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April 2009

सेक्युलरिज्म दिखाने के दांत, खाने के नहीं

वेंकैया नायडू गलतफहमी में रहें। तो अपन टोकने वाले नहीं। नायडू का दावा सुन अपन हंसे। उनने कहा- 'सीबीआई ने बीजेपी के दबाव में आकर क्वात्रोची पर कार्रवाई का वक्त मांगा।' वेंकैया सीबीआई की ताजा अर्जी पर बोल रहे थे। सीबीआई ने कोर्ट से दो महीने की मोहलत मांगी। वेंकैया ने सीबीआई की अर्जी तो देखी। पर हंसराज भारद्वाज का बयान नहीं देखा। उनने कहा- 'बोफोर्स केस में कोई दम-खम नहीं।' अपन नहीं जानते वेंकैया क्यों गलतफहमी में। आडवाणी और जेटली को कोई गलतफहमी नहीं। दोनों की राय- 'कांग्रेस ने अपना काम कर दिया।' वेंकैया के तो उस दावे में भी अपन को दम नहीं लगा। उनने कहा- 'एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिलेगा।' अपन को आडवाणी-जेटली असलियत के करीब दिखे।

सबसे बड़ा जूता

आपने वह इश्तिहार तो देखा होगा। वोटर का नेता से उसकी डिग्री पूछने वाला। मेरा इंटरव्यू ले रहे हो। कौन सी जॉब? देश चलाने की जॉब। अपन हैरान, इस इश्तिहार ने गजब का काम किया। जो इस बार वोटर नेताओं से सवाल पूछ रहे हैं। कहीं कहीं तो जूते भी मार रहे हैं। अपन ने 1977 के बाद दर्जनों चुनाव देख लिए। दसवां चुनाव तो लोकसभा का ही देख रहे। विधानसभाओं के चुनाव अलग से। पर वोटर अपने उम्मीदवारों पर इतने हमलावर कभी नहीं देखे। अलबत्ता इस बार मीडिया की धार कमजोर पड़ी। अरुण जेटली ने मीडिया को कटघरे में खड़ा किया। बोले- 'बोफोर्स मामले में इतनी बड़ी बात हो गई। किसी ने सोनिया से सवाल नहीं पूछा। भ्रष्टाचार शायद मीडिया के लिए मुद्दा नहीं रहा।'

बोफोर्स जिन्न से नजदीकी बढ़ी बीजेपी-माया की

बोफोर्स का जिन्न भी निकल आया। मनमोहन सरकार जाते-जाते क्वात्रोची का रेड कार्नर वारंट भी रद्द करवा गई। टाईटलर-सान के बाद सीबीआई पर नया दाग। अपन नहीं जानते भ्रष्टाचार का चुनाव पर कितना असर। बोफोर्स का 1989 में तो खूब असर हुआ। वोटर 1989 के मूड में आए। तो कांग्रेस मुश्किल में होगी। बताते जाएं- 1989 के बाद कांग्रेस कभी स्पष्ट बहुमत में नहीं आई। चुनावी डुगडुगी बजे एक महीना हो चुका। महीनेभर में अपन ने कई रंग देखे। शुरूआत तो जरनैल सिंह के जूते से हुई। अब आए दिन जूतेबाजी की खबर। जरनैल के जूते से चौरासी का भूत निकला। तो अपने टाईटलर-सान का टिकट कटा। कांग्रेस अक्लमंद निकली। जो टिकट काट कर डैमेज कंट्रोल कर लिया। अब न दिल्ली में नुकसान का डर, न पंजाब में। जब चौरासी का भूत निकल आया। तो गोधरा का जिन्न क्यों दबा रहता। गोधरा का जिन्न भी निकल आया। नरेंद्र मोदी को कपिल सिब्बल की धमकी पहले आई। गोधरा का जिन्न बाद में निकला।

हमारा ताजा आंकलन (28 अप्रेल 2009)

कांग्रेस, एनसीपी, तृणमूल, झामुमो, द्रमुक+लालू, मुलायम, पासवान = 211
भाजपा, एजीपी, शिवसेना, इनलोद, लोद = 193
लेफ्ट, बाबू, चंद्रशेखर, भजन, देवगौड़ा, बीजू, जयललिता, माया = 139

बिना मनमोहन यूपीए की संभावना
211 + 34 (लेफ्ट) + 33 (माया) + 31 (जयललिता) = 309
आडवाणी की संभावना
193 + 33 (माया) + 31 (जयललिता) + 25 (बाबू, चंद्रशेखर) = 285

