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February 2009

संन्यास राजनीति से, पद से नहीं

चलो वाजपेयी के चुनाव लड़ने की खबरों का फुल स्टाप हुआ। राजनाथ सिंह ने लखनऊ से लालजी टंडन को भिड़ा दिया। वह तो भिड़ने को तैयार ही थे। अब सोमवार को चुनावों का एलान होने के आसार। तो पता चलेगा- सामने संजय दत्त उतर पाएंगे या नहीं। वैसे कानूनन चुनाव नहीं लड़ सकते। पर बात वाजपेयी की। पता नहीं, वाजपेयी के लड़ने की चंडूखाने की खबरें कौन पेल रहा था। अपन ने तो 30 दिसंबर 2005 को खुद वाजपेयी के मुंह से सुना था। जब उनने चुनावी राजनीति से संन्यास का एलान किया। मुंबई में बीजेपी काउंसिल का आखिरी दिन था। अब बात राजनीति के दूसरे संन्यास की। सोमनाथ चटर्जी ने दसवीं बार फिर संन्यास का एलान किया। अपन नौ बार पहले भी स

अपराधीकरण के बोलबाले वाली रही 14वीं लोकसभा

संसद का सत्रावसान हो गया। राज्यसभा तो अजर-अमर। पर लोकसभा का टर्म खत्म होने को। वैसे लोकसभा भंग नहीं हुई। सरकार चाहे तो तीन महीनों में जब चाहे सेशन बुला ले। भले लोकसभा चुनावों का ऐलान भी हो जाए। पर स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने ऐसे 'द एंड' कहा। जैसे लोकसभा का आखिरी दिन हो। दादा ने संसदीय जीवन से संन्यास का ऐलान भी कर दिया। दादा की टर्म विवादों से घिरी रही। दादा ने अपना हिसाब-किताब बताया। तो उन कड़वी-मीठी यादों को ताजा भी किया। एक गम था, जो सीने में छुपा रखा था। कह ही दिया- 'महिला आरक्षण बिल पास नहीं हुआ।' सरकार पर फब्ती कसी- 'बिल लोकसभा के बजाए राज्यसभा में पेश किया। ताकि लोकसभा का टर्म खत्म होने के बाद भी बिल जिंदा रहे।' लोकसभा में पेश होता। तो पास कराने की मांग उठती। कांग्रेस की रणनीति रही- 'न होगा बांस, न बजेगी बांसुरी।' पर बात दादा की। उनने सदन से विदाई कुछ ऐसे ली। जैसे इस्तीफा दे रहे हों।

तो मोदी से भयभीत हो गए बाल ठाकरे

अपने सुखराम भी सजायाफ्ता हो गए। नरसिंह राव के एक और मंत्री पर भ्रष्टाचार साबित। शीला कौल, पीके थुंगन, सतीश शर्मा पहले ही दोषी साबित हो चुके। नरसिंह राव खुद भ्रष्टाचार के बूते पीएम बने रहे। सो भ्रष्टाचार को पनाह देते रहे। सुखराम भोले पहाड़ी थे। जिनने नकदी अपने घर में ही छुपा रखी थी। सो पकड़ी गई। राव ने सरकार बचाने के लिए जो चार सांसद खरीदे। वे भी आदिवासी भोले भंडारी थे। नकदी बैंक में जमा करा दी। पर वह तो संसद के अंदर की बात पर अदालत के हाथ बंध गए। वरना रिश्वत देने, लेने वाले अंदर होते। बेचारे सुखराम। पर एन चुनाव के वक्त आए फैसले से कांग्रेस की हवा खराब। सो बुधवार को ब्रीफिंग ही गोल कर गई। सोनिया का संसदीय दल मीटिंग में भाषण हुआ। फिर भी ब्रीफिंग नहीं। बात सोनिया के भाषण की। लिखा हुआ भाषण बंट गया। सोनिया को गुटबाजी से हार का अंदेशा। कहते हैं ना दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है। मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में कांग्रेस हारी। तो सोनिया ने कहा था- 'आपसी फूट के कारण हारे।' यों सोनिया को यूपीए सरकार के पांच साल पूरे होने पर संतोष।

