Monthly archive

January 2009

चावला के खिलाफ सिफारिश - देर आयद, दुरुस्त आयद

अपन को इस ब्रेकिंग न्यूज का इंतजार था। न्यूज है- चीफ इलेक्शन कमिश्नर गोपालस्वामी की सिफारिश। इलेक्शन कमिश्नर नवीन चावला को बर्खास्त करने की सिफारिश। सिफारिश करके गोपालस्वामी तो चुप्पी साधकर बैठ गए। अपनी राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने सिफारिश मनमोहन सरकार को भेज दी। अब मनमोहन सरकार की नींद हराम। सिफारिश पर विवाद खड़ा करते हुए खबर लीक हुई। ब्रेकिंग न्यूज में सवाल उठाए गए। कहा गया- खुद-ब-खुद की गई सिफारिश संविधान के खिलाफ। गोपालस्वामी ने इलेक्शन कमिशन की मीटिंग भी नहीं बुलाई। कानून के पंडित फाली एस. नरिमन गोपालस्वामी के खिलाफ बोले। दिग्विजय सिंह ने कहा- 'दूसरे आयुक्तों के खिलाफ भी कई मामले। नवीन चावला तो एकदम निष्पक्ष।' अभिषेक मनु सिंघवी बोले- 'देखना होगा, सीईसी को सिफारिश का हक है या नहीं।' होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम भी चुप नहीं रहे। बोले- 'बीजेपी चुनाव आयोग पर राजनीति कर रही है।' चिदंबरम ने बिलकुल सही कहा।

राजनाथ को दिखा पाक से ज्यादा खतरा चीन से

अरुणाचल जाकर चीन से खतरों पर बोले राजनाथ। यों प्रणव दा को चीन के खतरों की कम भनक नहीं। पर प्रणव दा की निगाह पीएम की कुर्सी से हटे। तो चीन से खतरों पर टिके। प्रणव दा तो मुंबई पर आतंकी हमले का जख्म भी झेल गए। जख्म सूखने लगे। पर यूपीए सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अब तो पाकिस्तान नए-नए शिगूफे भी छोड़ने लगा। कसाब के मरने वाली चंडूखाने की खबर अपन हंसी में उड़ा भी दें। तो पाक के ब्रिटिश हाईकमिश्नर ने जांच से पहले ही कह दिया- 'मुंबई हमले की साजिश पाक में नहीं रची गई।' जबसे अपने पीएम ने हमले में पाकिस्तानी एजेंसी का नाम लिया। तब से पाक के होश फाख्ता। यों अपन को दुनिया का समर्थन नहीं मिला। याद है तेरह जनवरी को ब्रिटिश विदेशमंत्री डेविड मिलिबेंड दिल्ली में थे। तो उनने  कहा था- 'हमला पाक के इशारे पर हुआ होगा, हम नहीं मानते।' अमेरिका ने भी अपने पीएम मनमोहन का यह दावा नहीं माना। इसीलिए अपन ने 14 जनवरी को लिखा था- 'कूटनीतिक जंग में भी फिसड्डी दिखी सरकार।' ब्रिटिश शह मिली।

कांग्रेस चुनाव में यूपीए से पल्ला झाड़ने के मूड में

कांग्रेस ने सोचा था- मोहन चंद्र शर्मा को अशोक चक्र दे देंगे। तो बाटला मुठभेड़ की जांच का सवाल नहीं उठेगा। अर्जुन, पासवान, लालू जैसे ठंडे जरूर पड़े। पर इन यूपीए वालों की लगाई आग थमी नहीं। गुरुवार को आजमगढ़िए दिल्ली आ धमके। जंतर-मंतर पर दो हजार की भीड़ तो होगी ही। आजमगढ़ियों के साथ दिल्ली के इंटलेक्चुएल भी जुटे। इन इंटलेक्चुएल्ज की मांग है- 'अफजल गुरु को फांसी न दो। मुठभेड़ में आतंकियों को मारने वालों को गिरफ्तार करो।' आजमगढ़ियों ने 'उलेमा काऊंसिल' बना ली है। इसी मुद्दे पर चुनाव में भी कूदेंगे। उलेमा काऊंसिल के चीफ अमीर रशीदी मदनी बोले- 'आजमगढ़ सदर और लालगंज सीट लड़ेंगे।' अपन नहीं जानते बीएसपी सीट छोड़ेगी या एसपी। कांग्रेस भी दोनों जगह उम्मीदवार खड़ा न करे। तो अपन को हैरानी नहीं होगी। यों यूपी पर अभी कांग्रेस की तस्वीर साफ नहीं। मायावती ने जबसे अशोक गहलोत को समर्थन दिया। तब से मुलायम के नुथने फूले हुए हैं। बात कांग्रेस के चुनावी गठबंधन की चली। तो बताते जाएं- सीडब्ल्यूसी के बाद जनार्दन द्विवेदी ने साफ कह दिया- 'गठबंधन स्टेट लैवल पर ही होगा। नेशनल लैवल पर नहीं।' इसका मतलब लालू, पासवान, मुलायम, पवार को औकात में लाना।

