August 2008

पीएम की दलील वाजिब पर समस्या तो हल हो

मनमोहन के बाद अब मुशर्रफ की अग्निपरीक्षा। अपने यहां जम्मू का संकट। तो वहां कारगिल करने वाला संकट में। जम्मू कश्मीर सिर्फ अपने लिए नहीं। अलबत्ता पाकिस्तान के लिए भी मुसीबत। मुसीबत कोई बताकर नहीं आती। इसलिए तो मुशर्रफ को ऐन वक्त पर अपना चीन दौरा रद्द करना पड़ा। पर अपनी सोनिया पूरे परिवार के साथ चीन चली गईं। अपने कलमाड़ी ने राहुल को ओलंपिक मशाल के लिए बुलाया। तो डांट पड़ी थी। तब तिब्बती मशाल की मुखालफत कर रहे थे। पर अब सोनिया-राहुल-प्रियंका ही ओलंपिक देखने नहीं गए। अलबत्ता कांग्रेस के भावी रहनुमा भी उद्धाटन समारोह में दिखेंगे।

जम्मू-कश्मीर में सभी कर रहे हैं- सांप्रदायिक राजनीति

गुलामनबी आजाद भले ही खुले तौर पर न मानें, लेकिन वास्तविकता यही है कि जम्मू कश्मीर के चुनाव नजदीक होने के कारण पीडीपी को मिलने वाले मुस्लिम वोटों के फायदे को रोकने के लिए ही उन्होंने श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन वापस ली थी। इससे साबित होता है कि जम्मू कश्मीर की मौजूदा सांप्रदायिक आग जम्मू के हिंदुओं की वजह से नहीं है, अलबत्ता घाटी के मुस्लिम वोट हासिल करने के लिए पीडीपी की ओर से अपनाई गई सांप्रदायिकता है। यही वजह है कि कांग्रेस बचाव की मुद्रा में है, क्योंकि जम्मू कश्मीर की सियासत उसके लिए दो धारी तलवार बन गई है।

श्राइन बोर्ड के झगड़े का हल तो है, कोई चाहे तो

आज बात कांग्रेसी फिरकापरस्ती की। सोचो, हज कमेटी को जमीन देने का सवाल होता। संघ परिवारी विरोध कर रहे होते। तो क्या कोई गुलामनबी आजाद अपने फैसले से पलटता। पर अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने का हुर्रियत कांफ्रेंस ने विरोध किया। तो गुलामनबी आजाद अपने फैसले से पलट गए। बात सिर्फ श्राइन बोर्ड को जमीन की नहीं। बात सिमी के मामले में होम मिनिस्टर के लुंज-पुंज होने की भी।  यों लालुओं-मुलायमों से पूछो। तो सिर्फ बीजेपी-शिवसेना ही फिरकापरस्त।

मनमोहन पर अब जल्द वादे निभाने का दबाव

राजनीति में जो दिखता है, होता नहीं। जो होता है, वह दिखता नहीं। शरद पवार जब बोले- 'सपा की सरकार में शामिल होने में दिलचस्पी नहीं।' तो अपन असलियत समझ गए। मुलायम-अमर की उतावली समझ आ गई। इसीलिए तो बुधवार को अमर-मुलायम पीएम से मिलेंगे। पर अमर-मुलायम से ज्यादा उतावली तो शिबू सोरेन को। सरकार जब संकट में थी। तो सोनिया ने वादा किया था। सो अब शिबू ने सोनिया को याद कराया।

स्टिंग सीडी देख कांग्रेस ने अमर से पल्ला झाड़ा

उमा भारती की सीडी पर अरुण जेटली के सबूत भारी पड़े। उमा भी अजीब-ओ-गरीब। एटमी करार का विरोध किया। करार पर सरकार गिरने की नौबत आई। तो सरकार बचाने वाले अमर सिंह से जा मिली। इसे कहते हैं- विनाशकाले विपरीत बुध्दि। अब जेटली के निशाने पर अमर सिंह। राजनाथ के बीजेपी चीफ बनने के बाद जेटली पहली बार इतने एक्टिव। इसकी वजह भी अपन बता दें।

