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September 2008

दक्षिण से सीख आएं ऐसे हादसों से बचने के गुर

अपने यहां आस्था का कोई अंत नहीं। हुजूम का हुजूम उमड़ पड़ेगा। फिर चाहे भगदड़ में जान ही चली जाए। अपन नैना देवी से चामुंडा देवी तक की भगदड क़ा जिक्र करेंगे। पर पहले अमावस्या के स्नान की बात। अपन सोमवार तड़के नैनीताल से चले। तो ढाई घंटे में मुरादाबाद पहुंच गए। इस स्पीड पर तो अपन छह घंटे में दिल्ली पहुंच जाते। पर पहले मनमोहन सरकार के टूटे-फूटे नेशनल हाइवे का फच्चर। फिर अमावस्या पर पितृ विसर्जन।

आठ महीने सीक्रेट रही चिट्ठी प्रस्ताव में नत्थी

कृपया गौर करिए। मनमोहन सिंह के खुश होने पर न जाईए। अमेरिकी कांग्रेस ने किस शर्त पर वन-टू-थ्री को मंजूरी दी। खुशी के मारे उसे अनदेखा न करें। मनमोहन अपनी जिद में सब शर्तें मानने को राजी। पर क्या आप लोग उन शर्तों को नहीं देखेंगे? क्या उन शर्तों पर गौर नहीं करेंगे? क्या देश का भला-बुरा सब मनमोहन पर छोड़ देंगे? अपन ने मनमोहन को देश का भाग्यविधाता नहीं चुना।

देश के साथ विश्वासघात

एटमी करार से देश का परमाणु शक्तिसंपन्न होने और सुरक्षा परिषद सीट का दावा हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो गया। मनमोहन सिंह एटमी ऊर्जा के लिए देश की सुरक्षा को गिरवी रखने के साथ-साथ आतंकवाद के लिए देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए भी याद किए जाएंगे।

एटमी करार के कारण भारत-अमेरिका के रिश्तों में व्यापक बदलाव आ रहा है। पाकिस्तान में भी निजाम बदलने से अमेरिका के साथ उसके रिश्तों में बदलाव आ रहा है। परवेज मुशर्रफ के परिदृश्य से हटने को अलकायदा अपनी जीत मान रहा है।

कांग्रेस उलझी टिकटों की बंदरबांट में

कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य और सुरेश पचौरी अपने-अपने समर्थकों को ज्यादा से ज्यादा टिकटें दिलवाने में मशगूल। अर्जुन सिंह टिकटों की बंदरबांट से दूर रहकर तमाशा देख रहे हैं, वह अपना खेल आखिर में शुरू करेंगे। मध्यप्रदेश में भाजपा को हराना खाला जी का घर नहीं। पिछले चार विधानसभा चुनावों में भाजपा हमेशा 39 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करती रही है जबकि कांग्रेस 1990 और 2003 में 31-32 फीसदी वोटों तक लुढ़क चुकी है।

मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा में हमेशा कांटे की टक्कर रही है। लगातार कई साल तक दोनों पार्टियों में करीब दो फीसदी का वोट अंतर रहता था। जिसके वोट दो फीसदी ज्यादा हो जाते थे, वह सरकार बना लेता था।

मोदी का बरी होना नहीं पचा बनर्जी को

सांसद खरीद फरोख्त की कहानी में नया मोड़ आ गया। जिस कार ड्राइवर का जिक्र अपन ने यहीं पर किया था। उस ड्राइवर हशमत की गुरुवार को पेशी थी। हशमत ने पहले खुद हल्फिया बयान दिया था। बकौल अमर सिंह- 'ड्राईवर मेरे घर पहुंचा। उसने बयान बदलने के लिए पांच करोड़ मांगे। पहले मैंने शिवराज पाटिल को फोन पर कहा- पुलिस भेजो। पर वह बोले- कांग्रेस इसमें उलझना नहीं चाहती। फिर मैंने खुद पुलिस को बुलाया।' हशमत को ले जाते मीडिया ने खुद देखा। वह चिल्ला रहा था- 'मेरा अपहरण किया गया।'

