October 2008

प्रज्ञा ठाकुर को कौन बनाएगा मुद्दा

प्रज्ञा को मोहरा बनाकर कांग्रेस पूरे देश में हिंदुओं को आतंकवादी बता रही है, लेकिन मध्यप्रदेश में खुद बचाव की मुद्रा में। कांग्रेस को डर है कहीं यह मुद्दा उल्टा ही न पड़ जाए।

कांग्रेस के लिए सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने वाली बात हुई। प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी सात के अंक को अपने लिए शुभ मानते हैं, इसलिए वह समझ रहे थे कि पच्चीस नवंबर उनके लिए शुभ होगा।

बांग्लादेशी हों, या उल्फा जिम्मेदार तो कांग्रेस ही

राजनाथ सिंह की दलील तो दमदार। दलील सुनकर कांग्रेसियों की भी हवा खिसक गई। पुलिस जैसा दावा प्रज्ञा सिंह ठाकुर के बारे में कर रही। आरुषि हत्या कांड में राजेश तलवार के खिलाफ भी ऐसी ताल ठोकती थी। डाक्टर राजेश तलवार का भी पचास दिन मीडिया ट्रायल हुआ। पुलिस-सीबीआई ने राजेश तलवार के खिलाफ कितनी दलीलें घड़ीं। पर सबूत नहीं जुटा पाई। थ्योरियों से केस नहीं जीते जाते। आखिर सीबीआई की तो कोर्ट में हवा निकली ही। मीडिया की भी हवा निकली।

आतंकवाद नहीं, सिर्फ मुद्दे से निजात की कोशिश

साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी पर कई सवाल। क्या सचमुच हिंदुओं के सब्र का प्याला भर चुका। क्या रिटायर्ड फौजी भी आतंकवाद के तुष्टिकरण की नीति से खफा। पर इन दो सवालों से पहले एक मूल सवाल। सवाल पुलिस एफआईआर की विश्वसनीयता का। अदालत में आधे केस ठहरते ही नहीं। इमरजेंसी में इसी पुलिस ने कितने मनघढ़ंत केस बनाए। संघ के अधिकारियों पर भैंस चोरी तक के केस बने। बर्तन चोरी तक के केस बनाए गए। अपने पास ऐसे एक-आध नहीं। दर्जनों केसों के सबूत मौजूद।

सिर्फ तकनीकी आधार पर खड़ी सरकार

सरकार शीत सत्र के समय मानसून सत्र को घसीट रही है।  वह 21 जुलाई से शुरू हुए सत्र को लंबा खींच रही है ताकि अविश्वास प्रस्ताव न आए। सत्र जितना लंबा होगा सरकार की उम्र भी उतनी ही लंबी होगी।

इमरजेंसी में इंदिरा गांधी ने संसद का मनमाने ढंग से इस्तेमाल किया था। उन्होंने लोकसभा की अवधि पांच साल से बढ़ाकर छह साल कर दी थी। संसद का उसी तरह मनमाने ढंग से दुरुपयोग अब फिर शुरू हो गया है। लोकसभा में बहुमत का बेजा फायदा उठाने से लोकतंत्र का कितना नुकसान होता है, शायद कांग्रेस को इसका आभास नहीं है।

तो दादा वाकआउट कर गए लोकसभा से

अपन ने कल दादा के इस्तीफे का शक जाहिर किया। शुक्रवार बीतते-बीतते अपना शक और बढ़ने लगा। दादा ने तब इस्तीफा नहीं दिया। जब दादा की पार्टी सीपीएम ने मांगा। अब सब कुछ गंवाकर इस्तीफे के मूड में। शुक्रवार को बोले- 'मैं इस्तीफा देने को तैयार हूं।' एनडीए ने चार साल दादा पर सौतेले व्यवहार का आरोप लगाया। लेफ्ट तो अपने सांसद के बचाव में हमेशा आगे रहा। अब उसी लेफ्ट से दादा की तू-तू, मैं-मैं की नौबत। शुक्रवार का किस्सा बहुत मजेदार रहा। सुनाएंगे।