तारीखों पर गोपालस्वामी चावला की कशमकश

संसद के सेंट्रल हाल की गहमा-गहमी बढ़ गई। गहमा-गहमी का यह आखिरी हफ्ता। कल के बाद चौदहवीं लोकसभा नहीं बैठेगी। अब जून में पंद्रहवीं लोकसभा ही बैठेगी। उसमें मौजूदा सांसद कितने होंगे। कितनों को टिकट मिलेगा, कितनों का कटेगा। जिनको मिलेगा, उनमें कितने जीतेंगे। सो सेंट्रल हाल में चमकते चेहरे कम। उतरे हुए चेहरे ज्यादा दिखने लगे। मंगलवार की बात ही लो। अपने नमो नारायण मीणा पूरे शबाब पर थे। बिना लाग लपेट बोले- 'वापस आने वालों की तादाद चालीस फीसदी ही होगी।' यह फार्मूला सिर्फ कांग्रेस का नहीं। बीजेपी का भी यही फार्मूला। राजस्थान के भाजपाईयों के चेहरे ज्यादा लुढ़के दिखे। सेंट्रल हाल के किसी बैंच पर बैठ जाइए। एक ही बात सुनने को मिलेगी- 'कहीं और हो न हो, राजस्थान में कांग्रेस को फायदा होगा।' यह सुन-सुनकर राजस्थान के भाजपाई सांसदों की हवा खराब। कांग्रेसी दावा तो मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ पर भी कम नहीं ठोकते। पर मध्यप्रदेश के भाजपाई उतने परेशान नहीं। हां, छत्तीसगढ़ के भाजपाई परेशान।

जब 'ॐ' गूंजा आस्कर के मंच पर

अपन को याद है पंद्रह अगस्त 1998 की वह रात। जब राष्ट्रपति भवन के सामने विजय चौक पर लेजर शो हुआ। पीएम अटल बिहारी वाजपेयी खुद मौजूद थे। एआर रहमान ने गाया था- 'वंदे मातरम्'। तेईस फरवरी को रहमान 'स्वर्णिम' आस्कर हासिल कर रहे थे। तो अपन को आजादी की स्वर्ण जयंती का वह सीन याद आ गया। 'स्लमडॉग मिलियनेयर' अपन ने 22 फरवरी रात को ही देखी। झुग्गी-झोपड़ी जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है फिल्म की कहानी। यह कहानी 'क्यू एंड ए' नावेल से ली गई। नावेल के लेखक हैं- अपने आईएफएस अफसर विकास स्वरूप। और खुदा जब देता है, तो छप्पर फाड़कर देता है। दशकों बाद आस्कर मिले। तो एक साथ एक ही फिल्म में आठ। फिर डाक्यूमेंट्री 'स्माइल पिंकी' को भी 'आस्कर' मिला। पर बात रहमान की। एआर रहमान-यानी अल्ला रक्खा रहमान। रहमान जब पैदा हुए तो नाम था- 'दिलीप कुमार'। बात 1988 की, वह बाईस साल के थे।

शरीयत पर इतनी हायतौबा भी ठीक नहीं

पाकिस्तान के एनएफडब्ल्यूपी में लोगों की समस्याओं और आक्रोश का निदान करने के लिए शरीयत लागू की गई है। मौलाना सुफी मोहम्मद के साथ हुआ समझौता उनके तालिबानी दामाद मौलवी फजलुल्लाह को अलग-थलग करने में सहायक हुआ, तो यह स्वात घाटी में तालिबान की कमर तोड़ने में सहायक होगा।

पिछले हफ्ते इसी कालम में मैंने तालिबान के भारत के सिरहाने तक आ पहुंचने की चिंता जताई थी। जिस दिन यह कालम छपा उस दिन इसी तरह की खबरें आनी शुरू हो गई थी। पिछले सोमवार का यह वही दिन था जब पेशावर में एनडब्ल्यूएफपी प्रशासन और वहां शरीयत कानून लागू करने की मांग कर रहे मुल्लाओं में समझौता हुआ। एनडब्ल्यूएफपी ने कट्टरपंथी मौलवी सूफी मोहम्मद की तहरीक-ए-निफाज-ए-शरीयत-ए मोहम्मदी (टीएनएसएम) के साथ समझौता किया है जिसके मुताबिक एनडब्ल्यूएफपी के मालाकंड डिवीजन में निजाम-ए-अदल शरीयत का कानून लागू हो जाएगा। इस खबर ने दुनियाभर को चौंका दिया क्योंकि इस घटनाक्रम को पाकिस्तान सरकार का तालिबान के सामने घुटने टेकना माना गया।

दादा को हुआ अपने श्राप पर अफसोस

आखिर दादा को अपनी गलती का अहसास हुआ। उनने गुरुवार को कही बात शुक्रवार को वापस ले ली। गुरुवार को उनने सांसदों पर भड़कते हुए कहा था- 'मैं उम्मीद करता हूं कि आप सभी चुनाव हार जाएं। आप सभी को चुनाव में हारना चाहिए। जनता अपना फैसला ठीक ढंग से करेगी।' लोकसभा का स्पीकर हैड मास्टर नहीं होता। वह सांसदों में से ही चुना जाने वाला सिर्फ सदन का मानीटर। मानीटर की हैसियत हैड मास्टर तो छोड़िए। मास्टर की भी नहीं होती। सो दादा के गुस्से को उनकी तानाशाही शैली माना गया। वैसे जैसा अपन ने लिखा ही था- 'अपन को चौदहवीं लोकसभा का कोई सत्र याद नहीं। जब दादा ने संसद का बंटाधार होने की बात न कही हो।' बाईस अक्टूबर को उनने एक कांग्रेस के सांसद को फटकारते हुए कहा था- 'मैं आप पर कार्रवाई करूंगा। हम जब गाली खा ही रहे हैं। तो सबकी खाएंगे।' सोमनाथ चटर्जी ने सदन को चलाने का ऐसा रिकार्ड बनाया। जो फिर कभी नहीं बनेगा।