आतंकियों की हिमायत में मुशर्रफ जैसी दलील

कांग्रेस में जंगलराज की हालत। सोनिया की रहनुमाई में पार्टी की ऐसी दुर्दशा होगी। अपन ने कभी सोचा नहीं था। एक नेता कुछ कहता है, तो दूसरा कुछ और। मनमोहन सिंह की करनी-कथनी को ही देख लीजिए। एक पल कुछ और तो दूसरे पल कुछ और। उस दिन राष्ट्रपति भवन में गवर्नर कांफ्रेंस थी। तो मनमोहन खुफिया ढांचे के तहस-नहस होने पर गरजे। आतंकवाद के खिलाफ सख्त कानून की वकालत की। मनमोहन से इशारा पाकर कई छुटभैय्ये भी बोले।

सोनिया को लेकर पाटिल पहुंचेंगे मेंगलूर

कर्नाटक में राजनीतिक घमासान शुरू हो गया। कांग्रेस मौके का फायदा उठाने की फिराक में। तो येदुरप्पा भी हर ईंट का जवाब पत्थर में देने को तैयार। अपने पाटिल ने पहले दो हिदायतें भिजवाई। फिर कुमावत की रहनुमाई वाली टीम। टीम मंगलवार को बेंगलुरु-मेंगलूर घूम ली। नौकरशाही की क्या मजाल। जो येदुरप्पा के लॉ एंड आर्डर को दुरुस्त बता दे। जहां तक बात कानून व्यवस्था की। तो येदुरप्पा ने ताल ठोककर कहा- 'कर्नाटक का लॉ एंड आर्डर दिल्ली से बेहतर। कांग्रेस हालात सुधारने में मदद के बजाए आग में घी डालना छोड़े।'

येदुरप्पा में है दूसरा मोदी बनने का मादा

अपने नरेंद्र मोदी ने शिवराज पाटिल का जमकर बाजा बजाया। बोले- 'पाटिल का सूचना से ज्यादा भोज पर जोर।' टाइम पर भोजन करना बुरी बात नहीं। पर जब बम फूट रहे हों। लोग तड़प-तड़प कर मर रहे हों। तो होम मिनिस्टर के मुंह से निवाला निकलता कैसे होगा। मोदी बोले- 'मैं जब आतंकियों से मिले सुराग बता रहा था, पाटिल बार-बार घड़ी देख रहे थे। मुझसे बोले- जानकारियां तो आती रहेंगीं, मेरे लंच का टाईम हो चुका।' लगते हाथों अपन पाटिल के कपड़े बदलने की पुरानी बात बताते जाएं।

धर्मांतरण के अधिकार से उपजा टकराव

कर्नाटक, केरल, मध्यप्रदेश में चर्च के खिलाफ आक्रोश हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ आई नई किताब 'सत्यदर्शनी' के कारण फैला। धर्म प्रचार के अधिकार का इस्तेमाल दूसरे धर्म के खिलाफ विषवमन के लिए नहीं होना चाहिए।

उड़ीसा में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या के बाद उग्र हिंदू संगठनों ने ईसाईयों के खिलाफ जगह-जगह पर हिंसक वारदातें की। हिंसा में जानमाल की भारी हानि हुई। उड़ीसा की आग अभी ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि कर्नाटक में हिंसक वारदातें शुरू हो गईं। कर्नाटक के बाद केरल और मध्यप्रदेश में भी हिंदुओं का गुस्सा ईसाईयों के खिलाफ फूट पड़ा।

दो आतंकी भाग गए तो पाटिल का क्या कसूर

अपने मीडिया में भी तिस्ता सीतलवाड़ों, पीयूडीआर, पीयूसीएल जैसों की कमी नहीं। कहीं मुठभेड़ हुई नहीं। लगेंगे फर्जी बताने। इस बार तो इलाके की मुस्लिम जनता को भी भड़काया। ठीक उसी तरह, जैसे 1999 में विमान अपहरण के समय भड़काया था। शुक्रवार को दिल्ली के जामिया इलाके में आतंकियों से मुठभेड़ हुई। मुठभेड़ खत्म भी नहीं हुई थी। सबसे तेज चैनल के मानवाधिकारी खबरची ने कांग्रेस  ब्रीफिंग में पूछा- 'मुठभेड़ को फर्जी बताया जा रहा है। कांग्रेस का क्या कहना है?'