अब हम गाली खा ही रहे हैं, तो सबकी खाएंगे

अपन ने कल जानबूझ कर स्पीकर पर नहीं लिखा। दादा का गुस्सा सातवें आसमान पर। कहीं अपन पर ही न फूट पड़ें। आखिर दो साल पहले सुभाष कश्यप पर फूटा ही था। जरा वह किस्सा याद दिला दें। दादा और ममता की सदन में खटपट हुई। सुभाष कश्यप ने एक चैनल पर सिर्फ इतना कहा था- 'दादा अपने जीवन में एक बार ही हारे। वह भी ममता बनर्जी से। सो वह टीस तो रहेगी ही।' दादा इस पर भड़क गए। सुभाष कश्यप लोकसभा के महासचिव थे। सो अपनी क्या बिसात।

चंदा मामा नजदीक के

संसद तो गिरती-लुढ़कती ही दिखी। लोकसभा की तो अब चली-चली की वेला। अपन ने 21 अक्टूबर को ही लिखा था- 'अपन को आशंका मानसून सत्र के ही आखिरी होने की।' वह लक्षण अब साफ दिखने लगे। अपन ने लोकसभा चैनल पर सोमनाथ चटर्जी का इंटरव्यू देखा। तो अपना माथा और ठनका। अब तक किसी स्पीकर ने ऐसे इंटरव्यू नहीं दिया। उनने अपने कार्यकाल के फैसलों की सफाईयां दी। सीपीएम से नाता टूटने पर भी अपना पक्ष रखा। पर बुधवार को संसद के अलावा भी दो बड़ी घटनाएं हुई।

लालूगर्दी से मराठी नहीं, कन्नड़, उड़िया भी खफा

होने को राज ठाकरे से अपन भी खफा। पर दिखने वाली काली चीज तवा नहीं होती। ना हर पीली चीज सोना। इतवार को अपन ने भी चैनलों पर देखा। राज ठाकरे की सेना ने रेलवे भर्ती का एक्जाम सेंटर वैसे ही उजाड़ा। जैसे रामलीला में हनुमान श्रीलंका की अशोक वाटिका उजाड़ता है। बात श्रीलंका की चली। तो बताते जाएं- अबके श्रीलंका यूपीए सरकार को उजाड़ने को तैयार।

मानसून सत्र चलेगा भी नहीं, सत्रावसान भी नहीं होगा

मून मिशन की उलटी गिनती शुरू। मानसून सत्र की नहीं। मानसून कब का आकर चला गया। मानसून सत्र निपटने का नाम नहीं ले रहा। पहले बात मून मिशन की। सेहरा भले ही मनमोहन अपने सिर पर बांध लें। पर मून मिशन वाजपेयी की देन। वाजपेयी ने 2003 में हरी झंडी दी। मनमोहन सरकार ने तो ना-ना करते फंड दिया। महंगा सौदा बताती रही। बात कश्मीर में ट्रेन की हो। मून मिशन की। देश को एटमी ताकत बनाने की। स्वर्णिम चतुर्भुज की। नदियों को जोड़ने की। ग्रामीण सड़क योजना की। घर बनाने के सस्ते लोन की। वाजपेयी का ट्रेक रिकार्ड मनमोहन से लाख दर्जे बेहतर।

राज करेंगे बांग्लादेशी

2001 में असम के राज्यपाल एसके सिन्हा ने चेतावनी दी थी कि घुसपैठियों को बाहर नहीं निकाला गया तो सिविल वार की स्थिति पैदा हो जाएगी। 2005 में राज्यपाल अजय सिंह ने कहा था कि असम में हर रोज छह हजार बांग्लादेशी घुसपैठ करते हैं।

अक्टूबर के पहले हफ्ते में असम के उदलगुरी और दारांग जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठियों और बोडो आदिवासियों में हुए खूनी संघर्ष में डेढ़ दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए। यह तो अभी शुरूआतभर है, आने वाले समय में असम हिंदू-मुस्लिम दंगों का मुख्य केंद्र बनने जा रहा है। कांग्रेस 1971 के बाद से बांग्लादेशियों की घुसपैठ को बढ़ावा देती रही है, जिसके नतीजे निकलने शुरू हो गए हैं।