मैच फिक्सर को पाकर सोनिया हुई बाग-ओ-बाग

लोकसभा अब चली-चला की वेला में। गुरुवार को सभी दलों के सांसद अपना-अपना एजेंडा लेकर वैल में कूदे। तो हमेशा की तरह स्पीकर सोमनाथ चटर्जी बिफर गए। वैसे तो अपन को चौदहवीं लोकसभा का कोई सत्र याद नहीं। जब दादा ने संसद का बंटाधार होने की बात न कही हो। पर गुरुवार को उनने वो कहा। जो सबको चुभ गया। उनने भी अपनी मर्यादा तोड़ दी। बोले- 'मैं उम्मीद करता हूं कि आप सभी चुनाव में हार जाएं। आप सभी को चुनाव में हारना चाहिए। जनता अपना फैसला ठीक ढंग से करेगी।' पर बात चुनाव से पहले झूला झूलने की। जैसा अपन ने कल लिखा था। झूला बदलने की चुनावी सर्कस शुरू हो गई। उध्दव ठाकरे ने शरद पवार से मुलाकात की। बीजेपी-शिवसेना का चौबीस साल पुराना रिश्ता चौराहे पर।

झूला बदलने की चुनावी सर्कस शुरू

भले ही प्रणव दा को पीएम की कुर्सी नहीं मिली। एक्टिंग पीएम भी नहीं बन पाए। पर बुधवार को जब वह बार-बार आडवाणी को पूर्व उपप्रधानमंत्री बता रहे थे। तो अपन को लगा जैसे बगल में बैठी सोनिया से कह रहे हों- 'कम से कम आखिरी दिनों में उपप्रधानमंत्री ही बना दो।' प्रणव दा अभिभाषण पर हुई बहस का जवाब दे रहे थे। तो आडवाणी को लेकर ज्यादा ही सावधान थे। आडवाणी ने प्रणव दा की तारीफ जो कर दी थी। सो बदले में आडवाणी की तारीफ करने लगते। तो सोनिया के दरबार में बने-बनाए नंबर कट जाते। सो उनने एनडीए राज को याद कराकर आडवाणी को सुई चुभोई। बोले- 'संसद पर हमले के बाद आपने बार्डर पर सेना लगा दी थी। बारूदी सुरंगें बिछा दी थी। हमने मुंबई पर आतंकी हमले के बाद यह सब नहीं किया। पर वह हासिल कर लिया। जो आप नहीं कर पाए।' पाक ने अमेरिका के दबाव में कसाब को क्या कबूला। प्रणव दा अपनी पीठ ठोकने लगे।

करीबियों को घेर आडवाणी को डराने में जुटी कांग्रेस

अपने प्रणव दा के लिए खुश होने वाली बात ही थी। विपक्ष का नेता लालकृष्ण आडवाणी भरी संसद में तारीफ करें। तो प्रणव दा खुश क्यों न होते। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस शुरू हुई। तो आडवाणी ने प्रणव दा की तारीफ के पुल बांधे। प्रणव दा तो खुश दिखे। पर सोनिया थोड़ी असहज दिखी। वैसे आडवाणी की तारीफ प्रणव दा के लिए घाटे का सौदा। लेफ्ट से तारीफ क्या कम थी। जो अब बीजेपी भी। लेफ्ट की पैरवी के कारण ही तो प्रणव दा पीएम नहीं बन पाए। खैर बात आडवाणी की। उनने कहा- 'मैं तो लंबे समय से प्रणव दा की क्षमताओं का कायल। संकट के समय प्रणव दा की रफ्तार बढ़ जाती है। मैं कई बार सोचता हूं। यूपीए के पास प्रणव दा जैसा संकट मोचक न होता। तो यूपीए सरकार का क्या होता।' आडवाणी की बात में दम। प्रणव दा 42 केबिनेट कमेटियों के मुखिया। इतनी जिम्मेदारी तो मनमोहन की भी नहीं। सोनिया भी प्रणव दा की क्षमताओं से वाकिफ। पर पीएम नहीं बनाएंगी। मनमोहन बीमार पड़े। तो एक्टिंग पीएम भी नहीं बनने दिया। नंबर दो का आफिशियल दर्जा भी नहीं लेने दिया।

