

एनडीए = भाजपा 151, जदयू 16, शिवसेना 13, अकाली 04, अगप 04, अजित 03, चौटाला 01 = 192

थर्ड फ्रंट = लेफ्ट केरल 08, आंध्र 02, बंगाल 24, त्रिपुरा 02 = 36,
मायावती यूपी 32, चंद्रबाबू 17, चंद्रशेखर राव 04, भजन 01, देवगौड़ा 03, जयललिता 28, नवीन पटनायक 10, कुल = 131

यूपीए का पहला विकल्प
213 + 32(माया) + 28(जयललिता)= 273, तो इसमें मुलायम और करुणानिधि के 30 निकालने पड़ेंगे।
तब बाकी बचेगा यूपीए = 243

यूपीए का दूसरा विकल्प
243 में लेफ्ट के 36 जोड़ें तो = 279, तो इसमें से ममता के 11 निकालने पड़ेंगे।
तब बाकी बचेगा यूपीए = 268

यूपीए का एकमात्र विकल्प
लेफ्ट सहित सारा सेक्युलर कुनबा = 249 + चंद्रशेखर+ भजन + देवगौड़ा + मायावती + जयललिता + नवीन =327,
तो इसमें ममता+ मुलायम और करुणानिधि निकालने पड़ेंगे। तब बाकी बचे = 289

थर्ड फ्रंट की संभावना
थर्ड फ्रंट 131 + लालू + पासवान = 143 + पवार 11 + शिबू 03, फारुख 02 = 159 + कांग्रेस 143 = 302

एनडीए की संभावना
192 + 32 (माया) + 28 (जयललिता) + 21 (बाबू, चंद्रशेखर) + 10 (नवीन) + 01 (भजन) = 284

राज्यवार सभी दलों की स्थिति

अपन गांधी-गांधी खेल रहे, चीन बढ़ रहा अपनी ओर

चुनाव नतीजे आने में अब दस दिन बाकी। अपन को अगली सरकार के अस्थिर होने का पूरा खतरा। पर गांधी परिवार के वारिसों में जंग एक-दूसरे पर हावी होने की। वरुण की मार्किट वैल्यू बढ़ने लगी। तो दस जनपथ में बेचैनी। दो दिन पत्रकारों से राहुल को मिलवाया। बात बनती नहीं दिखी। तो अब अशोका होटल में प्रेस कांफ्रेंस। मकसद राहुल को वरुण से ज्यादा राजनीतिक समझ वाला बताने की। राहुल कांग्रेसियों की वह बेचैनी भी दूर करेंगे। जो प्रियंका और दिग्गी राजा ने पैदा की। दोनों ने कुछ ऐसे कहा- "सरकार न भी बनी। तो आसमान नहीं टूट जाएगा।" राहुल ने मनमोहन की जिद पकड़ तो ली। पर सेक्युलर दलों में मनमोहन पर ऐतराज अब और ज्यादा। बोफोर्स ने आग में घी डाल दिया। मनमोहन ने क्वात्रोची की पैरवी कर कमाल ही किया। ऐसी पैरवी तो राजीव गांधी ने भी कभी नहीं की। हां, सोनिया ने 1999 में जरूर की थी।

इम्तिहान तो दोनों राष्ट्रीय दलों का

लोकतंत्र का मतलब ही यही है कि देश हर पांच साल बाद अपनी नई सरकार और उसका मुखिया चुने। लोकतंत्र किसी एक राजनीतिक दल को ही सत्ता हासिल करने या उसी को प्रधानमंत्री पद हासिल करने का हकदार नहीं बनाता। लोकतंत्र का मतलब जनादेश से सत्ता तक पहुंचकर अपनी नीतियों से सरकार चलाना है। भारत के संसदीय लोकतंत्र में दो दलीय व्यवस्था भी नहीं है, कि छोटे-छोटे दलों को अपना विकास करके प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने का हक न हो। इसलिए इस बार जब प्रधानमंत्री पद के कई दावेदार दिखाई दे रहे हैं, तो इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यही लोकतंत्र की विशेषता है। पांच साल के शासनकाल के बाद भी कांग्रेस अगर देशभर में 150 सीटों का आंकड़ा पार नहीं करती है, तो जनादेश उसके खिलाफ माना जाएगा।