Monthly archive

November 2008

सिर्फ पाटिल नहीं, नीतियां भी पलटिए

यूपीए सरकार ने चार सालों में अपनी नीतियों से राष्ट्रीय सुरक्षा का ढांचा तहस-नहस कर दिया, आतंकवाद के विभत्स रूप की जान-बूझकर अनदेखी करती रही यूपीए सरकार। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में खुफिया रिपोर्टों की अनदेखी आदत में शुमार हो गई।

पन्द्रह साल पहले जब मैं पहली बार शिवराज पाटिल से मिला था तो वह लोकसभा के स्पीकर थे। नरसिंह राव ने उनकी अध्यापकीय पृष्ठभूमि को देखते हुए उनके लिए सही पद चुना था। वह अध्यापक से ज्यादा हेडमास्टर ही हो सकते थे। पिछला लोकसभा चुनाव हार जाने के बाद भी सोनिया गांधी ने उन्हें देश का गृहमंत्री बनाने का फैसला किया, तो पाटिल को जानने वालों को हैरानी हुई थी। कुछ को तो सदमा भी लगा था। मुझे लगता है कि वित्त मंत्री के तौर पर पी. चिदम्बरम को छोड़ शायद ही कोई और मंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी मर्जी से बनाया होगा। पिछले तीन-चार सालों से हो रही हर आतंकवादी वारदात के बाद पाटिल की काबिलियत पर सवाल उठाए जाते रहे थे।

Faisal Mosque from Daman-e-Koh

[caption id="attachment_585" align="alignleft" width="300" caption="Faisal Mosque from Daman-e-Koh - 2nd picture in series of Pakistan - People and Places"]Faisal Mosque from Daman-e-Koh - 2nd picture in series of Pakistan - Peopla and Places[/

मोदी ने सच्ची बात कही तो तिलमिला गई कांग्रेस

मुंबई के पुलिस प्रमुख का ताज मुक्त करवाने का दावा झूठा निकला। एनएसजी शुक्रवार को भी दिनभर आतंकियों से जूझती रही। पर राजनीतिक दलों में तू-तू, मैं-मैं शुरू हो गई। अपन ने कल मनमोहन-आडवाणी के मुंबई दौरों की कहानी तो सुनाई ही थी। नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को नया खुलासा किया। वह बोले- 'मैंने गुरुवार को ही महाराष्ट्र के सीएम से बात की थी। हर तरह के सहयोग का वादा किया। मुंबई आने की इच्छा जताई। पर विलासराव ने कहा- आज मत आइए।' मोदी शुक्रवार को बिना पूछे चले गए। पूछने की जरूरत भी नहीं थी। विलासराव की गुजारिश तो सिर्फ गुरुवार के लिए थी। यह गुजारिश आडवाणी से भी की थी। पर मनमोहन को आने से नहीं रोका।

मुंबई का असर मतदान केन्द्रों में भी पड़ेगा

मध्यप्रदेश, दिल्ली, राजस्थान विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुई मुंबई की आतंकवादी वारदात ने कांग्रेसियों के माथे पर  पसीने की बूंदें झलका दी। कांग्रेस पर आतंकवाद के प्रति नरम होने का आरोप लगा रही भाजपा को इन तीनों राज्यों में फायदा होगा।

छह विधानसभाओं के चुनावों का ऐलान होने से पहले भाजपा दिल्ली को लेकर सबसे ज्यादा आश्वस्त थी। भाजपा यह मानकर चल रही थी कि दिल्ली तो उसे मिलेगा ही, कम से कम छत्तीसगढ़ और  मिल जाए, तो लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी की नाक बच जाएगी। मध्यप्रदेश को भाजपा हारा हुआ मानकर चल रही थी, राजस्थान को लेकर भी आश्वस्त नहीं थी। लेकिन जैसे-जैसे चुनावी शतरंज बिछनी शुरू हुई, भाजपा आलाकमान यह देखकर दंग रह गया कि मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान उम्मीद से ज्यादा नतीजा दिखा रहे थे, जबकि दिल्ली में विजय कुमार मल्होत्रा की उम्मीदवारी का ऐलान होते ही हालात ने नया मोड़ ले लिया।

