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March 2009

वोट बैंक की राजनीति में रासुका की भूमिका

तो वरुण गांधी देश की सुरक्षा के लिए खतरा हो गये। पर अपन को लगता है - वरुण गांधी देश के लिए नहीं मायावती का राजनीतिक खतरा बने। सो मायावती ने वही किया। जो इंमरजेंसी में इंदिरा गांधी ने किया था। इंदिरा गांधी ने भी इंमरजेसी में एनएसए का खूब बेजा इस्तेमाल किया। जब खुद की सत्ता को खतरा लगे । तो देश को खतरा बता दो। मायावती ने वरुण गांधी की दादी याद दिला दी। वरुण गांधी को भी दादी याद दिला दी। अपन को इंमरजेंसी का एक और किस्सा याद आया। तभी देवकान्त बरुआ ने कहा था- "इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा।" अब जब मायावती को राजनीतिक खतरा दिखा। तो उनने खुद पर खतरे को देश पर खतरा बता दिया। जिनकी उम्र 50 साल होगी। उन्हें तो याद होगा- इंदिरा गांधी पर जब राजनीतिक खतरा मंडराया। तो उनने इंमरेजेंसी लगाकर हजारों पर एनएसए लगाया था। मायावती तो इंदिरा गांधी के मुकाबले तिनका भर।

इस बार महा त्रिशंकु होगी लोकसभा

यूपीए-एनडीए पौने दो- पौने दो सौ में निपटेंगे। तीसरा मोर्चा ज्यादा ताकतवर होकर उभरेगा। कांग्रेस तीसरे-चौथे मोर्चे को समर्थन देने को मजबूर हो सकती है। कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया तो तीसरा मोर्चा टूटेगा। ऐसी हालत में एनडीए सरकार भी संभव।

लोकसभा चुनावों की तस्वीर अब साफ होने लगी है। देश की 543 सीटों में से 265 सीटों पर चुनाव की अधिसूचना जारी हो चुकी है। गठबंधनों ने नया रूप लेना शुरू कर दिया है। यूपीए से एक नए मोर्चे ने जन्म ले लिया है और पहले से बन-बिगड़ रहा तीसरा मोर्चे की तस्वीर भी उभर चुकी है। इस तीसरे मोर्चे में वामपंथी दलों को छोड़कर वे सभी क्षेत्रीय दल शामिल हैं जो कभी न कभी एनडीए में रहे हैं। दूसरी तरफ लालू-मुलायम के चौथे नए सेक्युलर मोर्चे में शामिल सभी दल हाल ही तक यूपीए के साथ थे। दूसरे शब्दों में यह कहा जा  सकता है कि वामपंथी दलों को छोड़कर तीसरे मोर्चे में शामिल बाकी सभी घटक दल जरूरत पड़ने पर एनडीए में शामिल हो सकते हैं। इसी तरह चौथे मोर्चे में शामिल सभी दल जरूरत पड़ने पर यूपीए में शामिल हो जाएंगे। यहां महत्वपूर्ण यह है कि तीसरे और चौथे मोर्चे के सभी घटक दल 1989 की वीपी सिंह और 1996-97 की देवगौड़ा-गुजराल सरकारों में शामिल थे।

आंध्र की नैय्या के खेवइया फिल्मी सितारे

शुक्रवार को अपना देसी नया साल शुरू हुआ। तो गरमी शबाब पर आ गई। चुनावी तापमान भी उसी तेजी से बढ़ा। कांग्रेसी आडवाणी की ललकार के जवाब में उलझे रहे। मनमोहन ने चौबीस अकबर रोड पर आनंद शर्मा को भेजा। वह बोले- 'भारतीय लोकतंत्र में सीधी बहस का कोई प्रावधान नहीं।' यानी मनमोहन सीधी बहस से बिदक गए। अपन संसदीय लोकतंत्र का संवैधानिक रूप देखें। तो उसमें पीएम प्रोजेक्ट करने का भी जिक्र नहीं। पर आडवाणी के सामने मनमोहन को कर ही दिया ना सोनिया ने। पीएम प्रोजेक्शन से लोकतंत्र का नया चेप्टर शुरू हो चुका। आनंद शर्मा आतंकवाद-सेक्युलरिज्म पर भी खूब बोले। पर जब वह सेक्युलरिज्म का झंडा उठा रहे थे। तभी तस्लीमा नसरीन ने अपने ब्लाग पर पोल खोल दी। लिखा है- 'मनमोहन सरकार ने मुझे कहा है- भारत में रहने का परमिट चाहिए। तो 31 मई तक भारत की तरफ मुंह न करो।' यह मुस्लिम कट्टरपंथियों के दबाव का सबूत।

