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August 2008

पाक कुएं से निकल कर खाई की ओर

बेनजीर भुट्टो के पति आसिफ अली जरदारी ने जब युसुफ रजा गिलानी को प्रधानमंत्री पद के लिए पीपीपी के उम्मीदवार के तौर पर चुना था तो पाकिस्तान में उन्हें मिस्टर सोनिया गांधी कहा गया। सोनिया गांधी के बारे में भारत और बाहर यह धारणा बनी हुई है कि उन्होंने प्रधानमंत्री पद की कुर्सी ठुकरा कर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था। आज यह मुद्दा नहीं है कि उस समय के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और सोनिया गांधी के बीच क्या बात हुई थी।

इटली के इशारे पर उड़ीसा में सीबीआई जांच की बात

लो विकास दर पर भी अपनी भविष्यवाणी सही निकली। अपने मनमोहन-चिदंबरम जब दस फीसदी का ढोल पीट रहे थे। तब अपन ने 13 अगस्त को लिखा था- 'देख लेना विकास दर की भी पोल खुलेगी।' वही हुआ। अप्रेल-मई-जून के आंकड़े आ गए। तीन महीनों में विकास दर 7.9 फीसदी रही। जिस मुद्दे को उठा लीजिए। बंटाधार किया मिलेगा। जीडीपी और महंगाई की बात तो सब के सामने। आतंकवाद-भ्रष्टाचार भी किसी से छिपा नहीं।

गुजरात मॉडल ही बेड़ा पार करेगा भाजपा का

कांग्रेस जीती तो सुभाष यादव को ही पेश करना पड़ सकता है पचौरी का नाम, रैलियों में प्रस्ताव पास करके कांग्रेसी मुख्यमंत्री नहीं बनते। मुख्यमंत्री तो विधायक दल की बैठक में सोनिया गांधी को अधिकृत करने वाले प्रस्ताव से ही तय होगा।

मध्य प्रदेश में चुनावी शतरंज के लिए बिसात बिछ गई है। कांग्रेस अभी तय नहीं कर पा रही कि वह किसे चुनावी बारात का दूल्हा बनाए। हालांकि कांग्रेस में दूल्हों की कमी नहीं, अलबत्ता दूल्हे ज्यादा बाराती कम हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की राजनीति चुपके से काम करने की रहती है।

बीजेपी को नहीं पची हत्या की नक्सली थ्योरी

राजनीति नेता से क्या-क्या नहीं करवाती। अपने मनमोहन सिंह को ही देखो। जब तक सोनिया को लेकर बिहार की बाढ़ का हवाई सर्वे नहीं किया। तब तक लोग डूबते-मरते, भूख से बिलबिलाते रहे। केंद्र से राहत नहीं भेजी। सोनिया-लालू-पासवान समेत शिव की बारात लेकर बिहार गए। तब राहत राशि का मुंह खोला। राजनीति जम्मू में भी कम नहीं हुई। कंधमाल में भी कम नहीं हो रही।

नक्सली-चर्च गठजोड़ तो और खतरनाक होगा

उड़ीसा का कंधमाल इलाका। जहां आजकल हिंदू-ईसाई सांप्रदायिक तनाव। अपन को 22 जनवरी 1999 की याद आ गई। तब ईसाई मिशनरी ग्राहिम स्टेन्स की हत्या हुई थी। स्टेन्स अपने दो बेटों के साथ कार में सो रहे थे। तीनों को जिंदा जला दिया गया। तब अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था- 'स्टेन्स के हत्यारों को माफ नहीं किया जाएगा।' अब अस्सी साल के स्वामी लक्ष्मणानंद की हू-ब-हू वैसे ही हत्या हुई।

टीडीपी के बाद अब तिरुपति से प्रजाराज्यम्

तिरुपति की ठीक वही जगह। जहां मार्च 1982 में नंदमूरि तारक रामाराव ने टीडीपी बनाई थी। यानी एनटीआर की तेलुगूदेशम पार्टी। छब्बीस साल बाद उसी तिरुपति में अब प्रजाराज्यम्। एक और फिल्मी हस्ती चिरंजीवी का नया राजनीतिक दल। फर्क सिर्फ इतनाभर। एनटीआर ने मुअजिज लोगों का महानाडु बुलाया था। पर चिरंजीवी ने लाखों लोगों की रैली कर डाली। लाखों लोगों का हुजूम अपन ने ठीक इसी जगह 1992 में देखा था।