बीजेपी ने जांच एजेंसी बन अमर-उमा पर फंदा कसा

गच्चा खाई बीजेपी ने सीएनएन-आईबीएन से तलाक ले लिया। सो अब पति-पत्नी के पुराने रिश्तों पर बोलने को तैयार नहीं। यों हमलावर होने में कोई कसर नहीं। हमला करने खुद अरुण जेतली को सामने आना पड़ा। उनने सीएनएन-आईबीएन पर जम कर हमला किया। अपन ने बाद में जेतली से पूछा -'मीडिया पार्टनर चुनने में गलती हुई क्या?' जेतली को जवाब सोचने में टाईम लगा। फिर बोले-'तलाक के बाद यह नहीं पूछा जाता-आपके रिश्ते कैसे थे।'

दक्षेस ही नहीं, अमेरिका भी आईएसआई से परेशान

दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन के गठन के समय ही तय हो गया था कि इस मंच से द्विपक्षीय मसले नहीं उठाए जाएंगे। अलबत्ता शिखर सम्मेलन के समय द्विपक्षीय बातचीत में आपसी मसले उठाए जा सकते हैं। इसलिए इस बात की कोई गुंजाइश ही नहीं थी कि भारत दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क-दक्षेस) के मंच से आतंकवाद के मुद्दे पर कोई दोषारोपण करेगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत और अफगानिस्तान की आतंकवादी वारदातों में आईएसआई की भूमिका पर अपनी बात पाक के प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी से सीधी बातचीत में उठाना ही उचित समझा।

मनमोहन का यह तोहफा इंदिरा को कबूल नहीं था

मनमोहन सिंह लोकसभा में विश्वासमत पेश करने खड़े हुए। तो उनने यूपीए सरकार बनाने में हरकिशन सिंह सुरजीत की तारीफ की। शुक्रवार को एटमी करार का आपरेशनालाइजेशन शुरू हुआ। तो हरकिशन सिंह सुरजीत इस दुनिया में नहीं रहे। सुरजीत क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे। वे गांधीवादी नहीं। शहीद-ए-आजम भगत सिंह की धारा के थे। भगत सिंह के साथ मिलकर काम किया। पकड़े गए, तो अदालत में अपना नाम बताया था- 'लंदनतोड़ सिंह।'

वोट-नोट की सियासत में मीडिया के भी जले हाथ

पहले खुद स्टिंग आपरेशन में शामिल होकर पीछे हटने से सीएनएन-आईबीएन चैनल की विश्वसनीयता को भाजपा ने कटघरे में खड़ा कर दिया है। चैनल का बायकाट मीडिया को सियासत से दूर रखने पर सोचने के लिए बाध्य करे, तो मीडिया का ही भला होगा।

कांग्रेस ने लोकसभा में वोट की सियासत भले ही जीत ली हो, नोट की सियासत में अभी बुरी तरह उलझी हुई है। जिस तरह नोटों का बंडल दराज में रखते बंगारू लक्ष्मण भाजपा का पीछा नहीं छोड़ रहे, वैसे ही लोकसभा के टेबल पर रखी गई नोटों की गड्डियां कभी भी कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ेंगी।

चैनल से भिड़ने के मूड में आ ही गई बीजेपी

अपन ने पिछले दो दिन सीएनएन-आईबीएन पर लिखा। सीएनएन-आईबीएन ने सांसदों की खरीद-फरोख्त का स्टिंग आपरेशन किया। पर दिखाया नहीं। अपन ने तीस जुलाई को बताया था- 'चैनल दगा दे गया। अब तीनों सांसदों का चैनल दफ्तर के बाहर धरने का इरादा।' अपना अंदाज सौ फीसदी सही निकला। अभी धरने का ऐलान तो नहीं हुआ। पर बीजेपी चैनल से दो-दो हाथ करने पर आमादा। गुरुवार को बीजेपी ने चैनल के बायकाट का ऐलान कर दिया।