राज्यवार सभी दलों की स्थिति

अटल-आडवाणी की जगह आडवाणी-मोदी

मनमोहन सिंह ने गुजरात में फिर गोधरा उठा दिया। दिल्ली में चौरासी कांग्रेस की आफत बना। तो गुजरात में गोधरा बीजेपी की आफत बनाने की कोशिश। यों अपन इसे जोड़कर नहीं देखते। पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश कांग्रेस के भागों छींका फूटने जैसा। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया- 'गोधरा दंगों में नरेन्द्र मोदी की भूमिका भी जांची जाए।' कोर्ट के आदेश पर अरुण जेटली कुछ ऐसे भड़के- 'चुनाव के दौरान अदालत के बाहर और अदालत के जरिए विवाद खड़ा करना कांग्रेसी परंपरा।' अपन बताते जाएं- अदालत का ताजा फैसला दिवंगत कांग्रेसी सांसद अहसास जाफरी के मामले में। अदालत में अर्जी थी जाफरी की बेवा जकिया नसीन अहसान की। पर बात पीएम के बयान की। मोदी ने पीएम के बयान पर फौरन चुनौती दी- 'मैं कसूरवार निकलूं, तो फांसी पर चढ़ा दो।

हर चुनाव में कंधार का सवाल

आडवाणी और जसवंत सिंह अपनी आत्मकथाओं में ज्यादा पारदर्शिता दिखाते, तो उनके प्रतिद्वंदी कांग्रेस को हर चुनाव में कंधार का सवाल उठाने का मौका न मिलता। सर्वदलीय बैठक में भी यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी।

पूर्व विदेश मंत्री और दार्जिलिंग से भाजपा के उम्मीदवार जसवंत सिंह ने कंधार विमान अपहरण पर अपने ताजा बयान में कोई नया खुलासा नहीं किया। राजनीति और देश की घटनाओं पर निगाह रखने वाला हर जागरूक नागरिक पहले से जानता था कि लालकृष्ण आडवाणी आतंकवादियों को छोड़ने के हक में नहीं थे। सिर्फ आडवाणी ही क्यों, केन्द्रीय मंत्रिमंडल का हर सदस्य यात्रियों के बदले आतंकवादियों को छोड़ने के हक में नहीं था। जब यह घटना हुई थी, और सरकार ने तीन आतंकवादियों को छोड़कर 161 विमान यात्री मुक्त कराने का मन बनाया था तो लालकृष्ण आडवाणी बेहद खफा थे। उन्होंने गृहमंत्री के पद से इस्तीफा देने का मन बना लिया था और अपने मन की बात अपने अंतरंग लोगों के सामने प्रकट भी कर दी थी। संभवत: अपनी नाराजगी का इजहार उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के सामने भी किया होगा। लेकिन उन्होंने अपनी किताब 'माई कंट्री, माई लाइफ' में इसका जिक्र न करके अपनी आत्मा की आवाज को 1999 की तरह 2008 में भी दबाए रखा।

बीजेपी से परमानेंट किनारे के मूड में नवीन

कांग्रेस के हमले सोची-समझी रणनीति। लालू-पासवान को फूके कारतूस मानने लगी कांग्रेस। गुरुवार को शीला दीक्षित भी हमलावर हुई। वाईएसआर के बाद शीला ही दमदार। अपन भले ही वाईएसआर को 29 से 15 पर समझें। कांग्रेसी नहीं मानते। तेलंगाना में भले ही झटका लगा। पर गुरुवार को रायलसीमा-आंध्र में दबदबा रहा। अब जब सारा आंध्र निपट गया। तो कांग्रेस का अपना दावा 19-20 सीट का। यानी दस का नुकसान तो पक्का। बात एसेंबली की। तो वाईएसआर को बहुमत भले न मिले। यों वाईएसआर का दावा स्पष्ट बहुमत का। पर बहुमत न भी मिला। तो भी सरकार उन्हीं की बनेगी। दिल्ली में ऐसा कहने वालों की कमी नहीं। कहते हैं- थोड़ी बहुत कसर हुई भी। तो औवेसी जैसे जुटेंगे। वाईएसआर फिर से सीएम बने। तो चंद्रबाबू को जोरदार झटका लगेगा। वह तो दिल्ली की गद्दी में अहम रोल की फिराक में। टीडीपी-टीआरएस-लेफ्ट गठजोड़ तो दमदार। पर बाबू की मजबूती 1999 जैसी नहीं।