कश्मीर के हालात नेहरू की गलतियों का नतीजा

कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी बेहद खफा दिखे। खफा दिखे- बीजेपी ने उन्हें आतंकियों का चीयर्स लीडर क्यों कहा। इसका जवाब अरुण जेटली ने बाखूबी दिया। वह बोले- 'मुस्लिम तुष्टिकरण अब पुरानी बात हो गई। कांग्रेस अब अलगाववादियों-आतंकवादियों का तुष्टिकरण करने लगी।' यह बात अपन ने तेईस अगस्त को लिखी ही थी।

संसदीय समिति ऐसी जांच में सक्षम नहीं

सांसदों की खरीद-फरोख्त के मामले में जांच समिति का काम करीब-करीब पूरा हो गया है। कार्यकाल बढ़ाया नहीं गया, तो इस हफ्ते रिपोर्ट सौंप दी जाएगी। लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी भी यह मानकर चल रहे हैं कि रिपोर्ट इस हफ्ते आ जाएगी। इसलिए उन्होंने चार सितंबर को संसद की गिरती साख पर गोलमेज कांफ्रेंस बुलाने का फैसला किया है। सोमनाथ चटर्जी को एक कड़े स्पीकर के तौर पर याद किया जाएगा।

प्याज खाकर जूते खाने वाली बात न हो जाए

अपन ने कल कांग्रेस के चार संकटों का जिक्र किया। जम्मू, स्टिंग, शिबू और एनएसजी। आज उन चारों की आगे पड़ताल। हुआ वही, जो अपन को शुरू से लगता था। एनएसजी ने एटमी ऊर्जा ईंधन व्यापार की छूट नहीं दी। पहली अगस्त को जब आईएईए ने करार पर मुहर लगाई। तब अपन ने लिखा था- 'रुकावटें अभी खत्म नहीं हुई। एनएसजी की शर्तें तो अपन की हालत ईरान जैसी बना देगी।'

कांग्रेस के चार संकट,जम्मू, स्टिंग, शिबू और एनएसजी

यूपीए सरकार की एक मुसीबत हो तो बताएं। आखिरी दिनों में कुकरमुत्तों की तरह उग आई मुसीबतें। आखिरी दिनों की मुसीबत कितनी भारी पड़ती है। यह बीजेपी से बेहतर कोई नहीं जानता। आखिरी महीने में प्याज के भाव ने दिल्ली में बीजेपी के आंसू निकाले। यों कांग्रेस की मुसीबतें तो सारी खुद की खड़ी की हुई।

और अब अलगाववादियों का तुष्टिकरण

अमरनाथ यात्रा के मार्ग में पड़ने वाले बालताल गांव के पास जंगलात विभाग की जमीन यात्रा के दौरान दो महीनों के लिए श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई थी। अलगाववादी हुर्रियत कांफ्रेंस की ओर से इसका कड़ा विरोध किए जाने के कारण गुलाम नबी सरकार ने अपने इस फैसले को वापस लिया। जम्मू कश्मीर के लोग इसे तत्कालीन कांग्रेस सरकार की आतंकवादियों के तुष्टिकरण का कदम मानते हैं। यही वजह है कि दो महीने बीत जाने के बावजूद जम्मू के लोगों का आंदोलन मध्यम नहीं पड़ा है।

एनएसजी को फच्चर फंसाने का मौका दिया इराक ने

एटमी करार के लिए अपने मनमोहन ने कितने पापड़ बेले। लेफ्ट की बैसाखी छोड़ मुलायम का सहारा लिया। वह भी कम पडा। तो सांसदों की खरीद-फरोख्त का कलंक माथे लगाया। आज उसी करार का इम्तिहान विएना में होगा। एनएसजी के पैंतालीस देश जांच पड़ताल करेंगे। एनएसजी की हरी झंडी मिली। तभी करार अमरीकी कांग्रेस में मंजूरी के लिए जाएगा। एनएसजी का फच्चर फंसा। तो समझो करार का राम नाम सत्य।

मुशर्रफ का फच्चर निकला तो अब इफ्तिकार चौधरी

पाकिस्तान से चार खबरें चौंकाने वाली आई। पहली- अपनी अरुंधति राय ने कहा है- 'कश्मीरियों को भारत से आजादी चाहिए।' एपीपी ने यह खबर एक इंटरव्यू के हवाले से दी। अरुंधति राय को बहुतेरे लोग इज्जत की नजर से देखते होंगे। अपन पहले भी नहीं देखते थे। पंचमड़ी में जंगलात की जमीन पर कब्जे ने अपना मन खट्टा कर दिया था। अब तो उनने देशद्रोह का काम किया।

