January 2009

  • strict warning: Non-static method view::load() should not be called statically in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/views.module on line 906.
  • strict warning: Declaration of views_handler_argument::init() should be compatible with views_handler::init(&$view, $options) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/handlers/views_handler_argument.inc on line 0.
  • strict warning: Declaration of views_handler_filter::options_validate() should be compatible with views_handler::options_validate($form, &$form_state) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/handlers/views_handler_filter.inc on line 0.
  • strict warning: Declaration of views_handler_filter::options_submit() should be compatible with views_handler::options_submit($form, &$form_state) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/handlers/views_handler_filter.inc on line 0.
  • strict warning: Declaration of views_handler_filter_boolean_operator::value_validate() should be compatible with views_handler_filter::value_validate($form, &$form_state) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/handlers/views_handler_filter_boolean_operator.inc on line 0.
  • strict warning: Declaration of views_plugin_style_default::options() should be compatible with views_object::options() in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/plugins/views_plugin_style_default.inc on line 0.
  • strict warning: Declaration of views_plugin_row::options_validate() should be compatible with views_plugin::options_validate(&$form, &$form_state) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/plugins/views_plugin_row.inc on line 0.
  • strict warning: Declaration of views_plugin_row::options_submit() should be compatible with views_plugin::options_submit(&$form, &$form_state) in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/plugins/views_plugin_row.inc on line 0.
  • strict warning: Non-static method view::load() should not be called statically in /home/ajayseti/public_html/sites/all/modules/views/views.module on line 906.

राजनाथ को दिखा पाक से ज्यादा खतरा चीन से

अरुणाचल जाकर चीन से खतरों पर बोले राजनाथ। यों प्रणव दा को चीन के खतरों की कम भनक नहीं। पर प्रणव दा की निगाह पीएम की कुर्सी से हटे। तो चीन से खतरों पर टिके। प्रणव दा तो मुंबई पर आतंकी हमले का जख्म भी झेल गए। जख्म सूखने लगे। पर यूपीए सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अब तो पाकिस्तान नए-नए शिगूफे भी छोड़ने लगा। कसाब के मरने वाली चंडूखाने की खबर अपन हंसी में उड़ा भी दें। तो पाक के ब्रिटिश हाईकमिश्नर ने जांच से पहले ही कह दिया- 'मुंबई हमले की साजिश पाक में नहीं रची गई।' जबसे अपने पीएम ने हमले में पाकिस्तानी एजेंसी का नाम लिया। तब से पाक के होश फाख्ता। यों अपन को दुनिया का समर्थन नहीं मिला। याद है तेरह जनवरी को ब्रिटिश विदेशमंत्री डेविड मिलिबेंड दिल्ली में थे। तो उनने  कहा था- 'हमला पाक के इशारे पर हुआ होगा, हम नहीं मानते।' अमेरिका ने भी अपने पीएम मनमोहन का यह दावा नहीं माना। इसीलिए अपन ने 14 जनवरी को लिखा था- 'कूटनीतिक जंग में भी फिसड्डी दिखी सरकार।' ब्रिटिश शह मिली।

कांग्रेस चुनाव में यूपीए से पल्ला झाड़ने के मूड में

कांग्रेस ने सोचा था- मोहन चंद्र शर्मा को अशोक चक्र दे देंगे। तो बाटला मुठभेड़ की जांच का सवाल नहीं उठेगा। अर्जुन, पासवान, लालू जैसे ठंडे जरूर पड़े। पर इन यूपीए वालों की लगाई आग थमी नहीं। गुरुवार को आजमगढ़िए दिल्ली आ धमके। जंतर-मंतर पर दो हजार की भीड़ तो होगी ही। आजमगढ़ियों के साथ दिल्ली के इंटलेक्चुएल भी जुटे। इन इंटलेक्चुएल्ज की मांग है- 'अफजल गुरु को फांसी न दो। मुठभेड़ में आतंकियों को मारने वालों को गिरफ्तार करो।' आजमगढ़ियों ने 'उलेमा काऊंसिल' बना ली है। इसी मुद्दे पर चुनाव में भी कूदेंगे। उलेमा काऊंसिल के चीफ अमीर रशीदी मदनी बोले- 'आजमगढ़ सदर और लालगंज सीट लड़ेंगे।' अपन नहीं जानते बीएसपी सीट छोड़ेगी या एसपी। कांग्रेस भी दोनों जगह उम्मीदवार खड़ा न करे। तो अपन को हैरानी नहीं होगी। यों यूपी पर अभी कांग्रेस की तस्वीर साफ नहीं। मायावती ने जबसे अशोक गहलोत को समर्थन दिया। तब से मुलायम के नुथने फूले हुए हैं। बात कांग्रेस के चुनावी गठबंधन की चली। तो बताते जाएं- सीडब्ल्यूसी के बाद जनार्दन द्विवेदी ने साफ कह दिया- 'गठबंधन स्टेट लैवल पर ही होगा। नेशनल लैवल पर नहीं।' इसका मतलब लालू, पासवान, मुलायम, पवार को औकात में लाना।