चुनाव में आडवाणी के लक्ष्मण होंगे नरेंद्र मोदी

चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने शांत समुद्र में कंकड़ फेंक दिया। लंदन जाकर बोले- 'लोकसभा चुनाव आठ अप्रेल से पंद्रह मई के बीच होंगे।' याद है- अपन ने 24 जनवरी को ही लिखा था- 'पर चुनाव होंगे अप्रेल-मई में।' वैसे अप्रेल-मई में कुल 61 दिन। कुरैशी ने इनमें अड़तालीस दिन तय किए। सिर्फ तेरह दिन छोड़े। वैसे कोई अनाड़ी भी ये तारीखें बता दे। पर आयोग में खलबली मच गई। बाकायदा खंडन जारी किया गया- 'आयोग में अभी कोई मीटिंग ही नहीं हुई।' पर लगते हाथों अपन कुरैशी की एक और बात याद करा दें। आयोग में वह अकेले थे। जो जम्मू कश्मीर में चुनाव टालने के हिमायती थे। उन्हीं के हवाले से एक खबरिया चैनल ने खबर चला दी थी- 'जम्मू कश्मीर के चुनाव अभी नहीं होंगे।' तब भी आयोग में खलबली मची थी। चैनल को फोन करके कहा गया- 'चुनाव टालने या कराने का कोई फैसला नहीं हुआ।' पर आखिर वक्त पर ही चुनाव हुए। कांग्रेस के शुरूआती विरोध के बावजूद हुए। यह बात अलग। जो बाद में गुलाम नबी फौरी चुनाव के हक में हो गए। बात जम्मू कश्मीर की चली। तो बताते जाएं- ओबामा ने रिचर्ड होलबु्रक को पाक-अफगानिस्तान का जिम्मा सौंपा। तो अपने यहां अमेरिका नियत पर शक हुआ। कहीं अमेरिका का इरादा कश्मीर मामले में दखल का तो नहीं। अपन को सुसान राईस का बयान याद आया। सुसान को यूएन में अमेरिकी दूत बनाया है ओबामा ने। सुसान ने कश्मीर को दुनिया का विवादास्पद हल्का बताया था। अपने कान तो तभी खड़े हुए थे।

पर येदुरप्पा की बात क्यों माने कांग्रेस

वेंकटरमण आखिरी दिनों में कांग्रेसी नहीं थे। कांग्रेस के विरोधी भी हो गए थे। तमिलनाडु में जयेंद्र सरस्वती की गिरफ्तारी हुई। तो वेंकटरमण बीजेपी के साथ सड़क पर उतरे थे। मंगलवार को वेंकटरमण का देहांत हो गया। इस बार के गणतंत्र दिवस पर सूर्यग्रहण था। उसका असर तो दो दिन पहले से दिखने लगा। तो एक दिन बाद भी दिखाई दिया। अपने पीएम मनमोहन की बाईपास सूर्यग्रहण से पहले कराना पड़ा। नतीजतन पहली बार अपना पीएम गणतंत्र दिवस समारोह में नहीं था। अब वेंकटरमण के देहांत का असर। बीटिंग रिट्रीट भी पहली बार रद्द हुआ। पर शोक के माहौल में भी राजनीति ठंडी नहीं पड़ती। बीजेपी-कांग्रेस में आरोपबाजी का खेल जारी रहा। अभिषेक मनु सिंघवी ने मंगलूर पर भड़ास निकाली। तो बीजेपी ने कांग्रेस के आरएसएस फोबिया पर। पहले बात सिंघवी की। बोले- 'जहां-जहां बीजेपी का राज। वहां-वहां कट्टरपंथियों के हौंसले बुलंद। ये सभी कट्टरपंथी एक दिन बीजेपी को खा जाएंगे।' अपन काफी हद तक सिंघवी से सहमत।

चुनाव प्रणाली बदलेगी तब बचेगा गणतंत्र

मौजूदा संविधान की संसदीय प्रणाली ने जातिवाद, सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद, भ्रष्टाचार और राजनीति के आपराधीकरण का एक ऐसा ढांचा तैयार कर दिया है, जिससे देश का लोकतंत्र खोखला हो चला है। दूसरे संविधान के लिए जनमत संग्रह का समय आ गया है, जिसमें राष्ट्रपति प्रणाली की तरह प्रधानमंत्री का उसकी योग्यता और क्षमता के आधार पर सीधा चुनाव होना चाहिए।

आज हमारा संविधान साठवें साल में प्रवेश कर रहा है। अब हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या इस संविधान से भारत का निर्माण ठीक ढंग से हो रहा है। देश को लोकतांत्रिक प्रणाली देने वाले संविधान ने सबको आजादी, इंसाफ और बराबरी का वादा किया था। क्या इन तीनों कसौटियों पर खरा उतरा है संविधान। हालांकि इस बीच हम सौ बार संविधान में संशोधन कर चुके हैं। एक बार पूरा संविधान ताक पर रखकर आजादी, इंसाफ और बराबरी के हक को कुचला भी जा चुका है। इन तीनों ही मोर्चों पर विफलता की एक लंबी कहानी हमारे सामने है।