तो मुशर्रफ जुगाड़ नहीं कर पाए एबस्टेन का

परवेज मुशर्रफ को जाना पड़ा। जाना नहीं चाहते थे। भले ही उनने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा- 'महाभियोग में मैं हारूं, या जीतूं। हार देश की होती। तो मैं इस्तीफा दे रहा हूं।' परवेज मुशर्रफ भले ही अब कुछ कहें। कितना ही जम्हूरियत प्रेमी होने का दावा करें। पर असलियत किसी से छिपी नहीं। मुशर्रफ की नीयत में शुरू से खोट था। नीयत में खोट न होता। तो भंग हो रही असेंबलियों से खुद को न चुनवाते।

गठबंधनों पर ही निर्भर होगी चुनावी बिसात

लाल किले के प्राचीर से मनमोहन सिंह का आखिरी भाषण लाचार प्रधानमंत्री की तरह हुआ। एक ऐसा लाचार प्रधानमंत्री जो महंगाई से लेकर आतंकवाद की समस्या तक से जूझ रहा है। इसके बावजूद सोनिया गांधी अगर उन्हीं को सामने रखकर चुनावी दंगल में कूदने का मन बना रही हैं तो कांग्रेस भारी रिस्क लेगी। लालकिले से भाषण देते समय मनमोहन सिंह के चेहरे पर जीत के कोई हाव-भाव नहीं थे।

अपनी जम्हूरियत और उनकी जम्हूरियत का फर्क

यों अपन आज बात करेंगे जश्न-ए-आजादी की। फिर भी शुरूआत मनमोहन सिंह को एक और बधाई से कर दें। अबके महंगाई के नए रिकार्ड पर बधाई। तीन महीने पहले मुद्रास्फीति सात फीसदी हुई। तब अखबारों में बैनर छपे थे- 'महंगाई सातवें आसमान पर।' अब 12.44 फीसदी होकर महंगाई तेरहवें आसमान पर। पर लीड भी नहीं छपती। अपन महंगाई के इतने अभ्यस्त हो गए। मनमोहन-चिदंबरम को इसीलिए महंगाई की फिक्र नहीं। सो सोलह साल का रिकार्ड तोड़ने पर दोनों को बधाई। सोलह साल पहले मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बने थे। तो यह रिकार्ड बनाया था। जिसकी बराबरी आज फिर से कर ली है। अपन बाजार से जो सब्जी बीस रुपए की लाते थे। अब पचास रुपए में भी नहीं आ

बधाईयों वाले खूब काम कर रही सरकार

अपने मनमोहन सिंह को फिर बधाई। बधाई के पात्र अब अभिषेक मनु सिंघवी भी बन गए। पर पहले बात मनमोहन सिंह की। अपन ने आठ अगस्त को खुलासा किया था। खुलासा था- मनमोहन की आडवाणी से बातचीत का। मनमोहन ने आडवाणी से कहा था- 'आर्थिक नाकेबंदी बंद न हुई। तो अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन जाएगा। पाकिस्तान संयुक्तराष्ट्र में राहत सामग्री भेजने की मांग कर दे। तो क्या होगा। सेबों के उत्पादक अपने ट्रक मुजफ्फराबाद की ओर मोड़ दें। तो क्या होगा।' आखिर बारह अगस्त को वह सब कुछ हो गया।

तेरह साल पुराना कर्फ्यू इतनी पुरानी महंगाई भी

मनमोहन सिंह को बधाई। गुलाम नबी आजाद को भी। दोनों ने रिकार्ड तोड़ दिया। पर इससे पहले कि अपन इन दोनों के बारे में लिखें। जरा नरसिंह राव को याद कर लें। बात तब की जब वह पीएम नहीं बने थे। किसी ने उनसे कहा- 'आप भी हो सकते हैं पीएम।' तो उनने कहा था- 'मेरा पीएम बनना तबाही होगा।' राव का कहा सच निकला। एस बी चव्हाण उनके गृहमंत्री थे। उनने अपने इंटरव्यू में कहा- 'मैं प्रधानमंत्री के कारण बाबरी ढांचा नहीं बचा पाया।'