आतंकवाद से लड़ने की इच्छाशक्ति चाहिए

समुद्री रास्ते से आतंकवाद की आशंका भी सही साबित हो गई है। राजनेता सुरक्षा एजेंसियों की सलाहों को दरकिनार करके आतंकवाद पर राजनीतिक नजरिया अपनाएंगे, तो आतंकवाद से नहीं लड़ा जा सकता।

करीब दो साल पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने पहली बार समुद्री रास्ते से आतंकवादियों के प्रवेश की आशंका जाहिर करके देश को चौंका दिया था। इसके करीब एक साल बाद तीस जून 2007 को संसद पटल पर रखी आतंरिक सुरक्षा की बाबत रपट में कहा गया था कि समुद्री मार्गों से खतरे की संभावना को देखते हुए तटीय क्षेत्रों की गश्त और निगरानी के लिए तटीय सुरक्षा योजना शुरू की गई है। तटीय पुलिस थानों को 204 नौकाओं, 149 जीपों और 318 मोटरसाईकिलों से सुसज्जित किया जा रहा है। गृहमंत्रालय की इस रिपोर्ट में महाराष्ट्र और गुजरात की तटीय सीमा से आतंकवादियों की घुसपैठ की आशंका को देखते हुए 'आपरेशन स्वान' नाम से एक योजना का जिक्र है। छब्बीस नवम्बर 2008 को वह घटना हो गई, जिसकी आशंका इस रिपोर्ट में जाहिर की गई थी।

व्हाइट हाऊस, टैन डाउनिंग अपन से ज्यादा फिक्रमंद

बुधवार रात 9.40 का वक्त। अपन डायनिंग टेबल पर बैठ चुके थे। पहली खबर आई- 'मुंबई में दो गुटों में गोलीबारी।' धीरे-धीरे परतें खुलती गई। तीन जगह गोलीबारी की खबर आई। तो अपन को पहली नजर में गैंगवार लगा। पर दस बजते-बजते हालात साफ हो गए। एटीएस चीफ हेमंत करकरे वीटी स्टेशन पर पहुंचे। अपन ने बुलेटप्रुफ जैकेट और हेलमेट लगाते देखा। रात बारह बजे करकरे को गोली लगने की खबर आई। करकरे मालेगांव जांच से सुर्खियों में थे। बयासी बैच के आईपीएस करकरे इसी साल जनवरी में लौटे। सात साल रॉ में डेपूटेशन पर आस्ट्रिया में थे। एटीएस की बात चली। तो बताते जाएं। मुस्लिम मुजाहिद्दीन एटीएस से बेहद खफा थी।

करकरे बोले- 'जांच की दाल में कुछ काला नहीं'

अपन मालेगांव जांच से जुड़ी अफवाहों से परहेज करते रहे। वरना अफवाहें तो पूरी जांच राजनीतिक साजिश की थी। जो सोनिया को घेरने के लिए रची बताई गई। यानी जांच में सोनिया का कोई हाथ नहीं। अफवाहों में पवार के साथ एक कांग्रेसी दिग्गज का भी नाम था। पर अपन को अफवाहें तवज्जो देने लायक नहीं लगी। अपने नरेन्द्र मोदी मंगलवार रात बोले- 'जब मैं मकोका जैसा गुजकोका मांगता हूं। ताकि सलीम उस्मान बशर और कयामुद्दीन पर लगा सकूं। तो मनमोहन कहते हैं- यह पाशविक कानून है। पर महाराष्ट्र में एटीएस को प्रुफ नहीं मिला। तो प्रज्ञा, पुरोहित, पांडे पर मकोका लगा दिया। दाल में जरूर कुछ काला।' वह दाल में काला क्या है? इस पर कुछ रोशनी रविशंकर प्रसाद को डालनी पड़ी। उनने कहा- 'पवार ने पांच अक्टूबर को कैसे कहा- मालेगांव विस्फोट में हिंदू आतंकवादियों का हाथ।'