आधा चुनाव बीता तो दावेदारी का दौर

''पहले नारा लगा करता था- 'अबके बारी अटल बिहारी।' कई चुनावों में नारा लगा। अब बीजेपी का नारा- 'अबकी बारी लालकृष्ण आडवाणी।' अपने अरुण शौरी भविष्यकाल में चले गए। अहमदाबाद में थे। सो मोदीमयी हो गए। यों भी शौरी मोदी के मुरीद। सो उनने कहा- 'इस बार भी गुजरात से पीएम चुनो। अगली बारी भी गुजरात की।' यानी आडवाणी पीएम बने भी। तो एक ही बारी मिलेगी। वाजपेयी की तरह तीन बार शपथ नहीं। यों अपन कह सकते हैं- शौरी ने जब गुजरात से पीएम की बात कही। तो दोनों ही बार आडवाणी दिमाग में होंगे। पर नहीं, उनके दिमाग में मोदी ही होंगे। बीजेपी वाले ही नहीं मानते- शौरी के दिमाग में अगली बार भी आडवाणी होंगे। इस बार भी आधे भाजपाई मोदी के गुण गाते दिखेंगे।

तो प्रकाश करात भी पीएम पद के दावेदार

तो चुनाव का दूसरा फेज आज निपटेगा। पहले फेज का रुझान तो कांग्रेस को करंट लगा गया। खासकर आंध्र प्रदेश में। तेलंगाना में टीडीपी-टीआरएस हावी रही। अपन ने मशीनों में झांककर तो नहीं देखा। पर कांग्रेस की बेचैनी ने सब कह दिया। आज 140 सीटों पर वोट पड़ेंगे। तो उनमें 20 सीटें बाकी बची आंध्र प्रदेश की। यह बताने का मकसद भी बताते चलें। पिछली बार इनमें से 19 जीती थी कांग्रेस ने। आंध्र की 29 सीटों की बदौलत ही यूपीए सरकार बनी। अब अपना अनुमान कांग्रेस के पंद्रह पर खिसकने का। चौदह का घाटा न तो राजस्थान में पूरा होगा, न मध्यप्रदेश में। अभिषेक मनु सिंघवी ही अशोक गहलोत के टारगेट-25 की हवा निकाल चुके। जहां तक बात मध्य प्रदेश की। ज्योतिरादित्य सिंधिया तक संकट में।

कांग्रेस की लालू को छोड़ नीतिश पर निगाह

कांग्रेसियों को तो खुश होना चाहिए। आडवाणी ने जब मनमोहन को कमजोर कहा। तो सोनिया को ताकतवर बताया। फिर तिलमिलाहट क्यों। क्या सोनिया को मनमोहन से ज्यादा ताकतवर नहीं मानते। सोनिया जवाब दें, तो समझ भी आए। लग्गुओं-भग्गुओं का जवाब देना नहीं बनता। अब सोनिया ने मनमोहन को पीएम का उम्मीदवार बताया। तो उनने कौन सा सीडब्ल्यूसी से पास करवाया। बात मनमोहन के उम्मीदवार होने की। अब लालू ने मनमोहन को उम्मीदवार मानने से भी इंकार कर दिया। सोनिया ने उम्मीदवार घोषित किया था। तो कांग्रेसी बचाव में कैसे न आते। सबसे पहले लालू के खास कपिल सिब्बल ही बोले- 'मनमोहन ही हमारे उम्मीदवार।' प्रणव मुखर्जी भी बचाव में आए। उनने कहा- 'मनमोहन की बराबरी का देश में नेता नहीं।'

तो यूपीए के सैध्दांतिक गठबंधन की खुली पोल

अपने अभिषेक मनु सिंघवी इतवार को जयपुर में थे। तो उनने आडवाणी पर जमकर हमले किए। सिंघवी का पहला एतराज- स्विस बैंकों में जमा काले धन का सवाल उठाने पर। बोले- 'यह सवाल अब क्यों उठाया। जब सरकार थी, तब क्यों नहीं उठाया। जब विपक्ष के नेता थे, तब क्यों नहीं उठाया।' सिंघवी को मनमोहन ने मंत्री बनाया होता। तो  यह बात न कहते। आडवाणी ने मनमोहन को अप्रेल 2008 को चिट्ठी लिखी थी। तब जर्मनी को उन भारतीयों की लिस्ट मिली थी। जिनका पैसा स्विस बैंक में था। आडवाणी ने चिट्ठी लिखी। तो चिदंबरम के एक सेक्रेटरी ने जर्मन एम्बेस्डर को लिखा- 'लिस्ट लेने के लिए कोई भाग-दौड़ न की जाए।' अरुण शौरी ने सही कहा- 'जिस सरकार ने क्वात्रोची के सील खाते खुलवा दिए। वह काला धन क्यों लाएगी।' सिंघवी ने दूसरी बात कंधार पर कही। बोले- 'आडवाणी उस सरकारी प्रोसेस के हिस्सा थे। जिसमें आतंकियों को छोड़ने का फैसला हुआ। वह अपनी आत्मकथा में यह कैसे कहते हैं- 'उन्हें कुछ पता नहीं था।'

