December 2008

दस साल बाद नींद खुली कुंभकर्ण की

अपने मित्र अब्दुल कयूम की ई मेल से अपन गुस्से में थे। इस्लामाबाद से अब्दुल ने कई बेतुके सवाल किए। जैसे- करकरे समेत एटीएस के तीन अफसर मौके पर कैसे पहुंचे? उन्हें किसने फोन किया था? अजमल की दांई कलाई पर लाल धागा। सो वह मुस्लिम नहीं, हिंदू। वगैरह-वगैरह। अपन ने इन बेतुकी बातों को एक कान से सुन दूसरे से निकाल दिया। अब अपना सिर शर्म से झुक गया। जब बुधवार को अब्दुल कयूम की जगह अब्दुल रहमान अंतुले बोले- 'कई बार जो दिखता है, वह होता नहीं। करकरे ऐसे केसों की जांच कर रहे थे। जिनमें गैर मुस्लिम शामिल थे। करकरे की हत्या पर अलग से जांच होनी चाहिए।' अपन नहीं जानते। मनमोहन अपने मंत्री के इस बयान पर क्या रुख अपनाएंगे। राजीव प्रताप रूढ़ी ने मनमोहन से पूछा तो है। अब बात कलाई पर लाल धागे की। अजमल से हैदराबाद के अरुणोदय डिग्रीकालेज का पहचान पत्र मिला। तो अपन को वह बात भी समझ आ गई।

आतंकवाद, महंगाई के साथ कैश फॉर वोट भी

संसदीय कमेटी की रपट उलटी होती। तो अपन को कमेटी का मीडिया पर भड़कना जमता। तीन अखबारों की खबर पर कमेटी ने एतराज जताया। खबरें थी 19-20 अगस्त और छह अक्टूबर की। जैसी खबरें थीं, हू-ब-हू वैसी रपट आई। तो कमेटी की मीडिया पर भड़कना चाहिए। या लीक करने वाला अपना मेंबर ढूंढना चाहिए। कमेटी ने भड़ककर स्पीकर से कार्रवाई की सिफारिश की। सोमवार को रपट पेश हुई। तो मंगलवार को स्पीकर की बारी आई। दादा ने मीडिया को लताड़ा। बोले- 'सदन सजा देने के हक का इस्तेमाल कर सकता है। सदन की खामोशी को न उसकी कमजोरी समझा जाए, न अक्षम।' स्पीकर मीडिया पर कार्रवाई करते। तो टकराव का दूसरा दौर शुरू होता। कमेटी की रपट पर सदन में बहस भी शुरू होती। रपट आखिर सर्वसम्मत नहीं। दो मेंबरों ने रपट पर सहमति नहीं दी। मंगलवार को संतोष गंगवार और अनंत कुमार ने यह मुद्दा उठाया भी। पर इससे भी ज्यादा खरी बात- खबरों की।

लीपापोती साबित हुई खरीद-फरोख्त की जांच

अपन ने शुरू में ही कहा था- 'संसदीय कमेटी जांच नहीं कर सकेगी। जांच एजेंसी से करानी चाहिए जांच।' अब जब सांसदों के खरीद-फरोख्त की संसदीय रपट आई। तो किशोर चंद्र देव कमेटी ने लिखा- 'संसदीय कमेटी जांच एजेंसी जैसी नहीं हो सकती। किसी जांच एजेंसी से संजीव सक्सेना की जांच कराई जाए।' सांसदों की खरीद-फरोख्त का एपिक सेंटर तो वही था। वही अशोक अर्गल, कुलस्ते, भगौरा को खरीदने गया था। वही एक करोड़ रुपया अर्गल को देकर आया था। जो उनने सदन पटल पर रखा। अपन को एक बात समझ नहीं आई। जब संजीव सक्सेना का रोल ही तय नहीं हुआ। जब पैसे का स्रोत ही पता नहीं चला। तो अमर सिंह बरी कैसे हुए। अपन को ऐसा लगा। जैसे कमेटी का काम सच जानना नहीं। सच छुपाना था। कमेटी ने अड़तालीसवें पेज पर लिखा- 'कमेटी के पास सक्सेना का झूठ पकड़ने की मशीन नहीं। सो सक्सेना की बातों को झूठ मानकर अमर सिंह पर दोष क्यों मढ़ें।' कमेटी जब सक्सेना की बातों को सच भी नहीं मानती। तो उसके कहे को आधार बनाकर अमर सिंह को बरी भी कैसे किया।