अदालत में तलब तिवारी पर बढ़ा इस्तीफे का दबाव

छह एसेंबलियों के चुनाव आडवाणी के लिए महत्वपूर्ण। तो कांग्रेस के लिए भी जीवन-मरण का सवाल। आप इस चुनाव का महत्व एक बात से समझ लें। दो महीनों में वाईएस राजशेखर रेड्डी पांच बार दिल्ली आए। दक्षिण से कोई मुख्यमंत्री इतनी बार क्यों आएगा। आंध्र का सीएम पहले तो ऐसे कभी नहीं आया। किसी पब्लिक रैली को भी संबोधित नहीं किया। अपन बात आंध्र के गवर्नर की भी करेंगे। पर पहले बात मुख्यमंत्री और रैली की चली। तो नरेंद्र मोदी की बात करते जाएं। छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश से निपटकर मोदी दिल्ली में। मोदी की दहशत का हाल देखिए। पंचकुइयां रोड पर पब्लिक मीटिंग की इजाजत नहीं दी। तो मोदी 'रोड शो' में करिश्मा दिखा गए।

अब तो जनता ही तैयार करे सौ दिन का रोड मैप

बधाई तो कश्मीर की जनता को। जिसने बायकाट का बाजा बजा दिया। हुर्रियत कांफ्रेंस की तो टैं बोल गई। पहले फेज में 69 फीसदी वोट पड़े। तो अलगाववादियों ने दूसरे फेज से पहले खूब बम फोड़े। पर दूसरे फेज में भी 65 फीसदी वोट पड़ गए। अलगाववादी अब जनता की पेशानी पर लिखी इबारत पढ़ लें। बैलेट की ताकत को समझें। बायकाट, हड़ताल और हिंसा की राजनीति छोड़ दें। फर्जी वोटिंग के आरोप अबके नहीं चलने। पूरी दुनिया ने पोलिंग बूथ पर लगी लंबी-लंबी लाइनें देख ली। इंटरनेशनल ऑबजर्वरों ने भी देख लिया। आवाम ने हुर्रियत से तौबा कर ली। इसका कुछ सेहरा तो अपन क्यूम खान के पोते के सिर भी बांधेंगे।

क्या हिंदुओं में अस्तित्व की चिंता जाग रही है?

परिदृश्य-एक
ब्रिटिश हुकूमत के साथ छह साल के संघर्ष के बाद 1781 में तेरह राज्यों ने मिलकर यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका का गठन कर लिया था। इससे ठीक 75 साल बाद 1856 में ब्रिटिश हुकूमत ने बर्मा में तैनात करने के लिए भारतीय सेना में एक नई टुकड़ी का गठन करने का फैसला किया। सेना में यह अफवाह जोरों पर फैल गई कि बर्मा में तैनात किए जाने वाले सैनिक धार्मिक परंपराओं का पालन नहीं कर पाएंगे जबकि सेना में ईसाई धर्म गुरुओं को तैनात किया जाएगा। इन अफवाहों को उस समय जोर मिला, जब ब्रिटिश हुकूमत की ओर से सेना के लिए एक नई राईफल भेजने और उसके कारतूस को

Boating at Lake Saiful Muluk

[caption id="attachment_564" align="alignleft" width="300" caption="Boating scene at Lake Saiful Muluk, Pakistan"]Boating scene at Lake Saiful Muluk, Pakistan[/caption]

Under this series we'll bring you one photogr

मुद्दा विहीन चुनाव में बेबात की चख-चख

अपन भी चुनावी सर्वेक्षणों पर ज्यादा भरोसा तो नहीं करते। पर 'द वीक' ने अपनी साख बनाई। जिसके मुताबिक मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली में भगवा लहराएगा। राजस्थान में कांटे की टक्कर। बात भगवे की चली। तो बता दें- एटीएस का नई खोजबीन है- 'अभिनव भारत' के निशाने पर मुस्लिम और आरएसएस दोनों थे। मोहन भागवत, इंद्रेश की सुपारी दे दी थी। संघ ने नेशनलिस्ट मुसलमानों को जोड़ना तय किया। तो राष्ट्रीय मुस्लिम मंच बनाया। जिम्मा सौंपा गया इंद्रेश को। एटीएस पर भरोसा करें। तो साध्वी प्रज्ञा, दयानंद पांडे, रमेश उपाध्याय आरएसएस से खफा थे। 'अभिनव भारत' यानी गोडसे की विचारधारा। जो गांधी की तरह आरएसएस से भी खफा थे।