सत्यम् की बैंलेंसशीट जैसा प्रणव का बजट

पच्चीस साल बाद प्रणव दा को मौका भी मिला। तो तब जब बीस दिन बाकी पड़े थे। प्रणव दा इसे बजट कहें, या अंतरिम बजट। दोनों ही गैर कानूनी। बीस दिन की सरकार को 365 दिन का बजट बनाने का क्या हक। आने वाली सरकार पर अपनी योजनाएं लादने का हक नहीं। आप पूछेंगे- अपन ने बीस दिन बाकी कैसे बताए। तो बता दें- अपना अंदाज दस मार्च को चुनाव के ऐलान का। सो अनुदान मांगों की जगह बजट पेश करना गैरकानूनी भी। अनैतिक भी। अंतरिम बजट चुनावी फायदे के लिए कहा गया। पर अपन याद दिला दें- 1991, 2004 में चुनाव से पहले ऐसा मौका आया। तो अंतरिम बजट नहीं, अलबत्ता अनुदान मांगें ही पेश हुई। यह भी याद दिला दें- दोनों ही बार सरकार चुनाव में चारों खाने चित हुई। पर बात प्रणव दा की। जिनने यूपीए के प्रोग्रामों पर धन तो खूब लुटाया। पर मिडिल क्लास को टैक्स में कटौती की बारी आई। तो नैतिकता की दुहाई देते बोले- 'अंतरिम बजट में टैक्सों पर बात नहीं कर सकते।' रोजगार गारंटी, भारत निर्माण, नेहरू मिशन को 110000 करोड़ लुटाते समय नैतिकता नहीं दिखी। ये तीनों ही प्रोग्राम कांग्रेसी वर्करों की गरीबी दूर करने का साधन।

तालिबान अब हमारे सिरहाने

पाकिस्तान का शासन अब सिर्फ दो प्रांतों पंजाब और सिंध तक ही सीमित रह गया है। जरदारी ने यह मान लिया है कि फाटा और एनडब्ल्यूएफपी के ज्यादातर इलाकों में अलकायदा का कब्जा हो गया है। पाकिस्तान की नींद अब उखड़ी है, जब बहुत देर हो चुकी है। अब भी अगर पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ खड़ा नहीं होता, तो भारत और अमेरिका को सैन्य कार्रवाई करनी पड़ेगी।

अमेरिका के नए राष्ट्रपति बाराक हुसैन ओबामा ने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस करवाने में बीस दिन का लंबा वक्त लिया। भारत के प्रधानमंत्री की तरह तुरुत -फुरुत अपनी नीतियों का खुलासा करने के बजाए ओबामा ने अपनी रणनीति पर अमल शुरू करने के बाद खुलासा किया। जैसी कि उम्मीद थी ओबामा ने दुनियाभर की भावनाओं की कद्र करते हुए इराक में बुश प्रशासन की गलतियों को सुधारना शुरू कर दिया है। दूसरी तरफ अफगानिस्तान के मोर्चे पर और कड़ाई बरतनी शुरू की है, ताकि तालिबान और अलकायदा का फैलाव रोका जा सके। जार्ज बुश के अफगानिस्तान पर हमले का नतीजा यह निकला है कि इन दोनों कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवादी संगठनों का फैलाव पाकिस्तान के फाटा (फैडरली एडमिनस्टर्ड ट्राइबल एरिया), एनडब्ल्यूएफपी(नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस) और ब्लूचिस्तान तक हो गया है। फिलहाल पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत ही इन दोनों आतंकी संगठनों के प्रभाव से बचे हुए हैं। हालांकि यह दावा के साथ नहीं कहा जा सकता कि इन आतंकी संगठनों का इन दोनों प्रांतों में बिल्कुल प्रभाव नहीं है।

लालू के बजट, प्रणव की धमकी के चुनावी मायने

अब संसद क्या चले, क्या न चले। यों प्रेक्टिकली तो शुक्रवार को पहला ही दिन था। पहले ही दिन कोरम पूरा नहीं हुआ। सो दोपहर बाद लोकसभा नहीं चली। दोपहर से पहले का दिन चुनावी लिहाज से अहम रहा। लालू का रेल बजट हो या प्रणव दा की पाक को धमकी। दोनों का मकसद वोटरों को लुभाना था। चुनाव का वक्त न होता। तो प्रणव दा पाकिस्तान के खिलाफ इतने तीखे तेवर न दिखाते। लालू का पांचवां बजट भी 'चारा' छवि सुधारने वाला रहा। वैसे लालू के रेल बजट का कोई मतलब नहीं। रेल बजट नई सरकार आने के बाद शुरू होगा। जो भी नई सरकार आएगी, वह अपना बजट बनाएगी। सो यह नौटंकी क्यों हुई। लालू या सोनिया ही जाने। सोमवार को पेश होने वाले अंतरिम बजट का भी कोई मतलब नहीं। मौके का फायदा उठाने की कोशिश भर। लालू के बजट का तो क्या कहने। हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और। बात हाथी की चली। तो बताते जाएं। लालू ने बजट भाषण पढ़ते कहा- 'हाथी को चित्त कर चीता बना दिया।' सुषमा स्वराज ने लालू के डायलॉग पर माकूल टिप्पणी की। जब उनने कहा- 'यह एकदम सही। चीता आदमखोर होता है। लालू ने रेलवे को आदमखोर ही बना दिया है। जो सामने से नहीं, छिपकर वार करता है।'

