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December 2008

जंग हल नहीं, पर चारा भी नहीं

पाक भी अफगानिस्तान की तरह आतंकियों पर कार्रवाई की बजाए सबूत मांग रहा है। पाक आतंकवाद की फैक्टरी बंद नहीं करता, तो सर्जिकल स्ट्राइक ही विकल्प बचा है। अफगानिस्तान-इराक पर हमला करने वाले अमेरिका का दोहरा चेहरा सामने आ चुका है।

सात अगस्त 1998 को ओसामा बिन लादेन के आतंकी संगठन अल कायदा ने नैरोबी, केन्या और तंजानिया के अमेरिकी दूतावासों पर आतंकवादी हमला किया। अमेरिका ने पहली बार आतंकवाद का इतना कड़वा स्वाद चखा था, जबकि भारत इसी तरह के आतंकवादी हमले 1982 से झेल रहा था। तेरह अगस्त, 28 अगस्त और आठ दिसम्बर को संयुक्त राष्ट्र की ओर से पास किए गए प्रस्तावों का लक्ष्य अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को दबाव में लाना था। संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका का ध्यान सिर्फ अफगानिस्तान पर ही लगा हुआ था, जबकि भारत उस समय भी आए दिन पाकिस्तान से आतंकी हमले झेल रहा था। अमेरिका की नीति पाकिस्तान को अपने साथ रखकर अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को उखाड़ फेंकने की थी, जो उस समय ओसामा बिन लादेन को शरण दे रही थी।

एक-दूसरे से डरकर ही हो रही जंग की तैयारी

भारत-पाक तनाव कुछ और बढ़ा। दोनों ने जंग रोकने की कोशिश भी शुरू की। पर दोनों तरफ फौजियों की छुट्टियां भी रद्द। एक कदम आगे, तो दो कदम पीछे की रणनीति। मनमोहन सिंह ने कहा था- 'मुद्दा जंग नहीं। जंग कोई नहीं चाहता।' तो यूसुफ रजा गिलानी ने भी कहा- 'हम जंग नहीं चाहते।' पर अविश्वास की गहरी खाई पैदा हो गई। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कह दिया- 'भारतीय नागरिक पाकिस्तान न जाएं।' यह सतीश आनंद शुक्ल की गिरफ्तारी के बाद एहतियात। यों शुक्ल की बात चली। तो बता दें- इस पाकिस्तानी शिगूफे की हवा अंसार-वा-मुहाजिर ने निकाल दी। किसी तूफान वजीर ने कहा- 'लाहौर कार बम विस्फोट हमने किया। वजीरीस्तान में अमेरिकी हमले का जवाब। अभी तो और फिदायिन हमले होंगे।'

जुबान की जंग में अपन सेर, तो पाक सवा सेर

अपन को प्रणव दा की रणनीति विफल होती दिखने लगी। दादा की रणनीति हू-ब-हू वाजपेयी जैसी। संसद पर हमले के बाद वाजपेयी ने भी जंग का माहौल बना दिया था। फौज बार्डर पर कूच कर गई थी। महीनों बार्डर पर जमी रही। जमी हुई बर्फ पिघल गई। तो फौज भी लौट आई। तब वाजपेयी ने 'आर या पार' का जुमला कसा था। अब प्रणव दा ने सभी विकल्प खुले होने का जुमला कसा। अच्छा-भला अपने एंटनी ने कह दिया था- 'जंग नहीं होगी।' प्रणव दा ने अगले ही दिन जंग का माहौल बना दिया। चुनाव जीतने के लिए जंग का इरादा हो। तो अलग बात। पर आप डराने के लिए माहौल बनाओगे। तो पाकिस्तान कोई बच्चा नहीं। जो चुप बैठेगा। माहौल बनाने में अपन सेर। तो वह सवा सेर। अपने प्रणव दा ने सिर्फ जुबान के बम चलाए। जरदारी ने लड़ाकू विमानों की रिहर्सल करवा दी। जरदारी उसी जुल्फिकार अली भुट्टो के दामाद। जिनने एक हजार साल तक लड़ने की कसम खाई थी।