यूपीए सियासत की देन है इंडियन मुजाहिद्दीन

कांग्रेस को आतंकवाद पर अपनी गलत नीतियों का अहसास हो चुका है, लेकिन चुनावों से ठीक पहले नीतियों में यू टर्न से भाजपा को फायदा पहुंचने के डर से ठिठकी हुई है। देश की सियासत वोट बैंक का शिकार हो गई है।

यूपीए सरकार और खासकर उसकी सबसे बड़ी घटक कांग्रेस संकट से जूझ रही है। कांग्रेस ने अंदाज भी नहीं लगाया था कि उसकी तुष्टिकरण की नीति उसके गले की हड्डी बन जाएगी। पिछले चार साल तक वामपंथी दल यूपीए सरकार की अल्पसंख्यक तुष्टिकरण और आतंकवादी तुष्टिकरण नीति के भागीदार थे।

'पोटा' लाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही कांग्रेस

सिरीफोर्ट की सैर करते अरुण जेटली से बात हुई। जेटली पोटा के सबसे बड़े पैरवीकार। जेटली की पैरवी पर ही आडवाणी ने सौ दिन में पोटा का वादा किया। जेटली ने माना- 'पोटा से आतंकवाद नहीं रुकेगा। पर पोटा से छानबीन में तेजी आएगी। जिससे कानूनी प्रक्रिया में तेजी आएगी।' गुरुवार को बुध्दिजीवी सख्त कानून की पैरवी में सामने आए। पोटा की पैरवी सोली सोराबजी, जी. पार्थसारथी ने भी की। अजीत डावोल, जनरल साहनी, चीफ मार्शल त्यागी और एमजे अकबर ने भी की। पर सबसे ज्यादा पोटा की पैरवी नरेंद्र मोदी ने की।

'पाटिल' नहीं, देश को चाहिए 'पोटा'-'पटेल'

कोई मां नहीं चाहती, उसका बेटा आतंकवादी बने। बेटा हत्यारा हो जाए। तो कोई मां जल्दी से भरोसा नहीं करती। सो अब्दुस सुभान कुरैशी उर्फ तौकीर की मां जुबैदा भी कैसे भरोसा करे। अपन ने सोलह सितंबर को तौकीर का जिक्र किया। विप्रो में कम्प्यूटर इंजीनियर था। इस्तीफा देकर अचानक गायब हो गया। इस्तीफे की वजह लिखी- 'धार्मिक स्टडी करना चाहता हूं।'

दिया जब रंज आतंकियों ने, तो पोटा याद आया

मनमोहन पच्चीस को बुश के साथ एटमी करार करेंगे। अगले ही दिन संयुक्त राष्ट्र के कटघरे में। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने 28 सितम्बर 2001 को दुनियाभर से कहा- 'आतंकवाद से निपटने के लिए सख्त कानून बनाए जाएं।' वाजपेयी ने जरा देर नहीं की। पच्चीस अक्टूबर को अब्दुल कलाम से आर्डिनेंस जारी करवा दिया। वही पोटा हटाकर  मनमोहन किस मुंह से आतंकवाद के खिलाफ बोलेंगे। अपने अभिषेक मनु सिंघवी अभी भी कहते हैं- 'पोटा की कोई जरूरत नहीं। मौजूदा कानून ही काफी।' पर बताएं तो सही- कौन सा कानून।

पाटिल का पटिया उलाल करेंगे लालू

अपने अभिषेक मनु सिंघवी को बधाई। मनमोहन सिंह की जिम्मेदारी अब उनके कंधे पर। सोमवार को शिवराज पाटिल पर इस्तीफे का दबाव बना। तो सिंघवी बोले- 'पाटिल से किसी ने इस्तीफा नहीं मांगा। वह होम मिनिस्टर बने रहेंगे।' अपन पाटिल से तो लाल बहादुर शास्त्री बनने की उम्मीद रखते ही नहीं। पर अपन समझते थे- पाटिल का फैसला मनमोहन सिंह के हाथ। पर अब वह सिंघवी तय करेंगे। तो मनमोहन सिंह का क्या काम। पीएम की हैसियत क्या हो गई।