चुनाव में आडवाणी के लक्ष्मण होंगे नरेंद्र मोदी

चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने शांत समुद्र में कंकड़ फेंक दिया। लंदन जाकर बोले- 'लोकसभा चुनाव आठ अप्रेल से पंद्रह मई के बीच होंगे।' याद है- अपन ने 24 जनवरी को ही लिखा था- 'पर चुनाव होंगे अप्रेल-मई में।' वैसे अप्रेल-मई में कुल 61 दिन। कुरैशी ने इनमें अड़तालीस दिन तय किए। सिर्फ तेरह दिन छोड़े। वैसे कोई अनाड़ी भी ये तारीखें बता दे। पर आयोग में खलबली मच गई। बाकायदा खंडन जारी किया गया- 'आयोग में अभी कोई मीटिंग ही नहीं हुई।' पर लगते हाथों अपन कुरैशी की एक और बात याद करा दें। आयोग में वह अकेले थे। जो जम्मू कश्मीर में चुनाव टालने के हिमायती थे। उन्हीं के हवाले से एक खबरिया चैनल ने खबर चला दी थी- 'जम्मू कश्मीर के चुनाव अभी नहीं होंगे।' तब भी आयोग में खलबली मची थी। चैनल को फोन करके कहा गया- 'चुनाव टालने या कराने का कोई फैसला नहीं हुआ।' पर आखिर वक्त पर ही चुनाव हुए। कांग्रेस के शुरूआती विरोध के बावजूद हुए। यह बात अलग। जो बाद में गुलाम नबी फौरी चुनाव के हक में हो गए। बात जम्मू कश्मीर की चली। तो बताते जाएं- ओबामा ने रिचर्ड होलबु्रक को पाक-अफगानिस्तान का जिम्मा सौंपा। तो अपने यहां अमेरिका नियत पर शक हुआ। कहीं अमेरिका का इरादा कश्मीर मामले में दखल का तो नहीं। अपन को सुसान राईस का बयान याद आया। सुसान को यूएन में अमेरिकी दूत बनाया है ओबामा ने। सुसान ने कश्मीर को दुनिया का विवादास्पद हल्का बताया था। अपने कान तो तभी खड़े हुए थे।

पर येदुरप्पा की बात क्यों माने कांग्रेस

वेंकटरमण आखिरी दिनों में कांग्रेसी नहीं थे। कांग्रेस के विरोधी भी हो गए थे। तमिलनाडु में जयेंद्र सरस्वती की गिरफ्तारी हुई। तो वेंकटरमण बीजेपी के साथ सड़क पर उतरे थे। मंगलवार को वेंकटरमण का देहांत हो गया। इस बार के गणतंत्र दिवस पर सूर्यग्रहण था। उसका असर तो दो दिन पहले से दिखने लगा। तो एक दिन बाद भी दिखाई दिया। अपने पीएम मनमोहन की बाईपास सूर्यग्रहण से पहले कराना पड़ा। नतीजतन पहली बार अपना पीएम गणतंत्र दिवस समारोह में नहीं था। अब वेंकटरमण के देहांत का असर। बीटिंग रिट्रीट भी पहली बार रद्द हुआ। पर शोक के माहौल में भी राजनीति ठंडी नहीं पड़ती। बीजेपी-कांग्रेस में आरोपबाजी का खेल जारी रहा। अभिषेक मनु सिंघवी ने मंगलूर पर भड़ास निकाली। तो बीजेपी ने कांग्रेस के आरएसएस फोबिया पर। पहले बात सिंघवी की। बोले- 'जहां-जहां बीजेपी का राज। वहां-वहां कट्टरपंथियों के हौंसले बुलंद। ये सभी कट्टरपंथी एक दिन बीजेपी को खा जाएंगे।' अपन काफी हद तक सिंघवी से सहमत।