एटीएस जांच को लोकसभा चुनाव तक खींचने की सियासत

श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड ने पलटी खाकर कांग्रेस का समर्थन शुरू कर दिया है, लेकिन कांग्रेस की निगाह मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान पर ज्यादा टिकी है, जहां 65 में से 56 लोकसभा सीटें भाजपा के पास हैं।

जिन छह राज्यों के विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उनमें से दो जम्मू कश्मीर और मिजोरम अत्यंत संवेदनशील राज्य हैं, लेकिन देशवासियों की निगाह इन दोनों राज्यों पर कम, बाकी चार राज्यों पर ज्यादा टिकी है। मिजोरम में सत्ता परिवर्तन के कोई आसार नहीं दिखते, लेकिन जम्मू कश्मीर में नए गठबंधन पैदा होने के आसार दिखाई देने लगे हैं। हालांकि नेशनल कांफ्रेंस का पलड़ा भारी है, लेकिन ऐसा नहीं दिखता कि वह अपने बूते पर सरकार बना पाएगी। पिछले विधानसभा चुनाव में भी नेशनल कांफ्रेंस की सीटें सबसे ज्यादा आई थी, लेकिन कांग्रेस और पीडीपी ने मिलकर सरकार बना ली थी।

एटीएस की हरकत से कटघरे में होगा भारत

छत्तीसगढ़ की जंग खत्म। सोनिया गांधी छत्तीसगढ़ में प्रचार नहीं कर पाई। ऐसा नहीं, जो चाहती नहीं थी। चाहती थी, इसीलिए तो आखिरी दिन गई। पर नतीजतन गुरुवार को अस्पताल जाना पड़ा। सोनिया की सेहत को अपन से बेहतर कौन जानेगा। मौसम बदलते ही अस्थमा के झटके अपन ने भी बहुत साल झेले। मौसम बदले, तो बचाव भी जरूरी, परहेज भी। सो मध्यप्रदेश में चुनावी बागडोर राहुल के हाथ होगी। राहुल बाबा गुरुवार को पहुंच भी गए। ताबड़तोड़ हमले भी शुरू कर दिए। वही जो मां ने छत्तीसगढ़ में आरोप लगाया था।

चुनावी गहमा-गहमी में कुछ कड़वा हो जाए

अपन गांधी-गोडसे की बहस में नहीं पड़ते। मोटे तौर पर गोडसे का गुस्सा देश के बंटवारे पर था। फिर गांधी ने भारत से पाक को अच्छी खासी रकम दिला दी। गोडसे की अंतिम इच्छा थी- 'एक दिन फिर अखंड भारत बनेगा। तब सिंधु नदी में उसकी अस्थियां बहाई जाएं।' सो गोडसे की अस्थियां आज भी उनके परिवार के पास सुरक्षित। गोडसे को फांसी पंद्रह नवंबर 1949 को दी गई। सो इस बार भी पंद्रह नवंबर को कुछ लोग पुणे में श्रध्दांजलि देने जुटे। अस्थियों का कलश सामने रखा था। जहां गोडसे के परिजनों ने श्रध्दांजलि दी।

जब प्रज्ञा को उसके शिष्य से पिटवाया

अपन की निगाह अब मानवाधिकारवादियों पर। जो जम्मू कश्मीर में आतंकियों के पैरवीकार बने फिरते थे। प्रज्ञा ठाकुर का हल्फिया बयान रोंगटे खड़े करने वाला। मानवाधिकारों का तो एटीएस ने जो हश्र किया, सो किया। देश की धर्म संस्कृति को भी अपमानित किया। अपन हल्फिया बयान के कुछ हिस्से बताएंगे। इन हिस्सों को पढ़कर आडवाणी ने भी चुप्पी तोड़ दी। अब तक मोर्चा राजनाथ सिंह संभाले हुए थे। मंगलवार को छत्तीसगढ़ में आडवाणी बोले- 'प्रज्ञा ठाकुर को दी गई यातनाओं की ज्यूडिशियल जांच होनी चाहिए। कानून पुलिस को यातनाओं की इजाजत नहीं देता। पुलिस का यह तौर-तरीका घोर आपत्तिजनक।'