सौ दिन में आतंकवाद विरोधी 'पोटा' का वादा

यूपीए सरकार आतंकवादियों के प्रति शुरू से नरम रही। अलबता आतंकवादियों से नरमी यूपीए का चुनावी वादा था। यूपीए और कांग्रेस की तारीफ करनी चाहिए। उनने चुनावों में किया वादा निभाया। सत्ता में आते ही आतंकवादियों को राहत दी। पहला कदम उठाया पोटा हटाने का। दूसरा कदम उठाया आतंकवादी की फांसी रुकवाने का। चुनावी वादा निभाने के लिए कांग्रेस की तारीफ करनी चाहिए। अपन तो आतंकवाद के प्रति बेवजह ही इतने गंभीर। एक दर्जन वारदातें ही तो हुई। एक हजार से ज्यादा लोग तो नहीं मरे होंगे।

मोदी बेंगलूर में गरजे बम दिल्ली में फटे

दिल्ली में फिर बम फट गए। जयपुर के बाद अहमदाबाद-सूरत। अब दिल्ली की बारी। कांग्रेस आतंकवाद का खतरा नहीं समझ रही। समझती हो तो आंखें बंद न करती। मनमोहन के साढ़े चार साल में वाजपेयी के छह साल से ज्यादा बम फट चुके। ज्यादा गंभीर आतंकी वारदातें हो चुकी। ज्यादा लोग मर चुके। अलबता कई गुणा लोग मर चुके। पर मनमोहन-सोनिया को पोटा हटाने का जरा मलाल नहीं। पोटा पर मलाल की बात छोड़िए। अपने नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ कानून बनाया।

भाजपा में मुद्दों पर भटकाव

एटमी करार को लेकर भाजपा गंभीर दुविधा में फंसी है। नए खुलासों ने तेवर कड़े करने पर मजबूर तो किया, लेकिन चुनावी मुद्दे में शामिल नहीं हुआ करार विरोध। भाजपा फिलहाल देखो और इंतजार करो के मूड में।

अमेरिकी कांग्रेस से भारतीय एटमी करार को मंजूरी मिलने से ठीक पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उस गंभीर मुश्किल में फंस गए हैं, जो एक दिन आनी ही थी। मनमोहन सिंह तो इस वास्तविकता को जानते ही थे कि एटमी करार के बाद परमाणु विस्फोट नहीं कर सकेगा। वह इस बात को भी अच्छी तरह जानते थे कि अमेरिकी परमाणु ऊर्जा ईंधन कानून के मुताबिक भारत को बिना एनपीटी पर दस्तखत किए ईंधन सप्लाई की गारंटी नहीं मिल सकती।

इस बार फच्चर नहीं अटल ने भेजा आशीर्वाद

आडवाणी-जोशी का डेरा कुमारकुप्पा गेस्ट हाउस में लगा। बीजेपी के सीएम अशोका होटल में जमें। वर्किंग कमेटी के सारे मेंबर चांसलरी होटल में। सारे संगठन मंत्री रामनाश्री होटल में। मीडिया वाले होटल वुडलैंड में। इस तरह जमावडा हुआ बेंगलुरु में बीजेपी का। मजेदार बात बताएं। कन्नड भाषियों में मारवाडियों के दबदबे की। वर्किंग कमेटी का सारा बंदोबस्त अपने राजस्थानी लहर सिंह ने संभाला।

बुश ने क्या कहा,अब तो सुनो मनमोहन भाई

मनमोहन सिंह अब चीन नहीं जाएंगे। गुरुवार को जार्ज बुश का फोन आ गया। अब उसके बाद चीन जाने का क्या मतलब। गांव से कोई बंदा मुंबई जाकर अमिताभ बच्चन से हाथ मिला ले। तो कई दिन हाथ नहीं धोता। सो बुश के फोन के बाद चीन की क्या हैसियत। मनमोहन अब बाईस सितंबर को सीधे न्यूयार्क जाएंगे। चौबीस को वाशिंगटन पहुंचेंगे। पच्चीस को बुश से मुलाकात होगी।