मनमोहन के राजनीतिक सितारे गर्दिश में

1998 में जयललिता, मायावती, नवीन पटनायक, चंद्रबाबू नायडू ने वाजपेयी को प्रधानमंत्री बनाया था। आडवाणी का पीएम बनना भी इन चारों पर निर्भर।

यह जरूरी नहीं है कि देश का अगला प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी या मनमोहन सिंह में से एक हो। मनमोहन सिंह जबसे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने हैं उनके चेहरे पर तनाव झलकने लगा है। अब तक वह सोनिया गांधी की दी गई खड़ाऊ पर विराजमान थे। तनाव की झलक उस समय साफ दिखाई दी जब उन्होंने डाक्टर अम्बेडकर की जयंती पर लालकृष्ण आडवाणी की नमस्ते का जवाब देना भी मुनासिब नहीं समझा। आडवाणी को गहरा झटका लगा। दूसरा झटका उन्हें उस समय लगा जब वह मध्यप्रदेश के अपने दौरे में अपने साथ ब्रिटिश अखबार 'दि डेली टेलीग्राफ' के पत्रकार डीन नेल्सन को लेकर गए। नेल्सन ने आडवाणी को बताया कि वह पिछले हफ्ते राहुल गांधी का इंटरव्यू करने के लिए रायबरेली में उनकी कार में सवार हुआ था। इंटरव्यू खत्म होते ही राहुल गांधी ने कार रोककर दरवाजा खोल दिया।

अमेरिकन बोले- 'खरीद फरोख्त से बनेगी सरकार'

जून में अपना पीएम कौन होगा? अपन से ज्यादा अमेरिकन फिक्रमंद। अमेरिका कुछ ऐसे जुगाड़ में- जो सरकार मनमोहन की ही बने। वह भी बिना लेफ्ट की मदद के। सीताराम येचुरी ने तो शुक्रवार को ही कहा- 'थर्ड फ्रंट की सरकार बनी। तो एटमी करार रिव्यू होगा।' यह बात अब आडवाणी ने तो कहनी लगभग छोड़ दी। आडवाणी का नया मुद्दा स्विस बैंक के खातों का। स्विस बैंक के नाम पर कांग्रेसियों के होश फाख्ता। अपन ने सात अप्रेल को कपिल सिब्बल की बेचैनी बताई थी। कांग्रेस के चुनाव इंचार्ज जयराम रमेश की बेचैनी भी बताएं। जयराम मंत्री पद से इस्तीफा देकर इंचार्ज बने। तो अपने कान तभी खड़े हुए थे। जरूर फंड का लफड़ा होगा। अब जब जयराम ने स्विस बैंकों के मामले में आडवाणी को चिट्ठी लिखी। तो अपने कान फिर खड़े हुए।

मनमोहन पर जिद्द का इरादा नहीं सोनिया का

अपने मनमोहन पीएम पद की दौड़ में थे भी नहीं। सोनिया ने दौड़ में शामिल किया। तो तुरुप का पत्ता अपने हाथ में रखा। यानी हाथी के दांत दिखाने के और, खाने के और। अपन तुरुप का पत्ता तो बताएंगे ही। उसकी वजह भी बताएंगे। आडवाणी ने भविष्य के सहयोगियों की तलाश शुरू की। तो कांग्रेस भी भविष्य की रणनीति बनाने लगी। पहले बात आडवाणी की। अपन ने कल लिखा ही था- 'यों तो हमलावर का मतलब घबराहट।' आडवाणी पीएम पद पर पहली पसंद बनते दिखे। तो कांग्रेस में खलबली होनी ही थी। अपन वैसे भरोसा नहीं करते। आईबी कभी भरोसे लायक रही भी नहीं। पर आईबी की रपट में यही खुलासा- 'बीजेपी की सीटें कांग्रेस से ज्यादा होंगी।' ऐसा हुआ, तो नए समीकरण उभरेंगे ही। उसी का इशारा आडवाणी ने किया।

