March 2009

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वोट बैंक की राजनीति में रासुका की भूमिका

तो वरुण गांधी देश की सुरक्षा के लिए खतरा हो गये। पर अपन को लगता है - वरुण गांधी देश के लिए नहीं मायावती का राजनीतिक खतरा बने। सो मायावती ने वही किया। जो इंमरजेंसी में इंदिरा गांधी ने किया था। इंदिरा गांधी ने भी इंमरजेसी में एनएसए का खूब बेजा इस्तेमाल किया। जब खुद की सत्ता को खतरा लगे । तो देश को खतरा बता दो। मायावती ने वरुण गांधी की दादी याद दिला दी। वरुण गांधी को भी दादी याद दिला दी। अपन को इंमरजेंसी का एक और किस्सा याद आया। तभी देवकान्त बरुआ ने कहा था- "इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा।" अब जब मायावती को राजनीतिक खतरा दिखा। तो उनने खुद पर खतरे को देश पर खतरा बता दिया। जिनकी उम्र 50 साल होगी। उन्हें तो याद होगा- इंदिरा गांधी पर जब राजनीतिक खतरा मंडराया। तो उनने इंमरेजेंसी लगाकर हजारों पर एनएसए लगाया था। मायावती तो इंदिरा गांधी के मुकाबले तिनका भर।

इस बार महा त्रिशंकु होगी लोकसभा

यूपीए-एनडीए पौने दो- पौने दो सौ में निपटेंगे। तीसरा मोर्चा ज्यादा ताकतवर होकर उभरेगा। कांग्रेस तीसरे-चौथे मोर्चे को समर्थन देने को मजबूर हो सकती है। कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया तो तीसरा मोर्चा टूटेगा। ऐसी हालत में एनडीए सरकार भी संभव।

लोकसभा चुनावों की तस्वीर अब साफ होने लगी है। देश की 543 सीटों में से 265 सीटों पर चुनाव की अधिसूचना जारी हो चुकी है। गठबंधनों ने नया रूप लेना शुरू कर दिया है। यूपीए से एक नए मोर्चे ने जन्म ले लिया है और पहले से बन-बिगड़ रहा तीसरा मोर्चे की तस्वीर भी उभर चुकी है। इस तीसरे मोर्चे में वामपंथी दलों को छोड़कर वे सभी क्षेत्रीय दल शामिल हैं जो कभी न कभी एनडीए में रहे हैं। दूसरी तरफ लालू-मुलायम के चौथे नए सेक्युलर मोर्चे में शामिल सभी दल हाल ही तक यूपीए के साथ थे। दूसरे शब्दों में यह कहा जा  सकता है कि वामपंथी दलों को छोड़कर तीसरे मोर्चे में शामिल बाकी सभी घटक दल जरूरत पड़ने पर एनडीए में शामिल हो सकते हैं। इसी तरह चौथे मोर्चे में शामिल सभी दल जरूरत पड़ने पर यूपीए में शामिल हो जाएंगे। यहां महत्वपूर्ण यह है कि तीसरे और चौथे मोर्चे के सभी घटक दल 1989 की वीपी सिंह और 1996-97 की देवगौड़ा-गुजराल सरकारों में शामिल थे।

आंध्र की नैय्या के खेवइया फिल्मी सितारे

शुक्रवार को अपना देसी नया साल शुरू हुआ। तो गरमी शबाब पर आ गई। चुनावी तापमान भी उसी तेजी से बढ़ा। कांग्रेसी आडवाणी की ललकार के जवाब में उलझे रहे। मनमोहन ने चौबीस अकबर रोड पर आनंद शर्मा को भेजा। वह बोले- 'भारतीय लोकतंत्र में सीधी बहस का कोई प्रावधान नहीं।' यानी मनमोहन सीधी बहस से बिदक गए। अपन संसदीय लोकतंत्र का संवैधानिक रूप देखें। तो उसमें पीएम प्रोजेक्ट करने का भी जिक्र नहीं। पर आडवाणी के सामने मनमोहन को कर ही दिया ना सोनिया ने। पीएम प्रोजेक्शन से लोकतंत्र का नया चेप्टर शुरू हो चुका। आनंद शर्मा आतंकवाद-सेक्युलरिज्म पर भी खूब बोले। पर जब वह सेक्युलरिज्म का झंडा उठा रहे थे। तभी तस्लीमा नसरीन ने अपने ब्लाग पर पोल खोल दी। लिखा है- 'मनमोहन सरकार ने मुझे कहा है- भारत में रहने का परमिट चाहिए। तो 31 मई तक भारत की तरफ मुंह न करो।' यह मुस्लिम कट्टरपंथियों के दबाव का सबूत।