चौथा फ्रंट बनते ही कांग्रेस खिसकी चौथे नंबर पर

इसे कहते हैं सिर मुड़ाते ही ओले पड़ना। मनमोहन की उम्मीदवारी का एलान हुआ। पीएमके भी कांग्रेस को छोड़ गई। तो अपना बीस फरवरी को लिखा सही हो गया। पर बात मनमोहन की। अमेरिका की तरह आमने-सामने का मुकाबला हो गया। तो गुरुवार को आडवाणी ने मनमोहन को लोकसभा चुनाव लड़ने को ललकारा। सिर्फ इतना नहीं, अमेरिका की तरह टीवी पर सीधी बहस को भी ललकारा। चुनाव का रंग जैसे-जैसे चढ़ेगा। कांग्रेस की मुसीबतें और बढ़ेंगी। पर पहले ताजा मुसीबत की बात। कांग्रेस ने पीएमके को रोकने की कम कोशिश नहीं की। अहमद पटेल ने दिन-रात एक किया। पर अंबूमणि रामदौस की भी एक नहीं चली। गुरुवार को पीएमके की काऊंसिल में वोटिंग हुई। तो करुणानिधि-सोनिया से गठबंधन लाईन वाले सिर्फ 117 निकले।

'राहुल' के बाद 'जय हो' से भी बिदकी कांग्रेस

अपन ने जैसा कल लिखा। चुनाव अब आडवाणी-मनमोहन के बीच होगा। पहली बार देश सीधे पीएम चुनेगा। कांग्रेस ने मजबूरी में मनमोहन को प्रोजेक्ट किया। रणनीति राहुल के लिए खिड़की खुली रखने की थी। राहुल को 'होर्डिंग' में 'भविष्य' बताया भी इसीलिए गया। पर मनमोहन का आडवाणी पर हमला भी दहशत का सबूत। अपन को 1999 का चुनाव याद। सोनिया ने इसी तरह वाजपेयी पर हमला किया। तो सोनिया को उलटा पड़ा। फिर नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कह डाला। तो वह भी सोनिया को उलटा पड़ा। अपने मनमोहन ने अपशब्द तो नहीं बोले। पर अपने अंदर का डर तो दिखा ही दिया। अपन को रविशंकर प्रसाद बता रहे थे- 'मनमोहन को अपने मजबूत होने पर इतना ही भरोसा। तो लोकसभा चुनाव में क्यों नहीं उतरते। अब तो आमने-सामने की लड़ाई हो गई।' अपन को मनमोहन का देवगौड़ा-गुजराल से मुकाबला भी अजीब लगा।

आडवाणी-मनमोहन और वरुण-प्रियंका में खुली जंग

अपन ने जैसे ही सोनिया के हाथ में कांग्रेस का घोषणा पत्र देखा। बगल में बैठे संपादक से कहा- 'तो राहुल मैदान से बाहर।' घोषणा पत्र पर सिर्फ मनमोहन-सोनिया का फोटू। प्रेस कांफ्रेंस आगे बढ़ी। तो सोनिया ने साफ किया- 'मनमोहन पीएम पद के उम्मीदवार होंगे। सोनिया-राहुल बिलकुल नहीं।' राहुल के बारे में पूछा। तो सोनिया बोली- 'आपने घोषणा पत्र पर फोटो नहीं देखे।' वैसे राहुल को मैदान से बाहर वरुण के डर से नहीं किया। कांग्रेस के अपने सर्वेक्षण का नतीजा। यह अलग बात जो वरुण के सामने बौने दिखने लगे हैं राहुल। सो सोनिया ने वरुण से निपटने का जिम्मा प्रियंका को सौंप दिया। प्रियंका मंगलवार को दूसरे दिन भी वरुण पर बरसी। बोली- 'सवाल परिवार का नहीं। सवाल गांधी परिवार के सिध्दांतों का।' अपन बताते जाएं। सोमवार को प्रियंका ने वरुण को गीता पढ़ने की सलाह दी थी। तो बीजेपी ने कहा था- 'हिंदुत्व सिखाने की कोशिश न करे।'

