December 2008

जंग हल नहीं, पर चारा भी नहीं

पाक भी अफगानिस्तान की तरह आतंकियों पर कार्रवाई की बजाए सबूत मांग रहा है। पाक आतंकवाद की फैक्टरी बंद नहीं करता, तो सर्जिकल स्ट्राइक ही विकल्प बचा है। अफगानिस्तान-इराक पर हमला करने वाले अमेरिका का दोहरा चेहरा सामने आ चुका है।

सात अगस्त 1998 को ओसामा बिन लादेन के आतंकी संगठन अल कायदा ने नैरोबी, केन्या और तंजानिया के अमेरिकी दूतावासों पर आतंकवादी हमला किया। अमेरिका ने पहली बार आतंकवाद का इतना कड़वा स्वाद चखा था, जबकि भारत इसी तरह के आतंकवादी हमले 1982 से झेल रहा था। तेरह अगस्त, 28 अगस्त और आठ दिसम्बर को संयुक्त राष्ट्र की ओर से पास किए गए प्रस्तावों का लक्ष्य अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को दबाव में लाना था। संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका का ध्यान सिर्फ अफगानिस्तान पर ही लगा हुआ था, जबकि भारत उस समय भी आए दिन पाकिस्तान से आतंकी हमले झेल रहा था। अमेरिका की नीति पाकिस्तान को अपने साथ रखकर अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को उखाड़ फेंकने की थी, जो उस समय ओसामा बिन लादेन को शरण दे रही थी।

एक-दूसरे से डरकर ही हो रही जंग की तैयारी

भारत-पाक तनाव कुछ और बढ़ा। दोनों ने जंग रोकने की कोशिश भी शुरू की। पर दोनों तरफ फौजियों की छुट्टियां भी रद्द। एक कदम आगे, तो दो कदम पीछे की रणनीति। मनमोहन सिंह ने कहा था- 'मुद्दा जंग नहीं। जंग कोई नहीं चाहता।' तो यूसुफ रजा गिलानी ने भी कहा- 'हम जंग नहीं चाहते।' पर अविश्वास की गहरी खाई पैदा हो गई। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कह दिया- 'भारतीय नागरिक पाकिस्तान न जाएं।' यह सतीश आनंद शुक्ल की गिरफ्तारी के बाद एहतियात। यों शुक्ल की बात चली। तो बता दें- इस पाकिस्तानी शिगूफे की हवा अंसार-वा-मुहाजिर ने निकाल दी। किसी तूफान वजीर ने कहा- 'लाहौर कार बम विस्फोट हमने किया। वजीरीस्तान में अमेरिकी हमले का जवाब। अभी तो और फिदायिन हमले होंगे।'

जुबान की जंग में अपन सेर, तो पाक सवा सेर

अपन को प्रणव दा की रणनीति विफल होती दिखने लगी। दादा की रणनीति हू-ब-हू वाजपेयी जैसी। संसद पर हमले के बाद वाजपेयी ने भी जंग का माहौल बना दिया था। फौज बार्डर पर कूच कर गई थी। महीनों बार्डर पर जमी रही। जमी हुई बर्फ पिघल गई। तो फौज भी लौट आई। तब वाजपेयी ने 'आर या पार' का जुमला कसा था। अब प्रणव दा ने सभी विकल्प खुले होने का जुमला कसा। अच्छा-भला अपने एंटनी ने कह दिया था- 'जंग नहीं होगी।' प्रणव दा ने अगले ही दिन जंग का माहौल बना दिया। चुनाव जीतने के लिए जंग का इरादा हो। तो अलग बात। पर आप डराने के लिए माहौल बनाओगे। तो पाकिस्तान कोई बच्चा नहीं। जो चुप बैठेगा। माहौल बनाने में अपन सेर। तो वह सवा सेर। अपने प्रणव दा ने सिर्फ जुबान के बम चलाए। जरदारी ने लड़ाकू विमानों की रिहर्सल करवा दी। जरदारी उसी जुल्फिकार अली भुट्टो के दामाद। जिनने एक हजार साल तक लड़ने की कसम खाई थी।

आतंक-जंग के माहौल में जन्मदिन पर चुनावी वसूली

अपन ने तेईस दिसंबर को जब लिखा- 'तेवर भी, तैयारियां भी, चुनावी फायदा भी।' तो अपन ने उसमें साफ लिखा था- 'शिवशंकर मेनन अखबारनवीसों से मुखातिब हुए। न तेवर दिखे, न तैयारियां।' अपन ने सही भांपा था। मंगलवार को ही मनमोहन सिंह ने कह दिया- 'जंग मुद्दा नहीं। मुद्दा आतंकवाद। जंग कोई नहीं चाहता।' पर राष्ट्रपति जरदारी-पीएम गिलानी का रवैया हाय तौबा मचाने का। बुधवार को उसका असर भी दिखा। जब नवाज शरीफ अपने कहे से पलट गए। पांच दिन पहले उनने कहा था- 'कसाब पाकिस्तानी ही है। मैंने खुद पता लगवा लिया।' पर जरदारी-गिलानी की मुहिम का असर हुआ। नवाज शरीफ ने बुधवार को यू टर्न ले लिया। बोले- 'भारत सबूत दे। तो मैं खुद जरदारी से कहूंगा- कार्रवाई की जाए।' अपन को जैसा शक था। हू-ब-हू वही हुआ। नवाज ने अपने भाई की सरकार बचाने के लिए पलटी मारी होगी।