आतंक-जंग के माहौल में जन्मदिन पर चुनावी वसूली

अपन ने तेईस दिसंबर को जब लिखा- 'तेवर भी, तैयारियां भी, चुनावी फायदा भी।' तो अपन ने उसमें साफ लिखा था- 'शिवशंकर मेनन अखबारनवीसों से मुखातिब हुए। न तेवर दिखे, न तैयारियां।' अपन ने सही भांपा था। मंगलवार को ही मनमोहन सिंह ने कह दिया- 'जंग मुद्दा नहीं। मुद्दा आतंकवाद। जंग कोई नहीं चाहता।' पर राष्ट्रपति जरदारी-पीएम गिलानी का रवैया हाय तौबा मचाने का। बुधवार को उसका असर भी दिखा। जब नवाज शरीफ अपने कहे से पलट गए। पांच दिन पहले उनने कहा था- 'कसाब पाकिस्तानी ही है। मैंने खुद पता लगवा लिया।' पर जरदारी-गिलानी की मुहिम का असर हुआ। नवाज शरीफ ने बुधवार को यू टर्न ले लिया। बोले- 'भारत सबूत दे। तो मैं खुद जरदारी से कहूंगा- कार्रवाई की जाए।' अपन को जैसा शक था। हू-ब-हू वही हुआ। नवाज ने अपने भाई की सरकार बचाने के लिए पलटी मारी होगी।

न अंतुले को अफसोस, न सरकार शर्मसार

मनमोहन के अपने ही मंत्री ने छह दिन सरकार की फजीहत करवाई। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को कमजोर किया। पाकिस्तान को कहने का मौका मिला- 'मुंबई के आतंकी मुसलिम लिबास में नहीं थे। वे क्लीन शेव थे। वे आर.एस.एस. काडर जैसे दिखते थे। जिसे कसाब कह कर पाकिस्तानी बताया गया। उस की दाईं कलाई पर पीला धागा बंधा है। जैसा हिंदू पहनते हैं।' जी हां, यह सब पाकिस्तानी प्रैस में छपा है। अपन को वहां के पत्रकार अब्दुल कयूम ने लिखकर भेजा। कसाब की वह फोटू भी ई मेल में भेजी। ताकि अपन दाईं कलाई पर बंधा वह धागा देख लें। जिसे अपन पूर्जा-अर्चना के वक्त बांधते हैं। पाक में अंतुले के सवाल भी उठाए गए- 'आतंकी ने पहले पंद्रह मिनट में करकरे को कैसे मार दिया। करकरे ने बुलेट प्रूफ जैकट पहनी थी। यह आतंकी को भी पता था। इसलिए गोली उसकी गर्दन पर मारी। आतंकी ने भीड़ में करकरे को कैसे पहचान लिया।'

तेवर भी, तैयारियां भी चुनावी फायदा भी

बीजेपी पांच दिन बाद नींद से जागी। तो सोमवार को अंतुले पर संसद ठप्प हुई। सत्रह दिसंबर को संसद ठप्प होती। तो सोनिया तुरुत-फुरुत फैसले को मजबूर होती। सोनिया चाहती तो अंतुले अब तक नप चुके होते। मनमोहन पर फैसला छोड़ सोनिया ने डबल क्रास किया। पता था- मनमोहन मन बनाकर भी कुछ नहीं करेंगे। इधर सिंघवी-मनीष से पल्ला झाड़ने वाला बयान दिलाया। उधर शकील- दिग्विजय से समर्थन करवाया। वोट देखो, वोट की धार देखो वाली नीति। सोनिया के रवैये से अंतुले खुश। अंतुले को साफ लगने लगा- अब उनका कुछ बिगाड़ना आसान नहीं। सो सोमवार को उनने बीजेपी सांसदों को ललकारा। तो प्रणव दा पहली बैंच पर हैरान-परेशान-लाचार बैठे रहे। आतंकवाद के खिलाफ बनी एकता हफ्तेभर में तार-तार हो गई। वृंदा कारत बोली- 'अंतुले का बयान अफसोसनाक। पाक को फायदा पहुंचाने वाला। हम तो सिर्फ यही चाहते हैं- मालेगांव की जांच ठप्प न हो।' बात मालेगांव की चली। तो बता दें- सोमवार को जांच आगे बढ़ी। एटीएस ने लेफ्टिनेंट जनरल पुरोहित के फौजी साथियों से पूछताछ की। पर बात मालेगांव की नहीं। बात मुंबई पर हुए आतंकी हमले की। जिस पर भारत-पाक तनाव शिखर पर।

