October 2008

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सोमवार से शुरू होंगे सब के अपने-अपने एजेंडे

तो पहले दिन लोकसभा श्रध्दांजलि देकर उठ गई। राज्यसभा में  पीएम की वादा खिलाफी पर हल्ला हुआ। कंधमाल और मंगलूर की सांप्रदायिकता भी उठी। हल्ले-गुल्ले में ही राज्यसभा भी उठ गई। सोमवार तक राम-राम। पहले दिन लोकसभा शोकसभा बन गई। पर सोमवार को मेजें थपथपाई जाएंगी। दोनों सदनों की शुरूआत सचिन तेंदुलकर को बधाई से होगी। खेलों के मामले में प्रभाष जोशी रुपइया। तो अपन धेला भी नहीं। पर गावस्कर के बाद अब सचिन ने देश का नाम ऊंचा किया। सो अपनी भी बधाई।

सोनिया का आशीर्वाद फिर जोगी को

विरोधियों को पछाड़ने के बाद खुद की रमण सिंह के मुकाबले चुनाव लड़ने की तैयारी। पत्नी और बेटे को भी टिकट दिलाने में जुटे। पहली ही नजर में कांग्रेस का पलड़ा भारी।

पूर्वोत्तर के मिजोरम और देश की राजधानी दिल्ली समेत पांच  हिन्दी भाषी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव की घोषणा हो चुकी है। इनमें से सबसे पहले छत्तीसगढ़ विधानसभा का चुनाव होगा। छत्तीसगढ़ का गठन पहली नवंबर 2000 को एनडीए शासनकाल के समय हुआ, हालांकि छत्तीसगढ़ अलग राज्य के लिए संघर्ष दो दशकों से चल रहा था। कांग्रेस ने हमेशा अलग छत्तीसगढ़ राज्य का विरोध किया, लेकिन जब राज्य का गठन हुआ, तो पहली सरकार उसी की बनी।

सोनिया सीएम को बचाए या मंत्री के बलात्कारी बेटे को

गोवा सरकार पर सवा साल में तीसरी बार संकट। वैसे गोवा 1963 में आजाद हुआ। पैंतालीस साल में पच्चीस सरकारें बदल चुकी। छोटे राज्यों में विधायकों की ब्लैकमेलिंग का पुख्ता सबूत है गोवा। यों गोवा में सिर्फ एनडीए राज में शांति रही। जब बीजेपी के मनोहर पारिक सीएम थे। कांग्रेस ने आते ही खेल शुरू किया। एस सी जमीर को तख्ता पलटने के लिए गवर्नर बनाकर भेजा। मारग्रेट अल्वा और दासमुंशी भी हफ्ताभर गोवा में बैठे। दलबदल से बनाई सरकार ढाई साल चलाई। पर वहां कब कौन एमएलए ब्लैकमेलिंग पर उतर आएं। कौन इस्तीफा देकर अपने ही दल की सरकार को अल्पमत में ले आए। कोई नहीं कह सकता।

मंत्री बोले- नहीं पता यह लोकसभा कब भंग होगी

संसद का मानसून सेशन कल से। यों पहले दिन चलना नहीं। लोकसभा के श्रीकांथपा और किशन लाल दलेर नहीं रहे। दोनों को श्रध्दांजलि देकर उठ जाएगा। अपन को शुक्रवार से सत्र शुरू करने की बात पल्ले नहीं पड़ी। यूपीए ने यह नई रिवायत कायम की। किसी ज्योतिषी ने कहा होगा। वरना तो हमेशा सोमवार से शुरू होता था। यों कहने को कांग्रेस सेक्युलर। पर ज्योतिषियों के चक्कर में खूब। लेफ्टियों ने पता नहीं कैसे चार साल झेला।

पत्थर पर लकीर नहीं कश्मीर में चुनाव टालना

पांच राज्यों के चुनावों का बिगुल बज गया। महीनेभर से हो रहा था इंतजार। जिससे बात करो। यही पूछता था- 'कब होगा ऐलान।' यों 45 दिन की आचार संहिता पर आम सहमति। वैसे कोई हार्ड एंड फास्ट रूल नहीं। चार-पांच राज्यों में इकट्ठे चुनाव होंगे। तो किसी में चालीस और किसी में पचास-पचपन दिन भी होगी। इस बार छत्तीसगढ़ में सिर्फ 30-36 दिन की आचार संहिता। मध्यप्रदेश में 40 दिन की। दिल्ली में 44 दिन की। तो राजस्थान में 50 दिन की। सो चुनाव वक्त पर ही घोषित हुए।