1984 के बाद प्रणव दा फिर सेंटर स्टेज पर

पीएम की हालत क्या खराब हुई। अटकलों का बाजार गर्म हो गया। राजनीतिक समीक्षकों की बन आई। ये होगा, तो क्या होगा। वो होगा, तो क्या होगा। मुंह से कोई नहीं बोल रहा। पर आशंकाएं सबकी एक सी। ज्योतिषियों की भी बन आई। तरह-तरह की भविष्यवाणियां। भविष्यवाणियां क्या, अटकलें कहिए। अपन इसे क्या कहें, क्या यह संयोग। बुधवार को एक ज्योतिषी अपने कैबिन में घुसा। शिगूफा छोड़ गया था- 'पीएम की हेल्थ गड़बड़ होगी। अप्रेल तक कुछ भी हो सकता है।' वह शिगूफा तो अच्छी-खासी भविष्यवाणी निकली। बुधवार को तो सिर्फ मनमोहन की फैमिली को ही पता होगा। गुरुवार की एंजियोग्राफी बुधवार को तो तय हो ही गई होगी। अपन एंजियोग्राफी के भुगतभोगी। यों एक दिन पहले तय करना भी जरूरी नहीं। अब ज्योतिषी महाशय का कहा सही निकला। सो अगली बात भी बता दें। कहा है- 'अप्रेल में चुनाव हुए। तो आडवाणी का कोई चांस नहीं। मई में हुए तो कुछ-कुछ चांस।' पर चुनाव होंगे अप्रेल-मई में। यानी चित्त भी मेरी पट भी। लगते हाथों तीसरी बात भी बता दें। कह गए थे- 'लोकसभा दो ही साल चलेगी।'

आडवाणी बोले- देश को लाऊंगा निराशा से आशा में

आडवाणी के रास्ते में लाख रुकावटें। पर एनडीए में आडवाणी के सिवा पीएम पद का दावेदार नहीं। कांग्रेस, शेखावत-मोदी को लेकर खिल्ली जितनी चाहे उड़ाए। पर खुद यूपीए में ईट उठाओ तो पीएम पद का दावेदार। एनडी तिवारी तो मन मसोसकर रह गए। लालू अपनी दबी इच्छा गाहे-बगाहे जाहिर करते ही रहे। भले ही अर्जुन-पवार दबी इच्छा छुपाते रहे हों। पर अब शेखावत के मित्र पवार दांव चलने के मूड में। यों पवार अब इस उम्र में लोकसभा चुनाव लड़ने के मूड में नहीं। यह बात उनने अपन को कई महीने पहले बता दी थी। जब उनने कहा- 'मैं आईसीसी का चुनाव लडूंगा।' पर राजनीति की घोड़ा चालें कौन नहीं जानता। यह कोई पुरानी बात नहीं। जब एनसीपी के प्रवक्ता डीपी त्रिपाठी ने पीएम पद पर शेखावत का समर्थन किया। उस खबर की सुर्खियां अभी सूखी नहीं। अब उनने पवार को पीएम पद का उम्मीदवार बता दिया। बोले- 'यह चुनाव के हालात पर निर्भर करेगा। पवार की यूपीए से बाहर भी पहुंच। जैसे शेखावत और जयललिता। वह मुलायम और मायावती दोनों के करीब।' पर कांग्रेस जैसे मोदी के नाम से तिलमिलाई थी। वैसे ही पवार के नाम से तिलमिलाई।

ऊपर से राहत की सांस का नाटक करती बीजेपी

जैसे बुश के आखिरी दिनों में रिपब्लिकन पार्टी को आर्थिक मंदी ले डूबी। लोकसभा चुनावों से पहले कुछ वैसा ही हाल बीजेपी का। कल्याण सिंह का बीजेपी छोड़ना क्या कम था। जो उनने मुलायम से हाथ मिला लिया। बीजेपी के रणनीतिकार कहते हैं- 'अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा।' पर कल्याण-मुलायम मिलकर एक और एक ग्यारह हो गए। वह कैसे हुए- अपन आगे बताएंगे। पर फिलहाल बात अकेले चने की। जो अरुण जेटली शनिवार को मनाने गए थे। वह बोले- 'कल्याण सिंह का एक ही वोट है। वह चाहें तो बीजेपी के खिलाफ दे दें।' अपन नहीं जानते कल्याण-शेखावत की क्या बात हुई थी। पर छूत की बीमारी फैल गई। अब कल्याण का बेटा राजबीर भी गया। मुलायम ने हाथों-हाथ लिया। अपनी पार्टी का महासचिव बना दिया। बीजेपी छोड़कर जैसे कल्याण सिंह ने गंगा नहा ली हो। मुलायम फूले नहीं समाए। कल्याण से मिलने उनके घर गए। साथ में अमर सिंह भी। कल्याण सिंह को गरीबों, पिछड़ों, मजदूरों का मसीहा कहकर कसीदे पढे। तो कल्याण सिंह ने अमर सिंह को चाणक्य कह डाला। जैसे कवि सम्मेलन में एक-दूसरों को दाद देने का समझौता हुआ हो- 'तुम मुझे पंत कहो, मैं तुम्हें निराला।'