फर्क अंतुले और नवाज शरीफ में

नवाज शरीफ ने कसाब को पाकिस्तानी बताया तो वहां के प्रिंट मीडिया ने इसे ब्लैक आउट किया। अंतुले ने मालेगांव की अपुष्ट जांच को एटीएस चीफ करकरे की हत्या से जोड़ दिया, तो भारतीय मीडिया ने इसे जमकर तूल दिया। मुंबई के बाद अपने खिलाफ उपजा गुस्सा राजनीतिज्ञ चार दिन में भूल गए। वोट बैंक की राजनीति से कोई राजनेता नहीं बन सकता।

निरंकुश स्वतंत्र प्रेस का नुकसान मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के समय सभी को दिखाई दिया। इससे पहले दिसम्बर 1999 में जब भारतीय विमान का अपहरण हुआ था, तब भी भारतीय प्रेस की भूमिका संदिग्ध हो गई थी। मीडिया का एक वर्ग विमान में सवार परिवारों को सामने करके सरकार पर आतंकवादियों से बातचीत करने का दबाव बना रहा था। अब जब सामाजिक दबाव में विजुअल मीडिया ने कुछ पाबंदियों पर सहमति जाहिर कर दी है तो पुरानी भूलों को भी कबूल किया जाना चाहिए। विमान अपहरण के समय विजुअल मीडिया हवाई अड्डे पर मौजूद यात्रियों के परिजनों का इंटरव्यू प्रसारित कर रहा था। एक चैनल ने उन परिजनों को प्रधानमंत्री के आवास तक पहुंचाने की व्यवस्था की थी, ताकि प्रधानमंत्री के घर पर प्रदर्शन का सीधा प्रसारण कर सकें। मीडिया ने सारे देश को दो हिस्सों में बांटने में भूमिका अदा की थी।

आखिर पीएम ने बनाया अंतुले की छुट्टी का मन

अंतुले से बयान पलटने को कहा गया। पर वह अचानक कट्टरवादी चौगा पहनने लगे। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी वाले शहाबुद्दीन नए दोस्त बन गए। शकील अहमद भी अंतुले को चने के झाड़ पर चढ़ाने लगे। अंतुले कभी कट्टरवादी नहीं रहे। कहा करते थे- 'मैं अब्दुल रहमान बाद में हूं। पहले अंतुले हूं।' अंतुले यानी चित्तपावन ब्राह्मण। पूर्वजों ने कभी इस्लाम कबूल किया होगा। यह वह फख्र से कहते रहे। शकील अहमद कह रहे थे- 'मुसलमानों ने अंतुले को कभी अपना नेता नहीं माना। पर मीडिया ने तीन दिन में बना दिया।' इन तीन दिनों में भले संसद में कांग्रेस की किरकिरी हुई। किसी ने अंतुले की उम्र पर फब्ती कसी। किसी ने दिमागी चैकअप की मांग उठाई। पर अंतुले की सेहत पर असर नहीं। अंतुले का रिकार्ड पल-पल बयान बदलने का। फिर ऐसा क्या हुआ। जो अंतुले अड़ गए। शुक्रवार को उनने फिर कहा- 'कांग्रेस और सरकार को तो मुझ पर फख्र करना चाहिए। परेशानी किस बात की।' अपन इसकी वजह बता दें। अंतुले के फोन की घंटी कभी दिनभर नहीं बजती थी। केबिनेट मंत्री जरूर थे। पर बैठने को दफ्तर तक के लाले थे।

फूट से जितनी दु:खी सोनिया, उतने ही आडवाणी

छत्तीसगढ़ में हार के बाद सोनिया गांधी के दरबार में जोगी का रुतबा घटा। मध्यप्रदेश की हार ने दिग्गज नेताओं की चमक घटा दी। राजस्थान की हार के बाद भाजपा की फूट विस्फोटक होकर सामने आई।

दिल्ली और राजस्थान की हार से भारतीय जनता पार्टी में मायूसी छाई हुई है। उतनी ही मायूसी कांग्रेसी हलकों में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की हार पर भी है। लालकृष्ण आडवाणी ने राजस्थान की हार का कारण गुटबाजी बताया है और दिल्ली की हार का कारण टिकटों का गलत बंटवारा बताया है। सोनिया गांधी ने छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश दोनों ही राज्यों में पार्टी की हार का कारण स्थानीय नेताओं की गुटबाजी बताया है।  दोनों ही बड़े नेताओं ने अपनी-अपनी राय अपने-अपने संसदीय दल की बैठक में पेश की।