अब होगी नेहरू-गांधी विरासत की जंग

अपन को इसी टकराव की आशंका थी। नवीन चावला अभी तो सीईसी भी नहीं बने। सोचो, चीफ इलेक्शन कमीशनर होंगे। तो ऊंगलियां कैसे नहीं उठेंगी। अपन बात कर रहे हैं आयोग के वरुण गांधी संबंधी फैसले की। आपको याद होगा। अपन ने 19 मार्च को लिखा था- 'संजय गांधी के ही तो करीब थे नवीन चावला। शाह आयोग ने यही तो लिखा था- चावला लेफ्टिनेंट गवर्नर की नहीं। संजय गांधी के इशारों पर चलते थे। अब वरुण का केस नवीन चावला के सामने। लाख टके का सवाल- चावला का रुख क्या होगा।' इतवार को आयोग का फैसला आ गया। आयोग ने बैठकर वही सीडी बार-बार देखी। जिसे अपने वरुण गांधी छेड़छाड़ की हुई बता रहे थे। वही सीडी देखकर आयोग ने फैसला कर लिया। फोरेंसिक जांच भी नहीं करवाई।

वोटरों, सांसदों की खरीद-फरोख्त वाला लोकतंत्र

सबको वोट के हक से शुरू हुई लोकतंत्र में खराबी। पहले दलितों के वोट खरीदे जाते थे। फिर सरकारी खजाने का बेजा इस्तेमाल शुरू हुआ। अब तो राजनीतिक दल टिकट बेच रहे हैं। विधायक-सांसद खुद बिक रहे हैं।

चुनाव में वोटरों को खरीदने की बात कोई नई नहीं है। पहले गांवों में दलितों को ऊंची जातियों के लोग वोट नहीं डालने देते थे फिर दलितों के एक नेता को एक पसेरी चावल पहुंचा कर ऊंची जाति के लोग पूरे समुदाय की ठेकेदारी उसी को दे देते थे। वक्त बीता तो दलितों के कई नेता उभरने लगे और खरीदारों की तादाद भी बढ़ गई। धीरे-धीरे नौबत यह आ गई कि उम्मीदवार और राजनीतिक दल नगदी और शराब की बोतल लेकर सीधे दलित के घर पहुंचने लगे। इस तरह सत्ता खुद दलित के घर तक पहुंच गई। पचास साल के भारतीय लोकतंत्र का यह सफर सुनने में बड़ा अजीब लगता है। फिर भी इस सच्चाई को नकारना अपनी आंखों पर पट्टी बांधने जैसा ही होगा। पिछले पचास सालों से लोकतंत्र धन्ना सेठों का बंधक होकर रह गया है। पैसा भी उन कुछ परिवारों तक सीमित हो गया है, जिन्होंने राजनीति को अपना पेशा बना लिया है।

संविधान निर्माताओं के मन में ऐसे लोकतंत्र की कल्पना नहीं थी। उन्होंने सोचा भी नहीं था कि राजनीति धन कमाने का जरिया बन जाएगी। उनके मन में ऐसी आशंका भी पैदा नहीं हुई होगी कि कुछ परिवार राजनीति से धन कमाकर वोटरों को खरीदने का धंधा शुरू कर देंगे।

तो संगमा से आडवाणी बोले- 'दिल्ली चले आओ'