कसाब के साथ पुरोहित भी पाक में मोस्ट वांटेड

चौदहवीं लोकसभा का आखिरी सैशन शुरू हुआ। तो कम से कम एक मुद्दे पर कांग्रेस को राहत मिली। राष्ट्रपति का अभिभाषण खत्म ही हुआ था। पाक के होम मिनिस्टर रहमान मलिक ने मान लिया- 'मुंबई में हुए आतंकी हमले के तार पाक से जुड़े थे।' पर स्लीपिंग सेल भारत में भी थे। तार तो आस्ट्रिया, स्पेन, इटली से भी जुड़े थे। एफआईआर दर्ज करने और छह गिरफ्तारियों का भी खुलासा किया। सो सरकार दबाव की रणनीति से सफलता पर गदगद। अब विपक्ष के हमले भी उतने धारदार नहीं रहेंगे। होम मिनिस्टर के बाकी खुलासों की बात अपन बाद में करेंगे। पहले बात राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील के अभिभाषण की। सवा घंटे का अभिभाषण बेहद फीका रहा। इतना काफी नहीं था। सो अपने उपराष्ट्रपति ने हिंदी की टांग तोड़ी। परंपरा- अंग्रेजी और हिंदी में अभिभाषण की। अपन को बीस साल का इतिहास तो याद। वेंकटरमण अंग्रेजी में बोलते। तो शंकर दयाल शर्मा हिंदी में। शंकर दयाल राष्ट्रपति बने। तो उपराष्ट्रपति केआर नारायणन अंग्रेजी में बोलते। नारायणन राष्ट्रपति बने। तो उपराष्ट्रपति कृष्ण कांत हिंदी में बोलते। अबके प्रतिभा पाटील हिंदी में बोलती। तो हामिद अंसारी का अंग्रेजी में ठीक रहता। सुषमा स्वराज ने सलाह भी दी थी। पता नहीं, प्रणव दा नहीं माने, या प्रतिभा पाटील। पर हिंदी की टांग जमकर टूटी।

प्रतिभा पाटील के पाले में अब एक नहीं, दो गेंदे

चौदहवीं लोकसभा का आखिरी सैशन आज से। अपने प्रियरंजन दासमुंशी डिसचार्ज होते। तो अपन उन्हीं के मुंह से सैशन का एजेंडा सुनते। दासमुंशी की जगह वायलार रवि ने एजेंडे पर रोशनी डाली। रेल और आम बजट समेत 37 सरकारी आईटम। सत्ताईस बिल पेश-पास-वापसी एजेंडे पर। पर महिला आरक्षण बिल का जिक्र भी नहीं। याद है- कितना ड्रामा किया था- जब राज्यसभा में बिल पेश किया। अपन कांग्रेस के लग्गुओं-भग्गुओं की बात नहीं करते। सोनिया तक महान उपलब्धि बताते नहीं थकी। अब आखिरी सैशन के एजेंडे में भी नहीं। वही हाल भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल बिल का। यूपीए नहीं चाहता पीएम लोकपाल के दायरे में हो। खैर पंद्रह दिन का सैशन चलेगा दस दिन। पर आधे दिन तो हंगामे जाएंगे। एक दिन अपनी प्रतिभा ताई के अभिभाषण का। एक दिन प्रणव दा के आम बजट का। यों तो फाइनेंस खुद पीएम के पास। पर पीएम भी दासमुंशी की तरह बिस्तर पर। यों पीएम ऑपरेशन के बाद चंगे-भले। पर प्रणव दा आखिरी सैशन में फन्नेखां होंगे।