कांग्रेस ने दिल्ली को छोड़कर किसी राज्य में मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं किया था। हालांकि छत्तीसगढ़ में अजित जोगी को सांसद होने के बावजूद विधानसभा का टिकट देकर संकेत कर दिया था और मिजोरम में ललथनहवला को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक उम्मीदवार माना जाता था। राजस्थान में मुख्यमंत्री का फैसला करने में कांग्रेस को उतनी देर नहीं लगी, जितना छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में विधायक दल का नेता चुनने में लगी।

तो क्या अंतुले पर बढ़ती उम्र का असर

अब्दुल रहमान अंतुले मुसीबत में नहीं। मुसीबत में मनमोहन सिंह। उनसे भी ज्यादा प्रणव मुखर्जी। सबसे ज्यादा मुसीबत कांग्रेस की। अपन ने कल अंतुले का करकरे पर बयान बताया ही था। उनकी मांग थी- 'करकरे की हत्या पर अलग से जांच होनी चाहिए। वह ऐसे केसों की जांच कर रहे थे। जिनमें गैर मुस्लिम शामिल थे।' वैसे महाराष्ट्र सरकार ने गुरुवार को यह मांग ठुकरा दी। अंतुले ने यह भी कहा था- 'बड़ी वारदात तो होटल में हुई। करकरे को कामा अस्पताल की तरफ किसने भेजा।' अब जब अंतुले का बयान मुसीबत बना। कांग्रेस ने पल्ला झाड़ा। तो अंतुले कह रहे हैं- 'मैंने तो सिर्फ गलत दिशा में जाने की बात उठाई थी।' बवाल गुरुवार को भी नहीं थमा। संसद के दोनों सदनों में हंगामा हुआ। हंगामा तो महाराष्ट्र विधानसभा में भी हुआ। पर अंतुले लोकसभा में बिना टस से मस हुए बैठे रहे। विपक्ष मंत्री पद से हटाने की मांग करता रहा। अंतुले का घमंड देखिए। बोले- 'मैं किसी को जवाबदेय नहीं। मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा। जो सरकार  को मुश्किल में डाले। मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। जिससे कांग्रेस मुसीबत में फंसे। अलबत्ता मैंने तो सरकार की मदद की।'

दस साल बाद नींद खुली कुंभकर्ण की

अपने मित्र अब्दुल कयूम की ई मेल से अपन गुस्से में थे। इस्लामाबाद से अब्दुल ने कई बेतुके सवाल किए। जैसे- करकरे समेत एटीएस के तीन अफसर मौके पर कैसे पहुंचे? उन्हें किसने फोन किया था? अजमल की दांई कलाई पर लाल धागा। सो वह मुस्लिम नहीं, हिंदू। वगैरह-वगैरह। अपन ने इन बेतुकी बातों को एक कान से सुन दूसरे से निकाल दिया। अब अपना सिर शर्म से झुक गया। जब बुधवार को अब्दुल कयूम की जगह अब्दुल रहमान अंतुले बोले- 'कई बार जो दिखता है, वह होता नहीं। करकरे ऐसे केसों की जांच कर रहे थे। जिनमें गैर मुस्लिम शामिल थे। करकरे की हत्या पर अलग से जांच होनी चाहिए।' अपन नहीं जानते। मनमोहन अपने मंत्री के इस बयान पर क्या रुख अपनाएंगे। राजीव प्रताप रूढ़ी ने मनमोहन से पूछा तो है। अब बात कलाई पर लाल धागे की। अजमल से हैदराबाद के अरुणोदय डिग्रीकालेज का पहचान पत्र मिला। तो अपन को वह बात भी समझ आ गई।

