September 2008

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'पोटा' लाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही कांग्रेस

सिरीफोर्ट की सैर करते अरुण जेटली से बात हुई। जेटली पोटा के सबसे बड़े पैरवीकार। जेटली की पैरवी पर ही आडवाणी ने सौ दिन में पोटा का वादा किया। जेटली ने माना- 'पोटा से आतंकवाद नहीं रुकेगा। पर पोटा से छानबीन में तेजी आएगी। जिससे कानूनी प्रक्रिया में तेजी आएगी।' गुरुवार को बुध्दिजीवी सख्त कानून की पैरवी में सामने आए। पोटा की पैरवी सोली सोराबजी, जी. पार्थसारथी ने भी की। अजीत डावोल, जनरल साहनी, चीफ मार्शल त्यागी और एमजे अकबर ने भी की। पर सबसे ज्यादा पोटा की पैरवी नरेंद्र मोदी ने की।

'पाटिल' नहीं, देश को चाहिए 'पोटा'-'पटेल'

कोई मां नहीं चाहती, उसका बेटा आतंकवादी बने। बेटा हत्यारा हो जाए। तो कोई मां जल्दी से भरोसा नहीं करती। सो अब्दुस सुभान कुरैशी उर्फ तौकीर की मां जुबैदा भी कैसे भरोसा करे। अपन ने सोलह सितंबर को तौकीर का जिक्र किया। विप्रो में कम्प्यूटर इंजीनियर था। इस्तीफा देकर अचानक गायब हो गया। इस्तीफे की वजह लिखी- 'धार्मिक स्टडी करना चाहता हूं।'

दिया जब रंज आतंकियों ने, तो पोटा याद आया

मनमोहन पच्चीस को बुश के साथ एटमी करार करेंगे। अगले ही दिन संयुक्त राष्ट्र के कटघरे में। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने 28 सितम्बर 2001 को दुनियाभर से कहा- 'आतंकवाद से निपटने के लिए सख्त कानून बनाए जाएं।' वाजपेयी ने जरा देर नहीं की। पच्चीस अक्टूबर को अब्दुल कलाम से आर्डिनेंस जारी करवा दिया। वही पोटा हटाकर  मनमोहन किस मुंह से आतंकवाद के खिलाफ बोलेंगे। अपने अभिषेक मनु सिंघवी अभी भी कहते हैं- 'पोटा की कोई जरूरत नहीं। मौजूदा कानून ही काफी।' पर बताएं तो सही- कौन सा कानून।

पाटिल का पटिया उलाल करेंगे लालू

अपने अभिषेक मनु सिंघवी को बधाई। मनमोहन सिंह की जिम्मेदारी अब उनके कंधे पर। सोमवार को शिवराज पाटिल पर इस्तीफे का दबाव बना। तो सिंघवी बोले- 'पाटिल से किसी ने इस्तीफा नहीं मांगा। वह होम मिनिस्टर बने रहेंगे।' अपन पाटिल से तो लाल बहादुर शास्त्री बनने की उम्मीद रखते ही नहीं। पर अपन समझते थे- पाटिल का फैसला मनमोहन सिंह के हाथ। पर अब वह सिंघवी तय करेंगे। तो मनमोहन सिंह का क्या काम। पीएम की हैसियत क्या हो गई।

सौ दिन में आतंकवाद विरोधी 'पोटा' का वादा

यूपीए सरकार आतंकवादियों के प्रति शुरू से नरम रही। अलबता आतंकवादियों से नरमी यूपीए का चुनावी वादा था। यूपीए और कांग्रेस की तारीफ करनी चाहिए। उनने चुनावों में किया वादा निभाया। सत्ता में आते ही आतंकवादियों को राहत दी। पहला कदम उठाया पोटा हटाने का। दूसरा कदम उठाया आतंकवादी की फांसी रुकवाने का। चुनावी वादा निभाने के लिए कांग्रेस की तारीफ करनी चाहिए। अपन तो आतंकवाद के प्रति बेवजह ही इतने गंभीर। एक दर्जन वारदातें ही तो हुई। एक हजार से ज्यादा लोग तो नहीं मरे होंगे।