एटीएस घिरी सवालों में, तो चूले हिली कांग्रेस की

कांग्रेस सांप्रदायिकता करती चौराहे पर पकड़ी गई। जब सोमवार को कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी घिरे। तो बाटला हाउस मुठभेड और मालेगांव जांच पर जवाब देते नहीं बना। कांग्रेस के दर्जनभर  आला नेता बाटला हाउस मुठभेड़ पर सवाल उठा चुके। सवाल उठाने वालों में कपिल सिब्बल, दिग्गी राजा प्रमुख थे। कांग्रेस के अल्पसंख्यक मोर्चे ने तो बाकायदा सवाल उठाया। मुठभेड़ तो सबके सामने हुई। जांबाज सिपाही मोहन चंद्र शर्मा मुठभेड़ में शहीद हुआ। पर राजनाथ सिंह ने मालेगांव की अधपकी जांच पर सवाल उठाया। तो कांग्रेस जल-भुन गई। अभिषेक बोले- 'बीजेपी एटीएस को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है।'

बहुसंख्यक विद्रोह की ओर तो नहीं?

भारत के संविधान में विभिन्न धर्मों के लिए अलग-अलग कानून और सेक्युलरिज्म परस्पर विरोधी हैं। सरकारें विभिन्न धर्मों के लिए अलग-अलग मापदंड अपनाकर सेक्युलरिज्म की भावना के अनुरूप काम नहीं कर रहीं।

परिदृश्य-एक
सत्रह सितंबर 1787 को तैयार अमेरिकी संविधान को लागू करने के लिए तेरह में से नौ राज्यों की पुष्टि होना जरूरी था, जो जून 1788 आते-आते हो गई थी, लेकिन दो बड़े राज्यों न्यूयार्क और वर्जिनिया ने पुष्टि नहीं की।

मोदी फार्मूले से बीजेपी को तीनों राज्यों में फायदा

अपने प्रभात झा ने कांग्रेसी कुनबे को नई मुसीबत में घेरा। बोले- 'कांग्रेस में शिवराज चौहान के कद का नेता नहीं।' ऐसा नहीं, जो कांग्रेस जवाब नहीं दे सकती। पर कांग्रेस में कोई दूसरे को अपने से बड़ा नहीं मानता। दिग्गी राजा बड़े होते। तो सीएम पद के निर्विवाद उम्मीदवार होते। कमलनाथ-पचौरी में झगड़ा ही न होता। सोनिया ने भले ही पचौरी को बड़ा बना दिया। पर कमलनाथ मानने को तैयार नहीं। ज्योतिरादित्य भी पचौरी को बड़ा कहने को राजी नहीं। दिग्गी राजा ने जमुनादेवी-सुभाष यादव को कभी बड़ा बनने ही नहीं दिया। अब कमलनाथ को भले ही बड़ा बताएं। पर वक्त आने पर टांग खींचते दिखाई देंगे।

टिकटों की बिक्री लोकतंत्र के लिए खतरा

चुनाव आयोग को चाहिए कि टिकटों की बिक्री के आरोपों की सीबीआई से जांच करवाए। आरोप सही पाए जाने पर राजनीतिक दल की मान्यता खत्म होनी चाहिए।

परिवारवाद न तो कांग्रेस में कोई अजूबा है और न ही अन्य राजनीतिक दलों में कोई नई बात। जिस तरह वकील का बेटा बड़ा होकर वकील बनने की सोचता है और डाक्टर का बेटा डाक्टर बनने की सोचता है उसी तरह सांसदों, विधायकों के बेटे भी अपने परिवेश में राजनीति की शिक्षा-दीक्षा हासिल करते हैं, इसलिए वे भी वैसा ही सोचते हैं। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी या उनकी मां सोनिया गांधी कतई राजनीति में नहीं होते अगर राजीव गांधी राजनीति में न होते।