यों तो हमलावर का मतलब घबराहट

तो इस बीच सुप्रीम कोर्ट को भी वरुण पर रासुका नहीं जंचा। अब आज यूपी सरकार कोर्ट में क्या कहेगी। अपन को उसी का इंतजार। यों माया सरकार कुछ भी कहे। वरुण की रिहाई दूर नहीं। वरुण का राजनीतिक मकसद पूरा हो चुका। वह क्यों तनाव फैलाने वाली भाषा बोलेंगे। तुजुर्बे से ही सीखता है इंसान। वैसे रविशंकर प्रसाद से पूछो। तो कहेंगे- कई लोग तुजुर्बे से भी नहीं सीखते। वैसे उनने बुधवार को सोनिया के बारे में कहा। पर पहले सोनिया की बात। वह बोली- 'आडवाणी संघ के गुलाम।' यों अपन समझते थे। सोनिया पर्सनल हमले नहीं करेगी। पर सोनिया की घबराहट समझना मुश्किल नहीं। घबराहट की बात बाद में। पहले बात रविशंकर के जवाब की। बोले- 'सोनिया को राजनीतिक समझ नहीं। जो कोई लिखकर दे दे, पढ़ देती हैं।' वैसे रविशंकर ने कोई नई बात तो कही नहीं। यों सोनिया ने भी नई बात नहीं कही। अपन तो 1978 से ही देख रहे।

विकास पर हावी नकारात्मक सोच

भाजपा के खिलाफ तीन मोर्चे नकारात्मक आधार पर चुनाव लड़ रहे हैं। तीनों मोर्चे आपस में भी एक-दूसरे को कमजोर करने की नकारात्मक सोच के शिकार।

गरीबों के वोट खरीद कर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा फिर खोखला साबित हो गया है। आंध्र प्रदेश जहां लोकसभा के साथ विधानसभा के चुनाव भी हो रहे हैं, इस खोखलेपन को साबित कर रहा है। कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी ने बताया था कि चुनाव के दौरान साढ़े पैंतालीस करोड़ रुपए की नकदी, शराब और अवैध प्रचार सामग्री जब्त की गई। अब जबकि अभी चुनाव प्रचार का दौर चल रहा है, तो आंध्र प्रदेश में पिछले शुक्रवार तक पुलिस ने 25 करोड़ रुपए नकदी और सोने की अंगूठियां पकड़ी हैं। एक-एक, डेढ़-डेढ़ ग्राम सोने की अंगूठियां बनाकर वोटरों को देने की नई परंपरा शुरू हुई है आंध्र प्रदेश में। यह तो वोटरों की सीधे खरीद-फरोख्त की बात। सरकारी धन से अपना वोट बैंक बनाने और वोट बैंक को लुभाने का नंगा नाच भी इस बार खूब हुआ है।

पीठ पीछे भी जूतम पैजार कम नहीं

जूतेबाजी तो अब चल ही निकली। नया शिकार बने नवीन जिंदल। कांग्रेस की रैली में एक जूता नवीन पर भी चला। पर कोई जूता किसी नेता को लग नहीं रहा। जूतों को भी पसंद नहीं आ रहे नेता। बुश से लेकर जिंदल तक। एक भी नेता को जूता नहीं लगा। पर अपन को डर फ्यूचर का। अब पार्लियामेंट और एसेंबलियों में भी जूते चलेंगे। स्पीकरों को मुश्किल होगी। जूते उतार कर हाल में घुसने का नियम बनाना पडेग़ा। जूतम-पैजार पहले तो सिर्फ कहावत थी। अब उसका प्रेक्टिकल रूप सामने आ गया। जरनैल के जूते ने टाईटलर-सजन का टिकट क्या कटवाया। कांग्रेस में जूतम-पैजार शुरू हो गई। टाईटलर की सज्जनता सामने आ गई। लगे शीला दीक्षित पर भड़ास निकालने। कहा- 'मेरी पार्टी के लोगों ने मौके का फायदा उठाया।' यों सब जानते हैं- टाईटलर का इशारा शीला दीक्षित की तरफ। पर नाम पूछो। तो बोलती बंद। दुश्मनी क्यों मोल लें।

