November 2008

सिर्फ पाटिल नहीं, नीतियां भी पलटिए

यूपीए सरकार ने चार सालों में अपनी नीतियों से राष्ट्रीय सुरक्षा का ढांचा तहस-नहस कर दिया, आतंकवाद के विभत्स रूप की जान-बूझकर अनदेखी करती रही यूपीए सरकार। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में खुफिया रिपोर्टों की अनदेखी आदत में शुमार हो गई।

पन्द्रह साल पहले जब मैं पहली बार शिवराज पाटिल से मिला था तो वह लोकसभा के स्पीकर थे। नरसिंह राव ने उनकी अध्यापकीय पृष्ठभूमि को देखते हुए उनके लिए सही पद चुना था। वह अध्यापक से ज्यादा हेडमास्टर ही हो सकते थे। पिछला लोकसभा चुनाव हार जाने के बाद भी सोनिया गांधी ने उन्हें देश का गृहमंत्री बनाने का फैसला किया, तो पाटिल को जानने वालों को हैरानी हुई थी। कुछ को तो सदमा भी लगा था। मुझे लगता है कि वित्त मंत्री के तौर पर पी. चिदम्बरम को छोड़ शायद ही कोई और मंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी मर्जी से बनाया होगा। पिछले तीन-चार सालों से हो रही हर आतंकवादी वारदात के बाद पाटिल की काबिलियत पर सवाल उठाए जाते रहे थे।

Faisal Mosque from Daman-e-Koh

[caption id="attachment_585" align="alignleft" width="300" caption="Faisal Mosque from Daman-e-Koh - 2nd picture in series of Pakistan - People and Places"]Faisal Mosque from Daman-e-Koh - 2nd picture in series of Pakistan - Peopla and Places[/caption]

Faisal Mosque from Daman-e-Koh

मोदी ने सच्ची बात कही तो तिलमिला गई कांग्रेस

मुंबई के पुलिस प्रमुख का ताज मुक्त करवाने का दावा झूठा निकला। एनएसजी शुक्रवार को भी दिनभर आतंकियों से जूझती रही। पर राजनीतिक दलों में तू-तू, मैं-मैं शुरू हो गई। अपन ने कल मनमोहन-आडवाणी के मुंबई दौरों की कहानी तो सुनाई ही थी। नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को नया खुलासा किया। वह बोले- 'मैंने गुरुवार को ही महाराष्ट्र के सीएम से बात की थी। हर तरह के सहयोग का वादा किया। मुंबई आने की इच्छा जताई। पर विलासराव ने कहा- आज मत आइए।' मोदी शुक्रवार को बिना पूछे चले गए। पूछने की जरूरत भी नहीं थी। विलासराव की गुजारिश तो सिर्फ गुरुवार के लिए थी। यह गुजारिश आडवाणी से भी की थी। पर मनमोहन को आने से नहीं रोका।

मुंबई का असर मतदान केन्द्रों में भी पड़ेगा

मध्यप्रदेश, दिल्ली, राजस्थान विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुई मुंबई की आतंकवादी वारदात ने कांग्रेसियों के माथे पर  पसीने की बूंदें झलका दी। कांग्रेस पर आतंकवाद के प्रति नरम होने का आरोप लगा रही भाजपा को इन तीनों राज्यों में फायदा होगा।

छह विधानसभाओं के चुनावों का ऐलान होने से पहले भाजपा दिल्ली को लेकर सबसे ज्यादा आश्वस्त थी। भाजपा यह मानकर चल रही थी कि दिल्ली तो उसे मिलेगा ही, कम से कम छत्तीसगढ़ और  मिल जाए, तो लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी की नाक बच जाएगी। मध्यप्रदेश को भाजपा हारा हुआ मानकर चल रही थी, राजस्थान को लेकर भी आश्वस्त नहीं थी। लेकिन जैसे-जैसे चुनावी शतरंज बिछनी शुरू हुई, भाजपा आलाकमान यह देखकर दंग रह गया कि मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान उम्मीद से ज्यादा नतीजा दिखा रहे थे, जबकि दिल्ली में विजय कुमार मल्होत्रा की उम्मीदवारी का ऐलान होते ही हालात ने नया मोड़ ले लिया।

आतंकवाद से लड़ने की इच्छाशक्ति चाहिए

समुद्री रास्ते से आतंकवाद की आशंका भी सही साबित हो गई है। राजनेता सुरक्षा एजेंसियों की सलाहों को दरकिनार करके आतंकवाद पर राजनीतिक नजरिया अपनाएंगे, तो आतंकवाद से नहीं लड़ा जा सकता।

करीब दो साल पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने पहली बार समुद्री रास्ते से आतंकवादियों के प्रवेश की आशंका जाहिर करके देश को चौंका दिया था। इसके करीब एक साल बाद तीस जून 2007 को संसद पटल पर रखी आतंरिक सुरक्षा की बाबत रपट में कहा गया था कि समुद्री मार्गों से खतरे की संभावना को देखते हुए तटीय क्षेत्रों की गश्त और निगरानी के लिए तटीय सुरक्षा योजना शुरू की गई है। तटीय पुलिस थानों को 204 नौकाओं, 149 जीपों और 318 मोटरसाईकिलों से सुसज्जित किया जा रहा है। गृहमंत्रालय की इस रिपोर्ट में महाराष्ट्र और गुजरात की तटीय सीमा से आतंकवादियों की घुसपैठ की आशंका को देखते हुए 'आपरेशन स्वान' नाम से एक योजना का जिक्र है। छब्बीस नवम्बर 2008 को वह घटना हो गई, जिसकी आशंका इस रिपोर्ट में जाहिर की गई थी।