राजनाथ बोले- 'सत्ता के लिए कांग्रेस फिर देश तोड़ देगी'

विश्वेंद्र सिंह टिकटों का मोलभाव करने में माहिर। पर इस बार एक नहीं चली। तो वसुंधरा पर ही टिकटें बेचने का आरोप मढ़ दिया। चलो एक जैसे हो गए। कांग्रेस मारग्रेट, मकवाना के आरोपों से जूझ रही थी। बीजेपी पर वैसा ही आरोप विश्वेंद्र ने मढ़ दिया। कांग्रेस की जान में जान आ गई। पर अपने गोपीनाथ मुंडे कह रहे थे- 'विश्वेंद्र को कितना देते। सोलह टिकटों के ठेकेदार बने बैठे थे।' यानि विश्वेंद्र का आरोप मारग्रेट जितना दमदार नहीं। कांग्रेस को तो मारग्रेट का जवाब ही नहीं सूझा।

छटपटाहट तो कांग्रेसियों में भी शुरू हो चुकी

जाफर शरीफ, जालप्पा, सिध्दारमैया को पुचकारना काम आया। मारग्रेट को फटकार ही दिया। तीनों की चुप्पी पुचकारने का सबूत। मंगल को वीरप्पा मोइली ने भले मारग्रेट के इस्तीफे की पुष्टि नहीं की। पर बुधवार को इस्तीफा मंजूर हो गया। तो वही मारग्रेट पर सबसे ज्यादा बरसे। सिर्फ अर्चना डालमिया ने मारग्रेट को दिलासा दिया। कहा- 'पार्टी छोड़कर न जाएं।' पर मोइली ने पार्टी छोड़ जाने की सलाह कुछ ऐसे दी- 'अब मारग्रेट की पार्टी में वह इज्जत नहीं रहेगी।' समझदार हो, तो इशारा काफी। वैसे भी कांग्रेस की यह पुरानी परंपरा। न चोर को मारो, न चोर की मां को। मारो चोर-चोर चिल्लाने वाले को।

मारग्रेट को फटकारने पुचकारने की रणनीति

मारग्रेट अल्वा की बिसात क्या बिछी। अपने अहमद पटेल पस्त हो गए। चार दिन बीत गए। सोनिया फैसला करने की हालत में नहीं पहुंची। वीरप्पा मोइली सुबह गरम तो शाम को नरम। न उगला जाए, न निगला। प्रवक्ताओं के मुंह में तो जुबान ही नहीं। कांग्रेस महासचिव कोई छोटा-मोटा पद नहीं। याद करो, हू-ब-हू ऐसी हालत बीजेपी में हुई थी। बात दस नवम्बर 2004 की। तो बीजेपी ने कितनी फुर्ती दिखाई थी। जैसे मारग्रेट अब दिग्गी राजा-पृथ्वीराज चव्हाण के खिलाफ भड़की। वैसे उमा भारती तब जेटली-वेंकैया-महाजन-नकवी के खिलाफ भड़की थी। मारग्रेट की तरह उमा भी पार्टी की महासचिव थी। उमा ने मीटिंग से वाकआउट किया।

कंगारूओं का किला ढहा धोनी हुए धुरंधर

नागपुर में जीत की इबारत सचिन ने पहले दिन ही लिख दी थी। जब उनने सुनील गावस्कर और ऐलन बार्डर का रिकार्ड तोड़ा। अपन ने सोमवार को कंगारूओं को हराकर जो ट्राफी जीती। वह इन दोनों महान क्रिकेटरों के ही नाम। सचिन के टेस्ट जीवन का यों तो 40वां सैकड़ा था। पर यह 40वां सैकड़ा बनाने में लंबा वक्त लगा। चालीसवां सैकड़ा  मारकर सचिन ने गावस्कर को पीछे छोड़ दिया। कंगारू बार्डर ने नब्बे आधे सैकड़े बनाए थे। सचिन 91 बना चुके। सचिन अब आस्ट्रेलिया से खेलते हुए दो सैकड़े और बना लें। तो कंगारूओं के खिलाफ सबसे ज्यादा सैकड़े बनाने वाले होंगे।