न अंतुले को अफसोस, न सरकार शर्मसार

मनमोहन के अपने ही मंत्री ने छह दिन सरकार की फजीहत करवाई। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को कमजोर किया। पाकिस्तान को कहने का मौका मिला- 'मुंबई के आतंकी मुसलिम लिबास में नहीं थे। वे क्लीन शेव थे। वे आर.एस.एस. काडर जैसे दिखते थे। जिसे कसाब कह कर पाकिस्तानी बताया गया। उस की दाईं कलाई पर पीला धागा बंधा है। जैसा हिंदू पहनते हैं।' जी हां, यह सब पाकिस्तानी प्रैस में छपा है। अपन को वहां के पत्रकार अब्दुल कयूम ने लिखकर भेजा। कसाब की वह फोटू भी ई मेल में भेजी। ताकि अपन दाईं कलाई पर बंधा वह धागा देख लें। जिसे अपन पूर्जा-अर्चना के वक्त बांधते हैं। पाक में अंतुले के सवाल भी उठाए गए- 'आतंकी ने पहले पंद्रह मिनट में करकरे को कैसे मार दिया। करकरे ने बुलेट प्रूफ जैकट पहनी थी। यह आतंकी को भी पता था। इसलिए गोली उसकी गर्दन पर मारी। आतंकी ने भीड़ में करकरे को कैसे पहचान लिया।'

तेवर भी, तैयारियां भी चुनावी फायदा भी

बीजेपी पांच दिन बाद नींद से जागी। तो सोमवार को अंतुले पर संसद ठप्प हुई। सत्रह दिसंबर को संसद ठप्प होती। तो सोनिया तुरुत-फुरुत फैसले को मजबूर होती। सोनिया चाहती तो अंतुले अब तक नप चुके होते। मनमोहन पर फैसला छोड़ सोनिया ने डबल क्रास किया। पता था- मनमोहन मन बनाकर भी कुछ नहीं करेंगे। इधर सिंघवी-मनीष से पल्ला झाड़ने वाला बयान दिलाया। उधर शकील- दिग्विजय से समर्थन करवाया। वोट देखो, वोट की धार देखो वाली नीति। सोनिया के रवैये से अंतुले खुश। अंतुले को साफ लगने लगा- अब उनका कुछ बिगाड़ना आसान नहीं। सो सोमवार को उनने बीजेपी सांसदों को ललकारा। तो प्रणव दा पहली बैंच पर हैरान-परेशान-लाचार बैठे रहे। आतंकवाद के खिलाफ बनी एकता हफ्तेभर में तार-तार हो गई। वृंदा कारत बोली- 'अंतुले का बयान अफसोसनाक। पाक को फायदा पहुंचाने वाला। हम तो सिर्फ यही चाहते हैं- मालेगांव की जांच ठप्प न हो।' बात मालेगांव की चली। तो बता दें- सोमवार को जांच आगे बढ़ी। एटीएस ने लेफ्टिनेंट जनरल पुरोहित के फौजी साथियों से पूछताछ की। पर बात मालेगांव की नहीं। बात मुंबई पर हुए आतंकी हमले की। जिस पर भारत-पाक तनाव शिखर पर।

फर्क अंतुले और नवाज शरीफ में

नवाज शरीफ ने कसाब को पाकिस्तानी बताया तो वहां के प्रिंट मीडिया ने इसे ब्लैक आउट किया। अंतुले ने मालेगांव की अपुष्ट जांच को एटीएस चीफ करकरे की हत्या से जोड़ दिया, तो भारतीय मीडिया ने इसे जमकर तूल दिया। मुंबई के बाद अपने खिलाफ उपजा गुस्सा राजनीतिज्ञ चार दिन में भूल गए। वोट बैंक की राजनीति से कोई राजनेता नहीं बन सकता।

निरंकुश स्वतंत्र प्रेस का नुकसान मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के समय सभी को दिखाई दिया। इससे पहले दिसम्बर 1999 में जब भारतीय विमान का अपहरण हुआ था, तब भी भारतीय प्रेस की भूमिका संदिग्ध हो गई थी। मीडिया का एक वर्ग विमान में सवार परिवारों को सामने करके सरकार पर आतंकवादियों से बातचीत करने का दबाव बना रहा था। अब जब सामाजिक दबाव में विजुअल मीडिया ने कुछ पाबंदियों पर सहमति जाहिर कर दी है तो पुरानी भूलों को भी कबूल किया जाना चाहिए। विमान अपहरण के समय विजुअल मीडिया हवाई अड्डे पर मौजूद यात्रियों के परिजनों का इंटरव्यू प्रसारित कर रहा था। एक चैनल ने उन परिजनों को प्रधानमंत्री के आवास तक पहुंचाने की व्यवस्था की थी, ताकि प्रधानमंत्री के घर पर प्रदर्शन का सीधा प्रसारण कर सकें। मीडिया ने सारे देश को दो हिस्सों में बांटने में भूमिका अदा की थी।