चुनाव प्रणाली बदलेगी तब बचेगा गणतंत्र

मौजूदा संविधान की संसदीय प्रणाली ने जातिवाद, सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद, भ्रष्टाचार और राजनीति के आपराधीकरण का एक ऐसा ढांचा तैयार कर दिया है, जिससे देश का लोकतंत्र खोखला हो चला है। दूसरे संविधान के लिए जनमत संग्रह का समय आ गया है, जिसमें राष्ट्रपति प्रणाली की तरह प्रधानमंत्री का उसकी योग्यता और क्षमता के आधार पर सीधा चुनाव होना चाहिए।

आज हमारा संविधान साठवें साल में प्रवेश कर रहा है। अब हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या इस संविधान से भारत का निर्माण ठीक ढंग से हो रहा है। देश को लोकतांत्रिक प्रणाली देने वाले संविधान ने सबको आजादी, इंसाफ और बराबरी का वादा किया था। क्या इन तीनों कसौटियों पर खरा उतरा है संविधान। हालांकि इस बीच हम सौ बार संविधान में संशोधन कर चुके हैं। एक बार पूरा संविधान ताक पर रखकर आजादी, इंसाफ और बराबरी के हक को कुचला भी जा चुका है। इन तीनों ही मोर्चों पर विफलता की एक लंबी कहानी हमारे सामने है।

1984 के बाद प्रणव दा फिर सेंटर स्टेज पर

पीएम की हालत क्या खराब हुई। अटकलों का बाजार गर्म हो गया। राजनीतिक समीक्षकों की बन आई। ये होगा, तो क्या होगा। वो होगा, तो क्या होगा। मुंह से कोई नहीं बोल रहा। पर आशंकाएं सबकी एक सी। ज्योतिषियों की भी बन आई। तरह-तरह की भविष्यवाणियां। भविष्यवाणियां क्या, अटकलें कहिए। अपन इसे क्या कहें, क्या यह संयोग। बुधवार को एक ज्योतिषी अपने कैबिन में घुसा। शिगूफा छोड़ गया था- 'पीएम की हेल्थ गड़बड़ होगी। अप्रेल तक कुछ भी हो सकता है।' वह शिगूफा तो अच्छी-खासी भविष्यवाणी निकली। बुधवार को तो सिर्फ मनमोहन की फैमिली को ही पता होगा। गुरुवार की एंजियोग्राफी बुधवार को तो तय हो ही गई होगी। अपन एंजियोग्राफी के भुगतभोगी। यों एक दिन पहले तय करना भी जरूरी नहीं। अब ज्योतिषी महाशय का कहा सही निकला। सो अगली बात भी बता दें। कहा है- 'अप्रेल में चुनाव हुए। तो आडवाणी का कोई चांस नहीं। मई में हुए तो कुछ-कुछ चांस।' पर चुनाव होंगे अप्रेल-मई में। यानी चित्त भी मेरी पट भी। लगते हाथों तीसरी बात भी बता दें। कह गए थे- 'लोकसभा दो ही साल चलेगी।'

आडवाणी बोले- देश को लाऊंगा निराशा से आशा में

आडवाणी के रास्ते में लाख रुकावटें। पर एनडीए में आडवाणी के सिवा पीएम पद का दावेदार नहीं। कांग्रेस, शेखावत-मोदी को लेकर खिल्ली जितनी चाहे उड़ाए। पर खुद यूपीए में ईट उठाओ तो पीएम पद का दावेदार। एनडी तिवारी तो मन मसोसकर रह गए। लालू अपनी दबी इच्छा गाहे-बगाहे जाहिर करते ही रहे। भले ही अर्जुन-पवार दबी इच्छा छुपाते रहे हों। पर अब शेखावत के मित्र पवार दांव चलने के मूड में। यों पवार अब इस उम्र में लोकसभा चुनाव लड़ने के मूड में नहीं। यह बात उनने अपन को कई महीने पहले बता दी थी। जब उनने कहा- 'मैं आईसीसी का चुनाव लडूंगा।' पर राजनीति की घोड़ा चालें कौन नहीं जानता। यह कोई पुरानी बात नहीं। जब एनसीपी के प्रवक्ता डीपी त्रिपाठी ने पीएम पद पर शेखावत का समर्थन किया। उस खबर की सुर्खियां अभी सूखी नहीं। अब उनने पवार को पीएम पद का उम्मीदवार बता दिया। बोले- 'यह चुनाव के हालात पर निर्भर करेगा। पवार की यूपीए से बाहर भी पहुंच। जैसे शेखावत और जयललिता। वह मुलायम और मायावती दोनों के करीब।' पर कांग्रेस जैसे मोदी के नाम से तिलमिलाई थी। वैसे ही पवार के नाम से तिलमिलाई।