मोदी बेंगलूर में गरजे बम दिल्ली में फटे

दिल्ली में फिर बम फट गए। जयपुर के बाद अहमदाबाद-सूरत। अब दिल्ली की बारी। कांग्रेस आतंकवाद का खतरा नहीं समझ रही। समझती हो तो आंखें बंद न करती। मनमोहन के साढ़े चार साल में वाजपेयी के छह साल से ज्यादा बम फट चुके। ज्यादा गंभीर आतंकी वारदातें हो चुकी। ज्यादा लोग मर चुके। अलबता कई गुणा लोग मर चुके। पर मनमोहन-सोनिया को पोटा हटाने का जरा मलाल नहीं। पोटा पर मलाल की बात छोड़िए। अपने नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ कानून बनाया।

भाजपा में मुद्दों पर भटकाव

एटमी करार को लेकर भाजपा गंभीर दुविधा में फंसी है। नए खुलासों ने तेवर कड़े करने पर मजबूर तो किया, लेकिन चुनावी मुद्दे में शामिल नहीं हुआ करार विरोध। भाजपा फिलहाल देखो और इंतजार करो के मूड में।

अमेरिकी कांग्रेस से भारतीय एटमी करार को मंजूरी मिलने से ठीक पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उस गंभीर मुश्किल में फंस गए हैं, जो एक दिन आनी ही थी। मनमोहन सिंह तो इस वास्तविकता को जानते ही थे कि एटमी करार के बाद परमाणु विस्फोट नहीं कर सकेगा। वह इस बात को भी अच्छी तरह जानते थे कि अमेरिकी परमाणु ऊर्जा ईंधन कानून के मुताबिक भारत को बिना एनपीटी पर दस्तखत किए ईंधन सप्लाई की गारंटी नहीं मिल सकती।

इस बार फच्चर नहीं अटल ने भेजा आशीर्वाद

आडवाणी-जोशी का डेरा कुमारकुप्पा गेस्ट हाउस में लगा। बीजेपी के सीएम अशोका होटल में जमें। वर्किंग कमेटी के सारे मेंबर चांसलरी होटल में। सारे संगठन मंत्री रामनाश्री होटल में। मीडिया वाले होटल वुडलैंड में। इस तरह जमावडा हुआ बेंगलुरु में बीजेपी का। मजेदार बात बताएं। कन्नड भाषियों में मारवाडियों के दबदबे की। वर्किंग कमेटी का सारा बंदोबस्त अपने राजस्थानी लहर सिंह ने संभाला।

बुश ने क्या कहा,अब तो सुनो मनमोहन भाई

मनमोहन सिंह अब चीन नहीं जाएंगे। गुरुवार को जार्ज बुश का फोन आ गया। अब उसके बाद चीन जाने का क्या मतलब। गांव से कोई बंदा मुंबई जाकर अमिताभ बच्चन से हाथ मिला ले। तो कई दिन हाथ नहीं धोता। सो बुश के फोन के बाद चीन की क्या हैसियत। मनमोहन अब बाईस सितंबर को सीधे न्यूयार्क जाएंगे। चौबीस को वाशिंगटन पहुंचेंगे। पच्चीस को बुश से मुलाकात होगी।

भाषा बनी वोट बैंक की सियासत

भाषा का आंदोलन तो पंजाब और तमिलनाडु में भी चला था, लेकिन उन आंदोलनों का लक्ष्य संस्कृति और परंपराओं की हिफाजत थी। जबकि राज ठाकरे का मराठी प्रेम अपने भाई उध्दव ठाकरे पर भारी पड़ने के लिए वोट बैंक की सियासत का हिस्सा है।

बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने इस हफ्ते अमिताभ बच्चन परिवार को फिर निशाना बनाया। इस बार निशाने पर अमिताभ बच्चन की पत्नी जया बच्चन थी। जया बच्चन मुलत: हिंदी भाषी या उत्तर भारतीय नहीं हैं। भले ही जया बच्चन के पिता तरुण भादुड़ी भोपाल में रहते थे, लेकिन वह थे मुलत: बंगाली। भोपाल में वह स्टेट्समैन के पत्रकार थे, बंगाली होने के बावजूद मध्यप्रदेश में इतना रच-बस गए कि अर्जुन सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में उन्हें पर्यटन विभाग में जिम्मेदार पद सौंप दिया था।