सिर मुंड़ाने से पहले ही ओले पड़े बीजेपी पर

बाराक ओबामा की शपथ ग्रहण हो गई। लालकृष्ण आडवाणी का चुनाव अभियान भी ओबामा की तर्ज पर। पर यहां तो सिर मुंडाने से पहले ही ओले बरसने लगे। श्रीगंगानगर में ओलों की खबर से अपन चौंके थे। ओले भी ठीक उस दिन पड़े। जब भैरोंसिंह शेखावत श्रीगंगानगर पहुंचे। राजनीतिक बिसात बिछाकर शेखावत राजस्थान लौट गए। पर बीजेपी में बगावत छुआछूत की बीमारी जैसी फैल गई। आडवाणी के लिए खबर अच्छी नहीं। कांग्रेस अपनी ताकत बढ़ाने में जुट चुकी। मैच फिक्सिंग का दागी मोहम्मद अजहर ही सही। कुनबा तो बढ़ने लगा। कांग्रेस को वैसे भी दागियों से कोई परहेज नहीं। पर बीजेपी से अपना ही कुनबा नहीं संभल रहा। बढ़ाना तो दूर की बात। बीजेपी की हालत देख अपन को बायोलॉजी लैब की याद आ गई।

मोदी के आईना दिखाने पर खिसियानी बिल्ली...

चुनाव की बिसात बिछ गई। बीजेपी ने अठारह उम्मीदवार और तय कर दिए। इनमें महेश्वर सिंह, यशवंत सिन्हा, करिया मुंडा जैसे धुरंधर। तो शिमला में हार का रिकार्ड बनाने वाले वीरेन्द्र कश्यप भी। बीजेपी की सीएसी बैठी। तो दफ्तर के सामने नया लफड़ा हो गया। पहली लिस्ट में शामिल अशोक प्रधान प्रदर्शन करा रहे थे। प्रधान को आशंका- कहीं कल्याण सिंह टिकट न कटा दें। असल में कल्याण सिंह अशोक प्रधान से बेहद खफा। इतवार को कल्याण-मुलायम मुलाकात की खबर आई। तो इसे दबाव की रणनीति माना गया। पर जब प्रधान प्रदर्शन करा रहे थे। मुलायम सिंह तभी मुलाकात का खंडन कर रहे थे। पर बिसात मुलायम सिंह ने भी बिछा दी। बोले- 'कल्याण के बेटे राजबीर सपा में आएं। तो स्वागत होगा।' मीडिया की खबर से बीजेपी में खलबली मची, सो मची। कांग्रेस में भी खलबली कम नहीं। यों मुलायम के डर से शकील अहमद बोले कुछ नहीं। कहीं सत्यव्रत चतुर्वेदी जैसा हश्र न करा दें। पर कांग्रेस मुलायम-कल्याण गठजोड़ की खबरों से सकते में। सेक्युलरिम का चोला दागदार हो जाएगा।

कश्मीर पर मध्यस्थता की अमेरिकी-ब्रिटिश साजिश

अमेरिका के नए राष्ट्रपति बाराक ओबामा 20 जनवरी को पदभार ग्रहण कर लेंगे। चुनाव के दौरान उनके मुसलमान होने का विवाद उठा था तो उन्होंने सफाई दी थी वह हमेशा इसाई धर्म अपनाते रहे हैं। खुद को इसाई साबित करने के लिए वह अपनी शपथ में 'गॉड' शब्द का इस्तेमाल करेंगे। अदालत ने उन्हें इसकी इजाजत दे दी है, लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि मुस्लिम पिता और इसाई मां की संतान बाराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने पर अमेरिका की आतंकवाद के खिलाफ नीति क्या मोड़ लेगी। राष्ट्रपति बुश ने नाईन-इलेवन के बाद आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई शुरू की थी तो ब्रिटेन और पाकिस्तान उनके प्रमुख सहयोगी थे। यूरोप के साथ-साथ अमेरिका, ब्रिटेन और पाकिस्तान में भी लड़ाई के खिलाफ लोग सड़कों पर प्रदर्शन करने उतरे थे। विरोध की वजह आगे चलकर इसके सभ्यताओं की जंग बनने का खतरा था। इस खतरे को राष्ट्रपति बुश भी समझते थे, इसीलिए उन्होंने भारत के सहयोग की पेशकश ठुकराकर पाकिस्तान को मदद का लालच देकर सहयोगी बनाया था।

शुरू-शुरू में राष्ट्रपति बुश अपनी रणनीति में कामयाब रहे थे, लेकिन पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ का आधार लगातार घटता गया। मुशर्रफ सरकार के बुश समर्थक होने के कारण पाकिस्तान भी आतंकवाद का शिकार हो गया।