ओबामा की जीत से उत्साहित मायावती

परिदृश्य- एक

अमेरिका का गठन होने के बाद वहां के नेताओं को लगता था कि दास्ता प्रथा धीरे-धीरे अपने आप खत्म हो जाएगी, जबकि ऐसा हुआ नहीं। जार्ज वाशिंगटन ने 1786 में फैसला किया कि दास्ता प्रथा को कदम दर कदम खत्म करने के लिए कार्य योजना बनाई जानी चाहिए। उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र ने 1787 में एक अध्यादेश जारी करके दास प्रथा खत्म कर दी। इक्कीस साल बाद जब 1808 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गुलामों का व्यापार बंद किया गया, तब भी अमेरिका के कई दक्षिणी राज्यों में दास्ता प्रथा चालू थी।

मारग्रेट ने खोली कांग्रेसी टिकटें बिकने की पोल

मुसीबतें हैं कि कांग्रेस का दामन नहीं छोड़ रहीं। एक से पिंड छूटता नहीं। दूसरी सिर उठाने को तैयार। ले देकर लोकसभा में बहुमत साबित किया। करुणानिधि तमिल मुद्दे पर अपने सांसदों के इस्तीफे बटोरने लगे। मनमोहन-प्रणव दा ने किसी तरह श्रीलंका मुद्दे से पिंड छुड़ाया। तो अब महाराष्ट्र के मुद्दे पर लालू-पासवान अपने सांसदों के इस्तीफे बटोरने लगे। लालू-पासवान की रणनीति नीतीश को घेरने की थी। पर शुक्रवार को दांव उल्टा पड़ गया। जद(यू) के पांचों सांसद इस्तीफा थमा आए।

एक बार जो सत्ता का स्वाद चख ले

दल-बदल की बीमारी ऐसे लोगों में ज्यादा पाई जाती है, जो सत्ता का स्वाद एक बार चख चुके होते हैं। चुनाव के मौके पर दल-बदल की बीमारी का मौसम आ जाता है। भाजपा ने टिकटों का ऐलान करने से पहले पार्टी के लिए काम करने की शपथ दिलाने का रास्ता ईजाद किया है। यह कितना कारगर होगा?

जिन छह राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, उनमें टिकट बंटवारे का काम अब करीब-करीब खत्म हो गया है। टिकट बंटवारे के बाद पार्टियों के दफ्तरों में तोड़फोड़ और बगावतों का सिलसिला भी थमने लगा है। चुनाव लड़ने की टिकट न मिलने के बाद अपनी ही पार्टी  के खिलाफ नारे लगाने, जिन नेताओं के पांव छूकर टिक

अब खबरिया चैनलों पर बिछती राजनीतिक बिसात

चुनावी बिगुल बज गया। रैलियां शुरू हो गईं। आडवाणी-राजनाथ भले रथ पर नहीं चढ़े। पर दोनों ने विजय संकल्प रैलियां तो खूब की। राहुल बाबा ने पिछले महीने दर-दर की खाक छानी। कोई राजनीतिबाज बिना स्वार्थ मिट्टी नहीं खोदता। न कोई सिर पर तसला उठाकर मजदूरी का स्वांग रचता। मकसद होता है वोटरों को लुभाना। अपन अक्टूबर में एक खबरिया चैनल देख रहे थे। चैनल कांग्रेसी एमपी का था। सो अपन को उस खबर पर हैरानी नहीं हुई।

मनमोहन से बोले करात 'अब तेरा क्या होगा....'