अपन ने कल संगमा-आडवाणी की बात बताई ही थी। फोन के बाद शुक्रवार को मुलाकात भी हुई। संगमा खुद आडवाणी के घर गए। यों आडवाणी-संगमा की पहले भी खूब छनती थी। अपन संगमा-आडवाणी गुफ्तगू का राज भी बताएंगे। पर पहले आडवाणी के घेराव की बात। साहिब सिंह वर्मा के समर्थक औरंगजेब रोड जा पहुंचे। वर्मा के बेटे प्रवेश को टिकट न देना बीजेपी को महंगा पड़ेगा। दिल्ली में जाटों की तादाद कोई थोड़ी-बहुत नहीं। यों दिल्ली में बिहारियों की तादाद भी बीस फीसदी। पर बिहारी को टिकट नहीं दिया। उत्तराखंडियों का भी दिल्ली में दबदबा। उत्तराखंडी भी नजरअंदाज हुए। यूपी वाले चेतन चौहान को जरूर मिला। पर किसी दिल्ली के पूरविए को देते। तो फायदा होता। बात यूपी की चली। तो बताते जाएं- वरुण गांधी यूपी में बीजेपी को अच्छा चेहरा मिला। भले वरुण चुनाव आयोग में फंस गए। पर वरुण का टिकट कटने के आसार नहीं।

राजनाथ-जेतली मिले तो चुटकियों में हुआ फैसला

बीजेपी में शांति लौटने लगी। येदुरप्पा- अनंत का झगड़ा निपट ही चुका। अम्बरीश की भाजपा में आमद हो जाएगी। केबिनेट नहीं, तो केबिनेट रेंक पर बात बन जाएगी। अम्बरीश के आते ही अनंत की जीत आसान। राजनाथ-जेतली का विवाद भी हल ही समझो। राजनाथ के घर यों ही नहीं गए जेतली। पर पवार-संगमा का झगड़ा कांग्रेस-एनसीपी को महंगा पड़ेगा। पवार मेघालय सरकार बचा नहीं पाए। उस केबिनेट मीटिंग में मौजूद थे। जिसमें राष्ट्रपति राज का फैसला किया। यों पवार ने संगमा को बताया- 'मेरी केबिनेट में नहीं चली।' पर संगमा के गले नहीं उतरी। पवार सच्चे होते, तो संगमा के साथ बात करते। पर वह तो गुरुवार को संगमा के दिल्ली पहुंचते ही खिसक लिए। अब सोचो, ऐसे वक्त पर पूर्वोत्तर में सुधांशु मित्तल किस काम के।

वरुण के तेवरों से भाजपाई शरमाने लगे

अपने भैरों बाबा चुनावों में अलग-थलग नहीं। चुनावों में धनबल के इस्तेमाल से बेहद खफा। कांग्रेस-बीजेपी धन जुटाने में जुटी है। पर शेखावत ऐसे रास्ते खोजने में लगे हैं। जिनसे लोकतंत्र बच सके। बुधवार को उनने रिटायर्ड सीईसी कृष्णामूर्ति से सलाह-मशविरा किया। इसी इतवार को अपन ने कृष्णामूर्ति को वेद मंदिर में सुना। कृष्णामूर्ति वहां महात्मा वेदभिक्षु की जयंति पर बोले। खैर बात चुनाव में धन बल की। चुनावों में धनबल का महत्व पूछना हो। तो उमा भारती से पूछो। खुद के पास लोकसभा चुनाव लड़ने का जुगाड़ नहीं। अपनी जनशक्ति को कैसे मैदान में उतारती। सो लालकृष्ण आडवाणी के सामने घुटने टेक दिए। आडवाणी को चिट्ठी में कहा- 'चुनाव लड़ने के लिए पैसा ही नहीं। देश को अच्छा पीएम देने के लिए आपकी मदद करना चाहती हूं।' चलो बीजेपी के करीब आने का मौका तो मिला। अब उमा यूपी, महाराष्ट्र, आंध्र, उड़ीसा जाएगी। मध्यप्रदेश बिल्कुल नहीं। अलग-थलग पड़ी उमा फिर सुर्खियों में आई। तो बुधवार को सबको सलाह देती दिखी।