चौथा फ्रंट बनते ही कांग्रेस खिसकी चौथे नंबर पर

इसे कहते हैं सिर मुड़ाते ही ओले पड़ना। मनमोहन की उम्मीदवारी का एलान हुआ। पीएमके भी कांग्रेस को छोड़ गई। तो अपना बीस फरवरी को लिखा सही हो गया। पर बात मनमोहन की। अमेरिका की तरह आमने-सामने का मुकाबला हो गया। तो गुरुवार को आडवाणी ने मनमोहन को लोकसभा चुनाव लड़ने को ललकारा। सिर्फ इतना नहीं, अमेरिका की तरह टीवी पर सीधी बहस को भी ललकारा। चुनाव का रंग जैसे-जैसे चढ़ेगा। कांग्रेस की मुसीबतें और बढ़ेंगी। पर पहले ताजा मुसीबत की बात। कांग्रेस ने पीएमके को रोकने की कम कोशिश नहीं की। अहमद पटेल ने दिन-रात एक किया। पर अंबूमणि रामदौस की भी एक नहीं चली। गुरुवार को पीएमके की काऊंसिल में वोटिंग हुई। तो करुणानिधि-सोनिया से गठबंधन लाईन वाले सिर्फ 117 निकले।

'राहुल' के बाद 'जय हो' से भी बिदकी कांग्रेस

अपन ने जैसा कल लिखा। चुनाव अब आडवाणी-मनमोहन के बीच होगा। पहली बार देश सीधे पीएम चुनेगा। कांग्रेस ने मजबूरी में मनमोहन को प्रोजेक्ट किया। रणनीति राहुल के लिए खिड़की खुली रखने की थी। राहुल को 'होर्डिंग' में 'भविष्य' बताया भी इसीलिए गया। पर मनमोहन का आडवाणी पर हमला भी दहशत का सबूत। अपन को 1999 का चुनाव याद। सोनिया ने इसी तरह वाजपेयी पर हमला किया। तो सोनिया को उलटा पड़ा। फिर नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कह डाला। तो वह भी सोनिया को उलटा पड़ा। अपने मनमोहन ने अपशब्द तो नहीं बोले। पर अपने अंदर का डर तो दिखा ही दिया। अपन को रविशंकर प्रसाद बता रहे थे- 'मनमोहन को अपने मजबूत होने पर इतना ही भरोसा। तो लोकसभा चुनाव में क्यों नहीं उतरते। अब तो आमने-सामने की लड़ाई हो गई।' अपन को मनमोहन का देवगौड़ा-गुजराल से मुकाबला भी अजीब लगा।

आडवाणी-मनमोहन और वरुण-प्रियंका में खुली जंग

अपन ने जैसे ही सोनिया के हाथ में कांग्रेस का घोषणा पत्र देखा। बगल में बैठे संपादक से कहा- 'तो राहुल मैदान से बाहर।' घोषणा पत्र पर सिर्फ मनमोहन-सोनिया का फोटू। प्रेस कांफ्रेंस आगे बढ़ी। तो सोनिया ने साफ किया- 'मनमोहन पीएम पद के उम्मीदवार होंगे। सोनिया-राहुल बिलकुल नहीं।' राहुल के बारे में पूछा। तो सोनिया बोली- 'आपने घोषणा पत्र पर फोटो नहीं देखे।' वैसे राहुल को मैदान से बाहर वरुण के डर से नहीं किया। कांग्रेस के अपने सर्वेक्षण का नतीजा। यह अलग बात जो वरुण के सामने बौने दिखने लगे हैं राहुल। सो सोनिया ने वरुण से निपटने का जिम्मा प्रियंका को सौंप दिया। प्रियंका मंगलवार को दूसरे दिन भी वरुण पर बरसी। बोली- 'सवाल परिवार का नहीं। सवाल गांधी परिवार के सिध्दांतों का।' अपन बताते जाएं। सोमवार को प्रियंका ने वरुण को गीता पढ़ने की सलाह दी थी। तो बीजेपी ने कहा था- 'हिंदुत्व सिखाने की कोशिश न करे।'

अब होगी नेहरू-गांधी विरासत की जंग

अपन को इसी टकराव की आशंका थी। नवीन चावला अभी तो सीईसी भी नहीं बने। सोचो, चीफ इलेक्शन कमीशनर होंगे। तो ऊंगलियां कैसे नहीं उठेंगी। अपन बात कर रहे हैं आयोग के वरुण गांधी संबंधी फैसले की। आपको याद होगा। अपन ने 19 मार्च को लिखा था- 'संजय गांधी के ही तो करीब थे नवीन चावला। शाह आयोग ने यही तो लिखा था- चावला लेफ्टिनेंट गवर्नर की नहीं। संजय गांधी के इशारों पर चलते थे। अब वरुण का केस नवीन चावला के सामने। लाख टके का सवाल- चावला का रुख क्या होगा।' इतवार को आयोग का फैसला आ गया। आयोग ने बैठकर वही सीडी बार-बार देखी। जिसे अपने वरुण गांधी छेड़छाड़ की हुई बता रहे थे। वही सीडी देखकर आयोग ने फैसला कर लिया। फोरेंसिक जांच भी नहीं करवाई।