बसपा बनी कांग्रेस के रास्ते का कांटा

राजस्थान में बसपा ने कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत से रोका, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में भी अड़चन बनी। आडवाणी को पीएम बनाने के लिए भाजपा को राजस्थान संभालना होगा, मौजूदा सीटों में पच्चीस-तीस का इजाफा करना होगा और तमिलनाडु, आंध्र, यूपी में नए सहयोगी ढूंढने होंगे।

हाल ही में हुए पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव नतीजों से एक संकेत तो साफ है कि मिजोरम की लोकसभा सीट कांग्रेस को आएगी। चौदहवीं लोकसभा में यह सीट मिजो नेशनल फ्रंट के पास थी, जो विधानसभा चुनावों में बुरी तरह लुढ़क गई है। मिजोरम की अगर मध्यप्रदेश की तरह 29 सीटें होती, या राजस्थान की तरह 25 सीटें होती तो पंद्रहवीं लोकसभा पर गहरा प्रभाव पड़ता। इसलिए कांग्रेस भी मिजोरम के चुनाव नतीजों से लोकसभा चुनाव नतीजों पर असर पड़ने की कोई संभावना नहीं देखती होगी। वैसे तो दिल्ली की सात लोकसभा सीटें भी भारतीय राजनीति की दिशा तय नहीं करती। दिल्ली में विजय कुमार मल्होत्रा से लोकसभा चुनाव हारकर मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्रीं बनना इसका सबूत है।

पाकिस्तान की गोद में छोरा दुनिया में सबूत का ढिंढोरा

तो आज वसुंधरा-माथुर की क्लास लगेगी। आडवाणी ही नहीं, बीजेपी का बच्चा-बच्चा जानता है। कम से कम राजस्थान में तो गुटबाजी ने हरवाया। यह गुटबाजी कोई चुनावों में नहीं पनपी। चुनावों से पहले भी थी। चुनावों के दौरान भी थी। सो गलती तो आलाकमान की। जो सब जानबूझकर भी अनजान बना रहा। आलाकमान की लापरवाहियां नतीजों में सिर चढ़कर बोली। अकबर इलाहाबादी ने ठीक ही लिखा था- 'गफलतों का खूब देखा है तमाशा दहर में, मुद्दतें गुजरी हैं तुझको होश में आए हुए।' पर अपने शिवराज की शपथ के बाद वेंकैया नायडू खबरचियों से बोले- 'वसु-माथुर को दिल्ली तलब किया है। ताकि ऐसी गलती लोकसभा चुनाव के वक्त न हो।' आज अपने गहलोत शपथ लेकर राहत की सांस लेंगे। तो वसुंधरा सीएम की 'एक्टिंग' से भी मुक्त होंगी।

राहुल का ट्रायल था मध्यप्रदेश

पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश के बाद गुजरात और कर्नाटक में कांग्रेस लगातार हारी। अब उसमें मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ भी जुड़ गया। पंद्रहवीं लोकसभा के लिए कांग्रेस की सारी उम्मीद मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान पर टिकी थी। अब कांग्रेसी नेताओं के माथे पर परेशानी की लकीरें दिखने लगीं।

पांच राज्यों के चुनाव नतीजों से कांग्रेस और भाजपा में आत्ममंथन शुरू हो गया है। विधानसभा चुनावों को सेमीफाइनल मानकर चलने वाली दोनों ही पार्टियों को चुनाव नतीजों ने परेशानी में डाल दिया है। भारतीय जनता पार्टी राजस्थान की हार को लेकर उतनी चिंतित नहीं है, जितनी दिल्ली की हार को लेकर है। दूसरी तरफ कांग्रेस दिल्ली, मिजोरम और राजस्थान हासिल करने से उतनी खुश नहीं है, जितनी मध्यप्रदेश में हार से परेशान है। अगली लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने के लिए कांग्रेस की निगाह मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान पर ही टिकी हुई थी। तीनों ही राज्यों के चुनाव नतीजे कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेरने वाले हैं।

हमला हल नहीं, पर पाक हमें कमजोर न समझे

अपन को उम्मीद नहीं थी। आडवाणी इतनी जल्दी मान जाएंगे। पर उनने राजस्थान-दिल्ली में हार की वजह गुटबाजी मान ली। उनने लोकसभा में कांग्रेस से कहा- 'हम राजस्थान-दिल्ली में हार गए। तो इस गलतफहमी में मत रहिएगा- आतंकवाद मुद्दा नहीं। हम अपनी गलतियों से हारे। कांग्रेस की वजह से नहीं। आतंकवाद देश के सामने गंभीर मुद्दा।' तो उनने मान लिया- राजस्थान में गुटबाजी ले डूबी। तो दिल्ली में मल्होत्रा को सीएम प्रोजेक्ट करने की गलती। पर बात आतंकवाद की। संसद के दोनों सदनों में आतंकवाद पर एकजुटता दिखी। आडवाणी ने कहा- 'यहां कौरव-पांडव एकजुट। दुश्मन के खिलाफ हम सौ और पांच नहीं, अलबत्ता एक सौ पांच।' चिदंबरम से लेकर प्रणव दा तक। आडवाणी से लेकर मोहम्मद सलीम तक। सबने पाकिस्तान को आतंकवाद का जिम्मेदार माना।