राहुल-मिलिबेंड पिकनिक ने बुरा फंसाया कांग्रेस को

कांग्रेस टाडा में सजायाफ्ता को टिकट देने की फिराक में। जिसे देश की अदालत ने मुजरिम माना। छह साल कैद की सजा सुनाई। कांग्रेस उसे मुजरिम मानने को तैयार नहीं। अपन नहीं जानते कांग्रेस के इस रुख से अदालत कितनी प्रभावित होगी। यों नेताओं के मामले में अदालतों का रवैया काबिल-ए-तारीफ नहीं। फिर भी जब टाडा अदालत ने संजय दत्त को सजा सुनाई। तो अदालत ने देश की न्यायपालिका का झंडा बुलंद किया। जी हां, अपन संजय दत्त की ही बात कर रहे हैं। अमर सिंह ने संजय दत्त को ठीक उस समय दाना फेंका। जब वह अपनी नई बीवी मान्यता के शिकंजे में। दिल्ली की एचटी कांफ्रेंस याद करा दें। जब वीर सिंघवी ने संजय दत्त से पूछा। तो उनने राजनीति में आने के फैसले को टाला था। पर सामने बैठी मान्यता ने कहा- 'इन्हें राजनीति में आना चाहिए।' अमर सिंह ने इसी कमजोर कड़ी को पकड़ा। संजय दत्त को लखनऊ की टिकट दे दी। साथ ही कहा- 'संजय नहीं, तो मान्यता।' मान्यता के नाम से प्रिया दत्त भड़क गई। वैसे अपन बता दें- संजय दत्त को छह साल की सजा हुई। वह चुनाव नहीं लड़ सकते।

कांग्रेस खुद बढ़ेगी, पर यूपीए को होगा नुकसान

कांग्रेस को मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, उड़ीसा, केरल और छत्तीसगढ़ में फायदा होगा। लेकिन असम, गुजरात, तमिलनाडु, हरियाणा में नुकसान होगा। सपा, राजद और द्रमुक को भी होगा अच्छा-खासा नुकसान।

भाजपा को गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार में बढ़ोत्तरी मिलेगी। वक्त देखकर जयललिता, मायावती दे सकती हैं एनडीए को समर्थन। पलड़ा किसी का भारी नहीं, टक्कर कांटे की।

यूपीए सरकार ने अल्पमत में होते हुए अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है। यूपीए लोकसभा में पहले वामपंथी दलों के समर्थन से और बाद में समाजवादी पार्टी के समर्थन से बहुमत में है। हालांकि यूपीए की स

बीजेपी की निगाह राहुल पर, कांग्रेस की मोदी पर

कांग्रेस-बीजेपी दफ्तरों में मोदी-राहुल की चर्चा रही। कांग्रेस दूसरे दिन भी इंडस्ट्री पर तिलमिलाई रही। तो बीजेपी मोदीवादी इंडस्ट्री पर फिदा दिखी। ब्रिटिश विदेशमंत्री मिलिबेंड के मामले में उल्टा हुआ। कांग्रेस मिलिबेंड पर फिदा दिखी। तो बीजेपी मिलिबेंड पर बुरी तरह तिलमिलाई। पर कांग्रेस की तिलमिलाहट गुरुवार को ज्यादा बढ़ी दिखी। शेखावत-कल्याण के गुस्से पर जितना खुश थी। मोदी के उभार ने उतना ही दुखी कर दिया कांग्रेस को। गुजरात विधायक दल के नेता शक्ति सिंह को दिल्ली तलब किया। शक्ति सिंह आरटीआई की फाइल लेकर दिल्ली पहुंचे। मनीष तिवारी दूसरे दिन भी इंडस्ट्री को कोसते रहे। शक्ति सिंह को बगल में बिठाकर फाइलें दिखाई। बताया- 'चार साल के एमओयू में से सिर्फ 22 फीसदी लागू हुए। मोदी का गुजरात बाइव्रेंट झूठ का पुलंदा। पैंसठ फीसदी अमल का दावा खोखला।' पर शक्ति सिंह भी अपनी छटपटाहट छुपा नहीं पाए। मोदी के बढ़ते कद से जब कांग्रेस आलाकमान की नींद उड़ गई। तो शक्ति सिंह की क्या बिसात। बोले- 'मोदी ने टाटा को दोनों हाथों से लुटाया। इसीलिए तारीफ कर रही है इंडस्ट्री।'

मोदी का नाम सुन तिलमिला गई कांग्रेस

कहावत है ना- गांव बसा नहीं, भिखारी पहले आ गए। बीजेपी में सत्ता आने से पहले पीएम के दावेदारों की हालत वही। लालकृष्ण आडवाणी जिन्ना विवाद में फंसे। तो बहुतेरे खुश हुए थे। मुरली मनोहर जोशी से लेकर यशवंत सिन्हा तक। मदन लाल खुराना से लेकर उमा भारती तक। खुराना-भारती का नाम अपन ने जानबूझ कर लिया। खुराना-भारती जैसे लोग भले बीजेपी में न रहें। रहेंगे बीजेपी वाले ही। जैसे अपने भैरों सिंह शेखावत। बीजेपी में नहीं। पर बीजेपी की राजनीति के स्तंभ। सो शेखावत का एक बयान बीजेपी आलाकमान की नींद उड़ा गया। शेखावत ने अब कोई लुकाव-छुपाव नहीं रखा। जैसा अपन ने आठ जनवरी को लिखा था। असली झगड़ा वसुंधरा का। आडवाणी को लेकर कोई झगड़ा नहीं। अब भैरों बाबा ने साफ-साफ कह दिया- 'मैं पीएम पद का दावेदार नहीं। पर वसुंधरा की जगह जेल में।'