बीजेपी की गुटबाजी में अब उमा भारती का दांव

बीजेपी को नवीन पटनायक ने झटका दिया। तो कांग्रेस को लालू-पासवान ने। मुलायम पहले ही झटका दे चुके। वैसे अपने लिए गङ्ढा खुद खोदा था कांग्रेस ने। याद है 29 जनवरी की कांग्रेस वर्किंग कमेटी। जब कांग्रेस ने यूपीए को ठोकर मारने की रणनीति बनाई थी। वर्किंग कमेटी के बाद जनार्दन द्विवेदी ने कहा था- 'यूपीए के नाते चुनाव नहीं लड़ेगी कांग्रेस। यूपीए तो शासन के लिए था।' अब जब लालू-पासवान ने कांग्रेस के लिए तीन सीटें छोड़ी। तो दस जनपथ के होश फाख्ता हो गए। वैसे कांग्रेस मांग भी ज्यादा नहीं रही थी। सिर्फ छह मांग रही थी। चार 2004 वाली। पांचवीं नालंदा की। नालंदा से जेडीयू के टिकट पर जीते थे रामस्वरूप प्रसाद। कांफिडेंस वोट में सरकार बचाने आए थे। सो कांग्रेस ने टिकट का वादा किया था।

'थर्ड फ्रंट' ने उड़ाए कांग्रेस के होश

अपने चंद्रबाबू नायडू पहले 'थर्ड फ्रंट' के कनवीनर थे। अब नए 'थर्ड फ्रंट' का अभी तो कोई कनवीनर नहीं। लगता है- चुनाव से पहले बनेगा भी नहीं। अभी तो 'थर्ड फ्रंट' का कोई नाम भी नहीं। लोग थर्ड फ्रंट को 'थर्ड क्लास' बताने लगे। तो अब 'थर्ड फ्रंट' कहलाने पर शर्मसार। देवगौड़ा बता रहे थे- 'प्रकाश करात ने मुझे बुलाकर कहा- लोगों को थर्ड फ्रंट नाम पर एतराज।' करात ने कहा ही होगा। तभी तो घोषणा पत्र की प्रेस कांफ्रेंस में कह रहे थे- 'मीडिया कह रहा है थर्ड फ्रंट। हम तो नहीं कह रहे।' सीपीएम ने घोषणा पत्र का खाता सबसे पहले खोला।  उम्मीद के मुताबिक ही कांग्रेस-बीजेपी दोनों पर बरसे। सो सोमवार को कांग्रेस-बीजेपी भी लेफ्ट पर जमकर बरसे। पर बात हो रही थी 'थर्ड फ्रंट' की। ना नाम पर सहमति। ना पीएम पद के उम्मीदवार पर। मायावती ने अपने सिर पर खुद रखी टोपी अपने आप उतार ली।

चुनावों के बाद होगा असली धुव्रीकरण

तीसरे मोर्चे की सरकार नहीं बनी, तो नए सिरे से धुव्रीकरण होगा। मुलायम-करुणानिधि के समर्थन वाली यूपीए सरकार बनने से रोकने के लिए मायावती, जयललिता अपनी वजह से एनडीए को समर्थन देने पर मजबूर होंगे। जबकि नवीन पटनायक, चंद्रबाबू कांग्रेस विरोध की वजह से ऐसा ही कदम उठा सकते हैं।

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू से 70 किलोमीटर दूर छोटी सी जगह है तुमकुर। तुमकुर का भारतीय राजनीति में कोई खास महत्व कभी नहीं रहा, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि मौजूदा सरकार के गठन में तुमकुर का खास महत्व था। चौदहवीं लोकसभा के चुनाव से ठीक पहले लालकृष्ण आडवाणी की तुमकुर में रैली हुई थी। आडवाणी उस समय देश के उपप्रधानमंत्री थे इसलिए वह एयरफोर्स के विमान पर तुमकुर गए थे, लेकिन उसी दिन लोकसभा चुनावों का ऐलान हो गया था। आचार संहिता लागू हो गई थी और आडवाणी को इंडियन एयरलाइंस की रेगुलर फ्लाइट पर बेंगलुरू से दिल्ली लौटना पड़ा था। उसके बाद लालकृष्ण आडवाणी सरकारी विमान का इस्तेमाल नहीं कर पाए।