आखिर पीएम ने बनाया अंतुले की छुट्टी का मन

अंतुले से बयान पलटने को कहा गया। पर वह अचानक कट्टरवादी चौगा पहनने लगे। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी वाले शहाबुद्दीन नए दोस्त बन गए। शकील अहमद भी अंतुले को चने के झाड़ पर चढ़ाने लगे। अंतुले कभी कट्टरवादी नहीं रहे। कहा करते थे- 'मैं अब्दुल रहमान बाद में हूं। पहले अंतुले हूं।' अंतुले यानी चित्तपावन ब्राह्मण। पूर्वजों ने कभी इस्लाम कबूल किया होगा। यह वह फख्र से कहते रहे। शकील अहमद कह रहे थे- 'मुसलमानों ने अंतुले को कभी अपना नेता नहीं माना। पर मीडिया ने तीन दिन में बना दिया।' इन तीन दिनों में भले संसद में कांग्रेस की किरकिरी हुई। किसी ने अंतुले की उम्र पर फब्ती कसी। किसी ने दिमागी चैकअप की मांग उठाई। पर अंतुले की सेहत पर असर नहीं। अंतुले का रिकार्ड पल-पल बयान बदलने का। फिर ऐसा क्या हुआ। जो अंतुले अड़ गए। शुक्रवार को उनने फिर कहा- 'कांग्रेस और सरकार को तो मुझ पर फख्र करना चाहिए। परेशानी किस बात की।' अपन इसकी वजह बता दें। अंतुले के फोन की घंटी कभी दिनभर नहीं बजती थी। केबिनेट मंत्री जरूर थे। पर बैठने को दफ्तर तक के लाले थे।

फूट से जितनी दु:खी सोनिया, उतने ही आडवाणी

छत्तीसगढ़ में हार के बाद सोनिया गांधी के दरबार में जोगी का रुतबा घटा। मध्यप्रदेश की हार ने दिग्गज नेताओं की चमक घटा दी। राजस्थान की हार के बाद भाजपा की फूट विस्फोटक होकर सामने आई।

दिल्ली और राजस्थान की हार से भारतीय जनता पार्टी में मायूसी छाई हुई है। उतनी ही मायूसी कांग्रेसी हलकों में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की हार पर भी है। लालकृष्ण आडवाणी ने राजस्थान की हार का कारण गुटबाजी बताया है और दिल्ली की हार का कारण टिकटों का गलत बंटवारा बताया है। सोनिया गांधी ने छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश दोनों ही राज्यों में पार्टी की हार का कारण स्थानीय नेताओं की गुटबाजी बताया है।  दोनों ही बड़े नेताओं ने अपनी-अपनी राय अपने-अपने संसदीय दल की बैठक में पेश की।

कांग्रेस ने दिल्ली को छोड़कर किसी राज्य में मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं किया था। हालांकि छत्तीसगढ़ में अजित जोगी को सांसद होने के बावजूद विधानसभा का टिकट देकर संकेत कर दिया था और मिजोरम में ललथनहवला को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक उम्मीदवार माना जाता था। राजस्थान में मुख्यमंत्री का फैसला करने में कांग्रेस को उतनी देर नहीं लगी, जितना छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में विधायक दल का नेता चुनने में लगी।

तो क्या अंतुले पर बढ़ती उम्र का असर

अब्दुल रहमान अंतुले मुसीबत में नहीं। मुसीबत में मनमोहन सिंह। उनसे भी ज्यादा प्रणव मुखर्जी। सबसे ज्यादा मुसीबत कांग्रेस की। अपन ने कल अंतुले का करकरे पर बयान बताया ही था। उनकी मांग थी- 'करकरे की हत्या पर अलग से जांच होनी चाहिए। वह ऐसे केसों की जांच कर रहे थे। जिनमें गैर मुस्लिम शामिल थे।' वैसे महाराष्ट्र सरकार ने गुरुवार को यह मांग ठुकरा दी। अंतुले ने यह भी कहा था- 'बड़ी वारदात तो होटल में हुई। करकरे को कामा अस्पताल की तरफ किसने भेजा।' अब जब अंतुले का बयान मुसीबत बना। कांग्रेस ने पल्ला झाड़ा। तो अंतुले कह रहे हैं- 'मैंने तो सिर्फ गलत दिशा में जाने की बात उठाई थी।' बवाल गुरुवार को भी नहीं थमा। संसद के दोनों सदनों में हंगामा हुआ। हंगामा तो महाराष्ट्र विधानसभा में भी हुआ। पर अंतुले लोकसभा में बिना टस से मस हुए बैठे रहे। विपक्ष मंत्री पद से हटाने की मांग करता रहा। अंतुले का घमंड देखिए। बोले- 'मैं किसी को जवाबदेय नहीं। मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा। जो सरकार  को मुश्किल में डाले। मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। जिससे कांग्रेस मुसीबत में फंसे। अलबत्ता मैंने तो सरकार की मदद की।'