कूटनीतिक जंग में भी फिसड्डी दिखी सरकार

प्रणव दा ने जब सब विकल्प खुले रखने की बात कही। तो अपन को लगा था- पाक को सबक सिखाने के लिए जंग न सही। आतंकी शिविरों पर सर्जिकल स्ट्राइक जरूर होगा। पर अपने प्रणव दा ने अब साफ-साफ कह दिया- 'हम इस्राइल की तरह सर्जिकल स्ट्राइक नहीं करेंगे।' असल में यूपीए सरकार की नजर का फर्क। वह आतंकियों और मुसलिमों में फर्क नहीं कर पा रही। फर्क समझती। तो आतंकी शिविरों पर हमले को मुसलिमों पर हमला न समझती। प्रणव दा की नजर में इस्राइल हमलावर। फिलिस्तीनी आतंकी संगठन हमास बेकसूर। हर फैसला वोट बैंक देखकर होगा। तो आतंकवाद पर भी नक्सलवाद जैसा नजरिया होगा। नक्सलवाद पर अपने शिवराज पाटिल कहते ही थे- 'समस्या की जड़ में जाकर समझना होगा। नक्सलवाद की समस्या सामाजिक-आर्थिक कारणों से।' परवेज मुशर्रफ को वाजपेयी ने इसीलिए आगरा से वापस भेजा था। जब उनने कहा- 'कश्मीर में आतंकवाद नहीं। अलबत्ता आजादी की जंग चल रही है।' अपन को डर। किसी दिन अपना कोई मंत्री भी आतंकवाद की जड़ में जाने की दुहाई न दे दे।

तीन लाख करोड़ इनवेस्ट अहमदाबाद बना नरेन्द्रपुर

गुजरात का सीएम कोई कांग्रेसी होता। तो वाइब्रेंट गुजरात का उद्धाटन सोनिया या राहुल करते। अपन मनमोहन की अनदेखी नहीं कर रहे। पर होता वही। नरेन्द्र मोदी ने खुद उद्धाटन किया। तो कोई लालकृष्ण आडवाणी की अनदेखी नहीं की। वह विकास का राजनीतिकरण नहीं चाहते। सो चौथा वाइब्रेंट गुजरात इनवेस्टर मेला। सोमवार को नरेन्द्र मोदी के हाथों ही शुरू हुआ। मोदी को सीएम बने सवा सात साल हो गए। दो बार एसेंबली चुनाव जीते। सिर्फ कांग्रेस-यूपीए-लेफ्ट नहीं। पूरी दुनिया के एनजीओ भी लगे थे। फिर भी मोदी जीते। कांग्रेस-यूपीए-लेफ्ट ने भारत में कितनी बदनामी की गुजरात की। अमेरिका से वीजा तक रुकवाया मोदी का। पर अकेले मोदी ने दस का दम दिखा दिया। सवा सात साल पहले मोदी सीएम बने। तो मुश्किलों के दौर में था गुजरात। सूखे और भूकंप से उबरा भी नहीं था। जब मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। सत्ता नहीं कांटों का ताज था।

भाजपा लोकसभा चुनाव में भी हिट विकेट को तैयार

देश की सियासत में इस हफ्ते की दो बड़ी घटनाएं रही झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का विधानसभा उप चुनाव हारना और पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत का सक्रिय राजनीति में लौटने का ऐलान। इन दोनों घटनाओं को हाल ही के विधानसभा चुनाव नतीजों की दूसरी कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। जम्मू कश्मीर और मिजोरम विधानसभाओं के चुनाव नतीजे उम्मीद के मुताबिक ही रहे थे। असल में महत्वपूर्ण रहे चार हिंदी भाषी राज्यों के नतीजे। इनमें से दो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा का फिर से जीतना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है, तो राजस्थान में हारना और दिल्ली नहीं जीत पाना भाजपा के लिए बड़ा झटका है। भाजपा चार में से तीन राज्य जीत जाती तो इसे लोकसभा चुनाव नतीजों का संकेत बताकर फूली नहीं समाती। इसी तरह कांग्रेस चार में से तीन राज्य जीत जाती तो अगली लोकसभा का स्वरूप उसके पक्ष में स्पष्ट दिखाई देता। सो जैसी स्थिति विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद दोनों राजनीतिक दलों के लिए बनी थी।