कांग्रेस-सपा प्रेम विवाह टूटने के कगार पर

यों पाकिस्तानी सरकार ने नहीं कहा। पर 'डान' अखबार ने अब तक जो छापा। बाद में वही पाक सरकार ने कहा। सो सबूतों को नाकाफी बताने के बाद अब पाक कहेगा- 'मुंबई का हमला बिना लोकल स्लीपिंग सेल नहीं हुआ। पाक एजेंसियों को भारत के उन तत्वों से पूछताछ करने दी जाए।' पर कांग्रेस लोकल आतंकियों के बचाव में। नरेंद्र मोदी ने स्लीपिंग सेल पर हमला बोला। तो कांग्रेस मोदी पर चढ़ दौड़ी थी। अपन पाकिस्तान सरकार का पक्ष नहीं ले रहे। पर मनमोहन ने मुशर्रफ से आतंकवाद पर साझा मकेनिज्म का समझौता किया था। अब मुंह चुराने की क्या जरूरत। जब एफबीआई को आतंकियों से पूछताछ की इजाजत। तो आईएसआई को भी इंडियन मुजाहिद्दीन के आतंकियों से मिलने दो। आतंकवाद पर दोहरा मापदंड तो नहीं चल सकता। जो सरकार लोकल आतंकियों को पनाह दे। आतंकियों के लिए बने कानून ढीले करे। अदालत फांसी की सजा सुनाए। तो फच्चर फंसा कर बैठ जाए। वह सरकार आतंकवाद से लड़ने में कितनी सक्षम। पर बात कांग्रेस के दोहरे मापदंड की चल रही थी।

चुनावी तैयारियां शुरू आतंक बनने लगा मुद्दा

चुनावी तैयारियां शुरू हो गई। कांग्रेस आतंकवाद पर हमलावर होने लगी। बीजेपी से आतंकवाद का मुद्दा छीनने की फिराक में। महंगाई पर तो काबू पा ही लेगी चुनाव तक। आडवाणी का आतंकवाद मुद्दा भले दिल्ली-राजस्थान में नहीं चला। पर कांग्रेस को भी असलियत की भनक। दोनों राज्यों में बीजेपी हिट विकिट हुई। आतंकवाद का मुद्दा नहीं चला। ऐसी बात नहीं थी। सो असलियत को समझ सोनिया एक्टिव हुई। अब आतंकवाद पर मनमोहन-प्रणव कुछ भी बोलें। लोग गंभीरता से नहीं लेते। अलबत्ता खिल्ली उड़ाने तक की नौबत। सो सोनिया खुद मैदान में उतर चुकी। खुद को इंदिरा का अवतार बताकर पाक को ललकारा। पर सोनिया के भाषण की स्याही सूखी नहीं थी। सोमवार को पाकिस्तान ने कह दिया- 'भारत के दिए सबूत नाकाफी।' यह होना ही था, इसी के आसार थे। अपन को लगता है चुनाव से पहले जंग का माहौल बनेगा। सो सोनिया की ललकार से कांग्रेसी बाग-ओ-बाग। सोमवार को अभिषेक मनु सिंघवी दो कदम आगे निकले। अब तक जो बातें बीजेपी कहती थी। वही सिंघवी ने कही।

चुनाव आयोग को निष्पक्ष बनाने की जरूरत

मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी ने न सिर्फ  पक्षपात करने वाले आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की है, अलबत्ता आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कोलजियम बनाने और रिटायरमेंट के बाद पद या राजनीति में आने की पाबंदी लगाने की सिफारिश भी की है।

मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी को देश के दो सौ सांसदों ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला के खिलाफ शिकायत की थी। गोपालस्वामी का यह काम था कि वह उस याचिका पर अपना फैसला सुनाते। यह अलग बात है कि उन्हें अपने सहयोगी चुनाव आयुक्त के खिलाफ सिफारिश करने का हक है या नहीं। इस बात का फैसला सुप्रीम कोर्ट करेगी, क्योंकि संविधान के किसी प्रावधान पर कोई मतभेद हों तो उसका फैसला केंद्रीय मंत्रिमंडल नहीं कर सकता। संवैधानिक प्रावधानों और यहां तक कि संसद की ओर से बनाए गए कानूनों की समीक्षा करना सुप्रीम कोर्ट का काम है। इसी अधिकार के तहत सुप्रीम कोर्ट संसद की ओर से पारित और राष्ट्रपति से हस्ताक्षरित कई कानूनों को संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताकर रद्द कर चुकी है। संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव आयुक्त को हटाने के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश का जिक्र है।

ताकि राम मंदिर पर कोई भ्रम न रहे

बीजेपी की नेशनल काऊंसिल पूरे शबाब पर रही। शुक्रवार को वर्किंग कमेटी में भाषण हुआ। तो राजनाथ सिंह ने तीनों मुद्दों को नहीं छुआ। यह बात अपन ने कल लिखी थी। अपने मीडिया बंधुओं को वही खबर चाहिए। तीनों मुद्दे दोहराए, तो क्यों दोहराए। नहीं दोहराए, तो क्यों नहीं दोहराए। सो खबर वही बनी। राजनाथ सिंह के भाषण में मंदिर, सिविल कोड, 370 का जिक्र तक नहीं। संघ की तरह मीडिया भी बीजेपी को याद कराता रहता है- 'अपनी जड़ें मत छोड़िए।' बात संघ की चली। तो बताते जाएं- नागपुर संघ का हेड क्वार्टर। सो यह भी खबर बनी- 'सुदर्शन, भागवत नागपुर से नदारद।' जैसे वैसे वे नागपुर में ही बैठे रहते हैं। अठाईस जनवरी को अपनी मोहन भागवत से मुलाकात हुई। तो उनने बताया था- 'मैं पांच फरवरी को तो नागपुर में हूं। पर इसी दिन आगे का प्रवास।' केएस सुदर्शन का प्रोग्राम तो महीनों पहले तय होता है। मोहन भागवत का भी कम से कम दो महीने पहले। बीजेपी वर्किंग कमेटी की तरह प्रोग्राम नहीं बदलते। होनी थी जनवरी में, हुई फरवरी में।