आतंकवाद, महंगाई के साथ कैश फॉर वोट भी

संसदीय कमेटी की रपट उलटी होती। तो अपन को कमेटी का मीडिया पर भड़कना जमता। तीन अखबारों की खबर पर कमेटी ने एतराज जताया। खबरें थी 19-20 अगस्त और छह अक्टूबर की। जैसी खबरें थीं, हू-ब-हू वैसी रपट आई। तो कमेटी की मीडिया पर भड़कना चाहिए। या लीक करने वाला अपना मेंबर ढूंढना चाहिए। कमेटी ने भड़ककर स्पीकर से कार्रवाई की सिफारिश की। सोमवार को रपट पेश हुई। तो मंगलवार को स्पीकर की बारी आई। दादा ने मीडिया को लताड़ा। बोले- 'सदन सजा देने के हक का इस्तेमाल कर सकता है। सदन की खामोशी को न उसकी कमजोरी समझा जाए, न अक्षम।' स्पीकर मीडिया पर कार्रवाई करते। तो टकराव का दूसरा दौर शुरू होता। कमेटी की रपट पर सदन में बहस भी शुरू होती। रपट आखिर सर्वसम्मत नहीं। दो मेंबरों ने रपट पर सहमति नहीं दी। मंगलवार को संतोष गंगवार और अनंत कुमार ने यह मुद्दा उठाया भी। पर इससे भी ज्यादा खरी बात- खबरों की।

लीपापोती साबित हुई खरीद-फरोख्त की जांच

अपन ने शुरू में ही कहा था- 'संसदीय कमेटी जांच नहीं कर सकेगी। जांच एजेंसी से करानी चाहिए जांच।' अब जब सांसदों के खरीद-फरोख्त की संसदीय रपट आई। तो किशोर चंद्र देव कमेटी ने लिखा- 'संसदीय कमेटी जांच एजेंसी जैसी नहीं हो सकती। किसी जांच एजेंसी से संजीव सक्सेना की जांच कराई जाए।' सांसदों की खरीद-फरोख्त का एपिक सेंटर तो वही था। वही अशोक अर्गल, कुलस्ते, भगौरा को खरीदने गया था। वही एक करोड़ रुपया अर्गल को देकर आया था। जो उनने सदन पटल पर रखा। अपन को एक बात समझ नहीं आई। जब संजीव सक्सेना का रोल ही तय नहीं हुआ। जब पैसे का स्रोत ही पता नहीं चला। तो अमर सिंह बरी कैसे हुए। अपन को ऐसा लगा। जैसे कमेटी का काम सच जानना नहीं। सच छुपाना था। कमेटी ने अड़तालीसवें पेज पर लिखा- 'कमेटी के पास सक्सेना का झूठ पकड़ने की मशीन नहीं। सो सक्सेना की बातों को झूठ मानकर अमर सिंह पर दोष क्यों मढ़ें।' कमेटी जब सक्सेना की बातों को सच भी नहीं मानती। तो उसके कहे को आधार बनाकर अमर सिंह को बरी भी कैसे किया।

बसपा बनी कांग्रेस के रास्ते का कांटा

राजस्थान में बसपा ने कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत से रोका, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में भी अड़चन बनी। आडवाणी को पीएम बनाने के लिए भाजपा को राजस्थान संभालना होगा, मौजूदा सीटों में पच्चीस-तीस का इजाफा करना होगा और तमिलनाडु, आंध्र, यूपी में नए सहयोगी ढूंढने होंगे।

हाल ही में हुए पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव नतीजों से एक संकेत तो साफ है कि मिजोरम की लोकसभा सीट कांग्रेस को आएगी। चौदहवीं लोकसभा में यह सीट मिजो नेशनल फ्रंट के पास थी, जो विधानसभा चुनावों में बुरी तरह लुढ़क गई है। मिजोरम की अगर मध्यप्रदेश की तरह 29 सीटें होती, या राजस्थान की तरह 25 सीटें होती तो पंद्रहवीं लोकसभा पर गहरा प्रभाव पड़ता। इसलिए कांग्रेस भी मिजोरम के चुनाव नतीजों से लोकसभा चुनाव नतीजों पर असर पड़ने की कोई संभावना नहीं देखती होगी। वैसे तो दिल्ली की सात लोकसभा सीटें भी भारतीय राजनीति की दिशा तय नहीं करती। दिल्ली में विजय कुमार मल्होत्रा से लोकसभा चुनाव हारकर मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्रीं बनना इसका सबूत है।