देर से ही सही, दुरुस्त रहा 11 अगस्त का दिन

ऐतिहासिक हो गया ग्यारह अगस्त। अभिनव बिंद्रा ने इतिहास रच दिया। यों तो अस्सी साल पहले अपन ओलंपिक में शुरू हुए। पर अस्सी साल में अपन हॉकी पर ही अटके रहे। जितने भी स्वर्ण मेडल मिले। सब हॉकी की बदौलत ही। बाकी खिलाड़ी तो रजत और कांस्य से आगे नहीं बढ़े। सो अभिनव बिंद्रा ने रिकार्ड बनाया। पर ओलंपिक शुरू हुए। तो अपन ने लिखा था- 'ओलंपिक बीजिंग में, खेल इस्लामाबाद में।' सो ओलंपिक में अपन ने पहला स्वर्ण जीत इतिहास रचा। तो उधर पाकिस्तान में भी राजनीतिक इतिहास की इबारत लिखी गई।

संसदीय जांच समिति का संकट

दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में आजकल हर्षद मेहता की चर्चा है। हर्षद मेहता ने 1990-91 में पांच हजार करोड़ का शेयर घोटाला करके पूरी दुनिया को चौँका दिया था। उन्होंने इससे भी ज्यादा तब चौंकाया था जब कहा कि उन्होंने नरसिंह राव को एक करोड़ रुपए की रिश्वत से उनका मुंह बंद किया था। हर्षद मेहता ने चार नवंबर 1991 को खुद प्रधानमंत्री आवास जाकर नोटों से भरे दो सूटकेस देने की बात कही थी।

ओलंपिक बीजिंग में खेल इस्लामाबाद में

बीजिंग में ओलंपिक की शुरूआत जोरदार हुई। जैसे अपनी दीवाली में चीन की लड़िया-फुलझड़ियां आ चुकी। हू-ब-हू वैसे ही चीनी लड़ियों-फुलझड़ियों से शुरूआत हुई। ऐसा लगा- जैसे चीन में दीवाली मन रही हो। ओलंपिक का 29वां महाकुंभ। आठवें महीने की आठ तारीख। सन् भी 2008 टाइम भी आठ बजकर आठ मिनट, आठ सेकेंड। सिर्फ बीजिंग नहीं। पूरा चीन दुल्हन की तरह सजाया गया।

पीएम की दलील वाजिब पर समस्या तो हल हो

मनमोहन के बाद अब मुशर्रफ की अग्निपरीक्षा। अपने यहां जम्मू का संकट। तो वहां कारगिल करने वाला संकट में। जम्मू कश्मीर सिर्फ अपने लिए नहीं। अलबत्ता पाकिस्तान के लिए भी मुसीबत। मुसीबत कोई बताकर नहीं आती। इसलिए तो मुशर्रफ को ऐन वक्त पर अपना चीन दौरा रद्द करना पड़ा। पर अपनी सोनिया पूरे परिवार के साथ चीन चली गईं। अपने कलमाड़ी ने राहुल को ओलंपिक मशाल के लिए बुलाया। तो डांट पड़ी थी। तब तिब्बती मशाल की मुखालफत कर रहे थे। पर अब सोनिया-राहुल-प्रियंका ही ओलंपिक देखने नहीं गए। अलबत्ता कांग्रेस के भावी रहनुमा भी उद्धाटन समारोह में दिखेंगे।

जम्मू-कश्मीर में सभी कर रहे हैं- सांप्रदायिक राजनीति

गुलामनबी आजाद भले ही खुले तौर पर न मानें, लेकिन वास्तविकता यही है कि जम्मू कश्मीर के चुनाव नजदीक होने के कारण पीडीपी को मिलने वाले मुस्लिम वोटों के फायदे को रोकने के लिए ही उन्होंने श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन वापस ली थी। इससे साबित होता है कि जम्मू कश्मीर की मौजूदा सांप्रदायिक आग जम्मू के हिंदुओं की वजह से नहीं है, अलबत्ता घाटी के मुस्लिम वोट हासिल करने के लिए पीडीपी की ओर से अपनाई गई सांप्रदायिकता है। यही वजह है कि कांग्रेस बचाव की मुद्रा में है, क्योंकि जम्मू कश्मीर की सियासत उसके लिए दो धारी तलवार बन गई है।

श्राइन बोर्ड के झगड़े का हल तो है, कोई चाहे तो

आज बात कांग्रेसी फिरकापरस्ती की। सोचो, हज कमेटी को जमीन देने का सवाल होता। संघ परिवारी विरोध कर रहे होते। तो क्या कोई गुलामनबी आजाद अपने फैसले से पलटता। पर अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने का हुर्रियत कांफ्रेंस ने विरोध किया। तो गुलामनबी आजाद अपने फैसले से पलट गए। बात सिर्फ श्राइन बोर्ड को जमीन की नहीं। बात सिमी के मामले में होम मिनिस्टर के लुंज-पुंज होने की भी।  यों लालुओं-मुलायमों से पूछो। तो सिर्फ बीजेपी-शिवसेना ही फिरकापरस्त।