वाजपेयी की फिक्र हुई नागपुर में

वाजपेयी के बिना बीजेपी की नेशनल काउंसिल आज शुरू होगी। शुक्रवार को वर्किंग कमेटी शुरू हुई। तो वाजपेयी के कुशल क्षेम की कामना की गई। शुक्र को ही सोनिया ने मनमोहन के कुशल क्षेम की कामना की। 'कांग्रेस संदेश' में सोनिया ने लिखा है- 'वह जल्द ही ठीक होकर कामकाज संभालेंगे। आगे भी देश का नेतृत्व करेंगे।' यों अपन को सोनिया के इस कहे पर शक। एक तरफ मनमोहन के नेतृत्व की बात। तो दूसरी तरफ कांग्रेस के पहले होर्डिंग में मनमोहन का जिक्र भी नहीं। पहला होर्डिंग अटल बिहारी वाजपेयी के हल्के लखनऊ में लगा। जिसमें सिर्फ राहुल बाबा का फोटू। नारा है- 'अतीत की नींव पर, भविष्य का निर्माण।' साफ है- राहुल होंगे कांग्रेस का मुखौटा। गोविंदाचार्य तो वाजपेयी को मुखौटा बताकर आडवाणी को पीएम बना रहे थे। पर कांग्रेस ने मुखौटा राहुल का अपना लिया। तो पीएम कोई और कैसे होगा। कांग्रेस की रहनुमाई में यूपीए जीत गया। तो वैसी ही नौटंकी फिर होगी। जैसी अपन ने 2004 में संसद के सेंट्रल हाल मे देखी थी।

नागपुर से बजेगा सुशासन, विकास, सुरक्षा का शंखनाद

बीजेपी की वर्किंग कमेटी-नेशनल काउंसिल आज नागपुर में होगी। बात नागपुर की चली। तो अपन को दिसंबर 2006 की लखनऊ काउंसिल याद आ गई। यों काउंसिल तो उसके बाद भी दो और हुई। पर लखनऊ और कल्याण सिंह का महत्व। कल्याण सिंह बीजेपी में दुबारा लौटे थे। सत्ताईस दिसंबर 2006 का दिन था। सुषमा स्वराज ने राजनीतिक प्रस्ताव पेश किया। कल्याण सिंह ने प्रस्ताव को सेंकड किया। जरा उनके भाषण पर गौर करें। उनने कहा- 'जिस दिन हमने तय किया कि रामजन्म भूमि मंदिर बनाया जाएगा। उसी दिन तय हो गया था कि विवादास्पद ढांचा ढहेगा। और यह टूटना ही चाहिए था। जब यह टूटा। तो यह गर्व की बात थी, शर्म की नहीं। ठीक चार सौ चौंसठ साल पहले बाबर ने भी यही किया था। अपनी सेना के कमांडर को राममंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाने का हुक्म दिया था।' उनने आगे कहा- 'अयोध्या मंदिर भाजपा का राजनीतिक एजेंडा नहीं। यह राष्ट्रीय स्वाभिमान का एजेंडा है। मुझे कानूनी समाधान की कोई संभावना नहीं दिखती।' उनने नारा लगाया- 'हिंदुत्व पर हमें गर्व है। रामजन्म भूमि मंदिर हिंदुत्व का प्राण तत्व है।'

मंदिर वहीं बनाएंगे वाले कल्याण ने मांगी माफी

मनमोहन सिंह एम्स से लौटे। तो वाजपेयी जा पहुंचे। पर बात दोनों के बीमार होने की नहीं। बात दोनों की राजनीतिक सोच में फर्क की। यों तो सूचना के अधिकार का कानून मनमोहन राज में बना। पर अब इस कानून को ठेंगा दिखाने की कोशिश भी उन्हीं की। मंत्रियों की संपत्ति दिन दुगनी, रात चौगुनी होने लगी। तो लोग सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने लगे। इससे मंत्रियों की नींद उड़े, तो समझ आता। पर मनमोहन सिंह की भी नींद उड़ गई। सो पीएमओ की राय है- 'मंत्रियों की संपत्ति आरटीआई से नहीं पूछ सकते।' दूसरी तरफ वाजपेयी को देखिए। उनने एनडीए राज में रूल बनाया था। मंत्री हर साल अपनी संपति का ब्योरा पीएम को सौंपेंगे। पीएम उस ब्योरे को पार्लियामेंट की लाइब्रेरी में रखवा देते थे। मंत्रियों पर तो सूचना का हक वाजपेयी ने एक दशक पहले लागू कर दिया था। पर मनमोहन की मुसीबत कांग्रेसी मंत्री न भी हों। तो आरजेडी के छह बागी मंत्रियों का दबाव तो होगा ही।