पाकिस्तान की गोद में छोरा दुनिया में सबूत का ढिंढोरा

तो आज वसुंधरा-माथुर की क्लास लगेगी। आडवाणी ही नहीं, बीजेपी का बच्चा-बच्चा जानता है। कम से कम राजस्थान में तो गुटबाजी ने हरवाया। यह गुटबाजी कोई चुनावों में नहीं पनपी। चुनावों से पहले भी थी। चुनावों के दौरान भी थी। सो गलती तो आलाकमान की। जो सब जानबूझकर भी अनजान बना रहा। आलाकमान की लापरवाहियां नतीजों में सिर चढ़कर बोली। अकबर इलाहाबादी ने ठीक ही लिखा था- 'गफलतों का खूब देखा है तमाशा दहर में, मुद्दतें गुजरी हैं तुझको होश में आए हुए।' पर अपने शिवराज की शपथ के बाद वेंकैया नायडू खबरचियों से बोले- 'वसु-माथुर को दिल्ली तलब किया है। ताकि ऐसी गलती लोकसभा चुनाव के वक्त न हो।' आज अपने गहलोत शपथ लेकर राहत की सांस लेंगे। तो वसुंधरा सीएम की 'एक्टिंग' से भी मुक्त होंगी।

राहुल का ट्रायल था मध्यप्रदेश

पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश के बाद गुजरात और कर्नाटक में कांग्रेस लगातार हारी। अब उसमें मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ भी जुड़ गया। पंद्रहवीं लोकसभा के लिए कांग्रेस की सारी उम्मीद मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान पर टिकी थी। अब कांग्रेसी नेताओं के माथे पर परेशानी की लकीरें दिखने लगीं।

पांच राज्यों के चुनाव नतीजों से कांग्रेस और भाजपा में आत्ममंथन शुरू हो गया है। विधानसभा चुनावों को सेमीफाइनल मानकर चलने वाली दोनों ही पार्टियों को चुनाव नतीजों ने परेशानी में डाल दिया है। भारतीय जनता पार्टी राजस्थान की हार को लेकर उतनी चिंतित नहीं है, जितनी दिल्ली की हार को लेकर है। दूसरी तरफ कांग्रेस दिल्ली, मिजोरम और राजस्थान हासिल करने से उतनी खुश नहीं है, जितनी मध्यप्रदेश में हार से परेशान है। अगली लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने के लिए कांग्रेस की निगाह मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान पर ही टिकी हुई थी। तीनों ही राज्यों के चुनाव नतीजे कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेरने वाले हैं।

हमला हल नहीं, पर पाक हमें कमजोर न समझे

अपन को उम्मीद नहीं थी। आडवाणी इतनी जल्दी मान जाएंगे। पर उनने राजस्थान-दिल्ली में हार की वजह गुटबाजी मान ली। उनने लोकसभा में कांग्रेस से कहा- 'हम राजस्थान-दिल्ली में हार गए। तो इस गलतफहमी में मत रहिएगा- आतंकवाद मुद्दा नहीं। हम अपनी गलतियों से हारे। कांग्रेस की वजह से नहीं। आतंकवाद देश के सामने गंभीर मुद्दा।' तो उनने मान लिया- राजस्थान में गुटबाजी ले डूबी। तो दिल्ली में मल्होत्रा को सीएम प्रोजेक्ट करने की गलती। पर बात आतंकवाद की। संसद के दोनों सदनों में आतंकवाद पर एकजुटता दिखी। आडवाणी ने कहा- 'यहां कौरव-पांडव एकजुट। दुश्मन के खिलाफ हम सौ और पांच नहीं, अलबत्ता एक सौ पांच।' चिदंबरम से लेकर प्रणव दा तक। आडवाणी से लेकर मोहम्मद सलीम तक। सबने पाकिस्तान को आतंकवाद का जिम्मेदार माना।

कांग्रेस का वोट कैचर मुखौटा होंगे राहुल

सोचो, चुनाव नतीजे न आए होते। मुंबई की आतंकी वारदात ही हुई होती। संसद सत्र की शुरूआत होती। तो क्या बुधवार जैसी खामोशी दिखती। दोनों सदनों में सांसद सुधरे हुए बच्चों की तरह बैठे थे। भाजपाई दो राज्य जीतकर भी खामोश थे। पर कांग्रेसी बेंचों पर बधाईयों का आदान-प्रदान हुआ। मुनव्वर हसन की सड़क हादसे में मौत की खबर ने सबको चौंकाया। वीपी सिंह, मुंबई-असम धमाकों में मरने वालों को श्रध्दांजलि हुई। तो मुनव्वर हसन भी जुड़ गए। सो दोनों सदन पहले दिन श्रध्दांजलि देकर उठ गए। उठने से पहले स्पीकर सोमनाथ ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की गुहार लगाई। बोले- 'सदन कठोर कार्रवाई का आह्वान करता है।'