कांग्रेस का वोट कैचर मुखौटा होंगे राहुल

सोचो, चुनाव नतीजे न आए होते। मुंबई की आतंकी वारदात ही हुई होती। संसद सत्र की शुरूआत होती। तो क्या बुधवार जैसी खामोशी दिखती। दोनों सदनों में सांसद सुधरे हुए बच्चों की तरह बैठे थे। भाजपाई दो राज्य जीतकर भी खामोश थे। पर कांग्रेसी बेंचों पर बधाईयों का आदान-प्रदान हुआ। मुनव्वर हसन की सड़क हादसे में मौत की खबर ने सबको चौंकाया। वीपी सिंह, मुंबई-असम धमाकों में मरने वालों को श्रध्दांजलि हुई। तो मुनव्वर हसन भी जुड़ गए। सो दोनों सदन पहले दिन श्रध्दांजलि देकर उठ गए। उठने से पहले स्पीकर सोमनाथ ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की गुहार लगाई। बोले- 'सदन कठोर कार्रवाई का आह्वान करता है।'

सत्ता का सेमीफाइनल था, तो ड्रा ही रहा

उम्मीद से ज्यादा मिला कांग्रेस को। कांग्रेस को राजस्थान पर तो उम्मीद थी। पर दिल्ली, मिजोरम पर कतई नहीं थी। मिजोरम में एमएनएफ की सरकार थी। जो चारों खाने चित हुई। जिन पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आए। उनमें कांग्रेस के पास खोने को सिर्फ दिल्ली था। जो उसने खोया नहीं। बीजेपी के पास हारने को तीन राज्य थे। पर वह सिर्फ राजस्थान हारी। दिल्ली में तो कांग्रेस की हैटट्रिक लग गई। ज्योतिबसु के बाद शीला हैटट्रिक वाली दूसरी सीएम हो गई। गुजरात में बीजेपी की हैटट्रिक जरूर लगी। पर मोदी की हैटट्रिक अभी बाकी। अपन दिल्ली में कांग्रेस को जीता नहीं मानते। अलबत्ता दिल्ली में बीजेपी हारी। जिसका फायदा कांग्रेस को मिला। शीला दीक्षित को खुद जीत की उम्मीद नहीं थी। जब लीड मिल रही थी। तो शीला ने खुशी जताने से परहेज किया। बोली- 'पहले नतीजे आ जाने दो, फिर ही बोलूंगी।' राजस्थान में भी कांग्रेस नहीं जीती। अलबत्ता बीजेपी-वसुंधरा आपसी टकराव में हारे। जिसका फायदा कांग्रेस को मिला।

खुद मियां फजीहत, दूसरों को नसीहत

पाक पर दोषारोपण करके हम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। मुंबई पर हमला हमारी खुद की सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी है। जरदारी का हम से सबूत मांगना भी नौटंकी, अजमल अमीर कसाब के घर पर आईएसआई का कब्जा।

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी अगर भारत-पाक की आबो-हवा बदलना चाहें तो उनके पास इससे बढ़िया मौका नहीं हो सकता। जरदारी और गिलानी ईमानदार होते तो उन्हें मुंबई के आतंकी हमले में शामिल लोगों के बारे में सबूत मांगने की जरूरत नहीं थी। वारदात के समय गिरफ्तार किए गए मोहम्मद अजमल अमीर कसाब ने बाकी साथियों के नाम और अपने घर का पता बता दिया था। अजमल ने खुद को ओकाडा जिले की दियारपुर तहसील के फरीदकोट गांव का बताया था। जनाब आसिफ अली जरदारी राष्ट्रपति बनने के बाद सितंबर में जब मनमोहन सिंह से न्यूयार्क में मिले थे तो उन्होंने आतंकवाद से मिलजुलकर लड़ने का बचन दिया था। मनमोहन सिंह ने भी उन पर भरोसा करके अनुकूल बयान देते हुए कहा था कि पाकिस्तान भी भारत की तरह आतंकवाद का शिकार है। इसमें कोई शक नहीं है कि तीस साल पहले उसने भारत में आतंकवाद की जो आग लगाई थी, अब खुद उसमें झुलस रहा है।