भाषा बनी वोट बैंक की सियासत

भाषा का आंदोलन तो पंजाब और तमिलनाडु में भी चला था, लेकिन उन आंदोलनों का लक्ष्य संस्कृति और परंपराओं की हिफाजत थी। जबकि राज ठाकरे का मराठी प्रेम अपने भाई उध्दव ठाकरे पर भारी पड़ने के लिए वोट बैंक की सियासत का हिस्सा है।

बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने इस हफ्ते अमिताभ बच्चन परिवार को फिर निशाना बनाया। इस बार निशाने पर अमिताभ बच्चन की पत्नी जया बच्चन थी। जया बच्चन मुलत: हिंदी भाषी या उत्तर भारतीय नहीं हैं। भले ही जया बच्चन के पिता तरुण भादुड़ी भोपाल में रहते थे, लेकिन वह थे मुलत: बंगाली। भोपाल में वह स्टेट्समैन के पत्रकार थे, बंगाली होने के बावजूद मध्यप्रदेश में इतना रच-बस गए कि अर्जुन सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में उन्हें पर्यटन विभाग में जिम्मेदार पद सौंप दिया था।

वाजपेयी का संसद के आधे रास्ते से घर लौटना

पंजाब एसेंबली ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को बर्खास्त किया। अपन को ग्यारह सांसदों की बर्खास्तगी याद आ गई। संसद में सवाल पूछने के बदले पैसे लेने का आरोप था। यानि कुर्सी का दुरुपयोग। यों तो भ्रष्टाचार के मामले में सख्ती होनी ही चाहिए। पर जांच पड़ताल के बाद ही। सांसदों की बर्खास्तगी के समय कोई जांच नहीं हुई। स्टिंग आपरेशन विपक्षी सांसदों के खिलाफ था। न दलील चली, न वकील। अपन को तब भी डर था- 'स्टिंग आपरेशन गले की हड्डी बनेंगे।'

अमेरिकी घुड़की से ठिठकी सरकार

एटमी करार को एनएसजी से हरी झंडी क्या मिली। कांग्रेस में फील गुड फैक्टर शुरू हो गया। अपन को राजस्थान का एक कांग्रेसी बता रहा था- 'डील ने कांग्रेस की उम्मीद बना दी। वरना तो वसुंधरा का पलड़ा भारी था।' एटमी करार कांग्रेस को चुनाव जिता देगा। अपन को तो भरोसा नहीं होता। पर इस देश का क्या पता। कांग्रेस के फील गुड का अंदाज पार्टी की रोजाना ब्रीफिंग में लगा। वीरप्पा मोइली अगल-बगल में जयंती-मनीष को बिठाकर जमकर बोले।

अमेरिकी चुनाव का असली मुद्दा अर्थव्यवस्था

शुरू में ऐसा लगता था कि बुश प्रशासन के समय अफगानिस्तान और इराक युध्द ही चुनावी मुद्दा बनेगा। अब जबकि चुनाव का दूसरा दौर शुरू हो गया है, तो अर्थव्यवस्था प्रमुख मुद्दा बनकर उभर आया है। अब देखना यह है कि अमेरिकी वोटर बेहतर अर्थव्यवस्था के लिए जोहन मैककेन पर भरोसा करेगी या बराक ओबामा पर।

अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव अब दूसरे दौर में पहुंच गया है। पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार बराक ओबामा के मुकाबले जोहन मैककेन मौजूदा राष्ट्रपति जार्ज बुश की रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार घोषित हो चुके हैं।

करार हुआ तो पलड़ा भारी होगा मैककेन का

मुलायम की चिंता दूर कर दी अमर सिंह ने। बुश प्रशासन की चिट्ठी से मुलायम घबरा गए थे। मनमोहन से मुलाकात कर अमर सिंह बोले- 'नेता जी नाहक ही घबरा गए। मनमोहन को हम कांग्रेस का नेता नहीं मानते। जो भरोसा न करें। उनने पीएम के नाते संसद से नाता किया है- देश की सुरक्षा से सौदा नहीं करेंगे। सो भरोसा न करने वाली कोई बात नहीं।'