हर दल में दलदल, हर गठबंधन में दरार

बेनजीर भुट्टो की हत्या न होती। तो जरदारी को कोई पूछता भी नहीं। बेनजीर जब पीएम थीं। तो मिस्टर टेन परसैंट के तौर पर बदनाम थे जरदारी। बीवी मरी, तो बीवी की मौत को भुनाकर राष्ट्रपति बन बैठे। जरदारी और मुशर्रफ में कोई खास फर्क नहीं। दोनों पाकिस्तान के नेचुरल लीडर नहीं। दुश्मनी का आलम देखिए। मुशर्रफ ने नवाज शरीफ को जेल में डाला था। तो शरीफ ने जरदारी को। सब एक दूसरे से खुन्नस निकाल रहे। पर बात हो रही थी नेचुरल लीडरशिप की। मनमोहन कहां यूपीए-कांग्रेस के नेचुरल लीडर। लगता है विदेशी मूल के मुद्दे पर बाहर निकले शरद पवार को अब पछतावा। बाहर न निकलते। तो शायद मनमोहन की जगह नंबर लग जाता। दिल में दबी बात जुबां पर आ ही गई।

माया-जयललिता ने थर्ड फ्रंट में भेजे भाजपाई दूत

तो अब तीसरे मोर्चे का पत्थर तुमकर में रखा गया। तो सबसे पहले कांग्रेस घबराई। ममता की शर्त मान ली। बंगाल की अठाईस सीटें ममता की, चौदह कांग्रेस की। कांग्रेस ममता के आगे झुकी। तो शरद पवार भी शेर हो गए। बोले- 'थर्ड फ्रंट का भी चांस। कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर समझौता न करे। तो पीएम के चुनाव में सहयोगी दलों का भी दखल होगा।' पर बात गुरुवार को फिर से जन्में थर्ड फ्रंट की। अपने हरदन हल्ली डोडेगोडा देवगौडा फिर फुदकने लगे। फिर पीएम बनने का ख्वाब देखने लगे। प्रकाश करात ने भी खूब ख्वाब दिखाए। थर्ड फ्रंट की रैली में बोले- '1996 में देश को पहली बार पता चला। कांग्रेस-भाजपा देश का भला नहीं कर सकते।' बाद में इन्हीं लैफ्टियों ने 2004 में कांग्रेस सरकार बनवाई। और देवगौड़ा ने भी खूब भला किया था देश का। सारी अर्थव्यवस्था चौपट करके गए थे।

कामराज योजना तो मोदी का ही मादा

अपन को आशंका तो थी। पर भरोसा नहीं था। आशंका सही निकली। भरोसा टूट गया। नवीन पटनायक बीजेपी का साथ छोड़ गए। पर नवीन बाबू की हालत भी ममता जैसी। ममता ने एनडीए कभी नहीं छोड़ा। पर कांग्रेस से गठजोड़ का ऐलान कर दिया। नवीन बाबू ने शनिवार को बीजेपी से गठबंधन तोड़ा। सोमवार को बोले- 'हमने एनडीए नहीं छोड़ा।' सो यह मानकर चलिए। तीसरे मोर्चे की सरकार न बनी। तो बीजेडी एनडीए में लौटेगा। और यह भी तय मानिए। तीसरे मोर्चे की सरकार बनती दिखी। तो ममता एनडीए में लौटेगी। वैसे ममता की बात चली। तो बताते जाएं- कांग्रेस को ममता की समझ नहीं आ रही। ममता भी मुलायम के रास्ते पर चल पड़ी। सीटें तय नहीं हुई। पर उम्मीदवारों का एकतरफा एलान शुरू कर दिया। प्रणव दा की सीटी-पीटी गुल। ममता वही सीटें छोड़ रही। जिन पर कांग्रेस दो-दो लाख से हावी थी।'

विरासत को लेकर कितनी चिंतित सरकार

भारत की विरासत को लेकर जुड़ी वस्तुओं को वापस लाने की कोई स्पष्ट नीति नहीं बन पाई। महात्मा गांधी से जुड़ी वस्तुएं जब-जब नीलाम होती है, सरकार के हाथ-पांव फूल जाते हैं। नीति का ड्राफ्ट पर्यटन मंत्रालय में धूल फांक रहा है।

रामसेतु और भगवान राम के अस्तित्व की तरह इस कहानी को भी नकारा जा सकता है। अलबत्ता नकारा ही जाएगा, लेकिन यह कहानी भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। बिल्कुल वैसे ही जैसे भगवान राम पैदा हुए थे और उन्होंने जानकी सीता को रावण से वापस लाने के लिए श्रीलंका पर चढाई की थी। जिसके लिए उन्होंने पुल बनाया था, जिसे हजारों सालों से रामसेतु के तौर पर जाना जाता