ऊपर से राहत की सांस का नाटक करती बीजेपी

जैसे बुश के आखिरी दिनों में रिपब्लिकन पार्टी को आर्थिक मंदी ले डूबी। लोकसभा चुनावों से पहले कुछ वैसा ही हाल बीजेपी का। कल्याण सिंह का बीजेपी छोड़ना क्या कम था। जो उनने मुलायम से हाथ मिला लिया। बीजेपी के रणनीतिकार कहते हैं- 'अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा।' पर कल्याण-मुलायम मिलकर एक और एक ग्यारह हो गए। वह कैसे हुए- अपन आगे बताएंगे। पर फिलहाल बात अकेले चने की। जो अरुण जेटली शनिवार को मनाने गए थे। वह बोले- 'कल्याण सिंह का एक ही वोट है। वह चाहें तो बीजेपी के खिलाफ दे दें।' अपन नहीं जानते कल्याण-शेखावत की क्या बात हुई थी। पर छूत की बीमारी फैल गई। अब कल्याण का बेटा राजबीर भी गया। मुलायम ने हाथों-हाथ लिया। अपनी पार्टी का महासचिव बना दिया। बीजेपी छोड़कर जैसे कल्याण सिंह ने गंगा नहा ली हो। मुलायम फूले नहीं समाए। कल्याण से मिलने उनके घर गए। साथ में अमर सिंह भी। कल्याण सिंह को गरीबों, पिछड़ों, मजदूरों का मसीहा कहकर कसीदे पढे। तो कल्याण सिंह ने अमर सिंह को चाणक्य कह डाला। जैसे कवि सम्मेलन में एक-दूसरों को दाद देने का समझौता हुआ हो- 'तुम मुझे पंत कहो, मैं तुम्हें निराला।'

सिर मुंड़ाने से पहले ही ओले पड़े बीजेपी पर

बाराक ओबामा की शपथ ग्रहण हो गई। लालकृष्ण आडवाणी का चुनाव अभियान भी ओबामा की तर्ज पर। पर यहां तो सिर मुंडाने से पहले ही ओले बरसने लगे। श्रीगंगानगर में ओलों की खबर से अपन चौंके थे। ओले भी ठीक उस दिन पड़े। जब भैरोंसिंह शेखावत श्रीगंगानगर पहुंचे। राजनीतिक बिसात बिछाकर शेखावत राजस्थान लौट गए। पर बीजेपी में बगावत छुआछूत की बीमारी जैसी फैल गई। आडवाणी के लिए खबर अच्छी नहीं। कांग्रेस अपनी ताकत बढ़ाने में जुट चुकी। मैच फिक्सिंग का दागी मोहम्मद अजहर ही सही। कुनबा तो बढ़ने लगा। कांग्रेस को वैसे भी दागियों से कोई परहेज नहीं। पर बीजेपी से अपना ही कुनबा नहीं संभल रहा। बढ़ाना तो दूर की बात। बीजेपी की हालत देख अपन को बायोलॉजी लैब की याद आ गई।

मोदी के आईना दिखाने पर खिसियानी बिल्ली...

चुनाव की बिसात बिछ गई। बीजेपी ने अठारह उम्मीदवार और तय कर दिए। इनमें महेश्वर सिंह, यशवंत सिन्हा, करिया मुंडा जैसे धुरंधर। तो शिमला में हार का रिकार्ड बनाने वाले वीरेन्द्र कश्यप भी। बीजेपी की सीएसी बैठी। तो दफ्तर के सामने नया लफड़ा हो गया। पहली लिस्ट में शामिल अशोक प्रधान प्रदर्शन करा रहे थे। प्रधान को आशंका- कहीं कल्याण सिंह टिकट न कटा दें। असल में कल्याण सिंह अशोक प्रधान से बेहद खफा। इतवार को कल्याण-मुलायम मुलाकात की खबर आई। तो इसे दबाव की रणनीति माना गया। पर जब प्रधान प्रदर्शन करा रहे थे। मुलायम सिंह तभी मुलाकात का खंडन कर रहे थे। पर बिसात मुलायम सिंह ने भी बिछा दी। बोले- 'कल्याण के बेटे राजबीर सपा में आएं। तो स्वागत होगा।' मीडिया की खबर से बीजेपी में खलबली मची, सो मची। कांग्रेस में भी खलबली कम नहीं। यों मुलायम के डर से शकील अहमद बोले कुछ नहीं। कहीं सत्यव्रत चतुर्वेदी जैसा हश्र न करा दें। पर कांग्रेस मुलायम-कल्याण गठजोड़ की खबरों से सकते में। सेक्युलरिम का चोला दागदार हो जाएगा।