अमेरिका ने नया इतिहास लिख दिया। वोटरों का उत्साह बिल्कुल वैसा था। जैसा अपन ने इमरजेंसी के बाद 1977 में भारत में देखा। तब भारत में पहली बार कांग्रेस का सूपड़ा साफ हुआ। ठीक उसी तरह 219 साल बाद अमेरिका में नया इतिहास लिखा गया। कोई सोच नहीं सकता था- व्हाइट हाऊस में ब्लैक राष्ट्रपति बैठेगा। दो साल पहले जब चुनाव मुहिम शुरू हुई। तो डेमोक्रेट के कई शुरूआती उम्मीदवारों के बाद दो टिके रह गए। हिलेरी क्लिंटन और बाराक हुसैन ओबामा। उधर रिपब्लिकन उम्मीदवार मैककेन तय हो गए। तो साफ था- 'जीते कोई भी, नया इतिहास तो बनेगा ही।'

मैककेन जीत गए,तो बूथ कैपचरिंग न कहें ओबामा

अपना चुनाव आयोग उम्मीदवारों को डंडा न दिखाता। तो कोई अपना बहीखाता न खोलता। कोई अपने कर्म-कुकर्म कतई नहीं बताता। अपनी शिक्षा-दीक्षा को भी छुपाते रहते। यों झूठ बोलने वालों की अब भी कमी नहीं। कांग्रेस के सांसद मणिकुमार सुब्बा को ही लो। तीन जगह अपना जन्मदिन अलग-अलग बताते पकड़े गए। अब सीबीआई ने कोर्ट में बताया है- 'सुब्बा भारत का सिटीजन ही नहीं।' गलत जानकारी देने में सोनिया गांधी भी पीछे नहीं। उनने खुद को ग्रेजुएट बताया। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने चुनौती दी।

अफजल हो गए कांग्रेस के 'गुरुजी'

असम बम धमाकों के तार चीन तक जा जुड़े। शिवराज पाटिल की होम मिनिस्ट्री के इस खबर ने होश उड़ा दिए। पाक-बांग्लादेश के बाद अब चीन भी आतंकवाद में शामिल। अपन को तीनों तरफ से घेरने की साजिश। चीन को न तो न्यूक्लियर डील पसंद आई। न चंद्रयान अभियान। असम बम धमाकों का आरडीएक्स चीन से आया। यह खुलासा होम मिनिस्ट्री के एक जिम्मेदार सज्जन ने किया। पर अपनी मनमोहन सरकार इस सुराग को दबाने की फिराक में। मनमोहन सरकार का सारा जोर हिंदू नेताओं को घेरने-फंसाने का।

बिखराव के मुहाने पर देश

 

देश को बिखरता देख अमेरिका ने अपना संविधान बदल लिया था। असंतुलित विकास ने समाज में बिखराव पैदा कर दिया है। वोट बैंक की राजनीति ने वैमनस्य बढ़ा दिया है। क्या हमें भी संविधान बदलने की जरूरत है।

 

परिदृश्य- एक

 

1775 तक ब्रिटेन की सीमाएं मौजूदा अमेरिका तक फैली थी। यह वह साल था, जब तेरह राज्यों ने ब्रिटेन से आजादी का बिगुल फूंक दिया। जंग अभी चल ही रही थी कि इन तेरह राज्यों ने चार जुलाई 1776 को पैनसेलवानिया राज्य के फिलाडेलफिया नगर में आजादी का ऐलान कर दिया और सभी ने मिलकर एक नया संविधान बनाना शुरू कर दिया।

कैबिनेट में आतंकवाद नही, छठ की 'राज' नीति हावी

यूपीए सरकार 'हिंदू आतंकवाद' में फंस गई। अब 'अभिनव भारत' को आतंकवादी साबित करने की तैयारी। अपन अभिनव भारत का इतिहास बताते जाएं। वीर सावरकर ने 1893 में बनाया था 'अभिनव भारत'। 'अभिनव भारत' की आजादी के आंदोलन में अहम भूमिका रही। जैसे आजादी के आंदोलन में कांग्रेस की। महात्मा गांधी चाहकर भी कांग्रेस भंग नहीं कर सके। पर वीर सावरकर ने 1952 में 'अभिनव भारत' भंग कर दी थी। मौजूदा यूपीए राज में आतंकवादियों का तुष्टिकरण शुरू हुआ। आतंकवाद की वारदातें बढ़ने लगी। तो 'अभिनव भारत' को दुबारा खड़ा किया गया 2006 में।<-- more --> वीर सावरकर के भाई बालाराव की पुत्रवधू हिमानी सावरकर ने बीडा उठाया। बताते जाएं- हिमानी ना