जरनैल का जूता तो चल निकला

मुंतधार अल जैदी का जूता नाइकी का था। तो जरनैल सिंह का जूता रिबोक का। पर अपन को हैरानी तो तब हुई। जब बिना ब्रांड का जूता भी चल निकला। वह भी बुध्दिजीवियों के बीच। घटना जरनैल के जूते से ठीक एक दिन बाद की। जगह थी- दिल्ली का आत्माराम सनातन धर्म कालेज। प्रिंसिपल और स्टाफ में चखचख तो पहले से थी। पर काउंसिल की मीटिंग में जूते चलेंगे। यह किसी ने नहीं सोचा होगा। वैसे जूतेबाजी का शिकार बुश और चिदम्बरम ही नहीं हुए। अरुंधती राय भी जूता खा चुकी। अरुंधती राय का कसूर था- कश्मीर पर पाकिस्तान की पैरवी। इसी तेरह फरवरी को दिल्ली यूनिवर्सिटी की आर्ट गैलरी में पहुंची। तो भाषण से पहले ही जूताबाजी हो गई। दिल्ली में एक जज पर भी जूता चल चुका। जरनैल सिंह के जूते का चुनावी कमाल अपन बाद में बताएंगे। पहले सेक्युलर मोर्चों में जूतमपैजार की बात। इस चुनाव में सेक्युलरिज्म के तीन ठेकेदार।

आम आदमी के नाम पर करोड़पतियों का राज

सोनिया सवा करोड़ की। राहुल ढाई करोड़ के। तो आडवाणी भी साढ़े तीन करोड़ के। आडवाणी ने बुधवार को परचा भरा। तो अपन को पता चला। पर आडवाणी और राहुल, सोनिया में एक फर्क। आडवाणी ने अपने परिवार के दो फ्लैट बताए। दोनों गुड़गांव में। दोनों की कीमत 92-92 लाख। ये दोनों फ्लैट 2004 में भी थे। तब उनने कीमत 30-30 लाख भरी थी। अपन जानते हैं- यूपीए राज में कीमतें कैसे तीन गुणी हुई। आडवाणी ने फ्लैटों की ताजा कीमत भरी। एनडीए राज में मिडिल क्लास सोच भी सकता था। खरीद भी रहा था। पर अब एनसीआर में खरीदना मिडिल क्लास के बूते में नहीं। पर उधर राहुल-सोनिया की जायदाद देखिए। अपन जानते हैं महरौली में नौ लाख की सौ गज जमीन भी नहीं मिलती। पर राहुल बाबा का फार्महाऊस नौ लाख का। अपन जानते हैं इटली में 18 लाख का वन बैड रूम फ्लैट भी नहीं मिलता। पर सोनिया के घर की कीमत सिर्फ 18 लाख। असलियत से कितने दूर हैं हल्फिया बयान। हर उम्मीदवार की यही हालत। चुनाव आयोग नेताओं की प्रापर्टी दुगनी कीमत में खरीद ले। तो भी आयोग को तीन गुणा फायदा होगा।

'जूते' के निशाने पर मौजूदा भ्रष्ट व्यवस्था

जरनैल सिंह ने अपन को चौंका दिया। उनने देश के होम मिनिस्टर चिदम्बरम पर जूता दे मारा। अपन को जरनैल से ऐसी उम्मीद तो नहीं थी। जरनैल सीधे-सादे धार्मिक इंसान। हर रोज गुरुद्वारे जाने वाले। गुरुग्रंथ साहिब का पाठ करने वाले। गुरुबाणी तो जरनैल को जुबानी याद। दैनिक जागरण में कोई दस साल से होंगे। जागरण को भी हैरानी हुई। जागरण ने अपने बयान में कहा- 'जागरण घोर निंदा करता है। जागरण का इस घटना से लेना-देना नहीं। संस्थान अनुशासनात्मक कार्रवाई भी करेगा।' यों भी यह जर्नलिज्म नैतिकता के खिलाफ। जरनैल की पहुंच वहां पत्रकार के नाते हुई। वह आम आदमी होते। तो उस कमरे तक पहुंच ही न पाते। जहां पी. चिदम्बरम मौजूद होते। पर जो पी. चिदम्बरम ने कहा। जरा उस पर गौर करें। उनने कहा- 'जरनैल सिंह ने भावनाओं में बहकर यह काम किया।' जी हां, सवाल भावनाओं का ही। कांग्रेस ने सिखों की भावनाएं ही तो नहीं समझीं। यह जो इक्का-दुक्का, कभी-कभार गुब्बार का लीकेज है। किसी दिन सुनामी लेकर आएगा। पता नहीं कितने जूते खाने पर नेताओं को अक्ल आएगी।