लोकतंत्र बचाने बीजेपी फिर जाएगी अदालत

ऐसा नहीं, जो लोग इमरजेंसी के समर्थक नहीं थे। इमरजेंसी के समर्थक भी बहुतेरे थे। इसी तरह अब नवीन चावला के समर्थक भी कम नहीं। सरकार भले ही अपनी जिद में चावला को सीईसी बना दे। पर गोपालस्वामी की सिफारिश का मजमून कब तक छुपाएगी। बीजेपी की पटीशन तो सत्रह पेज की थी। पर गोपालस्वामी की सिफारिश नब्बे पेज की। सिफारिश में सिर्फ बीजेपी की दलीलें नहीं। जिनसे नवीन चावला निष्पक्ष चुनाव आयुक्त कम, कांग्रेसी चुनाव आयुक्त ज्यादा दिखाए गए। गोपालस्वामी ने साढ़े तीन साल के अपने अनुभव भी लिखे। गोपालस्वामी ने लिखा-  'आयोग में जब कांग्रेस के खिलाफ शिकायत पर चर्चा होती। तो चावला बार-बार बाथरूम चले जाते। फिर कांग्रेस के नेताओं के फोन आने लगते।' सोनिया ने जब मोदी को मौत का सौदागर कहा। तो चुनाव आयोग की सारी मीटिंग लीक हुई। गोपालस्वामी ने जब इस पर चावला से बात की। तो चावला ने उस आदमी का नाम पूछा। जिसने गोपालस्वामी  को बताया था। इस घटना का जिक्र भी गोपालस्वामी की सिफारिश में।

विधिमंत्री ने साबित किया चावला का कांग्रेस प्रेम

अपन ने पहली फरवरी को ही लिखा था- 'देरी का कारण बता दें। नवीन चावला नोटिस का जवाब टालते रहे। चावला सरकार से सलाह ले रहे थे। इसलिए देरी हुई।' इतवार-सोम को विधिमंत्री हंसराज भारद्वाज जैसे भड़के। अपना कहा अक्षर-अक्षर सही साबित हुआ। राष्ट्रपति ने पीएम को गोपालस्वामी की सिफारिश भेजी है। सिफारिश के साथ चावला-कांग्रेस सांठगांठ के दस्तावेजी सबूत। पीएम उस पर केबिनेट में विचार करेंगे। खुद विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज बोले- 'विधि सचिव टीके विश्वनाथ सिफारिश स्टडी कर रहे हैं। चिट्ठी के साथ कुछ दस्तावेज भी हैं।' पर सोनिया गांधी के वफादार मंत्रियों के बयान आने शुरू। पहले पी. चिदंबरम ने चावला की पैरवी की। अब खुद विधिमंत्री हंसराज भारद्वाज। पीएम और केबिनेट की हैसियत सबके सामने।

सवाल नाक का नहीं, आयोग की निष्पक्षता का

सरकार का इरादा विवादास्पद चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने का नहीं है। विपक्ष के पास तीन रास्ते हैं- अदालत का दरवाजा फिर से खटखटाना, चुनाव का बायकाट करना और यूपीए के खिलाफ संवैधानिक संस्थाओं को नष्ट करने का चुनावी मुद्दा बनाना।

अंग्रेजी में कहावत है कि राजा कभी गलत नहीं हो सकता। चुनाव आयोग को भी इस दिशा में चलाने की कोशिश की गई। जिसके मुताबिक सोनिया गांधी कभी गलत नहीं हो सकती और राजनाथ सिंह कभी सही नहीं हो सकते। उदाहरण के लिए दो घटनाएं याद आती हैं- कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने गुजरात के चुनाव में नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कहा था। चुनाव आयोग ने इस तरह की भाषा पर वैसी कड़ाई नहीं बरती, जैसी उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों में एक सीडी के मामले में राजनाथ सिंह के खिलाफ बरती। राजनाथ सिंह ने वह सीडी जारी नहीं की थी, जबकि सोनिया गांधी ने अपनी जुबान से नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कहा था। चुनाव आयोग ने राजनाथ सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी थी। क्या यह सब भारतीय जनता पार्टी के चुनाव आयुक्त नवीन चावला के खिलाफ अपनाए गए कदम के कारण हो रहा था।