बढ़ रहा है सत्ता का असंवैधानिक दुरुपयोग

केंद्रीय मंत्री बेलगाम हो गए हैं, प्रधानमंत्री उनकी लगाम कसने में लाचार हैं। नतीजा यह निकला है कि मंत्री अपनी ही सरकार के फैसले की खुलेआम आलोचना कर रहे हैं और चुनी हुई राज्य सरकारों के खिलाफ अपने मंत्रालय से समानांतर सरकार चलाने लगे हैं।

बिहार में बाढ़ के पानी ने कहर ढाया तो वहां के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को राजनीतिक बिसात की याद आ गई। अपने यहां हर मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से देखने की गंभीर बीमारी पैदा हो गई है।

पर मनमोहन के चेहरे पर कोई शिकन नहीं

अपनी बातें रह-रहकर सही साबित हुई। अपने पुराने पाठक जानते होंगे। अपन ने हाईड एक्ट को भारत विरोधी बताया था। मनमोहन-प्रणव ने भी इसे माना। पर संसद में भरोसा दिया- 'हाईड एक्ट हम पर लागू नहीं होगा। वन-टू-थ्री ड्राफ्ट का इंतजार करिए।' पर तीन अगस्त 2007 की रात वन-टू-थ्री का ड्राफ्ट आने वाला था। तो नारायणन और मेनन अटल-आडवाणी से मिले। ड्राफ्ट भारत के माकूल नहीं था।

जम्मू में झुका लिया अब गुजरात की बारी

जम्मू पर आडवाणी की चिट्ठी के बाद चारा नहीं रहा। अमरनाथ बोर्ड को जमीन देनी पड़ी। पर बुश की चिट्ठी तो मनमोहन को कहीं का नहीं छोड़ेगी। एटमी करार ही छोड़ना पड़ेगा। जार्ज बुश ने एनएसजी को लिखा है- 'भारत ने न्यूक टेस्ट किया। तो करार खत्म हो जाएगा। ईंधन की सप्लाई बंद हो जाएगी।' अपन यही शक शुरू से जाहिर कर रहे थे। पर मनमोहन संसद को गुमराह करते रहे।

यह आतंकवादियों के तुष्टिकरण का नतीजा

केंद्र सरकार ने नया इतिहास रचा। पीएम जब कमजोर हो, तो ऐसा होना ही था। मंत्री राष्ट्रपति को मेमोरेंडम देने जा पहुंचा। यह सोनिया-मनमोहन नामक सत्ता के दो केंद्रों का नतीजा। संविधान का मजाक बनने लगा। मनमोहन ने अजय माकन को मंत्री बनाया। सोनिया ने पार्टी की जिम्मेदारी सौंप दी। असल में सत्ता के दुरुपयोग का यह नया उदाहरण।  जो केंद्रीय मंत्रियों को गैर कांग्रेसी राज्यों की जिम्मेदारी दी गई। उड़ीसा-झारखंड अजय माकन को। कर्नाटक पृथ्वीराज चव्हाण को। प्रियरंजन दासमुंशी को बंगाल की अध्यक्षी। सैफुद्दीन सोज को जम्मू-कश्मीर की। अपने सुरेश पचौरी अब मंत्री नहीं रहे। पर एमपी का अध्यक्ष मंत्री रहते ही बनाया।

नहीं समझ पा रही देश की नब्ज कांग्रेस

बड़ा ख्वाब देखने में कोई हर्ज नहीं। ख्वाब देखों, तो बड़ा देखो। सो, कांग्रेस फिर बड़े-बड़े ख्वाब देखने लगी। पहले 1998 में पचमढ़ी में ख्वाब देखा था। तब तय किया था- 'कांग्रेस गठजोड़ की राजनीति नहीं करेगी।' असल में तब कांशीराम ने ताजा-ताजा झटका दिया था। सीताराम केसरी से चुनावी गठजोड़ किया। जीतकर बीजेपी की गोदी में जा बैठे। पर 1999 में सरकार बनाने का ख्वाब टूटा। तो सोनिया ने पांच साल बाद शिमला में पचमढ़ी का फैसला पलट दिया।