स्विस बैंकों के खातों पर सिब्बल हुए बेचैन

अपने कपिल सिब्बल का भी जवाब नहीं। खुद चांदनी चौक में बुरी तरह फंस गए। पर निकले हैं मनमोहन सिंह का बचाव करने। वैसे मनमोहन के मामले में सारी कांग्रेस बचाव में। मनमोहन पर आडवाणी के हमले कम नहीं हो रहे। चुनाव घोषणापत्र जारी करते वक्त मनमोहन भड़क उठे थे। आडवाणी पर जवाबी हमला बोला। अपने कमजोर होने का जवाब तो नहीं सूझा। सोनिया के सामने कैसे कहते- 'मैंने सोनिया के इशारों पर सरकार नहीं चलाई।' सो उनने आडवाणी को भी कमजोर कह डाला। मनमोहन ने स्कूल में पढ़ा होगा- 'लकीर के सामने बड़ी लकीर खींच दो। तो पहले वाली लकीर छोटी हो जाएगी।' सो उनने स्कूल में पढ़ा आडवाणी पर आजमाया। गिनाने लगे- आडवाणी एनडीए राज में कितने कमजोर थे। आतंकवादी को कंधार भेजा। तो आडवाणी चुप रहे। संसद पर हमला हुआ। तो आडवाणी चुप रहे। वगैरह-वगैरह। यानी- 'अगर मैं कमजोर हूं, तो आप भी कम नहीं।'

दो देवियों के हाथ में होगी सत्ता की चाबी

कांग्रेस और भाजपा दोनों ही 150-150 के आसपास ही निपट जाएंगे। यूपीए सरकार बनवाने वाले वामपंथी, द्रमुक, राजद, लोजपा, सपा को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। मायावती और जयललिता की सीटें बढ़ेंगी। इन दोनों के हाथों में होगी सत्ता की चाबी।

अगर चुनाव घोषणापत्र के आधार पर मतदाता फैसला करेंगे, तो भारतीय जनता पार्टी का पलड़ा भारी रहेगा। सबसे ज्यादा लोकलुभावन घोषणापत्र भाजपा ने ही पेश किया है। भाजपा के घोषणापत्र को पढ़कर लगता है कि वह 2004 की गलती को सुधारना चाहती है। तब उसने आम आदमी की उपेक्षा करके उच्च मध्यम और अमीर लोगों की ओर देखना शुरू कर दिया था। नतीजतन अटल बिहारी वाजपेयी की छह साल की शानदार उपलब्धियों के बावजूद भाजपा को 35 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने आठ महीने पहले फरवरी 2004 में लोकसभा भंग करके मध्यावधि चुनाव करवाने का एलान किया तो ऐसा नहीं लगता था कि भारतीय जनता पार्टी चुनाव हार जाएगी। वह मानकर चल रही थी कि अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता जवाहर लाल नेहरू को भी पार कर गई है। इसलिए वाजपेयी पूरी उम्र प्रधानमंत्री पद पर बने रहेंगे। भाजपा भारत उदय के रथ पर सवार होकर अमर होने की कोशिश कर रही थी।

नई बीजेपी, हिंदुओं को मंदिर, मुस्लिमों को तालीम

बीजेपी ने शाईनिंग इंडिया की गलती सुधारी। जैसा अपन ने कल लिखा था- 'तो पुराने मुद्दों के साथ रोटी- रोजगार का भी वादा होगा।' सो अब बीजेपी राम के साथ गरीब रथ पर भी सवार। घोषणापत्र जारी करते राजनाथ सिंह ने कहा- 'बीजेपी अपने घोषणापत्र के हर शब्द का पालन करेगी।' तो अपन बता दें- घोषणा पत्र में गरीबों, किसानों, मिडिल क्लास के लिए तोहफे ही तोहफे। सैनिकों को सैलरी पर इनकम टेक्स नहीं। समान रैंक-समान पेंशन का भी वादा। गरीबों को दो रुपए किलो चावल-गेहूं। किसानों के सारे कर्ज माफ। नए कर्ज पर ब्याज सिर्फ चार फीसदी। इनकम टेक्स तीन लाख के बाद शुरू होगा। औरतों और बुर्जुगों को पचास हजार की और छूट। सीनियर सिटीजन की उम्र पैंसठ से घटाकर साठ होगी। पेंशन पर इनकम टेक्स भी नहीं। आम आदमी को मिले बैंक ब्याज पर टेक्स नहीं। सीएसटी-एफबीटी खत्म होगा। बीजेपी का इनकम टेक्स का चेप्टर देख कांग्रेस पसीनों-पसीने हो गई।