व्हाइट हाऊस, टैन डाउनिंग अपन से ज्यादा फिक्रमंद

बुधवार रात 9.40 का वक्त। अपन डायनिंग टेबल पर बैठ चुके थे। पहली खबर आई- 'मुंबई में दो गुटों में गोलीबारी।' धीरे-धीरे परतें खुलती गई। तीन जगह गोलीबारी की खबर आई। तो अपन को पहली नजर में गैंगवार लगा। पर दस बजते-बजते हालात साफ हो गए। एटीएस चीफ हेमंत करकरे वीटी स्टेशन पर पहुंचे। अपन ने बुलेटप्रुफ जैकेट और हेलमेट लगाते देखा। रात बारह बजे करकरे को गोली लगने की खबर आई। करकरे मालेगांव जांच से सुर्खियों में थे। बयासी बैच के आईपीएस करकरे इसी साल जनवरी में लौटे। सात साल रॉ में डेपूटेशन पर आस्ट्रिया में थे। एटीएस की बात चली। तो बताते जाएं। मुस्लिम मुजाहिद्दीन एटीएस से बेहद खफा थी।

करकरे बोले- 'जांच की दाल में कुछ काला नहीं'

अपन मालेगांव जांच से जुड़ी अफवाहों से परहेज करते रहे। वरना अफवाहें तो पूरी जांच राजनीतिक साजिश की थी। जो सोनिया को घेरने के लिए रची बताई गई। यानी जांच में सोनिया का कोई हाथ नहीं। अफवाहों में पवार के साथ एक कांग्रेसी दिग्गज का भी नाम था। पर अपन को अफवाहें तवज्जो देने लायक नहीं लगी। अपने नरेन्द्र मोदी मंगलवार रात बोले- 'जब मैं मकोका जैसा गुजकोका मांगता हूं। ताकि सलीम उस्मान बशर और कयामुद्दीन पर लगा सकूं। तो मनमोहन कहते हैं- यह पाशविक कानून है। पर महाराष्ट्र में एटीएस को प्रुफ नहीं मिला। तो प्रज्ञा, पुरोहित, पांडे पर मकोका लगा दिया। दाल में जरूर कुछ काला।' वह दाल में काला क्या है? इस पर कुछ रोशनी रविशंकर प्रसाद को डालनी पड़ी। उनने कहा- 'पवार ने पांच अक्टूबर को कैसे कहा- मालेगांव विस्फोट में हिंदू आतंकवादियों का हाथ।'

अदालत में तलब तिवारी पर बढ़ा इस्तीफे का दबाव

छह एसेंबलियों के चुनाव आडवाणी के लिए महत्वपूर्ण। तो कांग्रेस के लिए भी जीवन-मरण का सवाल। आप इस चुनाव का महत्व एक बात से समझ लें। दो महीनों में वाईएस राजशेखर रेड्डी पांच बार दिल्ली आए। दक्षिण से कोई मुख्यमंत्री इतनी बार क्यों आएगा। आंध्र का सीएम पहले तो ऐसे कभी नहीं आया। किसी पब्लिक रैली को भी संबोधित नहीं किया। अपन बात आंध्र के गवर्नर की भी करेंगे। पर पहले बात मुख्यमंत्री और रैली की चली। तो नरेंद्र मोदी की बात करते जाएं। छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश से निपटकर मोदी दिल्ली में। मोदी की दहशत का हाल देखिए। पंचकुइयां रोड पर पब्लिक मीटिंग की इजाजत नहीं दी। तो मोदी 'रोड शो' में करिश्मा दिखा गए।

अब तो जनता ही तैयार करे सौ दिन का रोड मैप

बधाई तो कश्मीर की जनता को। जिसने बायकाट का बाजा बजा दिया। हुर्रियत कांफ्रेंस की तो टैं बोल गई। पहले फेज में 69 फीसदी वोट पड़े। तो अलगाववादियों ने दूसरे फेज से पहले खूब बम फोड़े। पर दूसरे फेज में भी 65 फीसदी वोट पड़ गए। अलगाववादी अब जनता की पेशानी पर लिखी इबारत पढ़ लें। बैलेट की ताकत को समझें। बायकाट, हड़ताल और हिंसा की राजनीति छोड़ दें। फर्जी वोटिंग के आरोप अबके नहीं चलने। पूरी दुनिया ने पोलिंग बूथ पर लगी लंबी-लंबी लाइनें देख ली। इंटरनेशनल ऑबजर्वरों ने भी देख लिया। आवाम ने हुर्रियत से तौबा कर ली। इसका कुछ सेहरा तो अपन क्यूम खान के पोते के सिर भी बांधेंगे।

क्या हिंदुओं में अस्तित्व की चिंता जाग रही है?

परिदृश्य-एक
ब्रिटिश हुकूमत के साथ छह साल के संघर्ष के बाद 1781 में तेरह राज्यों ने मिलकर यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका का गठन कर लिया था। इससे ठीक 75 साल बाद 1856 में ब्रिटिश हुकूमत ने बर्मा में तैनात करने के लिए भारतीय सेना में एक नई टुकड़ी का गठन करने का फैसला किया। सेना में यह अफवाह जोरों पर फैल गई कि बर्मा में तैनात किए जाने वाले सैनिक धार्मिक परंपराओं का पालन नहीं कर पाएंगे जबकि सेना में ईसाई धर्म गुरुओं को तैनात किया जाएगा। इन अफवाहों को उस समय जोर मिला, जब ब्रिटिश हुकूमत की ओर से सेना के लिए एक नई राईफल भेजने और उसके कारतूस को