अभी अस्थियां और खून का सैंपल नीलाम होगा

सुनते हैं कांग्रेस ने 'जय हो' का पेटेंट एक करोड़ में खरीदा। पर 'गांधी' के पेटेंट पर धेला खर्च नहीं किया। गांधी के चश्मे, चप्पल, प्लेट-कटौरी, घड़ी की नीलामी पर अपन ने देखा ही। गांधी की नामलेवा कांग्रेस बोली लगाने नहीं गई। न कांग्रेस की यूपीए सरकार गई। वाजपेयी की सरकार होती। तो सोनिया-मनमोहन भूख हड़ताल पर बैठे होते। विजय माल्या ने सवा नौ करोड़ की बोली लगाकर नीलामी छुड़ाई। तो अंबिका-अभिषेक अपनी सरकार की पीठ थपथपा रहे थे। अभिषेक सिंघवी के नाम पर याद आया। 'स्लमडॉग मिलेनियर' को आस्कर मिला। तब भी उनने अपनी सरकार की पीठ थपथपाई थी। वैसे 'स्लमडाग मिलेनियर' पर कांग्रेस का पीठ ठोकना सौ फीसदी सही। आखिर देशभर में कांग्रेस ने ही तो बनवाई हैं झुग्गी-झोपड़ियां। कनाट प्लेस के चारों ओर भी झुग्गियां बसा दी थी। पिछली बार जगमोहन जीते। तो उनने सारी झुग्गियां हटवा दीं। झुग्गियों की जगह हरे-भरे पार्क बन गए। पर 2004 में जगमोहन हार गए। पता है क्यों- अजय माकन वोट डलवाने के लिए झुग्गी वालों को ढो-ढो कर लाए। सो स्लमडॉग मिलेनियर के आस्कर पर सचमुच कांग्रेस का पहला हक।

टिकटों की खींचतान में हुई शेखावत-आडवाणी गुफ्तगू

यूपी में कांग्रेस-एसपी गठजोड़ में दरार आई। तो दोनों दलों के उम्मीदवारों को पसीना आने लगा। अकेले लड़ने की धौंस दिखाना अलग बात। मैदान में कूद कर मैदान मारना एकदम अलग। सो ऊपर से भले ही कितना अकड़ रहे हों। अंदर से मुलायम ही नहीं, दिग्गी राजा भी मुलायम। मुलायम सिंह की भी अकेले लड़ने की हिम्मत नहीं। बुधवार को तो भड़के हुए थे। पर गुरुवार को खुद रीता बहुगुणा को फोन किया। तो दिग्गी राजा बता रहे थे- 'मुलायम फ्रैंडली चुनाव को तैयार हों। तो अभी भी गठजोड़ की गुंजाइश बरकरार।' अपन ने पूछा- 'क्या कुछ उम्मीदवार मैदान से हट भी सकते हैं?' उनने कहा- 'हां  इस पर भी हो सकता है विचार।' जब से गठबंधन की राजनीति शुरू हुई। अपन तभी से ऐसी लुक्का-छिपी देख रहे। पहले एकतरफा उम्मीदवारों का एलान। फिर ले देकर गठजोड़ की कोशिश। तो यह खेल सिर्फ कांग्रेस नहीं खेल रही। शरद पवार भी कम नहीं। पर पवार का खेल सिर्फ सीटों के बंटवारे तक नहीं। पवार ने क्रिकेट और राजनीति गढमढ कर दी।

चावला की तैनाती ने याद कराई इंदिरा की कार्यशैली

अपन ने अभी ब्लागरों पर गौर करना शुरू नहीं किया। पर अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में ब्लागरों का अहम रोल रहा। सो एलकेआडवाणी डाटकाम का आइडिया आया। वेबसाइट के जरिए आडवाणी पूरे साउथ एशिया में हिट। अपन ने पाकिस्तान का 'डॉन' अखबार खोला। तो आडवाणी की वेबसाइट का 'लोगो' दिखा। अमेरिका का 'डेलीन्यूज' देखा। तो आडवाणी को 'लोगो' दिखा। यों तो यूपीए सरकार भी वेबसाइटों के मामले में कमजोर नहीं। कांग्रेस पार्टी भी फिसड्डी नहीं। पर ब्लागरों की राय कितने पढ़ते होंगे। नवीन चावला को चीफ इलेक्शन कमिश्नर बनाने का फरमान ही लो। अपन ने ब्लागरों के ब्लाग झांके। बड़े अखबारों की वेबसाइटें देखी। इधर चावला को अगला सीईसी बनाने का