घिर गईं सोनिया, चले थे येदुरप्पा-नवीन को घेरने

अपन ने ऐसी सरकारी मीटिंग कभी नहीं सुनी- देखी। जैसे सोमवार को राष्ट्रीय एकता परिषद की हुई। मुख्यमंत्री लिखकर स्पीच लाए थे। उनके एक हाथ में माइक थमा दिया। दूसरे में अपनी कापी लेकर खड़े थे। क्या जरूरत थी, संसद की लाइब्रेरी में मीटिंग की। विज्ञान भवन किसलिए बनाया था। येदुरप्पा बोले- 'मीटिंग हड़बड़ी में हुई दिखी। न प्लानिंग, न एजेंडा।' यों भी एक दिन की मीटिंग में 164 मेंबर कैसे बोलते। साजिश तो खूब रची।

मुसलमान आतंकवाद के खिलाफ खड़े हों

पाकिस्तान में पढ़े-लिखे मुसलमान आतंकवाद के खिलाफ खड़े हो गए हैं। जबकि भारतीय बुध्दिजीवी मुसलमान उल्टे मुठभेड़ों पर सवाल उठा रहे हैं और मीडिया पर हमलावर हो गए हैं।

पाकिस्तान में मुसलमानों का पढ़ा-लिखा तबका अब आतंकवाद को लेकर गंभीर हो गया है। वहां के राजनीतिक दल भी पहले से ज्यादा गंभीर हो गए हैं, क्योंकि उन्हें देश का अस्तित्व खतरे में लगने लगा है। भारत तीस साल से आतंकवाद का सामना कर रहा है, लेकिन यहां के राजनीतिक दलों ने अभी राजनीतिक चश्मा उतारने की जहमत नहीं उठाई है। पिछले दिनों पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने यह कबूल किया है कि आतंकवाद को गंभीरता से नहीं लिया गया तो उनके देश की हालत भी अफगानिस्तान जैसी हो जाएगी।

कश्मीर में चुनाव टलवाने की कुटिल चालें, पर....

शुक्रवार को दिनभर कश्मीर का हल्ला मचा। चुनाव आयोग में मधुकर गुप्ता को बुलाकर सुरक्षा बंदोबस्त का जायजा लिया। तो चुनावों के ऐलान का इंतजार होने लगा। होम सेक्रेट्री मधुकर कुछ दिन पहले भी बुलाए गए थे। तब उनने चुनाव टालने की पैरवी की थी। बहाना बनाया था कश्मीर के हालात का। तब सीईसी गोपालस्वामी ने पूछा- 'आप बताओ 2002 में कैसे हालात थे। तब भी तो चुनाव हुए थे।' होम सेक्रेट्री की सीटी-पीटी गुल। बताते जाएं- 2002 में जब वाजपेयी ने एसेंबली चुनाव करवाए। तो खुद गोपालस्वामी होम सेक्रेट्री थे।

एंटी इनकंबेंसी तो दोनों दलों के खिलाफ

2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इतना जोरदार झटका लगा था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने दस साल तक कोई पद नहीं लेने का एलान कर दिया था। यह अलग बात है कि सोनिया गांधी ने जब उन्हें महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी तो वह ठुकरा नहीं सके। कांग्रेस आलाकमान ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उन्हें जिम्मेदारी दी तो वह भी उन्होंने मध्यप्रदेश की तरह बाखूबी निभाई। कांग्रेस आलाकमान ने शायद अभी तक 2003 की हार का सलीके से विश्लेषण नहीं किया।

ऐसा नहीं जो समझ नहीं आती होगी बुश की भाषा

मनीष तिवारी पता नहीं सो रहे थे या जाग रहे थे। पर अपन ने सीएनएन पर बुश को दस्तखत करते लाईव देखा। यों अपन आधी रात से दिन नहीं बदलते। हिंदू संस्कृति में दिन की शुरूआत सूरज की पहली किरण से ही। पर सेक्युलर दिन की शुरूआत रात के अंधेरे में बारह बजे से ही। पर बारह भी बजे नहीं थे। जब बुश ने दस्तखत किए। दशहरे का दिन शुरू नहीं हुआ था। पर मनीष तिवारी को जुमला कसना था। सो उनने जुमला कसा- 'बुश के दस्तखत करते ही बुराई पर अच्छाई की जीत हुई।'