मनमोहन पर अब जल्द वादे निभाने का दबाव

राजनीति में जो दिखता है, होता नहीं। जो होता है, वह दिखता नहीं। शरद पवार जब बोले- 'सपा की सरकार में शामिल होने में दिलचस्पी नहीं।' तो अपन असलियत समझ गए। मुलायम-अमर की उतावली समझ आ गई। इसीलिए तो बुधवार को अमर-मुलायम पीएम से मिलेंगे। पर अमर-मुलायम से ज्यादा उतावली तो शिबू सोरेन को। सरकार जब संकट में थी। तो सोनिया ने वादा किया था। सो अब शिबू ने सोनिया को याद कराया।

स्टिंग सीडी देख कांग्रेस ने अमर से पल्ला झाड़ा

उमा भारती की सीडी पर अरुण जेटली के सबूत भारी पड़े। उमा भी अजीब-ओ-गरीब। एटमी करार का विरोध किया। करार पर सरकार गिरने की नौबत आई। तो सरकार बचाने वाले अमर सिंह से जा मिली। इसे कहते हैं- विनाशकाले विपरीत बुध्दि। अब जेटली के निशाने पर अमर सिंह। राजनाथ के बीजेपी चीफ बनने के बाद जेटली पहली बार इतने एक्टिव। इसकी वजह भी अपन बता दें।

बीजेपी ने जांच एजेंसी बन अमर-उमा पर फंदा कसा

गच्चा खाई बीजेपी ने सीएनएन-आईबीएन से तलाक ले लिया। सो अब पति-पत्नी के पुराने रिश्तों पर बोलने को तैयार नहीं। यों हमलावर होने में कोई कसर नहीं। हमला करने खुद अरुण जेतली को सामने आना पड़ा। उनने सीएनएन-आईबीएन पर जम कर हमला किया। अपन ने बाद में जेतली से पूछा -'मीडिया पार्टनर चुनने में गलती हुई क्या?' जेतली को जवाब सोचने में टाईम लगा। फिर बोले-'तलाक के बाद यह नहीं पूछा जाता-आपके रिश्ते कैसे थे।'

दक्षेस ही नहीं, अमेरिका भी आईएसआई से परेशान

दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन के गठन के समय ही तय हो गया था कि इस मंच से द्विपक्षीय मसले नहीं उठाए जाएंगे। अलबत्ता शिखर सम्मेलन के समय द्विपक्षीय बातचीत में आपसी मसले उठाए जा सकते हैं। इसलिए इस बात की कोई गुंजाइश ही नहीं थी कि भारत दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क-दक्षेस) के मंच से आतंकवाद के मुद्दे पर कोई दोषारोपण करेगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत और अफगानिस्तान की आतंकवादी वारदातों में आईएसआई की भूमिका पर अपनी बात पाक के प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी से सीधी बातचीत में उठाना ही उचित समझा।

मनमोहन का यह तोहफा इंदिरा को कबूल नहीं था

मनमोहन सिंह लोकसभा में विश्वासमत पेश करने खड़े हुए। तो उनने यूपीए सरकार बनाने में हरकिशन सिंह सुरजीत की तारीफ की। शुक्रवार को एटमी करार का आपरेशनालाइजेशन शुरू हुआ। तो हरकिशन सिंह सुरजीत इस दुनिया में नहीं रहे। सुरजीत क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे। वे गांधीवादी नहीं। शहीद-ए-आजम भगत सिंह की धारा के थे। भगत सिंह के साथ मिलकर काम किया। पकड़े गए, तो अदालत में अपना नाम बताया था- 'लंदनतोड़ सिंह।'

वोट-नोट की सियासत में मीडिया के भी जले हाथ

पहले खुद स्टिंग आपरेशन में शामिल होकर पीछे हटने से सीएनएन-आईबीएन चैनल की विश्वसनीयता को भाजपा ने कटघरे में खड़ा कर दिया है। चैनल का बायकाट मीडिया को सियासत से दूर रखने पर सोचने के लिए बाध्य करे, तो मीडिया का ही भला होगा।

कांग्रेस ने लोकसभा में वोट की सियासत भले ही जीत ली हो, नोट की सियासत में अभी बुरी तरह उलझी हुई है। जिस तरह नोटों का बंडल दराज में रखते बंगारू लक्ष्मण भाजपा का पीछा नहीं छोड़ रहे, वैसे ही लोकसभा के टेबल पर रखी गई नोटों की गड्डियां कभी भी कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ेंगी।