वोटरों, सांसदों की खरीद-फरोख्त वाला लोकतंत्र

सबको वोट के हक से शुरू हुई लोकतंत्र में खराबी। पहले दलितों के वोट खरीदे जाते थे। फिर सरकारी खजाने का बेजा इस्तेमाल शुरू हुआ। अब तो राजनीतिक दल टिकट बेच रहे हैं। विधायक-सांसद खुद बिक रहे हैं।

चुनाव में वोटरों को खरीदने की बात कोई नई नहीं है। पहले गांवों में दलितों को ऊंची जातियों के लोग वोट नहीं डालने देते थे फिर दलितों के एक नेता को एक पसेरी चावल पहुंचा कर ऊंची जाति के लोग पूरे समुदाय की ठेकेदारी उसी को दे देते थे। वक्त बीता तो दलितों के कई नेता उभरने लगे और खरीदारों की तादाद भी बढ़ गई। धीरे-धीरे नौबत यह आ गई कि उम्मीदवार और राजनीतिक दल नगदी और शराब की बोतल लेकर सीधे दलित के घर पहुंचने लगे। इस तरह सत्ता खुद दलित के घर तक पहुंच गई। पचास साल के भारतीय लोकतंत्र का यह सफर सुनने में बड़ा अजीब लगता है। फिर भी इस सच्चाई को नकारना अपनी आंखों पर पट्टी बांधने जैसा ही होगा। पिछले पचास सालों से लोकतंत्र धन्ना सेठों का बंधक होकर रह गया है। पैसा भी उन कुछ परिवारों तक सीमित हो गया है, जिन्होंने राजनीति को अपना पेशा बना लिया है।

संविधान निर्माताओं के मन में ऐसे लोकतंत्र की कल्पना नहीं थी। उन्होंने सोचा भी नहीं था कि राजनीति धन कमाने का जरिया बन जाएगी। उनके मन में ऐसी आशंका भी पैदा नहीं हुई होगी कि कुछ परिवार राजनीति से धन कमाकर वोटरों को खरीदने का धंधा शुरू कर देंगे।

तो संगमा से आडवाणी बोले- 'दिल्ली चले आओ'

अपन ने कल संगमा-आडवाणी की बात बताई ही थी। फोन के बाद शुक्रवार को मुलाकात भी हुई। संगमा खुद आडवाणी के घर गए। यों आडवाणी-संगमा की पहले भी खूब छनती थी। अपन संगमा-आडवाणी गुफ्तगू का राज भी बताएंगे। पर पहले आडवाणी के घेराव की बात। साहिब सिंह वर्मा के समर्थक औरंगजेब रोड जा पहुंचे। वर्मा के बेटे प्रवेश को टिकट न देना बीजेपी को महंगा पड़ेगा। दिल्ली में जाटों की तादाद कोई थोड़ी-बहुत नहीं। यों दिल्ली में बिहारियों की तादाद भी बीस फीसदी। पर बिहारी को टिकट नहीं दिया। उत्तराखंडियों का भी दिल्ली में दबदबा। उत्तराखंडी भी नजरअंदाज हुए। यूपी वाले चेतन चौहान को जरूर मिला। पर किसी दिल्ली के पूरविए को देते। तो फायदा होता। बात यूपी की चली। तो बताते जाएं- वरुण गांधी यूपी में बीजेपी को अच्छा चेहरा मिला। भले वरुण चुनाव आयोग में फंस गए। पर वरुण का टिकट कटने के आसार नहीं।

राजनाथ-जेतली मिले तो चुटकियों में हुआ फैसला

बीजेपी में शांति लौटने लगी। येदुरप्पा- अनंत का झगड़ा निपट ही चुका। अम्बरीश की भाजपा में आमद हो जाएगी। केबिनेट नहीं, तो केबिनेट रेंक पर बात बन जाएगी। अम्बरीश के आते ही अनंत की जीत आसान। राजनाथ-जेतली का विवाद भी हल ही समझो। राजनाथ के घर यों ही नहीं गए जेतली। पर पवार-संगमा का झगड़ा कांग्रेस-एनसीपी को महंगा पड़ेगा। पवार मेघालय सरकार बचा नहीं पाए। उस केबिनेट मीटिंग में मौजूद थे। जिसमें राष्ट्रपति राज का फैसला किया। यों पवार ने संगमा को बताया- 'मेरी केबिनेट में नहीं चली।' पर संगमा के गले नहीं उतरी। पवार सच्चे होते, तो संगमा के साथ बात करते। पर वह तो गुरुवार को संगमा के दिल्ली पहुंचते ही खिसक लिए। अब सोचो, ऐसे वक्त पर पूर्वोत्तर में सुधांशु मित्तल किस काम के।