सत्ता का सेमीफाइनल था, तो ड्रा ही रहा

उम्मीद से ज्यादा मिला कांग्रेस को। कांग्रेस को राजस्थान पर तो उम्मीद थी। पर दिल्ली, मिजोरम पर कतई नहीं थी। मिजोरम में एमएनएफ की सरकार थी। जो चारों खाने चित हुई। जिन पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आए। उनमें कांग्रेस के पास खोने को सिर्फ दिल्ली था। जो उसने खोया नहीं। बीजेपी के पास हारने को तीन राज्य थे। पर वह सिर्फ राजस्थान हारी। दिल्ली में तो कांग्रेस की हैटट्रिक लग गई। ज्योतिबसु के बाद शीला हैटट्रिक वाली दूसरी सीएम हो गई। गुजरात में बीजेपी की हैटट्रिक जरूर लगी। पर मोदी की हैटट्रिक अभी बाकी। अपन दिल्ली में कांग्रेस को जीता नहीं मानते। अलबत्ता दिल्ली में बीजेपी हारी। जिसका फायदा कांग्रेस को मिला। शीला दीक्षित को खुद जीत की उम्मीद नहीं थी। जब लीड मिल रही थी। तो शीला ने खुशी जताने से परहेज किया। बोली- 'पहले नतीजे आ जाने दो, फिर ही बोलूंगी।' राजस्थान में भी कांग्रेस नहीं जीती। अलबत्ता बीजेपी-वसुंधरा आपसी टकराव में हारे। जिसका फायदा कांग्रेस को मिला।

खुद मियां फजीहत, दूसरों को नसीहत

पाक पर दोषारोपण करके हम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। मुंबई पर हमला हमारी खुद की सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी है। जरदारी का हम से सबूत मांगना भी नौटंकी, अजमल अमीर कसाब के घर पर आईएसआई का कब्जा।

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी अगर भारत-पाक की आबो-हवा बदलना चाहें तो उनके पास इससे बढ़िया मौका नहीं हो सकता। जरदारी और गिलानी ईमानदार होते तो उन्हें मुंबई के आतंकी हमले में शामिल लोगों के बारे में सबूत मांगने की जरूरत नहीं थी। वारदात के समय गिरफ्तार किए गए मोहम्मद अजमल अमीर कसाब ने बाकी साथियों के नाम और अपने घर का पता बता दिया था। अजमल ने खुद को ओकाडा जिले की दियारपुर तहसील के फरीदकोट गांव का बताया था। जनाब आसिफ अली जरदारी राष्ट्रपति बनने के बाद सितंबर में जब मनमोहन सिंह से न्यूयार्क में मिले थे तो उन्होंने आतंकवाद से मिलजुलकर लड़ने का बचन दिया था। मनमोहन सिंह ने भी उन पर भरोसा करके अनुकूल बयान देते हुए कहा था कि पाकिस्तान भी भारत की तरह आतंकवाद का शिकार है। इसमें कोई शक नहीं है कि तीस साल पहले उसने भारत में आतंकवाद की जो आग लगाई थी, अब खुद उसमें झुलस रहा है।

Crossing into Azad Jammu and Kashmir, Police Checkpost at Bararkot

[caption id="attachment_599" align="alignleft" width="300" caption="Crossing into Azad Jammu and Kashmir, Police Checkpost at Bararkot"]Crossing into Azad Jammu and Kashmir, Police Checkpost at Bararkot