पाक का 'डबल थ्री' आतंक भी होगा अपना चुनावी मुद्दा

'नाईन-इलेवन' के बाद 'छब्बीस-ग्यारह'। और अब 'डबल थ्री'। सो अब अपन को आतंकवाद बड़ा चुनावी मुद्दा बनने का भरोसा। मुंबई के बाद राजस्थान दिल्ली में नहीं बना होगा। पर लोकसभा चुनावों में बनेगा। अपन को मनमोहन का स्टेटमेंट नहीं भूलता। जो उनने सोलह सितंबर 2006 को मुशर्रफ से मुलाकात के बाद दिया। मुलाकात हुई थी हवाना में। मौका था निर्गुट सम्मेलन। वहीं पर आतंकवाद के खिलाफ साझा मैकेनिज्म तय हुआ। मनमोहन ने कहा था- 'पाक भी आतंकवाद का शिकार।' मनमोहन ने यह कहकर पाकिस्तान के सारे पाप धो दिए। अपन तो दो दशक से पाकिस्तानी आतंकवाद के शिकार हैं। मनमोहन ने अमेरिकी दबाव में ऐसा काम किया। जो किसी भारतीय के पल्ले नहीं पड़ा।

Result of Manmohans Soften Terror Policy

[caption id="attachment_798" align="alignleft" width="150" caption="Taj Hotel Mumbai under Terrorist Attacks"]Taj Hotel Mumbai under Terrorist Attacks[/caption]

Terror Attacks on Mumbai were result of our Prime Minister Manmohan Singh's soft view on anti Terror policy.

चुनावी डुगडुगी के साथ ही सेंधमारी की तैयारी

तो चुनावी डुगडुगी बज गई। गोपाल स्वामी जब डुगडुगी बजा रहे थे। तो नवीन चावला बाएं, कुरैशी दाएं बैठे थे। अपन ने तो शनिवार को ही लिख दिया था- 'सोमवार को होगा चुनाव का ऐलान।' पर चावला के छुट्टी पर जाने की खबर उड़ी। तो भाई लोगों को लगा- फिर झगड़ा शुरू। बात झगड़े की चल ही पड़ी। तो याद दिला दें- सीईसी गोपाल स्वामी की सिफारिश- ईसी चावला को हटाने की थी। दोनो अगल-बगल बैठे, तो सरकार की मेहनत साफ दिखी। सरकार अपनी तीन साल की मेहनत पर पानी क्यों फेरती। चुनाव में चावला सीईसी हों। इसीलिए तो तीन साल पहले ईसी बनाया था। सो, गोपाल स्वामी की सिफारिश कूड़ेदान में गई। अपन को सरकार से यही उम्मीद थी। इतवार को सिफारिश रद्द। सोमवार को चुनावों का ऐलान। यह कोई संयोग नहीं।

एक दशक से दक्षिण बना-बिगाड़ रहा सरकार

आठवीं लोकसभा के बाद किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। पंद्रहवीं लोकसभा भी त्रिशंकु होगी। तीसरा मोर्चा अभी भले ही उभरता दिखाई दे रहा हो, लेकिन तीसरे मोर्चे की सरकार नहीं बनीं, तो चंद्रबाबू, जयललिता, मायावती एनडीए के साथ जा सकती हैं। तीनों पहले भी एनडीए के साथ रहे हैं।

यूपीए सरकार ने अल्पमत में होते हुए अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है। पहले वामपंथी दलों के समर्थन से और बाद में समाजवादी पार्टी के समर्थन से सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया। कांग्रेस को दो बार अल्पमत सरकार चलाने का मौका मिला। और दोनों ही बार उसने सांसदों की खरीद-फरोख्त करके अपना