पवार की दोहरी सदस्यता पर कांग्रेस में खलबली

तो यूपीए का सारा कुनबा ही बिखर गया। वाइको, चंद्रशेखर राव, रामदौस तो गए ही। लालू, मुलायम, पासवान भी बाहर। अब पवार भी इशारे करने लगे। यूपीए में बची सिर्फ ममता। वह भी चुनाव बाद पक्की नहीं। ममता का असली घर एनडीए। यूपीए तो सिर्फ खेत की ढाणी। आप कहेंगे पवार का तो सीट एडजेंटमेंट हो चुका। अपन भूल भी जाएं। पर पवार क्यों भूलेंगे। सोनिया देशभर में तालमेल की बात मान जाती। तो यह दिन देखना ही नहीं पड़ता। अपने पी. चिदम्बरम मुंह लटकाए हुए थे। जब पूछा- 'पवार का सीपीएम-बीजेडी के साथ जाना कैसा लगा?' तो बोले- 'एनसीपी से उड़ीसा में तालमेल तो नहीं। पर पवार का हमारे विरोधियों से जा मिलना ठीक नहीं।' वैसे पवार भी उसी दिन उड़ीसा गए। जिस दिन सोनिया उड़ीसा में थी। तेवर दिखाने का असर भी हुआ। कांग्रेस ने गुजरात में एक सीट की पेशकश कर दी। राजकोट न सही, सूरत सही। इसे कहते हैं- दिया जब रंज बुतों ने, तो खुदा याद आया। यों पवार की टेढ़ी चाल से कांग्रेस की चाल बेढंगी हो गई।

वरुण को अभिमन्यु की तरह घिरा बताया मेनका ने

हस्तिनापुर का राजा था पांडु। पांडु की दो बीवियां थी मादरी और कुंती। पांडु को श्राप मिला- बच्चे पैदा करने  की कोशिश करेगा तो मर जाएगा। डरकर पांडु ने अपना राज-काज धृतराष्ट्र को सौंप दिया। धृतराष्ट्र अंधा था। पर था पांडु का बड़ा भाई। पर बाद में कुंती को युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन पैदा हुए। मादरी को नकुल और सहदेव। ये पांचों बच्चे कैसे पैदा हुए। अपन इस कहानी की गहराई में नहीं जाते। वह कहानी बताने का आज वक्त नहीं। पर पांडु श्राप के कारण ही मर गया। मादरी सती हो गई। पांडु की मौत का कारण मादरी ही थी। पर सवाल सिहासन की विरासत का। धृतराष्ट्र ने पांडु के पांडव बेटों को राज गद्दी नहीं सौंपी। जबकि राज गद्दी के वारिस पांडव थे। महाभारत इसीलिए हुआ। कहानी हू-ब-हू भले नहीं। पर कुछ कुछ मिलती-जुलती।

ज्यूडिशरी ने लोकतंत्र को कलंकित होने से बचाया

वरुण गांधी अब तीन हफ्ते तो अंदर समझिए। यूपी सरकार का सलाहकार बोर्ड तीन हफते में एनएसए का फैसला करेगा। जब से वरुण सुर्खियों में आए। तब से राहुल गांधी पहले पेज से गायब थे। पहले पेज की तो बात ही छोड़िए। अखबार से ही गायब थे। अब जब वरुण कम से कम तीन हफ्ते अंदर रहेंगे। तो राहुल गांधी ने महाराष्ट्र से अपना प्रचार शुरु किया। शुरुआत में ही उनने बिना नाम लिए अपने चचेरे भाई पर हमला किया। बोले- "समाज बांटने की बात करती है बीजेपी। कांग्रेस ही एक पार्टी जो समाज को जोड़ती है।" अपन ने किसी चैनल पर वरुण का इतना लंबा भाषण कभी नहीं सुना। जितना राहुल गांधी का लाइव सुनने को मिला। जिस भाषण पर विवाद खड़ा किया। वह भी छह मार्च का था। पर सोलह मार्च तक अपन ने किसी चैनल पर नहीं सुना। चैनलों को वह सीडी दस दिन बाद कहां से मिली। वह भी काई चैनल नहीं बता रहा। हां, अपन जानते हैं - चुनाव आयोग को यह सीडी कांग्रेस ने दी।