लाशों पर राजनीति का नजारा दिखा महाराष्ट्र में

मुंबई में अभी दरियां नहीं उठी। मातम अभी खत्म नहीं हुआ। बुधवार को सारे देश ने शोक मनाया। गेट वे ऑफ इंडिया से लेकर इंडिया गेट तक। बेंगलुरुसे लेकर चेन्नई तक। सब जगह लोगों ने मोमबत्तियां जलाई। राजनीतिज्ञों के खिलाफ गुस्सा हर चेहरे पर था। मोमबत्तियों की लौ अभी ठंडी नहीं पड़ी। कांग्रेस में महासंग्राम शुरू हो गया। मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए कुत्ते-बिल्ली जैसी लड़ाई हुई। जैसे बिल्ली के भागो छिकां फूट पड़ा हो। अपने अभिषेक मनु सिंघवी शुक्रवार को इतरा रहे थे- 'हमने चौबीस घंटे में तीन लोग हटा दिए। पाटिल, देशमुख, आर आर पाटिल। और किसी सरकार ने किसी आतंकी वारदात पर ऐसा नहीं किया।' अभिषेक का इशारा बीजेपी की ओर था। अपन समझ नहीं पा रहे। कांग्रेस का पहला दुश्मन कौन। आतंकवाद या बीजेपी।

आतंकी का धर्म नहीं तो कोई देश भी नहीं

आडवाणी तो शुरू से बता रहे थे- 'यह सरकार आतंकवाद को गंभीरता से नहीं ले रही।' पीएम भी होम मिनिस्टर के नकारेपन से खफा थे। पर सोनिया हटाने को राजी नहीं थी। यही हाल विलासराव देशमुख का था। मारग्रेट अल्वा दो साल से समझाती-समझाती खुद नप गई। पर सोनिया नहीं मानी। अब जब नजला खुद पर उतरता दिखा। तो दोनों बलि का बकरा बने। बुधवार को नैनीताल में अपनी कांग्रेस के एक दिग्गज से मुलाकात हुई। जयपुर की चुनावी जिम्मेदारी से लौटे ही थे। गुफ्तगू हुई तो बोले- 'पाटिल का क्या कसूर। वह तो तीन साल पहले ही नकारा साबित हो चुके थे।'

मुंबई से भी सबक लेंगे, या नहीं

देश बचाना है, तो आतंकवादी का धर्म देखकर कार्रवाई करने की नीति छोड़नी होगी। बोट पर आने वालों से तो एनएसजी ने निपट लिया, वोट वालों से कैसे निपटेगा देश।

आतंकवादी और आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले फ्रांस की क्रांति के बाद 1795 में हुआ। क्रांतिकारी सरकार की आतंक की नीतियां लागू करने वाली जन सुरक्षा और राष्ट्रीय कंवेशन कमेटी को आतंकवादी कहा गया। इस तरह आतंकवाद का अर्थ तब मौजूदा अर्थ से बिल्कुल भिन्न और सकारात्मक था। वैसे आतंकवाद की शुरुआत पहली ही सदी में हो गई थी, जब रोमनो ने खाड़ी में यहूदियों की जमीन पर कब्जा कर लिया था। यहूदियों के दो गुट खड़े हुए, जो रोमनो और उनका समर्थन करने वाले यहूदियों की भी हत्या करते थे। ग्यारहवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी के बीच ईरान और सीरिया में एसेसिन नामक इस्लामिक गुट सक्रिय थे, जो राजनीतिक हत्याएं करते थे। सोलहवीं सदी की शुरू में गे फाक्स ने अंग्रेजी राजशाही के खिलाफ विद्रोह कर किया था, इंग्लिश इतिहासकार उसे पहला आतंकवादी मानते हैं।

आखिर पाटिल का हुआ पटिया उलाल

इस्तीफे की पेशकश तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार ने भी की। आखिर पीएम ने शुक्रवार को समीक्षा की। तो पाटिल के अलावा नारायणन भी नदारद थे। पर इस्तीफा सिर्फ पाटिल का मंजूर हुआ। पीएम ने बृजेश मिश्र को बुलाया। तो नारायणन ने इसे इशारा समझा। बृजेश-मनमोहन मुलाकात से अपने कान भी खड़े हुए। अपन को याद आया- 'अमेरिकी समझाइश पर बृजेश मिश्र ने एटमी करार पर यू टर्न लिया था।' जरूर अमेरिकी सलाह से मुलाकात हुई होगी। पर फिलहाल नारायणन बच गए। यों खबर तो रॉ-आईबी चीफ पर भी गाज गिरने की। अपन उन दोनों का कसूर नहीं मानते। कसूर राजनीतिक लैवल पर हुआ।