अब राहुल चालीस पढ़ना चापलूसी नहीं कहलाएगा

अपन को वह तेरह अप्रेल 2008 का दिन याद। जब अर्जुन सिंह ने राहुल को पीएम प्रोजेक्ट करने की बात कही। अर्जुन सिंह से पूछा था- 'जैसे 1984 में युवा राजीव ने देश की कमान संभाली। क्या 2009 में राहुल को प्रोजेक्ट करना चाहिए?' अर्जुन सिंह का सधा सा जवाब था- 'क्यों नहीं। उनमें अपने पिता की सभी विशेषताएं मौजूद।' आपको याद करा दें। यह सवाल हुआ क्यों था। शरद पवार ने कहा था- 'मनमोहन को प्रोजेक्ट करके यूपीए को मिलकर चुनाव लड़ना चाहिए।' पवार के इस कथन ने कांग्रेस में खलबली मचाई। कांग्रेस राहुल का नाम जपना शुरू कर चुकी थी। पवार के बयान को साजिश माना गया। पवार ने पहले सोनिया के खिलाफ विदेशीमूल का फच्चर फंसाया। अब राहुल के रास्ते में रोड़ा। सो कांग्रेसी तिलमिलाए हुए थे। अपन जरा इतिहास की कुछ और परतें खोल दें।

राजनाथ ने शेखावत को माना अपना नेता

साल के पहले हफ्ते में ही बवंडर। साल के शुरू में ही दूसरा कारगिल यूपीए को जख्म दे गया। यूपीए को दूसरा जख्म झारखंड के मुख्यमंत्री की हार से लगा। जख्मों से तो बीजेपी भी लहूलुहान हुई। एनडीए राज में एक फोटू खूब चर्चा में आई थी। अटल, आडवाणी और भैरोंसिंह शेखावत की। तीनों की 1957 की फोटू के साथ 2003 में भी तीनों की साथ फोटू छपी। इतना लंबा समय राजनीति में कोई एकजुट नहीं रहता। सो आडवाणी ने माई कंट्री माई लाइफ में दोनों फोटू छापी। पर अब वही तिकड़ी मुंह फुलाकर बैठी है। पर पहले बात दूसरे कारगिल की। पहले कारगिल के वक्त खुफिया एजेंसियां सोई रही।  वाजपेयी सरकार ने कारगिल पर 1999 का चुनाव जीत लिया। तब कांग्रेस कहती थी- 'कैसी जंग। अपनी ही जमीन छुड़ाने के लिए सात सौ जवान शहीद कर दिए।' अब उसी कांग्रेस राज में दो हजार जवान अपनी जमीन पर फिर लड़ रहे हैं। सरकार जाते-जाते कारगिल कांग्रेस को आइना दिखा गया। आज नौवां दिन। मंढेर की पहाड़ियों पर आतंकियों का कब्जा। अपन को फिर वहीं आशंका। जो कारगिल के वक्त थी।

इस उम्र में क्या खाक मुस्लमां होंगे

अपन ने कल मनमोहन की जुबानी गोलाबारी बताई। गोलाबारी का असर दिखने लगा। पाक आखिर मानने लगा- कसाब पाकिस्तानी ही। जैसी जुबानी गोलाबारी भारत-पाक में चली। कुछ वैसी ही जुबानी राजनीतिक गोलाबारी देश में भी तेज हो गई। मनमोहन सरकार बचाने वाले अमर सिंह बोले- 'मनमोहन ने पाक के खिलाफ निर्णायक फैसले की मोहलत मांगी थी। वह मोहलत अब खत्म। समाजवादी पार्टी समर्थन वापसी पर फैसला करेगी।' पर इससे भी ज्यादा मजेदार राजनीतिक जुबानी जंग बीजेपी में शुरू। अपने भैरों बाबा लालकृष्ण आडवाणी पर जहर बुझे तीर चलाने लगे। भैरों बाबा इसे मानेंगे नहीं। पर जब उनने पीएम के विकल्प खुले होने की बात कही। तो कसक आडवाणी के खिलाफ ही दिखी। यों अपनी भी शुरू से यही राय थी। आडवाणी से शेखावत बेहतर च्वायस होती। पर अब एनडीए अपना फैसला बदलने से रहा। पहले संघ ने हरी झंडी दी।

मनमोहन ने पाक पर चलाई जुबानी तोपें

मौजूदा मध्यप्रदेश में एक रियासत थी नरसिंहगढ़। नरसिंहगढ़ के महाराज थे प्रभुनाथ सिंह। बाद में नरसिंहगढ़ के सीएम भी रहे। सो महाराज के बेटे भानुप्रताप सिंह जन्मजात कांग्रेसी। एमपी और गवर्नर भी रहे। अब राजनीति के बियाबान में भी कोई मलाल नहीं। संसद के सेंट्रल हाल में आधा घंटा ठहाका न गूंजे। तो समझो महाराज सेंट्रल हाल में नहीं। मंगलवार को धुंध ने मध्यप्रदेश में ही रोक लिया। तो फोन पर अपन से दिल्ली की धुंध का हाल-चाल पूछा। अपन हैरान हुए। महाराज तो कभी मौसम की बात नहीं करते थे। पर वह राजनीतिक धुंध की बात कर रहे थे। बोले- 'दिल्ली की धुंध तो दो-चार घंटे में छंट जाएगी। पर मनमोहन सरकार की धुंध कब छंटेगी। इनका सूरज कब निकलेगा।'

अब पाकिस्तान के गले में कूटनीतिक फंदा

चीन के उप विदेशमंत्री हे फेई बिचौलिया बनने आए थे। सोमवार को अपने विदेश सचिव से मिले। तो शिवशंकर मेनन ने सबूतों का पुलिंदा थमा दिया। मेनन ने दिन की शुरूआत शाहिद मलिक को तलब करके की। पाकिस्तान के हाई कमिशनर हैं जनाब। मेनन ने मलिक को छह सबूत सौंपे। पहला- अजमल कसाब का कबूलनामा। दूसरा- आतंकियों के रूट मोबाइल का जीपीएस रिकार्ड। तीसरा- आतंकियों की ओर से इस्तेमाल सेटलाईट फोन का कच्चा चिट्ठा। चौथा- सेटलाईट फोन से जरार शाह से हुई बातचीत का ट्रांसक्रिप्ट। पांचवा- आतंकियों से बरामद हथियारों का ब्योरा। छटा- कराची से मुंबई लाए जहाज की लॉग बुक का रिकार्ड। अब पाकिस्तान का बचकर निकलना मुश्किल। हाई कमिशनर ने सबूत इस्लामाबाद भेजे। तो पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय में सन्नाटा पसर गया। शाह महमूद कुरैशी जहां खड़े थे, खड़े रह गए।

जम्मू कश्मीर में तीसरी पीढ़ी का राज

शेख अब्दुल्ला और फारुख अब्दुल्ला के साथ कांग्रेस के रिश्ते दोस्ती और दुश्मनी के रहे। अब बारी अब्दुल्ला परिवार के तीसरी पीढ़ी के वारिस उमर अब्दुल्ला के साथ राजनीतिक रिश्तों की। उमर कांग्रेस की मदद से ही मुख्यमंत्री बने हैं।

भारत यह कभी नहीं भूल सकता और भूलना भी नहीं चाहिए कि जम्मू कश्मीर की मौजूदा समस्या की जड़ में अमेरिका का हाथ है। पंडित जवाहर लाल नेहरू जब कश्मीर का मसला संयुक्त राष्ट्र में लेकर गए थे तो जनमत संग्रह का प्रस्ताव अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर रखा था। छह नवंबर 1952 को पेश किए गए इस प्रस्ताव का मकसद पाकिस्तान को फायदा पहुंचाना था। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि दोनों तरफ की फौजों को हटाकर जनमत संग्रह करवाया जाए, जबकि संयुक्त राष्ट्र आयोग के अध्यक्ष की ओर से रखे गए पहले प्रस्ताव में पाकिस्तान की हमलावर फौज को ही हटाने की बात कही गई थी। जम्मू कश्मीर का बाकायदा भारत में विलय हो गया था और वहां चुनी हुई सरकार कायम थी। नवंबर के पहले हफ्ते में विधानसभा ने जम्मू कश्मीर के भारत में विलय को पारित कर दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला ने विधानसभा में जम्मू कश्मीर के भारत में विलय को अंतिम करार दिया था। अमेरिका का यह प्रस्ताव साजिश भरा था, जिसका खामियाजा भारत आज तक भुगत रहा है।

कहीं पाक-बांग्लादेश में आतंकी मुकाबला तो नहीं

कुछ तो आतंकवाद का असर। कुछ मंदी की मार। सो नए साल का स्वागत शानदार नहीं हुआ। शिमला, मसूरी, नैनीताल में टूरिस्ट नहीं गए। तो कश्मीर के बारे में सोचना ही क्यों। अपन ने शिमला में मंदी और आतंक का साया रू-ब-रू देखा। अपन को वे दिन भी याद। जब 31 दिसंबर को मॉल पर तिल धरने को जगह नहीं होती थी। पिछले साल की बात ही लो। अपने प्रेम कुमार धूमल ने 30 दिसंबर 2007 को शपथ ली। सो अगली रात एक पंथ, दो काज हुआ। मॉल पर घूम टूरिस्टों को नए साल की बधाई। साथ में लोकल वोटरों को जिताने का आभार। अपने सुरेश भारद्वाज भी साथ थे। जिनने शिमला में कांग्रेस का किला ढहाया। धूमल मॉल पर पैदल निकले। तो पुलिस को रास्ता बनाना पड़ा। पर इस साल काफिले के साथ आसानी से निकल गए। एक दिन पहले ही धूमल सरकार की सालगिरह थी। सो 30 को आडवाणी की रैली भी मॉल पर हुई। अपन मॉल का इतिहास बताते जाएं। मॉल पर पीएम-सीएम के अलावा रैली नहीं हो सकती। पर राजनारायण जब मोरारजी सरकार में हेल्थ मिनिस्टर थे। तो उनने रैली करके शांता कुमार को ललकारा। शांता ने राजनारायण पर कानूनी कार्रवाई की। राजनारायण की चेली थी- श्यामा शर्मा। श्यामा ने हिमाचल में बगावत कर दी।